इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अपराध की गंभीरता के आधार पर किशोर की जमानत अर्जी खारिज नहीं की जा सकती। यह अपराध की स्थिति व किशोर की भूमिका पर निर्भर करेगा।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने फिरोजाबाद के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए किशोर की सशर्त जमानत मंजूर कर ली है।
इससे पहले किशोर न्याय बोर्ड और विशेष अदालत (पाक्सो एक्ट) ने आरोपित किशोर की जमानत खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई थी।
अदालत ने किशोर न्याय अधिनियम की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि किसी नाबालिग को जमानत देने से केवल तीन परिस्थितियों में ही इन्कार किया जा सकता है। पहला यदि उसकी रिहाई से वह अपराधियों के संपर्क में आ सकता हो, दूसरा नैतिक या मानसिक खतरे में पड़ सकता हो और न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका हो।
कोर्ट ने पाया कि जिला प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट में ऐसी कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी और किशोर का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है। इस तथ्य को भी देखा कि किशोर जनवरी 2025 से बाल सुधार गृह में निरुद्ध है।
कोर्ट ने उसे 20 हजार रुपये के निजी मुचलके और दो प्रतिभूति लेकर रिहा करने का आदेश देते हुए गवाहों को प्रभावित न करने समेत कई शर्तें लगाई हैं।
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