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भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2014 ( Indian Institutes of Information Technology Act, 2014 )


 

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2014

(2014 का अधिनियम संख्यांक 30)

[8 दिसम्बर, 2014]

कतिपय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थाओं को, सूचना प्रौद्योगिकी में नई जानकारी का

विकास करने की दृष्टि से राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने और

सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए विश्व स्तर की जन शक्ति

का उपबंध करने और ऐसी संस्थाओं से संबद्ध

या उसके आनुषंगिक कतिपय अन्य

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के पैंसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2014 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. कतिपय संस्थाओं की राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं के रूप में घोषणा-अनुसूची में वर्णित संस्थाओं के उद्देश्य ऐसे हैं, जो उन्हें राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि प्रत्येक ऐसी संस्था, राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) किसी संस्थान के संबंध में, बोर्ड" से धारा 13 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट शासक बोर्ड अभिप्रेत है;

(ख) अध्यक्ष" से धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त शासक बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ग) परिषद्" से धारा 40 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित परिषद् अभिप्रेत है;

(घ) निदेशक" से संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है; 

(ङ) विद्यमान संस्थान" से अनुसूची के स्तंभ (3) में वर्णित कोई संस्थान अभिप्रेत है ;

(च) संस्थान" से अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित कोई संस्थान अभिप्रेत हैं;            

(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ज) अनुसूची" से इस अधिनियम की अनुसूची अभिप्रेत है;

(झ) किसी संस्थान के संबंध में सिनेट" से उसकी सिनेट अभिप्रेत है;

(ञ) किसी संस्थान के संबंध में परिनियम" और अध्यादेश" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए उस संस्थान के परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।

अध्याय 2

संस्थान

4. संस्थानों का निगमन-(1) अधिनियम के प्रारंभ से ही प्रत्येक विद्यमान संस्थान अनुसूची के स्तंभ (5) में यथावर्णित उसी नाम से एक निगमित निकाय होगा ।

(2) अनुसूची में स्तम्भ (5) में निर्दिष्ट प्रत्येक विद्यमान संस्थान का शाश्वत् उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी, जिसको इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जंगम और स्थावर, दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण तथा व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।

5 संस्थानों के निगमन का प्रभाव-इस अधिनियम के प्रारंभ से ही,-

(क) किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में किसी सोसाइटी के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह अनुसूची के स्तभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान के प्रति निर्देश है;

(ख) प्रत्येक विद्यमान संस्थान की या उसके स्वामित्व में की सभी संपत्तियां, चाहे जंगम हों या स्थावर, अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान में निहित होंगी;

(ग) अनुसूची के स्तंभ (3) में वर्णित प्रत्येक विद्यमान संस्थान के सभी अधिकार और ऋण तथा अन्य दायित्व, अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार तथा दायित्व होंगे;

(घ) अनुसूची में स्तंभ (3) में वर्णित प्रत्येक विद्यमान संस्थान द्वारा ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा, अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान में उसी सेवाधृति पर, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों तथा विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसा कि वह उस दशा में उसको धारण करता जिसमें यह अधिनियम, अधिनियमित नहीं किया जाता और तब तक उसी प्रकार धारण करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी सेवा की अवधि, पारिश्रमिक और निबंधन तथा शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :

परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन, ऐसे कर्मचारी को स्वीकार नहीं है तो उसका नियोजन, संस्थान द्वारा कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार समाप्त किया जा सकेगा या यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया गया है तो स्थायी कर्मचारियों की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारी की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर का संस्थान द्वारा उसको संदाय करके समाप्त किया जा सकेगा :

परन्तु यह और कि अनुसूची के स्तम्भ (3) में वर्णित किसी भी विद्यमान संस्थान के निदेशक, रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारी के प्रति तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या किसी लिखत या अन्य दस्तावेज में किसी निर्देश का, चाहे शब्दों के किसी भी रूप में हो, अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह अनुसूची के स्तम्भ (5) में वर्णित तत्स्थानी संस्थान के निदेशक, रजिस्ट्रार और अधिकारी के प्रति निर्देश है; 

