विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999
(1999 का अधिनियम संख्यांक 42)
[29 दिसम्बर, 1999]
विदेश व्यापार और संदायों को सुकर बनाने तथा भारत में विदेशी
मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और अनुरक्षण का
संप्रवर्तन करने के उद्देश्य से विदेशी मुद्रा से
संबंधित विधि का समेकन और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पचासवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विदेशी मुद्रा प्रबन्ध अधिनियम, 1999 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह भारत में निवासी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन भारत से बाहर की सभी शाखाओं, कार्यालयों और अभिकरणों को भी और किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसे यह अधिनियम लागू होता है, भारत से बाहर उसके अधीन किए गए किसी उल्लंघन को भी लागू होगा ।
(4) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे:
परंतु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) न्यायनिर्णायक प्राधिकारी" से धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी अभिप्रेत है;
(ख) अपील अधिकरण" से धारा 18 के अधीन स्थापित विदेशी मुद्रा अपील अधिकरण अभिप्रेत है;
(ग) प्राधिकृत व्यक्ति" से ऐसा प्राधिकृत व्यवहारी, मुद्रा परिवर्तक, अपतट बैंककारी इकाई या कोई ऐसा अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है जो तत्समय विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूतियों का कारबार करने के लिए धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत है;
[(गग) प्राधिकृत अधिकारी" से धारा 37क के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत प्रवर्तन निदेशालय का कोई अधिकारी अभिप्रेत है;]
(घ) न्यायपीठ" से अपील अधिकरण की न्यायपीठ अभिप्रेत है;
(ङ) पूंजीगत लेखा संव्यवहार" से ऐसा संव्यवहार अभिप्रेत है जो भारत में निवासी व्यक्तियों की भारत से बाहर आस्तियों या दायित्वों को, जिनके अन्तर्गत समाश्रित दायित्व भी हैं, या भारत से बाहर निवासी व्यक्तियों की भारत में आस्तियों या दायित्वों को परिवर्तित करता है और इसके अन्तर्गत धारा 6 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट संव्यवहार भी है;
(च) अध्यक्ष" से अपील अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(छ) चार्टर्ड अकाउन्टेंट" का वही अर्थ होगा जो चार्टर्ड अकाउन्टेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में है;
1[(छछ) सक्षम प्राधिकारी" से धारा 37क की उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी अभिप्रेत है;]
(ज) करेंसी" के अन्तर्गत सब करेंसी नोट, पोस्टल नोट, पोस्टल आर्डर, मनीआर्डर, चैक, ड्राफ्ट, यात्री चैक, प्रत्यय-पत्र, विनिमय पत्र और वचन पत्र, क्रेडिट कार्ड या ऐसी अन्य समरूप लिखत भी हैं जो रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचित की जाएं;
(झ) करेंसी नोट" से अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत सिक्कों और बैंक नोटों के रूप में नकदी भी हैं;
(ञ) चालू खाता संव्यवहार" से पूंजीगत लेखा संव्यवहार से भिन्न संव्यवहार अभिप्रेत है और पूर्वगामी ऐसे संव्यवहार की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इसके अंतर्गत निम्न भी हैं: -
(i) विदेश व्यापार, अन्य चालू कारबार, सेवाओं और कारबार के मामूली अनुक्रम में अल्पकालिक बैंककारी और प्रत्यय सुविधाओं के संबंध में शोध्य संदाय;
(ii) उधारों पर ब्याज के रूप में और विनिधानों से शुद्ध आय के रूप में शोध्य संदाय;
(iii) विदेश में रह रहे माता-पिता, पति-पत्नी और पुत्र-पुत्री की आजीविका व्यय के लिए प्रेषण; और
(iv) माता-पिता, पति-पत्नी और पुत्र-पुत्री की विदेश यात्रा, शिक्षा और चिकित्सीय देखभाल के संबंध में व्यय;
(ट) प्रवर्तन निदेशक" से धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रवर्तन निदेशक अभिप्रेत है;
(ठ) निर्यात" से उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित, निम्न अभिप्रेत हैं: -
(i) भारत से किसी माल का, भारत से बाहर किसी स्थान को ले जाया जाना;
(ii) भारत से बाहर किसी व्यक्ति को भारत से सेवाएं उपलब्ध कराना;
(ड) विदेशी करेंसी" से भारतीय करेंसी से भिन्न कोई करेंसी अभिप्रेत है;
(ढ) विदेशी मुद्रा" से विदेशी करेंसी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत निम्न भी हैं, -
(i) किसी विदेशी करेंसी में संदेय जमा राशियां, जमा खाते और अतिशेष;
(ii) भारतीय करेंसी में अभिव्यक्त या लिखे गए, किन्तु किसी विदेशी करेंसी में संदेय ड्राफ्ट, यात्री चैक, प्रत्यय-पत्र या विनिमय पत्र;
(iii) भारत से बाहर के बैकों, संस्थाओं या व्यक्तियों द्वारा लिखे गए किन्तु भारतीय करेंसी में संदेय ड्राफ्ट, यात्री चैक, प्रत्यय-पत्र या विनिमय पत्र;
(ण) विदेशी प्रतिभूति" से ऐसे शेयर, स्टाक, बंधपत्र, डिबेंचर या किसी अन्य लिखत के रूप में कोई प्रतिभूति अभिप्रेत है जिनका अंकित मूल्य या अभिव्यक्ति विदेशी करेंसी में है और इसके अंतर्गत विदेशी करेंसी में अभिव्यक्त प्रतिभूतियां हैं किन्तु यह वहां जहां मोचन या वापसी का कोई रूप जैसे ब्याज अथवा लाभांश, भारतीय करेंसी में संदेय है;
(त) आयात" से, उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित, किसी माल या सेवाओं का भारत में लाना अभिप्रेत है;
(थ) भारतीय करेंसी" से ऐसी करेंसी अभिप्रेत है जो भारतीय रुपयों में अभिव्यक्त की गई या लिखी गई है किन्तु इसके अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 28क के अधीन जारी किए गए विशेष बैंक नोट और एक रुपए वाले विशेष नोट नहीं हैं;
(द) विधि व्यवसायी" का वही अर्थ है जो अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (i) में है;
(ध) सदस्य" से अपील अधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उसका अध्यक्ष भी है;
(न) अधिसूचित करना" से राजपत्र में अधिसूचित करना अभिप्रेत है और अधिसूचना" पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(प) व्यक्ति" के अंतर्गत निम्न है-
(i) कोई व्यष्टि,
(ii) कोई अविभक्त हिंदू कुटुम्ब,
(iii) कोई कंपनी,
(iv) कोई फर्म,
(v) व्यक्तियों का कोई संगम या व्यष्टियों का निकाय, चाहे निगमित हो या न हो,
(vi) ऐसा प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति, जो पूर्वगामी उपखंडों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता है, और
(vii) ऐसे व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन कोई अभिकरण, कार्यालय या शाखा;
(फ) भारत में निवासी व्यक्ति" से अभिप्रेत है, -
(i) ऐसा कोई व्यक्ति जो पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान एक सौ बयासी दिन से अधिक तक भारत में निवास कर रहा था किन्तु इसके अन्तर्गत: -
(अ) ऐसा व्यक्ति नहीं है जो-
(क) भारत से बाहर नियोजित होने के लिए या नियोजित हो जाने पर; या
(ख) भारत से बाहर कोई कारबार या व्यवसाय भारत से बाहर चलाने के लिए; या
(ग) ऐसी परिस्थितियों में, किसी अन्य प्रयोजन के लिए जिनसे उसका भारत से बाहर अनिश्चित अवधि तक ठहरने का आशय उपदर्शित होता हो,
भारत से बाहर चला गया है या भारत से बाहर ठहरता है,
(आ) ऐसा व्यक्ति भी नहीं है जो-
(क) भारत में नियोजित होने के लिए या नियोजित हो जाने पर; या
(ख) भारत में कोई कारबार या व्यवसाय भारत में चलने के लिए; या
(ग) ऐसी परिस्थितियों में किसी अन्य प्रयोजन के लिए जिनसे उसका भारत में अनिश्चित अवधि तक ठहरने का आशय उपदर्शित होता हो,
भारत लौट आता है या भारत में ठहरता है;
(ii) कोई व्यक्ति या भारत में रजिस्ट्रीकृत या निगमित कोई निगम निकाय;
(iii) भारत के बाहर निवासी किसी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन भारत में कोई कार्यालय, शाखा या अभिकरण;
(iv) भारत में निवासी किसी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन भारत से बाहर कोई कार्यालय, शाखा या अधिकरण;
(ब) भारत के बाहर निवासी व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारत में निवासी नहीं है;
(भ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(म) भारत को संप्रत्यावर्तित करना" से वसूली गई विदेशी मुद्रा का भारत में लाना अभिप्रेत है, और-
(i) ऐसी विदेशी मुद्रा का, भारत में किसी प्राधिकृत व्यक्ति को रुपए के बदले में विक्रय करना; या
(ii) वसूली गई रकम का, भारत में किसी प्राधिकृत व्यक्ति के पास किसी खाते में रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचित सीमा तक धारण करना;
और इसके अन्तर्गत वसूली गई रकम का विदेशी मुद्रा में अंकित किसी ऋण या दायित्व के उन्मोचन के लिए उपयोग भी आता है और संप्रत्यावर्तन" पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(य) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;
(यक) प्रतिभूति" से शेयर, स्टाक, बंधपत्र और डिबेंचर, लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) में यथा परिभाषित सरकारी प्रतिभूतियां, ऐसे बचत पत्र, जिन्हें सरकारी बचत पत्र अधिनियम, 1959 (1959 का 46) लागू होता है, प्रतिभूतियों की जमा राशि संबंधी रसीदें, और भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट के या किसी पारस्परिक निधि के यूनिट अभिप्रेत हैं और इसके अंतर्गत प्रतिभूतियों में हक के प्रमाणपत्र हैं; किन्तु इसके अंतर्गत सरकारी विनिमय पत्र या वचन पत्र से भिन्न विनिमय पत्र या वचन पत्र या कोई ऐसी अन्य लिखत जो रिजर्व बैंक द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्रतिभूति के रूप में अधिसूचित की जाएं, नहीं है;
