इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों की मदद और उन्हें मुआवजा देने के मामले में सरकारी कामकाज के तरीके पर गहरी नाराजगी जताई है। पीड़ितों के लिए एक मजबूत और बेहतर पॉलिसी (नीति) लागू करने में नाकाम रहने पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य के गृह सचिव (प्रिंसिपल सेक्रेटरी होम) और महिला एवं बाल कल्याण विभाग के सचिव को खुद अदालत में हाजिर होने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और लोगों की जान-माल की रक्षा करना पूरी तरह से राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे गंभीर अपराधों में, जिससे किसी की जिंदगी हमेशा के लिए बर्बाद हो जाती है, सरकार का काम सिर्फ अपराधी को पकड़कर सजा दिलाने तक खत्म नहीं हो जाता। 

सिर्फ एक बार पैसा दे देना काफी नहीं: हाईकोर्ट

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ एक बार कुछ पैसा यानि मुआवजा थमा देना ही काफी नहीं है। सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि पीड़ित दोबारा अपने पैरों पर खड़े हो सकें और समाज में सम्मान से जी सकें। कोर्ट ने कहा कि बार-बार मौका देने और पिछले आदेशों में सीधे सवाल पूछने के बावजूद सरकार की तरफ से कोई सही जवाब नहीं मिला कि आखिर अब तक एसिड अटैक पीड़ितों के लिए एक ठोस नीति क्यों नहीं बनाई गई। सरकारी कागजों से ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि इस मामले को सुलझाने के लिए बड़े स्तर पर कोई गंभीर कोशिश की गई है।

फर्रुखाबाद की पीड़ित महिला की अर्जी पर चल रही है सुनवाई

ये आदेश जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने फर्रुखाबाद की रहने वाली एक एसिड अटैक सर्वाइवर की अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया। पीड़ित महिला ने मुआवजा बढ़ाने और सरकारी नौकरी देने की मांग की है। इस मामले में फरवरी 2026 से हाईकोर्ट में लगातार सुनवाई चल रही है। जब महिला के साथ यह हादसा हुआ था, तब वह सिर्फ 24 साल की थी। उसे अब तक कुल मिलाकर सिर्फ 6 लाख रुपये ही मिले हैं। कोर्ट ने कहा कि घटना के 9 साल बीत जाने के बाद भी सरकार के पास मदद का कोई ठोस प्लान नहीं है। यह रकम उसकी जिंदगी भर के दर्द के सामने बहुत कम है। पीड़ितों की पूरी मदद करना और उन्हें एक बेहतर जिंदगी देना सरकार का वो फर्ज है, जो संविधान ने हर नागरिक को दिया है।

तेजाब हमला सिर्फ चोट नहीं, पूरी जिंदगी का नुकसान

अदालत ने दर्द बयां करते हुए कहा कि एसिड अटैक का शिकार हुए लोग न सिर्फ शरीर का दर्द झेलते हैं, बल्कि समाज में उठने-बैठने, शादी-ब्याह, नौकरी और सम्मान से जीने की उम्मीदें भी खो देते हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के 'परिवर्तन केंद्र' वाले फैसले का हवाला दिया, जिसमें पीड़ितों को 10 लाख रुपये तक का मुआवजा देने की बात कही गई थी। इसके अलावा 'लक्ष्मी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' केस का भी जिक्र किया गया, जिसमें कम से कम 3 लाख रुपये तय थे। कोर्ट ने साफ कहा कि मुआवजा सिर्फ चोट देखकर नहीं, बल्कि मानसिक दर्द और समाज में हुए नुकसान को देखकर तय होना चाहिए।

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