(ङ) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुसूची के स्तंभ (3) में वर्णित प्रत्येक विद्यमान संस्थान में किसी विद्या या अनुसंधान पाठ्यक्रम का अनुसरण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उक्त अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान में, ऐसे संस्थान से, जिससे ऐसे व्यक्ति ने प्रवास किया है, पाठ्यक्रम के समान स्तर पर, प्रवासित और रजिस्ट्रीकृत किया गया समझा जाएगा :

(च) इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व स्तंभ (3) में वर्णित विद्यमान संस्थान द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित या जो संस्थित किए जा सकते थे, सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित तत्समान संस्थान द्वारा या उसके विरुद्ध जारी या संस्थित रह सकेंगी ।

6. संस्थान के उद्देश्य-प्रत्येक संस्थान के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे, अर्थात् :-

(क) सूचना प्रौद्योगिकी और ज्ञान के सहबद्ध क्षेत्रों में प्रमुख संस्थाओं में से उभर कर आना;

(ख) विश्व के पटल पर राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी और सहबद्ध क्षेत्रों में नए ज्ञान और नवप्रवर्तन में अभिवृद्धि करना;

(ग) देश की ज्ञान संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने और सूचना प्रौद्योगिकी और सहबद्ध क्षेत्रों में विश्वव्यापी नेतृत्व प्रदान करने के लिए सामाजिक और पर्यावरणीय अभिविन्यास के साथ नवप्रवर्तन और उद्यमशीलता की भावना से ओत-प्रोत, सक्षम और योग्य युवाओं का विकास करना;

(घ) प्रवेश, विभिन्न पदों पर नियुक्ति, शैक्षणिक मूल्यांकन, प्रशासन और वित्त से संबंधित विषयों में उच्चतम श्रेणी की पारदर्शिता का संवर्धन और प्रबंध करना ।

7. संस्थान की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान, निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्: -

(क) शिक्षा में अभिवृद्धि और ज्ञान के प्रसार के लिए सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित ज्ञान के ऐसे क्षेत्रों और उससे सहबद्ध ऐसे क्षेत्रों में, जो ऐसा संस्थान ठीक समझे, शिक्षण के लिए व्यवस्था करना;

(ख) सूचना प्रौद्योगिकी और ज्ञान के सहबद्ध क्षेत्रों में अनुसंधान और नवीकरण का, ऐसी रीति से जो संस्थान ठीक समझे मार्गदर्शन करना, उनका आयोजन और संचालन करना, जिसके अन्तर्गत किसी अन्य संस्थान, शिक्षण संस्था, अनुसंधान संगठन या निगमित निकाय के साथ सहयोग या सहयोजन भी है;

(ग) परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां, डिप्लोमा तथा अन्य शिक्षा संबंधी उपाधियां या पदवियां प्रदान करना और मानद डिग्रियां प्रदान करना;

(घ) संस्थान द्वारा अपेक्षित ऐसे पदनामों के साथ, जो वह ठीक समझे, शिक्षण, अनुसंधान या अन्य शैक्षणिक पदों की स्थापना करना और निदेशक के पद से भिन्न ऐसे पदों पर सेवाधृति, अवधि पर या अन्यथा व्यक्तियों को परिषद् द्वारा अधिकथित नीति के अनुसार नियुक्त करना;

(ङ) ऐसे व्यक्तियों की, जो किसी अन्य संस्थान या शिक्षण संस्था में कार्यरत हैं या किसी उद्योग में संस्थान के अनुबद्ध, अतिथि या अभ्यागत संकाय सदस्यों के रूप में महत्वपूर्ण अनुसंधान में लगे हुए हैं, ऐसे निबंधनों पर और ऐसी अवधि के लिए जो संस्थान द्वारा विनिश्चित की जाए, नियुक्ति करना;