(यख) सेवा" से किसी प्रकार की ऐसी सेवा अभिप्रेत है जो संभावित उपयोगकर्ताओं को उपलभ्य कराई जाती है तथा इसमें बैंककारी, वित्तपोषण, बीमा, चिकित्सीय सहायता, विधिक सहायता, चिट फंड, पूर्ण स्वामिक स्थावर संपदा, परिवहन, प्रसंस्करण, विद्युत या अन्य ऊर्जा के प्रदाय, आवास या भोजन या दोनों, मनोरंजन, आमोद-प्रमोद या समाचार अथवा अन्य जानकारी जुटाने के संबंध में प्रसुविधाओं की व्यवस्था भी सम्मिलित है, किन्तु निःशुल्क या व्यक्तिगत सेवा की संविदा के अधीन किसी सेवा का दिया जाना सम्मिलित नहीं है;
(यग) विशेष निदेशक (अपील)" से धारा 18 के अधीन नियुक्त कोई अधिकारी अभिप्रेत है;
(यघ) विनिर्दिष्ट करना" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट करना अभिप्रेत है और विनिर्दिष्ट" पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(यङ) अंतरण" के अंतर्गत विक्रय, क्रय, विनिमय, बंधक, गिरवी, उपहार, उधार अथवा अधिकार, हक, कब्जा या धारणाधिकार के अंतरण का कोई अन्य रूप भी है ।
अध्याय 2
विदेशी मुद्रा का विनियमन और प्रबंध
3. विदेशी मुद्रा आदि में व्यवहार करना-इस अधिनियम, इसके अधीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों में या रिजर्व बैंक की साधारण या विशेष अनुज्ञा से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय कोई भी व्यक्ति, -
(क) ऐसे किसी व्यक्ति के साथ जो प्राधिकृत व्यक्ति नहीं है, विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति में व्यवहार नहीं करेगा या उसे अंतरित नहीं करेगा;
(ख) भारत से बाहर निवासी किसी व्यक्ति को, किसी रीति से संदाय नहीं करेगा या उसके नाम में जमा नहीं करेगा;
(ग) किसी प्राधिकृत व्यक्ति के माध्यम से भिन्न किसी ऐसे व्यक्ति के या उसकी ओर से जो भारत से बाहर निवास करता है किसी आदेश द्वारा किसी रीति में कोई संदाय प्राप्त नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजन के लिए, जहां कोई व्यक्ति भारत में या भारत में निवासी, भारत में निवासी कोई व्यक्ति भारत से बाहर निवासी किसी व्यक्ति के, या उसकी ओर से आदेश द्वारा कोई संदाय किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से (जिसके अंतर्गत प्राधिकृत व्यक्ति भी है) भारत से बाहर किसी स्थान से तद्रूपी आवक विप्रेषण के बिना प्राप्त करता है तब ऐसे व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने प्राधिकृत व्यक्ति के माध्यम से अन्यथा ऐसा संदाय प्राप्त किया है;
(घ) किसी व्यक्ति द्वारा भारत से बाहर किसी आस्ति के अर्जन, सृजन या अर्जित करने के अधिकार के अंतरण के प्रतिफल के रूप में या उसके साथ भारत में कोई वित्तीय संव्यवहार नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजन के लिए वित्तीय संव्यवहार" से किसी व्यक्ति के लिए या उसकी ओर से, आदेश द्वारा, किसी व्यक्ति को कोई संदाय करना या उसके नाम जमा करने के लिए कोई संदाय प्राप्त करना या विनिमय पत्र या वचन पत्र लिखना, जारी करना या परक्रामित करना या कोई प्रतिभूति अंतरित करना अथवा कोई ऋण अभिस्वीकृत करना अभिप्रेत है ।
4. विदेशी मुद्रा आदि धारित करना-इस अधिनियम में जैसा उपबंधित है इसके सिवाय, भारत में निवासी कोई व्यक्ति, किसी विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति या भारत से बाहर स्थित किसी स्थावर संपत्ति को धारित नहीं करेगा, स्वामित्व में या कब्जे में नहीं रखेगा या अंतरण नहीं करेगा ।
5. चालू खाता संव्यवहार-कोई व्यक्ति, किसी प्राधिकृत व्यक्ति को, विदेशी मुद्रा का विक्रय कर सकेगा या उससे ले सकेगा यदि ऐसा विक्रय या लेना चालू खाता संव्यवहार है:
परन्तु केन्द्रीय सरकार, लोकहित में और रिजर्व बैंक के परामर्श से, चालू खाता संव्यवहारों के लिए ऐसे युक्तियुक्त निबन्धन अधिरोपित कर सकेगी, जो विहित किए जाएं ।
6. पूंजीगत खाता संव्यवहार-(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति, किसी पूंजीगत लेखा संव्यवहार के लिए किसी प्राधिकृत व्यक्ति को विदेशी मुद्रा का विक्रय कर सकेगा या उससे ले सकेगा ।
(2) रिजर्व बैंक, केन्द्रीय सरकार के परामर्श से, -
[(क) पूंजीगत खाता संव्यवहार के, जिसमें ऋण लिखतें अंतर्वलित हैं, ऐसे किसी वर्ग या वर्गों को, जो अनुज्ञेय हैं;]
(ख) वह सीमा, जिस तक विदेशी मुद्रा ऐसे संव्यवहारों के लिए अनुज्ञेय होगी;
[(ग) ऐसी कोई शर्तें जो ऐसे संव्यवहारों पर लगाई जाएं,]
विनिर्दिष्ट कर सकेगा:
[परन्तु रिजर्व बैंक या केंद्रीय सरकार, कारबार के मामूली अनुक्रम में उधारों के अपकरण के मद्दे या सीधे विनिधानों के अवक्षयण के लिए शोध्य संदायों के लिए विदेशी मुद्रा के निकाले जाने पर काई निर्बन्धन नहीं लगाएगी ।]
1[(2क) केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से, -
(क) पूंजीगत खाता संव्यवहार के, जिसमें ऋण लिखतें अंतर्वलित नहीं हैं, ऐसे किसी वर्ग का या वर्गों का, जो अनुज्ञेय है;
(ख) वह सीमा जिस तक विदेशी मुद्रा ऐसे संव्यवहारों के लिए अनुज्ञेय होगी; और
(ग) ऐसी कोई शर्तें, जो ऐसे संव्यवहारों पर लगाई जाएं,
विहित कर सकेगीट
। । । । । । ।
(4) भारत में निवासी कोई व्यक्ति विदेशी करेंसी, विदेशी प्रतिभूति या भारत से बाहर स्थित किसी स्थावर संपत्ति का धारण कर सकेगा, उसे स्वामित्व में रख सकेगा, उसका अंतरण कर सकेगा या उसमें विनिधान कर सकेगा, यदि ऐसी करेंसी, प्रतिभूति या संपत्ति, ऐसे व्यक्ति द्वारा तब अर्जित की गई थी, धारित की गई थी या उसके स्वामित्व में थी जब वह भारत से बाहर निवासी था या उसने ऐसे व्यक्ति से विरासत में प्राप्त की थी, जो भारत से बाहर निवासी था ।
(5) भारत से बाहर निवासी कोई व्यक्ति, भारतीय करेंसी, प्रतिभूति या भारत में स्थित किसी स्थावर संपत्ति को धारण कर सकेगा, उसे स्वामित्व में रख सकेगा, उसका अंतरण कर सकेगा या उसमें विनिधान कर सकेगा, यदि ऐसी करेंसी, प्रतिभूति या संपत्ति, ऐसे व्यक्ति द्वारा तब अर्जित, धारित की गई थी या उसके स्वामित्व में थी जब वह भारत में निवासी था या उसने ऐसे किसी व्यक्ति से विरासत में प्राप्त की थी जो भारत में निवासी था ।
(6) इस धारा के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, रिजर्व बैंक, विनियम द्वारा, भारत के बाहर के निवासी किसी व्यक्ति द्वारा, किसी शाखा, कार्यालय के भारत में स्थापन या कारबार के किसी अन्य स्थान को, ऐसी शाखा, कार्यालय या कारबार के अन्य स्थान से संबंधित किसी क्रियाकलाप को चलाने के लिए, प्रतिषिद्ध, निर्बंधित या विनियमित कर सकेगा ।
1[(7) इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऋण लिखतें" पद से ऐसी लिखतें अभिप्रेत हैं जो केंद्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक के परामर्श से अवधारित की जाएं ।]
7. माल और सेवाओं का निर्यात-(1) माल का प्रत्येक निर्यातकर्ताः-
(क) रिजर्व बैंक को या ऐसे अन्य प्राधिकारी को एक घोषणा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से जो विनिर्दिष्ट की जाए, प्रस्तुत करेगा जिसमें सत्य और सही तात्विक विशिष्टियां, जिसके अन्तर्गत पूर्ण निर्यात मूल्य को जताने वाली रकम है या यदि निर्यात के समय माल का पूर्ण निर्यात मूल्य अभिनिश्चित नहीं किया जा सकता है तो वह मूल्य है जिसे निर्यातकर्ता, विद्यमान बाजार दशाओं को ध्यान में रखते हुए भारत से बाहर बाजार में माल के विक्रय पर प्राप्त करने की आशा रखता है, अन्तर्विष्ट होंगी;
(ख) रिजर्व बैंक को ऐसी अन्य जानकारी प्रस्तुत करेगा जो ऐसे निर्यातकर्ता द्वारा निर्यात आगमों की वसूली सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए रिजर्व बैंक द्वारा अपेक्षित हों ।
(2) रिजर्व बैंक, यह सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि माल का पूर्ण निर्यात मूल्य या माल का ऐसा घटा हुआ मूल्य, जो रिजर्व बैंक, विद्यमान बाजार दशाओं को ध्यान में रखते हुए अवधारित करे, बिना किसी विलंब के प्राप्त हो जाए, ऐसे किसी निर्यातकर्ता को ऐसी अपेक्षाओं को जो वह ठीक समझे, पूरा करने का निदेश दे सकेगा ।
(3) सेवाओं का प्रत्येक निर्यातकर्ता, रिजर्व बैंक को या ऐसे अन्य प्राधिकारी को, एक घोषणा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विनिर्दिष्ट की जाए, प्रस्तुत करेगा जिसमें ऐसी सेवाओं के लिए संदाय के संबंध में सत्य और सही तात्त्विक विशिष्टियां, अन्तर्विष्ट होंगी ।
8. विदेशी मुद्रा की वसूली और संप्रत्यावर्तन-इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, जहां विदेशी मुद्रा में कोई रकम भारत में निवासी किसी व्यक्ति को शोध्य है या प्रोद्भूत हो गई है, वहां ऐसा व्यक्ति, ऐसी विदेशी मुद्रा को ऐसी अवधि के भीतर और ऐसी रीति में, जो रिजर्व बैंक द्वारा, विनिर्दिष्ट की जाए, वसूल करने और भारत को संप्रत्यावर्तित करने के लिए सभी उचित कदम उठाएगा ।
9. कतिपय मामलों में वसूली और संप्रत्यावर्तन से छूट-धारा 4 और धारा 8 के उपबंध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे, अर्थात्ः-
(क) किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी सीमा तक, जो रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे, विदेशी करेंसी या विदेशी सिक्कों का कब्जा रखना;
(ख) ऐसे व्यक्ति या वर्ग के व्यक्तियों द्वारा और वह सीमा जिस तक रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे विदेशी करेंसी खाता रखना या प्रचालन करना;
(ग) 8 जुलाई, 1947 के पूर्व अर्जित या प्राप्त की गई विदेशी मुद्रा या उस पर उद्भूत या प्रोद्भूत कोई आय, जो किसी व्यक्ति द्वारा रिजर्व बैंक द्वारा दी गई साधारण या विशेष अनुज्ञा के अनुसरण में भारत से बाहर धृत है;
