भारत की आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950
(1950 का अधिनियम संख्यांक 49)
[14 अगस्त, 1950]
आकस्मिकता निधि की स्थापना और उसे बनाए
रखने का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारत की आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950 है ।
2. भारत की आकस्मिकता निधि की स्थापना- [(1)] भारत की आकस्मिकता निधि के नाम से अग्रदाय की प्रकृति की एक आकस्मिकता निधि स्थापित की जाए, जिसमें भारत की संचित निधि में से [पचास करोड़ रुपएट की राशि संदत्त की जाएगी ।
[(2) उस तारीख से ही, जिसको वित्त विधेयक, 2005 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, उस राशि में, जो उपधारा (1) के अधीन भारत की संचित निधि में से भारत की आकस्मिकता निधि में संदत्त की जाएगी, पांच अरब रुपए तक की वृद्धि हो जाएगी :]
[परन्तु 28 जुलाई, 1999 से आरम्भ होने वाली और 31 मार्च, 2000 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान यह धारा इस उपांतरण के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी कि “पचास करोड़ रुपए" शब्दों के स्थान पर पांच अरब पचास करोड़ रुपए" शब्द रखे जाएंगे ।]
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3. आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा और उसमें से आहरण-भारत की संचित निधि राष्ट्रपति की ओर से भारत सरकार के वित्त मंत्रालय में भारत सरकार के एक सचिव द्वारा धारित की जाएगी और ऐसी निधि में से कोई अग्रिम नहीं दिया जाएगा सिवाय ऐसे आकस्मिक व्यय की पूर्ति करने के प्रयोजनों के लिए, जिसका विधि द्वारा किए गए विनियोगों के अधीन संसद् द्वारा प्राधिकृत किया जाना लम्बित हो ।
4. नियम बनाने की शक्ति- [(1)] इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,] ऐसे सभी विषयों को विनियमित करने के लिए नियम बना सकेगी, जो भारत की संचित निधि में धन के संदाय की अभिरक्षा और उसमें से धन के आहरण से संबंधित या उसमें आनुषंगिक हों ।
8[(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व, दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
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