(च) प्रशासनिक और अन्य पद सृजित करना तथा उन पर परिषद् द्वारा अधिकथित नीति के अनुसार नियुक्तियां करना;

(छ) अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान के प्रसार के लिए व्यवस्था करना और उस प्रयोजन के लिए ऐसे ठहराव करना जिनमें ऐसे अन्य संस्थान, उद्योग, सिविल सोसाइटी या अन्य संगठनों के साथ परामर्श और सलाहकारी सेवाएं भी सम्मिलित हैं, जो संस्थान आवश्यक समझे;

(ज) वेबसाइट सृजित करना, ऐसी सूचना पर बल देना, जो छात्रों, प्रवेश, फीस, प्रशासनिक ढांचा, नीतियां, जिसके अंन्तर्गत भर्ती नियम, संकाय और गैर संकाय पद, वार्षिक रिपोर्ट तथा संस्थान के लेखा विवरण सहित वित्तीय ब्यौरे भी हैं, से संबंधित होने तक निर्बन्धित नहीं है ;

(झ) व्यक्ति, संस्था या निगमित निकाय से सेवाओं के लिए, जिनमें संस्थान द्वारा प्रदान किया गया प्रशिक्षण, परामर्श तथा सलाहकारी सेवाएं सम्मिलित हैं, ऐसे प्रभार, जो संस्थान ठीक समझे अवधारित करना, विनिर्दिष्ट करना तथा संदाय प्राप्त करना;

(ञ) संस्थान की या उसमें निहित किसी संपत्ति का ऐसी रीति से व्यवहार करना जो संस्थान, के उद्देश्यों की अभिवृद्धि करने के लिए ठीक समझे :

परन्तु जहां संस्थान को कोई भूमि, राज्य सरकार द्वारा निःशुल्क प्रदान की गई है वहां ऐसी भूमि केवल, ऐसी राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से ही व्ययनित की जा सकेगी;

(ट) सरकार से दान, अनुदान, संदान या उपकृति प्राप्त करना तथा, यथास्थिति, वसीयतकर्ताओं, संदानकर्ताओं या अंतरकों से जंगम या स्थावर संपत्तियों की वसीयत, संदान और अंतरण प्राप्त करना;

(ठ) विश्व के किसी भाग में संस्थान के पूर्णतः या भागतः समरूप उद्देश्य रखने वाली शैक्षणिक या अन्य संस्थाओं के शिक्षकों और विद्वानों के आदान-प्रदान द्वारा और साधारणतः ऐसी रीति में सहयोग करना जो सामान्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सहायक हों;

(ड) ऐसी अवसंरचना स्थापित करना और उसको बनाए रखना, जो संस्थान के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हो;

(ढ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां, पुरस्कार और पदक संस्थित करना और प्रदान करना;

(ण) तकनीकी शिक्षा संस्थाओं की सहायता करके राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों की प्रोद्यौगिक आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करना; और

(त) ऐसी अन्य सभी बातें करना जो संस्थान के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।

(2) खंड (ञ) में किसी बात के होते हुए भी, कोई संस्थान, कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन के बिना किसी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति से व्ययन नहीं करेगा ।

8. संस्थानों का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना-(1) प्रत्येक संस्थान सभी व्यक्तियों के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी लिंग, जाति, वंश, निःशक्तता, अधिवास, नस्ल, सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि के हों ।

(2) किसी भी संस्थान द्वारा किसी ऐसी संपत्ति की वसीयत, संदान या अंतरण स्वीकार नहीं किया जाएगा जो परिषद् की राय में ऐसी शर्तों या बाध्यताओं को अन्तर्वलित करता है जो इस धारा के भाव और उद्देश्य के प्रतिकूल हैं ।

(3) प्रत्येक संस्थान में अध्ययन के प्रत्येक कार्यक्रम में प्रवेश, ऐसे संस्थान द्वारा प्रवेश की प्रक्रिया के प्रारंभ से पूर्व उसके प्रोस्पेक्टस के माध्यम से प्रकट पारदर्शी और युक्तियुक्त मानदंड के माध्यम से निर्धारित योग्यता पर आधारित होगा :