(घ) भारत में निवासी किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी सीमा तक जिसे रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे, धृत विदेशी मुद्रा यदि ऐसी विदेशी मुद्रा खंड (ग) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति से दान या विरासत के रूप में अर्जित की गई हो जिसके अंतर्गत उससे उद्भूत कोई आय भी है;
(ङ) उस सीमा तक जो रिजर्व बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, नियोजन, कारबार, व्यापार, व्यवसाय, सेवाओं, मानदेय, दान, विरासत या किसी अन्य विधिसम्मत साधनों द्वारा अर्जित विदेशी मुद्रा; और
(च) विदेशी मुद्रा की ऐसी अन्य प्राप्तियां, जो रिजर्व बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं ।
अध्याय 3
प्राधिकृत व्यक्ति
10. प्राधिकृत व्यक्ति-(1) इस निमित्त रिजर्व बैंक से आवेदन किए जाने पर, वह किसी भी व्यक्ति को विदेशी मुद्रा का या विदेशी प्रतिभूतियों का व्यवहार करने के लिए, प्राधिकृत व्यवहारी, मुद्रा परिवर्तक या अपत बैंककारी यूनिट के रूप में, या किसी अन्य रीति से जो वह ठीक समझे, प्राधिकृत कर सकेगा जो प्राधिकृत व्यक्ति के रूप में माना जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन प्राधिकार लिखित रूप में दिया जाएगा और वह उसमें अधिकथित शर्तों के अध्यधीन होगा ।
(3) रिजर्व बैंक उपधारा (1) के अधीन दिए गए प्राधिकार को किसी भी समय, वापस ले सकता है यदि रिजर्व बैंक का समाधान हो जाता है कि, -
(क) ऐसा करना लोकहित में है; या
(ख) प्राधिकृत व्यक्ति, उस शर्त का अनुपालन करने में असफल रहा है जिसके अधीन रहते हुए प्राधिकार दिया गया था या उसने अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, निकाली गई अधिसूचना, किए गए निदेश या आदेश के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन किया है:
परन्तु ऐसा कोई प्राधिकार, खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी आधार पर तब तक वापस नहीं लिया जाएगा जब तक कि प्राधिकृत व्यक्ति को उस विषय में अभ्यावेदन करने का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।
(4) प्राधिकृत व्यक्ति, विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति के अपने सभी व्यवहार में उन साधारण या विशेष निदेशों या आदेशों का अनुपालन करेगा, जो रिजर्व बैंक, समय-समय पर, देना ठीक समझे और रिजर्व बैंक की पूर्व अनुज्ञा के बिना कोई प्राधिकृत व्यक्ति ऐसा संव्यवहार नहीं करेगा जिसका संबंध किसी विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति से है और जो इस धारा के अधीन उसके प्राधिकार के निबंधनों के अनुरूप नहीं है ।
(5) प्राधिकृत व्यक्ति, किसी व्यक्ति की ओर से विदेशी मुद्रा का कोई संव्यवहार करने के पूर्व उस व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसी घोषणा करे और ऐसी जानकारी दे जिससे उसका उचित रूप से समाधान हो जाए कि उस संव्यवहार से इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, निकाली गई अधिसूचना, दिए गए निदेश या आदेश के उपबंधों का कोई उल्लंघन या अपवंचन नहीं होता है और न ही वह किसी उल्लंघन या अपवंचन के प्रयोजन के लिए प्रकल्पित है और जहां उक्त व्यक्ति, ऐसी किसी अपेक्षा का अनुपालन करने से इंकार करता है या केवल असमाधानप्रद पालन करता है वहां प्राधिकृत व्यक्ति, वह संव्यवहार करने से लिखित में इंकार करेगा और यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति कोई यथापूर्वोक्त उल्लंघन या अपवंचन करने का विचार रखता है तो वह उस मामले की रिपोर्ट रिजर्व बैंक को करेगा ।
(6) प्राधिकृत व्यक्ति से भिन्न ऐसा कोई व्यक्ति जिसने उपधारा (5) के अधीन प्राधिकृत व्यक्ति को उसके द्वारा की गई घोषणा में वर्णित किसी प्रयोजन के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित या क्रय की है, ऐसे प्रयोजन के लिए उसका उपयोग नहीं करता है या विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर प्राधिकृत व्यक्ति को अभ्यर्पित नहीं करता है या इस प्रकार अर्जित या क्रय की गई विदेशी मुद्रा का उपयोग किसी अन्य प्रयोजन के लिए करता है जिसके लिए विदेशी मुद्रा का क्रय या अर्जन अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के या किए गए निदेश या आदेश के उपबंधों के अधीन अनुज्ञेय नहीं है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने इस धारा के प्रयोजन के लिए अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन किया है ।
11. प्राधिकृत व्यक्तियों को निदेश देने की रिजर्व बैंक की शक्तियां-(1) रिजर्व बैंक, इस अधिनियम के उपबंधों और उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों, विनियमों, निकाली गई अधिसूचनाओं या दिए गए निदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, प्राधिकृत व्यक्तियों को, विदेशी मुद्रा या विदेशी प्रतिभूति से संबंधित संदाय करने या कोई कृत्य करने या करने से विरत रहने के निदेश दे सकेगा ।
(2) रिजर्व बैंक, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, निकाली गई अधिसूचना, दिए गए निदेश या आदेश के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, किसी प्राधिकृत व्यक्ति को, ऐसी जानकारी ऐसी रीति से देने के लिए, जो वह ठीक समझे, निदेश दे सकेगा ।
(3) जहां कोई प्राधिकृत व्यक्ति, इस अधिनियम के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए किसी निदेश का उल्लंघन करेगा या रिजर्व बैंक द्वारा निदेशित रूप में कोई विवरणी फाइल करने में असफल रहेगा, तो रिजर्व बैंक, सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने पश्चात् प्राधिकृत व्यक्ति पर ऐसी शास्ति, जो दस हजार रुपए तक की हो सकेगी और चालू रहने वाले उल्लंघन की दशा में अतिरिक्त शास्ति, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन चालू रहता है, दो हजार रुपए तक की हो सकेगी, अधिरोपित कर सकेगा ।
12. प्राधिकृत व्यक्तियों का निरीक्षण करने की रिजर्व बैंक की शक्तियां-(1) रिजर्व बैंक, किसी भी समय, किसी प्राधिकृत व्यक्ति के कारबार का निरीक्षण, जो उसे निम्नलिखित प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो, रिजर्व बैंक के किसी ऐसे अधिकारी द्वारा जो इस निमित्त रिजर्व बैंक द्वारा लिखित रूप में विशेष रूप से प्राधिकृत किया गया हो, करा सकेगा, -
(क) रिजर्व बैंक को प्रस्तुत किए गए किसी कथन, जानकारी या विशिष्टियों की शुद्धता का सत्यापन करना;
(ख) ऐसी कोई जानकारी या विशिष्टियां अभिप्राप्त करना, जिसे ऐसा प्राधिकृत व्यक्ति, ऐसी मांग किए जाने पर, देने में असफल रहा है;
(ग) इस अधिनियम के उपबंधों की या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों, विनियमों, दिए गए निदेशों या आदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करना ।
(2) प्रत्येक प्राधिकृत व्यक्ति का और जहां ऐसा व्यक्ति कंपनी या फर्म है, यथास्थिति, ऐसी कंपनी या फर्म के प्रत्येक निदेशक, भागीदार या अन्य अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह उपधारा (1) के अधीन निरीक्षण करने वाले किसी अधिकारी को ऐसी बहियां, लेखा और अन्य दस्तावेजें, जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति में हो, पेश करे और उसे ऐसे व्यक्ति, कंपनी या फर्म के कार्यों से संबंधित ऐसा कोई विवरण या जानकारी, जैसी कि उक्त अधिकारी अपेक्षा करे, ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से, जैसा कि उक्त अधिकारी निदेश दे, प्रदान करे ।
अध्याय 4
उल्लंघन और शास्तियां
13. शास्तियां-(1) यदि कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा या इस अधिनियम के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए बनाए गए किसी नियम, विनियम, निकाली गई अधिसूचना, दिए गए निदेश या आदेश का उल्लंघन करेगा या किसी ऐसी शर्त का उल्लंघन करेगा जिसके अधीन रहते हुए रिजर्व बैंक द्वारा प्राधिकार जारी किया जाता है, तो वह, न्यायनिर्णयन पर, ऐसी शास्ति का, जो ऐसे उल्लंघन में अन्तर्वलित राशि की, जहां ऐसी रकम परिमाणन योग्य है, तीन गुनी अथवा जहां रकम परिमाणन योग्य नहीं है वहां दो लाख रुपए तक की हो सकेगी, और जहां ऐसा उल्लंघन जारी रहने वाला उल्लंघन है, वहां अतिरिक्त शास्ति का, जो उस प्रथम दिन के पश्चात् प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान उल्लंघन जारी रहता है, पांच हजार रुपए तक की हो सकेगी, दायी होगा ।
[(1क) यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह पाया जाता है कि उसने धारा 37क की उपधारा (1) के परंतुक के अधीन विहित अवसीमा से अधिक संकलित मूल्य की कोई विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर अवस्थित स्थावर संपत्ति अर्जित की है, तो वह ऐसे उल्लंघन और अधिहरण में अंतर्वलित विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत में अवस्थित स्थावर संपत्ति के समतुल्य मूल्य की राशि के तीन गुणा तक की शास्ित के लिए दायी होगा ।
(1ख) यदि न्यायनिर्णायक अधिकारी, उपधारा (1क) के अधीन की किसी कार्यवाही में उचित समझता है तो वह कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् अभियोजन आरंभ करने की सिफारिश कर सकेगा और यदि प्रवर्तन निदेशक का यह समाधान हो जाता है तो वह कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात् दोषी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसे अधिकारी द्वारा, जो सहायक निदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, दांडिक शिकायत फाइल करके अभियोजन करने का निदेश दे सकेगा ।
