इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि राज्य का दायित्व है कि प्रत्येक नागरिक (बालिग या नाबालिग) के जीवन व स्वतंत्रता की सुरक्षा करे। दो बालिग जोड़े अपनी मर्जी से जो भी करेंगे उसके लिए वे खुद जिम्मेदार होंगे।
वह वैध शादी करें या अवैध शादी करें अथवा बिना शादी ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहें, उनकी मर्जी। संविधान का अनुच्छेद 21 उन्हें जीवन स्वतंत्रता का मूल अधिकार देता है।
उनके इस अधिकार में किसी को भी बिना कानूनी प्रक्रिया के हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने सिदरा परवीन व एक अन्य की याचिका निस्तारित करते हुए की है।याचीगण का कहना था कि उन्होंने मर्जी से निकाह किया है। दोनों साथ रह रहे हैं।
उन्हें परिवार व रिश्तेदारों से जीवन को खतरा है। उन्हें सुरक्षा दी जाए। याची बिजनौर की रहने वाली है। उसका कहना है कि वह दुबई में थी। उसने 24 अप्रैल 2025 को वीडियो कान्फ्रेंसिंग से काजी व गवाहों के सामने निकाह किया। जिलाधिकारी रामपुर ने वीडियो में दोनों को देखा, लेकिन कहा कि वीडियो को सत्यापित नहीं किया गया है।
याची का कहना है कि निकाह के लिए मौके पर मौजूद रहना जरूरी नहीं है। निकाहनामा सही होना चाहिए। वापस आकर उसने भी हस्ताक्षर कर दिया है। शादी पंजीकृत करने की अर्जी दी है। उसके पिता व रिश्तेदारों ने कोर्ट के बाहर उसे रोकने का प्रयास किया जबकि दोनों बालिग हैं।
कोर्ट ने कहा, दुबई में रह रही याची का वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिये काजी व गवाहों के सामने निकाह करना और वापस आकर निकाहनामे पर हस्ताक्षर करने से निकाह की वैधता या अवैधता का मुद्दा हमारे सामने नहीं है। हमारे सामने दो बालिग नागरिकों की जीवन सुरक्षा का मुद्दा है।
कोर्ट ने याची के पिता व रिश्तेदारों को उसके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप न करने का निर्देश दिया है। कहा है कि कोई हस्तक्षेप करे तो याची एसएसपी /एसपी से शिकायत करे और वह (पुलिस प्रमुख) जरूरी सुरक्षा मुहैया कराएं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हमने वीडियो कान्फ्रेंसिंग से निकाह की वैधता पर विचार नहीं किया है न ही आयु का। इसलिए इस टिप्पणी का विवेचना पर कोई प्रभाव नहीं होगा।
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