संघ राज्यक्षेत्र (विधि) अधिनियम, 1950
(1950 का अधिनियम संख्यांक 30)
[15 अप्रैल, 1950]
कुछ [संघ राज्यक्षेत्रों] पर विधियों का विस्तारण करने के लिए
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम 1[संघ राज्यक्षेत्रट (विधि) अधिनियम, 1950 है ।
(2) यह 16 अप्रैल, 1950 को प्रवृत्त होगा ।
2. कुछ संघ राज्यक्षेत्रों पर अधिनियमितियों का विस्तार करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अधिसूचना की तारीख को किसी [राज्य] में प्रवृत्त किसी अधिनियमिति को ऐसे निर्बन्धनों और उपांतरणों सहित जो वह उचित समझे, [दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर या त्रिपुरा संघ राज्यक्षेत्र या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के किसी भाग पर,] विस्तार कर सकेगी ; ***।
3. त्रिपुरा, विंध्य प्रदेश और मणिपुर पर विधियों का विस्तारण-(1) विलयित राज्य (विधि) अधिनियम, 1949 (1949 का 59) की अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमों और अध्यादेशों का इसके द्वारा त्रिपुरा और विंध्य प्रदेश राज्यों पर विस्तार किया जाता है और वे ऐसे राज्यों में उसी प्रकार प्रवृत्त रहेंगे जिस प्रकार साधारणतः वे ऐसे राज्यक्षेत्रों में प्रवृत्त रहते हैं जिन पर उनका विस्तार, इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व किया गया है ।
(2) [उपधारा (2क) में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिनियम और अध्यादेश का इसके द्वारा मणिपुर राज्य पर विस्तार किया जाता है और वे मणिपुर राज्य में उसी प्रकार प्रवृत्त रहेंगे जिस प्रकार साधारणतः वे ऐसे राज्यक्षेत्रों में प्रवृत्त रहते हैं जिन पर उनका विस्तार, इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किया गया है :
परन्तु मणिपुर राज्य को लागू होने के सम्बन्ध में भारतीय दण्ड संहिता, (1860 का 45) का प्रभाव इस प्रकार होगा मानो कि-
(क) उसकी धारा 361 में शब्द “अठारह" के स्थान पर शब्द “पन्द्रह" प्रतिस्थापित किया गया था ; और
(ख) उसकी धारा 375 के पांचवें खण्ड में, शब्द सोलह" से स्थान पर शब्द “चौदह" प्रतिस्थापित किया गया था और अपवाद में शब्द “पन्द्रह" के स्थान पर शब्द “तेरह" प्रतिस्थापित किया गया था ।]
[(2क) इस अधिनियम की अनुसूची के भाग क में विनिर्दिष्ट अधिनियमों का विस्तार मणिपुर राज्य पर नहीं होगा और अनुसूची के भाग ख में विनिर्दिष्ट अधिनियमों का विस्तार संघ राज्यक्षेत्र (विधि) संशोधन, 1956 (1956 का 68) के प्रारंभ की तारीख से केवल मणिपुर राज्य पर होगा और वे मणिपुर राज्य में प्रवृत्त रहेंगे और उस तारीख से उक्त भाग में विनिर्दिष्ट रीति से और विस्तार तक संशोधित किए जाएंगे ।]
(3) उक्त राज्यों में पूर्वोक्त ऐसे किसी अधिनियम या अध्यादेश को लागू होना सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए कोई न्यायालय या अन्य प्राधिकरण ऐसे अधिनियम या अध्यादेश का अर्थान्वयन ऐसे परिवर्तनों सहित कर सकेगा जो न्यायालय या अन्य प्राधिकरण के समक्ष रखे जाने वाले विषय का अनुकूलन करने के लिए आवश्यक या उचित प्रतीत हों । किन्तु ऐसा परिवर्तन विषयवस्तु के सार को प्रभावित न करते हुए किया जाएगा ।
[स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 4 के प्रयोजनों के लिए 31 अक्तूबर, 1956 के पश्चात् की किसी अवधि के संबंध में मणिपुर या त्रिपुरा राज्य के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया कि वह, यथास्थिति, मणिपुर या त्रिपुरा संघ राज्यक्षेत्र के प्रति निर्देश है ।]