(1ग) यदि किसी व्यक्ति के बारे में यह पाया जाता है कि उसने धारा 37क की उपधारा (1) के परंतुक के अधीन विहित अवसीमा से अधिक संकलित मूल्य की कोई विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर अवस्थित स्थावर संपत्ति अर्जित की है, तो वह उपधारा (1क) के अधीन अधिरोपित शास्ति के अतिरिक्त, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से दंडनीय होगा ।
(1घ) कोई भी न्यायालय, धारा 13 की उपधारा (1ग) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, ऐसे अधिकारी की, जो उपधारा (1ख) में निर्दिष्ट सहायक निदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, लिखित शिकायत पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।]
(2) कोई न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, उपधारा (1) के अधीन किसी उल्लंघन का न्यायनिर्णयन करते समय, यदि वह ऐसी शास्ति के अतिरिक्त जिसे वह ऐसे उल्लंघन के लिए अधिरोपित कर सकता है, उचित समझता है तो यह निदेश दे सकेगा कि ऐसी कोई मुद्रा, प्रतिभूति या कोई अन्य धन या संपत्ति जिसकी बाबत उल्लंघन हुआ है, केन्द्रीय सरकार को अधिहृत हो जाएगी और आगे यह निदेश दे सकेगा कि उल्लंघन करने वाले व्यक्ति की विदेशी मुद्रा धृतियां, यदि कोई हों, या उनका कोई भाग भारत में वापस लाया जाएगा या भारत से बाहर इस निमित्त दिए गए निदेशानुसार प्रतिधारित किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए संपत्ति" के अंतर्गत जिसकी बाबत उल्लंघन हुआ है, निम्नलिखित भी है-
(क) जहां उक्त संपत्ति बैंक में निक्षेपों में परिवर्तित कर दी जाती है, वहां बैंक में निक्षेप;
(ख) जहां उक्त संपत्ति भारतीय मुद्रा में संपरिवर्तित कर दी जाती है, वहां भारतीय मुद्रा;
(ग) ऐसी अन्य संपत्ति जो उस संपत्ति के संपरिवर्तन के परिणामस्वरूप हो ।
14. न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के आदेशों का प्रवर्तन-(1) धारा 19 की उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि कोई व्यक्ति, धारा 13 के अधीन, उस पर अधिरोपित शास्ति का संपूर्ण संदाय उस तारीख से जिसको उस पर ऐसी शास्ति के संदाय के लिए सूचना तामील की गई थी, नब्बे दिन की अवधि के भीतर करने में असफल रहेगा तो वह इस धारा के अधीन सिविल कारावास का दायी होगा ।
(2) किसी व्यतिक्रमी की गिरफ्तारी और सिविल कारागार में निरोध के लिए कोई आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा, जब तक कि न्यायनिर्णायक प्राधिकारी ने ऐसी सूचना जारी न कर दी हो और व्यतिक्रमी पर तामील न कर दी हो जिसमें उससे उस सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को उसके समक्ष उपसंजात होने और यह हेतुक दर्शित करने के लिए कहा गया हो कि उसे सिविल कारागार के सुपुर्द क्यों न कर दिया जाए और जब तक कि लेखबद्ध कारणों से, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि: -
(क) व्यतिक्रमी ने, शास्ति की वसूली में बाधा पहुंचाने या उसे रोकने के उद्देश्य से, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा सूचना जारी किए जाने के पश्चात्, बेईमानी से अपनी संपत्ति के किसी भाग का अंतरण किया है, उसे छुपाया या हटाया है, या
(ख) व्यतिक्रमी के पास, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा सूचना जारी किए जाने के समय से, बकायों का या उनके एक बड़े भाग का संदाय करने के साधन हैं या रहे हैं, और वह उसका संदाय करने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है अथवा उसने इंकार कर दिया है या उपेक्षा की है ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा व्यतिक्रमी की गिरफ्तारी के लिए वारंट तभी जारी किया जा सकेगा जब न्यायनिर्णायक प्राधिकारी का, शपथपत्र द्वारा या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि प्रमाणपत्र के निष्पादन में विलंब करने के उद्देश्य या प्रभाव से यह संभावना है कि व्यतिक्रमी या तो फरार हो जाएगा या वह न्यायनिर्णायक प्राधिकारी की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं को छोड़कर चला जाएगा ।
(4) जहां उपधारा (1) के अधीन जारी की गई और तामील की गई सूचना के अनुसरण में वह उपसंजात नहीं होता है वहां न्यायनिर्णायक प्राधिकारी व्यतिक्रमी की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर सकेगा ।
(5) उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए गिरफ्तारी वारंट का किसी ऐसे अन्य न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा निष्पादन किया जा सकेगा जिसकी अधिकारिता के भीतर व्यतिक्रमी तत्समय पाया जाए ।
(6) इस धारा के अधीन गिरफ्तारी वारंट के अनुसरण में गिरफ्तार किए गए प्रत्येक व्यक्ति को वारंट जारी करने वाले, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के समक्ष, यथासाध्य शीघ्रता से और किसी भी दशा में उसकी गिरफ्तारी से चौबीस घंटे के भीतर (यात्रा के लिए अपेक्षित समय को निकालकर) लाया जाएगा:
परन्तु यदि व्यतिक्रमी उसे गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को, बकाया और गिरफ्तारी के खर्चे के रूप में गिरफ्तारी वारंट में प्रविष्ट रकम का संदाय कर देता है तो ऐसा अधिकारी उसे तत्काल निर्मुक्त कर देगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, जहां व्यतिक्रमी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब हो वहां उस कुटुम्ब का कर्ता व्यतिक्रमी समझा जाएगा ।
(7) जब व्यतिक्रमी हेतुक दर्शित करने की सूचना के अनुसरण में न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के समक्ष हाजिर होता है या इस धारा के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के समक्ष लाया जाता है तब न्यायनिर्णायक प्राधिकारी व्यतिक्रमी को इस बारे में हेतुक दर्शित करने का अवसर प्रदान करेगा कि उसे सिविल कारागार में क्यों न भेज दिया जाए ।
(8) न्यायनिर्णायक प्राधिकारी जांच के निष्कर्ष के लंबित रहने के दौरान अपने विवेकानुसार यह आदेश दे सकेगा कि व्यतिक्रमी को ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाए जिसे न्यायनिर्णायक प्राधिकारी उचित समझे या जब भी अपेक्षित हो उसकी हाजिरी के लिए न्यायनिर्णायक प्राधिकारी अपने समाधान के लिए प्रतिभूति दिए जाने पर उसे निर्मुक्त कर सकेगा ।
(9) न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, जांच के निष्कर्ष पर व्यतिक्रमी के सिविल कारागार में निरोध के लिए आदेश कर सकेगा और उस दशा में, यदि वह पहले से ही गिरफ्तार न हो, उसे गिरफ्तार करवाएगा:
परन्तु न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, व्यतिक्रमी को बकायों को चुकाने का अवसर देने के उद्देश्य से निरोध का आदेश करने से पूर्व, व्यतिक्रमी को उसे गिरफ्तार करने वाले अधिकारी या किसी अन्य अधिकारी की अभिरक्षा में पन्द्रह दिन से अनधिक विनिर्दिष्ट अवधि के लिए छोड़ सकेगा या यदि बकाया नहीं चुकाए जाते हैं, तो विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर उसकी हाजिरी के लिए न्यायनिर्णायक प्राधिकारी समाधान के लिए प्रतिभूति दिए जाने पर उसे निर्मुक्त कर सकेगा ।
(10) जब न्यायनिर्णायक प्राधिकारी उपधारा (9) के अधीन निरोध का आदेश नहीं करता है तब, यदि व्यतिक्रमी गिरफ्तार हो, वह उसकी निर्मुक्ति का निदेश देगा ।
(11) प्रमाणपत्र के निष्पादन में सिविल कारागार में निरुद्ध प्रत्येक व्यक्ति को, -
(क) जहां प्रमाणपत्र एक करोड़ रुपए से अधिक की रकम की मांग के लिए है, वहां तीन वर्ष तक; और
(ख) अन्य किसी दशा में छह मास तक,
निरुद्ध किया जा सकेगा:
परंतु वह, उसके निरोध के लिए वारंट में वर्णित रकम का सिविल कारागार के भारसाधक अधिकारी को संदाय कर दिए जाने पर ऐसे निरोध से निर्मुक्त कर दिया जाएगा ।
(12) इस धारा के अधीन निरोध से निर्मुक्त किया गया प्रत्येक व्यतिक्रमी, मात्र अपनी निर्मुक्ति के आधार पर, बकायों के लिए अपने दायित्व से उन्मोचित नहीं होगा किन्तु वह उस प्रमाणपत्र के अधीन जिसके निष्पादन में उसे सिविल कारागार में निरुद्ध रखा गया था, गिरफ्तार किए जाने का दायी नहीं होगा ।
(13) निरोध आदेश भारत में किसी भी स्थान पर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में गिरफ्तारी वारंट के निष्पादन के लिए उपबंधित रीति से निष्पादित किया जा सकेगा ।
15. उल्लंघन का शमन करने की शक्ति-(1) धारा 13 के अधीन किसी उल्लंघन का शमन, ऐसा उल्लंघन करने वाले व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर प्रवर्तन निदेशक या प्रवर्तन निदेशालय के ऐसे अन्य अधिकारियों और रिजर्व बैंक के ऐसे अधिकारियों द्वारा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किए जाएं, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, आवेदन की प्राप्ति की तारीख से एक सौ अस्सी दिन के भीतर किया जा सकेगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन उल्लंघन का शमन कर दिया गया है वहां ऐसे शमन किए गए उल्लंघन की बाबत ऐसा उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध उक्त धारा के अधीन, यथास्थिति, कोई कार्यवाही या आगे कार्यवाही, यथास्थिति, प्रारंभ नहीं की जाएगी या चालू नहीं रखी जाएगी ।
अध्याय 5
न्यायनिर्णयन और अपील
