आधार कार्ड एक जरूरी डॉक्यूमेंट बन चुका है। इसका इस्तेमाल हर सराकरी काम में होता है। कहीं-कहीं तो केवल आधार कार्ड नंबर की कॉपी जमा करने से ही वेरिफिकेशन हो जाता है। ऐसा ही कुछ इस शख्स के साथ, जिसका फेक आधार लगाकर जालसाजों ने उसके जमीन की रजिस्ट्री करा लिया। जब उसे इस बात की खबर हुई तो उसने UIDAI से उस फेक आधार के बायोमैट्रिक देने की मांग की, ताकि असली लोगों का पता लगाया जा सके। हालांकि,  UIDAI ने प्राइवेसी का हवाला देते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया। पीड़ित शख्स ने इस मामले को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी। आइये जानते हैं कि आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने क्या-कहा…

क्या है पूरा मामला?

असल में यह मामला जमीन धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ा है, जहां एक जालसाज ने पीड़ित शख्स के नाम पर फर्जी आधार कार्ड बनावाया। वहीं, धोखाधड़ी को अंजाम देने के लिए आरोपी ने बड़ी चालाकी से पीड़ित के नाम पर एक डुप्लीकेट आधार कार्ड तैयार किया, जिसमें नाम और पता तो पीड़ित का ही था लेकिन उसमें लगी तस्वीर और बायोमेट्रिक्स, जैसे उंगलियों के निशान या आंखों की पुतली का डेटा, जालसाज के थे। इस फर्जी आधार का इस्तेमाल कर उसने साल 2021 में पीड़ित की जमीन की दो फर्जी रजिस्ट्री, सेल डीड, करवा ली। जब पीड़ित को इस धोखाधड़ी का पता चला, तो उसने मामले की सच्चाई सामने लाने और पुलिस जांच में मदद के लिए यूआईडीएआई (UIDAI) से उस फर्जी आधार कार्ड और बायोमेट्रिक की जानकारी मांगी थी। इस बीच उसने सिविस सूट कर सेल डीड पर रोक लगा दिया है, वहीं असली जालसाजों का पता लगाने के लिए पीड़ित शख्स ने UIDAI से डुप्लीकेट आधार के बायोमैट्रिक की जानकारी मांगी।

किन नियमों के तहत मांगी गई थी जानकारी?

 पीड़ित ने जमीन की रजिस्ट्री में फेक आधार नंबर फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के तहत आवेदन किया था। उन्होंने RTI की धारा 8(1)(j) के तहत उस फर्जी आधार कार्ड से जुड़ी जानकारी मांगी थीं। उसने दावा किया कि किसी व्यक्ति के साथ हुए अपराध या धोखाधड़ी की स्थिति में उसे अपनी पहचान साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज और डेटा जानने का पूरा कानूनी हक है।

UIDAI ने क्यों किया जानकारी देने से इंकार?

UIDAI ने सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देते हुए पीड़ित के आवेदन को खारिज कर दिया था। अथॉरिटी का तर्क था कि आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) के तहत निजी जानकारियां साझा नहीं की जा सकतीं, क्योंकि इससे निजता के अधिकार (Privacy Rights) का उल्लंघन होगा। इसके अलावा, एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने भी पहले यह माना था कि आधार डेटा केवल राष्ट्रीय सुरक्षा या हाई कोर्ट के आदेश के बाद ही शेयर किया जा सकता है।

MP-MLA की तरह आम आदमी को भी अधिकार

UIDAI के इसी तर्क को शख्स ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। अदालत ने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(जे) के प्रावधान का जिक्र करते हुए कहा कि जो जानकारी देश की संसद (MP) या राज्य की विधानसभा (MLA) को देने से मना नहीं की जा सकती, उसे किसी भी आम नागरिक को देने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने इस बात जोर देते हुए कहा कि जब किसी आम इंसान के नाम का गलत इस्तेमाल कर फ्रॉड हुआ हो, तो उसे सच जानने का उतना ही हक है जितना किसी जनप्रतिनिधि को होता है।

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