4. निरसन और व्यावृत्ति-दिल्ली विधि अधिनियम, 1912 (1912 का 13) की धारा 7, अजमेर-मारवाड़ (एक्सटेंशन आफ लाज) ऐक्ट, 1947 (1947 का 52) और ऐसी कोई विधि, जो इस अधिनियम द्वारा [मणिपुर, त्रिपुरा और विंध्य प्रदेश राज्यों में से किसी पर विस्तारित अधिनियम या अध्यादेश के प्रवृत्त होने से ठीक पूर्व, उस राज्य में प्रवृत्त है और जो इस प्रकार विस्तारित अधिनियम या अध्यादेश के समरूप है,] इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं :
परन्तु ऐसा निरसन निम्नलिखित को प्रभावित नहीं करेगा :-
(क) ऐसी किसी विधि का पूर्व प्रवर्तन ; या
(ख) ऐसी किसी विधि के विरुद्ध किए गए किसी अपराध की बाबत उपगत किसी शास्ति, समपहरण या दण्ड ; या
(ग) ऐसी किसी शास्ति, समपहरण या दण्ड की बाबत कोई अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार,
और ऐसा कोई अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार संस्थित किया जा सकेगा या चालू रखी जा सकेगी या प्रवर्तित किया जा सकेगा और ऐसी कोई शास्ति, समपहरण या दण्ड इस प्रकार अधिरोपित किया जा सकेगा मानो यह अधिनियम पारित ही नहीं किया गया था :
परन्तु यह और कि पूर्ववर्ती परन्तुक के अधीन रहते हुए ऐसी विधि के अधीन की गई किसी बात या कार्यवाही के बारे में, जिसमें की गई कोई नियुक्ति या किया गया प्रत्यायोजन, जारी की गई अधिसूचना, किए गए आदेश, अनुदेश या निदेश, बनाए गए नियम, विनियम, प्ररूप, बनाई गई उपविधि या स्कीम, अनुदत्त प्रमाणपत्र, पेटेन्ट, अनुज्ञापत्र या अनुज्ञप्ति या प्रभावी किए गए रजिस्ट्रीकरण भी सम्मिलित हैं यह समझा जाएगा कि वह धारा 2 के अधीन या, यथास्थिति, ऐसे अधिनियम या अध्यादेश के समरूपी उपबंधों के अधीन, जिनका धारा 3 के अधीन राज्य पर [विस्तार किया गया] है, की गई है और तद्नुसार तब तक प्रभावी रहेगी जब तक कि वह उक्त धारा 2 के अधीन या, यथास्थिति, उक्त अधिनियम या अध्यादेश के अधीन की गई किसी बात या कार्यवाही द्वारा अतिष्ठित न कर दी जाए ।
[अनुसूची
[धारा 3(2क) देखिए]
भाग क
वे अधिनियम जिनका इस अधिनियम द्वारा मणिपुर पर विस्तार नहीं किया गया है
|
वर्ष |
संख्यांक |
संक्षिप्त नाम |
|
1 |
2 |
3 |
|
1866 |
XXI
|
संपरिवर्ती विवाह विघटन अधिनियम, 1866 |
|
1872 |
XV |
भारतीय क्रिश्चियन विवाह अधिनियम, 1872 |
|
। । । । । । |
||
|
1879 |
XVIII |
विधिक व्यवसायी अधिनियम, 1879 |
भाग ख
वे अधिनियम जिनका विस्तार, संघ राज्यक्षेत्र (विधि) संशोधन अधिनियम, 1956 के प्रारंभ से, इस अधिनियम द्वारा मणिपुर पर किया गया है
|
वर्ष |
संख्यांक |
संक्षिप्त नाम |
संशोधन (यदि कोई हो) |
|
1 |
2 |
3 |
4 |
|
1873 |
X |
इण्डियन ओथस ऐक्ट, 1873 |
धारा 1 में, द्वितीय पैरा के स्थान पर निम्नलिखित पैरा रखा जाएगा, अर्थात् :- इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।"। |
|
1882 |
IV |
संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 |
- |
|
1887 |
VII |
वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1887 |
- |
|
1898 |
V |
कोड आफ क्रिमिनल प्रोसिजर, 1898 |
(1) धारा 1 की उपधारा (2) में और मणिपुर संघ राज्यक्षेत्र" शब्दों का लोप किया जाएगा, और (2) धारा 93क की उपधारा (1) में या मणिपुर संघ राज्यक्षेत्र में" शब्दों का लोप किया जाएगा । |
|
1908 |
V |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 |
धारा 1 की उपधारा (3) में खण्ड (ग) और खण्ड (घ) के अंत में और" शब्दों का लोप किया जाएगा । |
|
1925 |
XXXIX |
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 |
- |
______