16. न्यायनिर्णायक प्राधिकारी की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 13 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए, उस व्यक्ति को जिसके विरुद्ध यह अभिकथन है कि उसने धारा 13 के अधीन उल्लंघन किया है, और जिसके विरुद्ध उपधारा (2) के अधीन परिवाद किया गया है (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् उक्त व्यक्ति कहा गया है) कोई शास्ति अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर प्रदान करने के पश्चात् विहित रीति में जांच करने के लिए राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, केन्द्रीय सरकार के उतने अधिकारियों को न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकेगी जितने वह उचित समझे :
परन्तु जहां न्यायनिर्णायक प्राधिकारी की यह राय है कि उक्त व्यक्ति के फरार होने की संभावना है या किसी रीति में शास्ति के संदाय की यदि उद्गृहीत की जाती है, अपवंचना करने की संभावना है तो वह, उक्त व्यक्ति को, इतनी रकम का और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जिन्हें वह उचित समझे, बंधपत्र या प्रत्याभूति देने का निदेश दे सकेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन न्यायानिर्णायक प्राधिकारियों को नियुक्त करते समय, राजपत्र में प्रकाशित आदेश में, उनकी संबंधित अधिकारिता को भी विनिर्दिष्ट करेगी ।
(3) कोई न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, उपधारा (1) के अधीन कोई जांच, केन्द्रीय सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा लिखित में किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
(4) उक्त व्यक्ति न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के समक्ष अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करने के लिए या तो स्वयं हाजिर हो सकेगा या अपनी पसंद के किसी विधि व्यवसायी अथवा चार्टर्ड अकाउन्टेंट की सहायता ले सकेगा ।
(5) प्रत्येक न्यायनिर्णायक प्राधिकारी को सिविल न्यायालय की वही शक्तियां होंगी, जो धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन अपील अधिकरण को प्रदान की गई हैं और, -
(क) उसके समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी;
(ख) वह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(6) प्रत्येक न्यायनिर्णायक प्राधिकारी उपधारा (2) के अधीन परिवाद पर यथासंभव शीघ्रता से विचार करेगा और उक्त परिवाद प्राप्त होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर अंतिम रूप से निपटारा करने का प्रयास करेगा:
परन्तु जहां परिवाद का उक्त अवधि के भीतर निपटारा नहीं किया जा सकता वहां न्यायनिर्णायक प्राधिकारी उक्त अवधि के भीतर परिवाद का निपटारा न कर पाने के लिए लिखित में कारणों को कालिक रूप से लेखबद्ध करेगा ।
17. विशेष निदेशक (अपील) को अपील-(1) केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारियों के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करने के लिए एक या अधिक विशेष निदेशक (अपील), अधिसूचना द्वारा, नियुक्त करेगी और उक्त अधिसूचना में उन विषयों और स्थानों को भी विनिर्दिष्ट करेगी जिनकी बाबत विशेष निदेशक (अपील) अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगा ।
(2) ऐसे न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा, जो प्रवर्तन सहायक निदेशक या प्रवर्तन उप निदेशक है, किए गए आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति विशेष निदेशक (अपील) को अपील कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से जिसको न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा किए गए आदेश की प्रति व्यथित व्यक्ति को प्राप्त होती है, पैंतालीस दिन के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी, ऐसी रीति में सत्यापित की जाएगी और उसके साथ उतनी फीस होगी, जो विहित की जाए:
परन्तु विशेष निदेशक (अपील) उक्त पैंतालीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न कर पाने के लिए पर्याप्त कारण था ।
(4) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, विशेष निदेशक (अपील), अपील के पक्षकारों को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करते हुए, उसे उपांतरित करते हुए या अपास्त करते हुए उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा वह उचित समझे ।
(5) विशेष निदेशक (अपील), उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक-एक प्रति अपील के पक्षकारों और संबंधित न्यायनिर्णायक प्राधिकारी को भेजेगा ।
(6) विशेष निदेशक (अपील) को सिविल न्यायालय की वही शक्तियां होंगी जो धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन अपील अधिकरण को प्रदान की गई हैं और-
(क) उसके समक्ष सभी कार्यवाहियां, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी;
(ख) वह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
18. अपील अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारियों [, सक्षम प्राधिकारियों] और विशेष निदेशक (अपील) के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करने के लिए, विदेशी मुद्रा अपील अधिकरण के नाम से ज्ञात अपील अधिकरण की, अधिसूचना द्वारा स्थापना करेगी ।
19. अपील अधिकरण को अपील-(1) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, केन्द्रीय सरकार या धारा 17 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट न्यायनिर्णायक प्राधिकारियों से भिन्न न्यायनिर्णायक प्राधिकारी या विशेष निदेशक (अपील) द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा:
परन्तु न्यायनिर्णायक प्राधिकारी या विशेष निदेशक (अपील) के शास्ति उद्ग्रहण करने वाले आदेश के विरुद्ध अपील करने वाला व्यक्ति, अपील फाइल करते समय, ऐसी शास्ति की रकम ऐसे प्राधिकारी के, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए, पास जमा करेगा:
परन्तु यह और कि जहां किसी विशिष्ट मामले में अपील अधिकरण की यह राय है कि ऐसी शास्ति जमा करने से ऐसे व्यक्ति को असम्यक् कठिनाई पैदा होगी, वहां अपील अधिकरण ऐसे जमा करने से, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जिन्हें वह शास्ति की वसूली को सुरक्षित करने के लिए अधिरोपित करना उचित समझे, अभिमुक्ति दे सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से जिसको न्यायनिर्णायक प्राधिकारी या विशेष निदेशक (अपील) द्वारा किए गए आदेश की प्रति व्यथित व्यक्ति या केन्द्रीय सरकार को प्राप्त होती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी तथा ऐसी रीति में सत्यापित की जाएगी तथा उसके साथ उतनी फीस होगी, जो विहित की जाए:
परन्तु अपील अधिकरण, उक्त पैंतालीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न कर पाने के लिए पर्याप्त कारण था ।
(3) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, अपील अधिकरण, अपील के पक्षकारों को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् उस आदेश को जिसके विरुद्ध अपील की गई है पुष्टि करते हुए, उसे उपांतरित करते हुए या अपास्त करते हुए उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा, जैसा वह ठीक समझे ।
(4) अपील अधिकरण, उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक-एक प्रति अपील के पक्षकारों और, यथास्थिति, संबंधित न्यायनिर्णायक प्राधिकारी या विशेष निदेशक (अपील) को भेजेगा ।
(5) उपधारा (1) के अधीन अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से विचार किया जाएगा और अपील प्राप्त होने की तरीख से एक सौ अस्सी दिन के भीतर उसके द्वारा अपील का अंतिम रूप से निपटारा करने का प्रयास किया जाएगा:
परन्तु जहां किसी अपील का उक्त एक सौ अस्सी दिन की अवधि के भीतर निपटारा नहीं किया जा सकता, वहां अपील अधिकरण उक्त अवधि के भीतर अपील का निपटारा न कर पाने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा ।
(6) अपील अधिकरण, किसी कार्यवाही के संबंध में, धारा 16 के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश की वैधता, औचित्य या शुद्धता की परीक्षा करने के प्रयोजनार्थ स्वप्रेरणा से या अन्यथा, ऐसी कार्यवाहियों के अभिलेख मंगा सकेगा और मामले में ऐसा आदेश कर सकेगा जैसा वह ठीक समझे ।
20. अपील अधिकरण की संरचना-(1) अपील अधिकरण, अध्यक्ष और उतने सदस्यों से मिलकर बनेगा जितने केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, -
(क) अपील अधिकरण की अधिकारिता का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा;
(ख) न्यायपीठ का गठन, अध्यक्ष द्वारा, एक या अधिक सदस्यों से, जो अध्यक्ष ठीक समझे, किया जा सकेगा;
(ग) अपील अधिकरण की न्यायपीठें सामान्यतया नई दिल्ली में और ऐसे अन्य स्थानों पर अधिविष्ट होंगी, जो केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष के परामर्श से, अधिसूचित करे;
(घ) केन्द्रीय सरकार, उन क्षेत्रों को अधिसूचित करेगी जिनके संबंध में अपील अधिकरण की प्रत्येक न्यायपीठ अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी ।
(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष किसी सदस्य को एक न्यायपीठ से किसी दूसरे न्यायपीठ में स्थानांतरित कर सकेगा ।
(4) यदि किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत होता है कि मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है जिसकी सुनवाई दो सदस्यों से मिलकर बनी किसी न्यायपीठ द्वारा की जानी चाहिए तो वह मामला या विषय अध्यक्ष द्वारा, यथास्थिति, ऐसी न्यायपीठ को अंतरित किया जा सकेगा या अंतरण के लिए उसको निर्दिष्ट किया जा सकेगा, जो अध्यक्ष ठीक समझे ।
21. अध्यक्ष, सदस्य और विशेष निदेशक (अपील) की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति अध्यक्ष या किसी सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह-
