हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कैसरबाग स्थित सिविल कोर्ट परिसर के आसपास से अतिक्रमण हटाने के विरोध में न्यायिक कार्य के बहिष्कार और वकीलों की हड़ताल पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने सेंट्रल बार एसोसिएशन व लखनऊ बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों समेत तीन वकीलों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए तथा उनके आचरण की शिकायत यूपी बार काउंसिल को क्यों न भेजी जाए।

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की अवकाशकालीन पीठ ने अनुराधा सिंह व अन्य टाइटिल से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया है। पूर्व में न्यायालय ने कैसरबाग में सिविल कोर्ट परिसर के आसपास से अतिक्रमण को हटाने का आदेश दिया था। पुलिस प्रशासन और नगर निगम की ओर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का वकीलों ने विरोध किया था और न्यायिक कार्य का बहिष्कार भी किया था। इस पर न्यायालय ने जिला जज से रिपोर्ट मांग ली थी।

सोमवार को पारित आदेश में न्यायालय ने कहा कि 18 मई से 26 मई 2026 तक दोनों बार एसोसिएशनों के आह्वान पर वकीलों ने न्यायिक कार्य से विरत रहकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया। न्यायालय ने कहा कि हड़ताल के कारण बड़ी संख्या में वादकारी प्रभावित हुए, दूर-दराज से आने वाले गरीब वादकारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। गवाहों सहित अन्य लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा। आदेश में कहा गया कि किसी भी वकील या एसोसिएशन को न्यायालयों के बहिष्कार अथवा हड़ताल का अधिकार नहीं है।

सुनवाई के दौरान जिला जज लखनऊ की रिपोर्ट और वीडियो फुटेज भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई। इसमें एक अधिवक्ता द्वारा बैठक के दौरान वकीलों में प्लास्टिक की लाठियां बांटने तथा प्रशासन और पुलिस के खिलाफ उत्तेजक टिप्पणियां किए जाने का उल्लेख किया गया है। कोर्ट ने इस घटना को गंभीरता से लिया। इस संबंध में कोर्ट ने अधिवक्ता उत्तम त्रिपाठी, हिमांशु मिश्रा और बृजेश कुमार यादव को भी नोटिस जारी कर दो सप्ताह में शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। हालांकि आदेश में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि सेंट्रल बार एसोसिएशन ने दो अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें पांच वर्ष के लिए सदस्यता से निष्कासित किया है। मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई को होगी।

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