इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कक्षा 11 की छात्रा की आत्महत्या के लिए शिक्षक पर दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने कहा कि केवल पूर्व में कथित उत्पीड़न के आरोप, बिना आत्महत्या से “प्रत्यक्ष एवं निकट संबंध” स्थापित किए, धारा 306 आईपीसी के अपराध को सिद्ध नहीं करते।

मामला गीता बैसला द्वारा लगाए गए आरोपों से संबंधित था, जिनमें कहा गया कि टीआरएम स्कूल, मोदीनगर के फिजिक्स शिक्षक राहुल कुशवाहा उनकी नाबालिग पुत्री ज्योति को निजी ट्यूशन लेने के लिए दबाव डालते थे, अशोभनीय व्यवहार करते थे तथा परीक्षा में फेल करने की धमकी देते थे। आरोप था कि लगातार मानसिक उत्पीड़न और अपमान के कारण छात्रा ने 29 जुलाई 2011 को विषाक्त पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली।

आवेदक ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही निरस्त करने की मांग करते हुए कहा कि पुलिस द्वारा दो बार जांच के बाद अंतिम रिपोर्ट लगाई जा चुकी थी तथा कथित घटनाओं और आत्महत्या के बीच लगभग तीन माह का अंतराल था, जिससे कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं होता। साथ ही न तो पोस्टमार्टम कराया गया और न ही विसरा जांच हुई।

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि धारा 200 और 202 सीआरपीसी के अंतर्गत दर्ज बयानों से प्रथमदृष्टया लगातार उत्पीड़न और छेड़छाड़ का मामला बनता है।

हाईकोर्ट ने निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य, अभिनव मोहन डेलकर तथा महमूद अली सहित कई सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर भरोसा करते हुए कहा कि धारा 306 आईपीसी के लिए स्पष्ट आपराधिक मनःस्तिथि, प्रत्यक्ष उकसावा तथा आत्महत्या से निकट संबंध आवश्यक है।

अदालत ने पाया कि अंतिम कथित घटना 2 अप्रैल 2011 की थी जबकि आत्महत्या 29 जुलाई 2011 को हुई। इस अवधि में आरोपी और मृतका के बीच कोई संपर्क नहीं था। न्यायालय ने एफआईआर दर्ज करने में अत्यधिक देरी, पोस्टमार्टम न होना, विष सेवन का चिकित्सीय प्रमाण न होना तथा स्वतंत्र गवाहों के अभाव को भी महत्वपूर्ण माना।

इन परिस्थितियों में अदालत ने कहा कि मुकदमे का जारी रहना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और समस्त कार्यवाही निरस्त कर दी।

वाद विवरण:
मामला : आवेदन धारा 482 संख्या 21503/2015
पीठ : न्यायमूर्ति संदीप जैन
पक्षकार : राहुल कुशवाहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

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