सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बड़े उद्योगपतियों और कंपनियों को भारी-भरकम कर्ज देने में बैंक अक्सर लापरवाही बरतते हैं। वहीं, आम लोगों को छोटे ऋण के लिए भी सख्त और अक्सर थका देने वाली प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, जो कुछ मामलों में उत्पीड़न की सीमा तक पहुंच जाती हैं। अदालत ने कहा कि यह बड़े कर्ज पर नरमी और छोटों पर सितम जैसी बात है।  

जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ मेसर्स भास्कर इंटरनेशनल प्रा. लि. की याचिका पर की है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह लोन देने के नियमों में किसी ढील का सुझाव नहीं दे रहा है। कोर्ट ने कहा कि ये नियम तय करने का काम रिजर्व बैंक और खुद बैंकों पर ही छोड़ देना बेहतर है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि लोन देने और   वसूलने की प्रक्रियाओं को अधिक आसान व निष्पक्ष बनाया जाना चाहिए। रियायत व प्रोत्साहन देने से जुड़ी नीतियां इस तरह तय की जाएं कि सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे निचले पायदान के लोगों को इसका अधिक से अधिक लाभ मिल सके।

क्या है पूरा मामला?

इस मामले में कंपनी ने 2019 में स्टेट बैंक से 8.09 करोड़ रुपये का लोन लिया और कुछ ही माह में किश्तें चुकानी बंद कर दीं। इसके चलते 2019 में कंपनी के खाता नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) घोषित हो गया। बैंक ने 2024 में यमुनानगर के डीएम से कंपनी की गिरवी संपत्तियों पर कब्जे का आदेश लिया। बाद में हाईकोर्ट ने भी इन संपत्तियों पर जल्द से जल्द कब्जे का निर्देश दिया।

खाते को पांच-छह माह में एनपीए घोषित करना मनमाना : कंपनी के वकील ने दलील दी कि खाते को महज पांच-छह महीनों में ही एनपीए घोषित कर देना मनमाना व एसबीआई की नीति के खिलाफ था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्होंने लोन की पूरी मूल राशि चुकाने की पेशकश की थी।

व्यावसायिक शर्तों पर लोन, एक भी किस्त नहीं दी

दूसरी ओर, एसबीआई ने यह तर्क दिया कि लोन लेने वालों ने व्यावसायिक शर्तों पर लोन लिया था, इसके बावजूद वे एक भी किस्त चुकाने में नाकाम रहे। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने याचिकाकर्ता कंपनी को कई बातों पर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि 8.09 करोड़ रुपये का लोन लेने के तुरंत बाद ही किश्तें चुकाना बंद कर देना और फिर लगभग छह साल बाद आकर केवल मूल राशि चुकाने की पेशकश करना, यह सब बहुत कम और बहुत देर से उठाया गया कदम है।

कोर्ट ने बैंक के रवैये पर भी जताई नाराजगी

अदालत ने एसबीआई के रवैये पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि बैंक ने लोन लेने वाले की चुकाने की क्षमता का ठीक से आकलन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि वह किसी उचित मामले में इस संबंध में विशेष आदेश जारी कर सकता है। हालांकि याचिकाकर्ताओं के रवैये को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने दो जून तक दो हफ्ते के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और कंपनी को यह छूट दी कि वह डीआरटी के सामने अंतरिम राहत के लिए अपनी बात रख सकती है।

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