(क) अध्यक्ष की दशा में, किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश हो या रहा हो या होने के लिए अर्हित हो; और
(ख) सदस्य की दशा में, जिला न्यायाधीश हो या रहा हो या होने के लिए अर्हित हो ।
(2) कोई व्यक्ति विशेष निदेशक (अपील) के पद पर नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा, जब वह, -
(क) भारतीय विधिक सेवा का सदस्य रहा हो और उसने उक्त सेवा की श्रेणी का पद धारण किया हो; या
(ख) भारतीय राजस्व सेवा का सदस्य रहा हो और भारत सरकार के संयुक्त सचिव के समतुल्य पद धारण किया हो ।
22. पदावधि-अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए उस हैसियत में पद धारण करेगा:
परन्तु कोई अध्यक्ष या अन्य सदस्य, -
(क) अध्यक्ष की दशा में, पैसठ वर्ष; और
(ख) अन्य सदस्य की दशा में, बासठ वर्ष,
की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् उस हैसियत में पद धारण नहीं करेगा ।
23. सेवा के निबंधन और शर्तें-अध्यक्ष, अन्य सदस्यों और विशेष निदेशक (अपील) को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं:
परन्तु अध्यक्ष के या किसी सदस्य के न तो वेतन और भत्तों में और न ही उसकी सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन किया जाएगा ।
24. रिक्तियां-यदि अध्यक्ष या किसी सदस्य के पद में, अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न कारण से कोई रिक्ति होती है तो केन्द्रीय सरकार, उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करेगी और अपील अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियां उसी प्रक्रम से जारी रखी जा सकेंगी जिस पर रिक्ति भरी जाती है ।
25. पदत्याग और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष या कोई सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:
परन्तु अध्यक्ष या कोई सदस्य, जब तक कि केन्द्रीय सरकार उसे अपना पद पहले छोड़ने के लिए अनुज्ञात न कर दे, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास के समाप्त होने तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त किसी व्यक्ति के अपना पद ग्रहण करने तक या अपनी पदावधि के समाप्त होने तक, इनमें से जो भी सबसे पहले हो, पद धारण करता रहेगा ।
(2) अध्यक्ष या किसी सदस्य को उसके पद से, ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, की गई किसी जांच के पश्चात्, जिसमें संबद्ध अध्यक्ष या किसी सदस्य को उसके विरुद्ध आरोपों के बारे में सूचित कर दिया गया हो और ऐसे आरोपों के संबंध में सनुवाई का उचित अवसर दे दिया गया हो, साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेश से हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
26. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, ज्येष्ठतम सदस्य, उस तारीख तक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण करता है ।
(2) जब अध्यक्ष, अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब ज्येष्ठतम सदस्य, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है ।
27. अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) को उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जितने वह ठीक समझे ।
(2) अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी अपने कृत्यों का निर्वहन, यथास्थिति, अध्यक्ष और विशेष निदेशक (अपील) के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे ।
(3) अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।
28. अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होंगे किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होंगे और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) को अपनी ही प्रक्रिया विनियमित करने की शक्तियां होंगी ।
(2) अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय निम्नलिखित विषयों की बाबत किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसे हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज अथवा ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अध्यपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;
(छ) व्यतिक्रम में किसी अभ्यावेदन को खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;
(ज) व्यतिक्रम में किसी अभ्यावेदन को खारिज करने के किसी आदेश या उसके द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना; और
(झ) कोई अन्य विषय, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किया जाए ।
(3) अपील अधिकरण या विशेष निदेशक (अपील) द्वारा इस अधिनियम के अधीन किया गया कोई आदेश अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) द्वारा सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होगा और इस प्रयोजन के लिए अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण या विशेष निदेशक (अपील) अपने द्वारा किए गए किसी आदेश को स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी ऐसे सिविल न्यायालय को पारेषित कर सकेगा और ऐसा सिविल न्यायालय उस आदेश का इस प्रकार निष्पादन करेगा मानो वह उस न्यायालय द्वारा की गई कोई डिक्री हो ।
(5) अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी और अपील अधिकरण दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
29. न्यायपीठों में कार्य का वितरण-जहां न्यायपीठों का गठन किया जाता है वहां अध्यक्ष, समय-समय पर, अधिसूचना द्वारा, अपील अधिकरण के कार्य के न्यायपीठों में वितरण के बारे में उपबंध कर सकेगा और उन विषयों के लिए भी उपबंध कर सकेगा जिनके बारे में प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा कार्यवाही की जा सकेगी ।
30. मामले अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति-किसी भी पक्षकार के आवेदन पर और पक्षकारों को सूचना दिए जाने के पश्चात् तथा उनमें से ऐसे पक्षकार की सुनवाई करने के पश्चात् जिसे वह सुने जाने की वांछा करे या ऐसी सूचना के बिना स्वप्रेरणा से, अध्यक्ष किसी एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले को निपटारे के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अन्तरित कर सकेगा ।
31. बहुमत द्वारा विनिश्चय किया जाना-यदि दो सदस्यों से मिलकर बने किसी न्यायपीठ के सदस्यों की किसी प्रश्न पर राय में भिन्नता है तो वे उस प्रश्न या उन प्रश्नों का कथन करेंगे जिन पर उनका मतभेद है और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे जो या तो उस प्रश्न या उन प्रश्नों की स्वयं सुनवाई करेगा या उस प्रश्न या उन प्रश्नों पर अपील अधिकरण के अन्य सदस्यों में से किसी एक या अधिक सदस्यों द्वारा सुनवाई किए जाने के लिए मामले को निर्देशित करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय अपील अधिकरण के उन सदस्यों के बहुमत के अनुसार किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है जिनके अन्तर्गत वे सदस्य भी हैं जिन्होंने उसकी प्रथम सुनवाई की थी ।
32. विधि व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउटेंट की सहायता लेने का अपीलार्थी का और उपस्थापक अधिकारियों की नियुक्ति करने का सरकार का अधिकार-(1) इस अधिनियम के अधीन, अपील अधिकरण या विशेष निदेशक (अपील) को अपील करने वाला व्यक्ति, यथास्थिति, अपील अधिकरण या विशेष निदेशक (अपील) के समक्ष अपना मामला उपस्थापित करने के लिए या तो स्वयं उपस्थित हो सकेगा या अपनी पसन्द के किसी विधि व्यवसायी या चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता ले सकेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार एक या अधिक विधि व्यवसायियों या चार्टर्ड अकाउंटेटों को या अपने अधिकारियों में से किसी को उपस्थापक अधिकारियों के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी और इस प्रकार प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति, यथास्थिति, अपील अधिकरण या विशेष निदेशक (अपील) के समक्ष किसी अपील के संबंध में मामला उपस्थापित कर सकेगा ।
33. सदस्यों, आदि का लोक सेवक होना-अपील अधिकरण के अध्यक्ष, सदस्यों और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों, विशेष निदेशक (अपील) और न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के बारे में यह समझा जाएगा कि वे, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक हैं ।
34. सिविल न्यायालय की अधिकारिता का न होना-किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे विषय की बाबत कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी जिसको न्यायनिर्णायक प्राधिकारी या अपील अधिकरण या विशेष निदेशक (अपील) इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अवधारित करने के लिए सशक्त है, और इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत कोई व्यादेश किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा नहीं दिया जाएगा ।
35. उच्च न्यायालय को अपील-अपील अधिकरण के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, अपील अधिकरण का विनिश्चय या आदेश उसको संसूचित किए जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर ऐसे आदेश से उद्भूत विधि के किसी प्रश्न पर उच्च न्यायालय को अपील फाइल कर सकेगा:
परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी को उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था तो वह उसे साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में उच्च न्यायालय" से अभिप्रेत है, -
(क) वह उच्च न्यायालय जिसकी अधिकारिता के भीतर व्यथित पक्षकार मामूली तौर से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है; और
(ख) जहां केन्द्रीय सरकार व्यथित पक्षकार है वहां वह उच्च न्यायालय जिसकी अधिकारिता के भीतर प्रत्यर्थी, अथवा किसी ऐसे मामले में जहां एक से अधिक प्रत्यर्थी हैं, वहां, कोई प्रत्यर्थी, मामूली तौर से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है ।
अध्याय 6
प्रवर्तन निदेशालय
36. प्रवर्तन निदेशालय-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना करेगी, जिसमें एक निदेशक और ऐसे अन्य अधिकारी या अधिकारियों का वर्ग होगा, जो वह ठीक समझे, जिन्हें प्रवर्तन अधिकारी कहा जाएगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रवर्तन सहायक निदेशक की पंक्ति से नीचे के प्रवर्तन अधिकारियों की नियुक्ति करने के लिए प्रवर्तन निदेशक या प्रवर्तन अपर निदेशक या प्रवर्तन विशेष निदेशक या प्रवर्तन उप-निदेशक को, प्राधिकृत कर सकेगी ।
(3) ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार अधिरोपित करे, प्रवर्तन अधिकारी इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और अधिरोपित कर्तव्यों का निर्वहन कर सकेगा ।
37. तलाशी, अभिग्रहण आदि की शक्ति-(1) प्रवर्तन निदेशक और ऐसे अन्य प्रवर्तन अधिकारी जो सहायक निदेशक की पंक्ति से नीचे के न हों, धारा 13 में निर्दिष्ट उल्लंघन के अन्वेषण का कार्य करेंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अधिसूचना द्वारा, केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या रिजर्व बैंक के किसी अधिकारी या अधिकारियों के किसी वर्ग को जो भारत सरकार के अवर सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, धारा 13 में निर्दिष्ट किसी उल्लंघन का अन्वेषण करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगी ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी वैसी ही शक्तियों का प्रयोग करेंगे जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन आय-कर प्राधिकारियों को प्रदान की गई हैं और ऐसी शक्तियों का प्रयोग उस अधिनियम के अधीन अधिकथित परिसीमाओं के अधीन रहते हुए करेंगे ।
[37क. धारा 4 के उल्लंघन में भारत से बाहर धारित आस्तियों के संबंध में विशेष उपबंध-(1) किसी जानकारी की प्राप्ति पर या अन्यथा यदि केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित प्राधिकृत अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर स्थित किसी स्थावर संपत्ति के धारा 4 के उल्लंघन में धारित किए जाने का संदेह है, तो वह कारणों को लेखबद्ध किए जाने के पश्चात् आदेश द्वारा, ऐसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के भीतर स्थावर संपत्ति के समतुल्य मूल्य का अभिग्रहण कर सकेगा :
परंतु ऐसा कोई अभिग्रहण ऐसे मामले में नहीं किया जाएगा जहां ऐसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या भारत के बाहर स्थित किसी स्थावर संपत्ति का कुल मूल्य उस मूल्य से कम है जो विहित किया जाए ।
(2) अभिग्रहण का सुसंगत सामग्री सहित आदेश केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त ऐसे सक्षम अधिकारी के समक्ष, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का नहीं होगा ऐसे अभिग्रहण की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर रखा जाएगा ।
(3) सक्षम प्राधिकारी ऐसी याचिका का निपटारा प्रवर्तन निदेशालय के प्रतिनिधियों और व्यथित व्यक्ति को सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् अभिग्रहण की तारीख से एक सौ अस्सी दिन की अवधि के भीतर ऐसे आदेश की पुष्टि करके या उसे अपास्त करके करेगा ।
स्पष्टीकरण-एक सौ अस्सी दिनों की अवधि की संगणना करते समय न्यायालय द्वारा मंजूर की गई रोक की अवधि को अपवर्जित किया जाएगा और ऐसे रोक आदेश के बातिल किए जाने की संसूचना की तारीख से कम से कम तीस दिन की अतिरिक्त अवधि की मंजूरी दी जाएगी ।
(4) सक्षम प्राधिकारी का समतुल्य आस्ति के अभिग्रहण की पुष्टि करने संबंधी आदेश न्यायनिर्णयन की कार्यवाहियों का निपटारा होने तक बना रहेगा और तत्पश्चात् न्यायनिर्णायक प्राधिकारी उपधारा (1) के अधीन किए गए अभिग्रहण के बारे में और कार्रवाई करने के संबंध में न्यायनिर्णयन संबंधी आदेश में समुचित निदेश पारित करेगा:
परंतु यदि इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर व्यथित व्यक्ति ऐसी विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूति या स्थावर संपत्ति के तथ्य को प्रकट करता है और उसे भारत में वापस लाता है तो, यथास्थिति, सक्षम प्राधिकारी या न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, व्यथित व्यक्ति से इस संबंध में आवेदन की प्राप्ति पर और व्यथित व्यक्ति तथा प्रवर्तन निदेशालय के प्रतिनिधियों को सुने जाने का अवसर दिए जाने के पश्चात् ऐसा समुचित आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे, जिसके अंतर्गत उपधारा (1) के अधीन किए गए अभिग्रहण को अपास्त किए जाने का आदेश भी है ।
(5) सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।
(6) धारा 15 में अंतर्विष्ट कोई बात इस धारा को लागू नहीं होगी ।]
38. अन्य अधिकारियों को सशक्त करना-(1) केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा और ऐसी शर्तों तथा परिसीमाओं के अधीन रहते हुए जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे, सीमाशुल्क के किसी अधिकारी या किसी केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क अधिकारी या किसी पुलिस अधिकारी या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अन्य अधिकारी को इस अधिनियम के अधीन प्रवर्तन निदेशक या किसी अन्य प्रवर्तन अधिकारी की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए, जो आदेश में कथित किए जाएं, प्राधिकृत कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिकारी वैसी ही शक्तियों का, जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन आय-कर प्राधिकारियों को प्रदान की गई हैं, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए प्रयोग करेंगे जिन्हें केन्द्रीय सरकार अधिरोपित करे ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
39. कतिपय मामलों में दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-जहां कोई दस्तावेज-
(i) किसी व्यक्ति द्वारा पेश की जाती है या दी जाती है अथवा किसी व्यक्ति की अभिरक्षा या नियंत्रण से दोनों दशाओं में इस अधिनियम के अधीन या किसी अन्य विधि के अधीन अभिग्रहीत की जाती है; या
(ii) इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे उल्लंघन के अन्वेषण के दौरान, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि किसी व्यक्ति ने उसे किया है, भारत से बाहर किसी स्थान से (ऐसे प्राधिकारी या व्यक्ति द्वारा और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित रूप में प्राप्त की गई है), और ऐसी दस्तावेज इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में उसके विरुद्ध अथवा उसके और किसी अन्य ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिसके विरुद्ध उसके साथ संयुक्त रूप से कार्यवाही की गई है, साक्ष्य में प्रस्तुत की गई है, वहां, यथास्थिति, न्यायालय या न्यायनिर्णायक प्राधिकारी,-
(क) जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया गया हो, यह उपधारणा करेगा कि ऐसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और उसका प्रत्येक अन्य भाग, जिसका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है या जिसकी बाबत न्यायालय उचित रूप से यह मान सकता है कि वह किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित की गई हैं या वह उसके हस्तलेख में है, उस व्यक्ति के हस्तलेख में है और निष्पादित या अनुप्रमाणित दस्तावेज की दशा में, यह उपधारणा करेगा कि वह उसी व्यक्ति द्वारा, निष्पादित या अनुप्रमाणित की गई थी जिसके द्वारा उसका निष्पादित या अनुप्रमाणित किया जाना तात्पर्यित है;
(ख) यदि ऐसी दस्तावेज साक्ष्य में अन्यथा ग्राह्य है तो उस दस्तावेज को इस बात के होते हुए भी, साक्ष्य में ग्रहण करेगा कि यह सम्यक् रूप से स्टांपित नहीं है;
(ग) खंड (i) के अन्तर्गत आने वाले मामले में, जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया गया हो, यह उपधारणा भी करेगा कि ऐसी दस्तावेजों की अंतर्वस्तुएं सही हैं ।
40. इस अधिनियम के प्रवर्तन का निलंबन-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं जिनके कारण यह आवश्यक हो गया है कि इस अधिनियम द्वारा अनुदत्त किसी अनुज्ञा या अधिरोपित किसी निर्बंधन को अनुदत्त या अधिरोपित किया जाना समाप्त किया जाना चाहिए, या यदि वह लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझती है, तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबंधों का प्रवर्तन, उस परिमाण तक या तो अनिश्चितकाल के लिए या ऐसी अवधि के लिए जो अधिसूचित की जाए, निलंबित कर सकेगी या उन्हें शिथिल कर सकेगी ।
(2) जहां इस अधिनियम के किसी उपबंध का प्रवर्तन उपधारा (1) के अधीन अनिश्चित काल के लिए निलंबित या शिथिल किया गया है वहां ऐसा निलंबन या शिथिलीकरण, इस अधिनियम के प्रवृत्त रहने के दौरान किसी भी समय केन्द्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, हटाया जा सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन, उस अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना नहीं निकाली जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी । किन्तु अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।
41. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, रिजर्व बैंक को ऐसे साधारण या विशेष निदेश दे सकेगी जो वह ठीक समझे और रिजर्व बैंक, इस अधिनिमय के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में, किन्हीं ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।
42. कंपनी द्वारा उल्लंघन-(1) जहां इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, दिए गए किसी निदेश या किए गए किसी आदेश के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन करने वाला कोई व्यक्ति कंपनी है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के किए जाने के समय उस कंपनी के कारोबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि उल्लंघन उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, दिए गए किसी निदेश या किए गए किसी आदेश के उपबंधों में से किसी का कोई उल्लंघन, किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह उल्लंघन कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस उल्लंघन का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस उल्लंघन का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(i) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और
(ii) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
43. कतिपय मामलों में मृत्यु या दिवालियापन-धारा 13 के उपबंधों के संबंध में उत्पन्न किसी अधिकार, बाध्यता, दायित्व, कार्यवाही या अपील का उस धारा के अधीन दायी व्यक्ति की मृत्यु या दिवालियापन के कारण उपशमन नहीं होगा और ऐसी मृत्यु या दिवालियापन होने पर ऐसे अधिकार और बाध्यताएं, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि या शासकीय रिसीवर या शासकीय समनुदेशिती को न्यागत हो जाएंगी:
परन्तु यह कि मृतक का विधिक प्रतिनिधि केल मृतक की विरासत या सम्पदा तक ही दायी होगा ।
44. विधिक कार्यवाहियों का वर्जन-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम, निकाली गई अधिसूचना, दिए गए निदेश या आदेश के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक अथवा केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक के किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर रहा है या किन्हीं कृत्यों का निर्वहन कर रहा है या किन्हीं कर्तव्यों का पालन कर रहा है, नहीं होगी ।
45. कठिनाइयों को दूर करना-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए कोई भी ऐसी बात कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो:
परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
46. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित का उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
(क) धारा 5 के अधीन चालू खाता संव्यवहारों पर उचित निर्बन्धनों का अधिरोपण;
[(कक) ऐसी लिखतें, जिन्हें धारा 6 की उपधारा (7) के अधीन ऋण लिखतें अवधारित किया जाए;
(कख) धारा 6 की उपधारा (2क) के अनुसार पूंजीगत खाता संव्यवहारों के अनुज्ञेय वर्ग, विदेशी मुद्रा की ग्राह्यता की परिसीमाएं और ऐसे संव्यवहारों का प्रतिषेध, निर्बन्धन या विनियमन;]
(ख) वह रीति जिसमें उल्लंघनों का धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन शमन किया जा सकेगा;
(ग) न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन जांच किए जाने की रीति;
(घ) धारा 17 और धारा 19 के अधीन अपील का प्ररूप और ऐसी अपील फाइल करने के लिए फीस;
(ङ) धारा 23 के अधीन अपील अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों और विशेष निदेशक (अपील) को संदेय वेतन और भत्ते तथा तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
(च) धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) के कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें;
(छ) ऐसे अतिरिक्त विषय जिनकी बाबत अपील अधिकरण और विशेष निदेशक (अपील) धारा 28 की उपधारा (2) के खण्ड (i)के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे;
1[(छछ) धारा 37क की उपधारा (1) में निर्दिष्ट विदेशी मुद्रा का सकल मूल्य;]
(ज) वह प्राधिकारी या व्यक्ति जिसके द्वारा और वह रीति जिससे कोई दस्तावेज धारा 39 के खण्ड (ii) के अधीन अधिप्रमाणित किया जा सकेगा; और
(झ) कोई अन्य विषय जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
47. विनियम बनाने की शक्ति-(1) रिजर्व बैंक, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए विनियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-
[(क) पूंजीगत लेखा संव्यवहारों के ऐसे अनुज्ञेय वर्ग, जिनमें धारा 6 की उपधारा (7) के अधीन अवधारित ऋण लिखतें अंतर्वलित हैं, ऐसे संव्यवहारों के लिए विदेशी मुद्रा की ग्राह्यता की परिसीमाएं और धारा 6 के अधीन ऐसे पूंजीगत लेखा संव्यवहारों का प्रतिषेध, निर्बन्धन या विनियमन;]
(ख) वह रीति जिससे और वह प्ररूप जिसमें धारा 7 की उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन घोषणा की जानी है;
(ग) धारा 8 के अधीन विदेशी मुद्रा के संप्रत्यावर्तन की अवधि और रीति;
(घ) वह सीमा जिस तक कोई व्यक्ति धारा 9 के खंड (क) के अधीन विदेशी करेंसी या विदेशी सिक्के रख सकेगा;
(ङ) व्यक्तियों का वह वर्ग और वह सीमा जिस तक धारा 9 के खण्ड (ख) के अधीन विदेशी करेंसी खाता धारित या प्रचालित किया जा सकेगा;
(च) वह सीमा जिस तक धारा 9 के खण्ड (घ) के अधीन अर्जित विदेशी मुद्रा को छूट दी जा सकेगी;
(छ) वह सीमा जिस तक धारा 9 के खण्ड (ङ) के अधीन अर्जित विदेशी मुद्रा प्रतिधारित की जा सकेगी;
[(छक) करेंसी या करेंसी नोटों का निर्यात, आयात या उन्हें रखना;]
(ज) कोई अन्य विषय जो विनिर्दिष्ट किए जाने के लिए अपेक्षित है या विनिर्दिष्ट किया जाए ।
1[(3) रिजर्व बैंक द्वारा, उस तारीख के पूर्व, जिसको इस अधिनियम की धारा 6 और धारा 47 के अधीन पूंजीगत लेखा संव्यवहारों पर इस धारा के उपबंध अधिसूचित किए जाते हैं, बनाए गए ऐसे सभी विनियम, जिनकी बाबत विनियम बनाने की शक्ति अब केन्द्रीय सरकार में निहित है, तब तक विधिमान्य बने रहेंगे जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा उन्हें संशोधित या विखंडित नहीं कर दिया जाता है ।]
48. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
49. निरसन और व्यावृत्ति-(1) विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) इसके द्वारा निरसित किया जाता है और उक्त अधिनियम की (जिसे इसमें इसके पश्चात् निरसित अधिनियम कहा गया है) धारा 52 की उपधारा (1) के अधीन गठित अपील बोर्ड का विघटन हो जाएगा ।
(2) उक्त अपील बोर्ड के विघटन पर, अपील बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति और सदस्य के रूप में नियुक्त प्रत्येक अन्य व्यक्ति जो ऐसी तारीख के ठीक पूर्व उस रूप में पदधारण किए हुए है, अपना-अपना पद रिक्त कर देंगे और ऐसा कोई अध्यक्ष या अन्य व्यक्ति अपनी पदावधि या सेवा की किसी संविदा की समयपूर्व समाप्ति के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय, इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् निरसित अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान नहीं करेगा और कोई न्यायनिर्णायक अधिकारी निरसित अधिनियम की धारा 51 के अधीन किसी उल्लंघन की अवेक्षा नहीं करेगा ।
(4) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निरसित अधिनियम के अधीन किए गए सभी अपराध निरसित अधिनियम के उपबंधों द्वारा शासित होते रहेंगे मानो वह अधिनियम निरसित न हुआ हो ।
(5) ऐसे निरसन के होते हुए भी, -
(क) इसके द्वारा निरसित अधिनियम के अधीन की गई या की जाने के लिए तात्पर्यित कोई बात या कार्रवाई जिसके अंतर्गत बनाया गया कोई नियम, जारी की गई कोई अधिसूचना, या किया गया निरीक्षण, आदेश या निकाली गई कोई सूचना अथवा की गई कोई नियुक्ति, पुष्टि या घोषणा या दी गई कोई अनुज्ञप्ति, अनुज्ञा, प्राधिकार या छूट या निष्पादित कोई दस्तावेज या लिखत या दिया गया कोई निदेश है, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी;
(ख) निरसित अधिनियम की धारा 52 की उपधारा (2) के अधीन अपील बोर्ड को की गई कोई अपील, जो इस अधिनियम के प्रारंभ तक निपटाई नहीं गई है, इस अधिनियम के अधीन गठित अपील अधिकरण को अंतरित हो जाएगी और उसका निपटारा उसके द्वारा किया जाएगा;
(ग) निरसित अधिनियम की धारा 52 की उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन अपील बोर्ड के किसी विनिश्चय या आदेश से प्रत्येक अपील, यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के पहले फाइल नहीं की गई है, तो उच्च न्यायलय के समक्ष ऐसे प्रारंभ के साठ दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी:
परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाए कि अपीलार्थी उक्त अवधि के भीतर पर्याप्त कारणवश अपील फाइल नहीं कर सका था तो वह साठ दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी कोई अपील ग्रहण कर सकेगा ।
(6) उपधारा (3) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, उपधारा (2), उपधारा (4) और उपधारा (5) में विशिष्ट मामलों के उल्लेख का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह निरसन के प्रभाव के बारे में साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के साधारणतया लागू होने पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है या उसको किसी भी प्रकार प्रभावित करता है ।
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