परंतु प्रत्येक ऐसा संस्थान, केन्द्रीय शिक्षा संस्था (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 (2007 का 5) के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय शिक्षा संस्था होगी ।

9. संस्थान में शिक्षण-प्रत्येक संस्थान में सभी प्रकार के शिक्षण, इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार संस्थान के नाम से संचालित किए जाएंगे ।

10. संस्थान का सुभिन्न गैर लाभकारी विधिक अस्तित्व होना-प्रत्येक संस्थान गैर लाभकारी विधि अस्तित्व होगा और ऐसे संस्थान में इस अधिनियम के अधीन उसके प्रचालनों के संबंध में सभी व्ययों की पूर्ति के पश्चात् राजस्व के अधिशेष का भाग, यदि कोई है, ऐसे संस्थान की वृद्धि और विकास से या उसमें अनुसंधान संचालित करने से भिन्न किसी अन्य प्रयोजन के लिए विनिहित नहीं किया जाएगा ।

11. कुलाध्यक्ष-(1) भारत के राष्ट्रपति प्रत्येक संस्थान के कुलाध्यक्ष होंगे ।

(2) कुलाध्यक्ष, किसी संस्थान के कामकाज और प्रगति के पुनर्विलोकन के लिए और उनके कार्यों की जांच करने और उन पर ऐसी रीति में रिपोर्ट देने के लिए, जैसा कुलाध्यक्ष निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा ।

(3) ऐसी किसी रिपोर्ट के प्राप्त होने पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्रवाई कर सकेगा और ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह रिपोर्ट में चर्चित मामलों में से किसी के संबंध में आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का युक्तियुक्त समय के भीतर पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।

अध्याय 3

केंद्र द्वारा वित्तपोषित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के प्राधिकरण

12. संस्थान के प्राधिकरण-संस्थान के निम्नलिखित प्राधिकरण होंगे, अर्थात्: -

(क) शासक बोर्ड;

(ख) सिनेट;

(ग) वित्त समिति;

(घ) भवन और संकर्म समिति;

(ङ) अनुसंधान परिषद्;

(च) ऐसे अन्य प्राधिकरण जिनको परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकरण होना घोषित किया जाए ।

13. शासक बोर्ड-(1) प्रत्येक संस्थान का शासक बोर्ड, संस्थान का प्रधान कार्यकारी निकाय होगा ।

(2) प्रत्येक संस्थान के शासक बोर्ड में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(क) एक अध्यक्ष, जो केंद्रीय सरकार द्वारा सिफारिश किए गए तीन नामों के पैनल में से कुलाध्यक्ष द्वारा किसी एक विख्यात प्रौद्योगिकीविद् या उद्योगपति या शिक्षाविद् को नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(ख) उस राज्य का, जिसमें संस्थान अवस्थित है, सूचना प्रौद्योगिकी या उच्चतर शिक्षा का भारसाधक सचिव-पदेन;

(ग) भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान से संबंधित भारत सरकार के उच्चतर शिक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि-पदेन;

(घ) संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार एक प्रतिनिधि-पदेन;

(ङ) केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान का निदेशक;

(च) केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट, भारतीय प्रबंध संस्थान का निदेशक;

(छ) सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरी या विज्ञान या सहबद्ध क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले चार व्यक्ति, जिनको परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(ज) सिनेट द्वारा नामनिर्दिष्ट संस्थान के दो आचार्य;

(झ) संस्थान का निदेशक, पदेन;

(ञ) रजिस्ट्रार, पदेन सचिव ।

14. बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां और उनको संदेय भत्ते-(1) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय बोर्ड के अध्यक्ष या पदेन सदस्यों से भिन्न अन्य सदस्यों की पदावधि उनके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की कालावधि के लिए होगी ।

(2) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को जिसके आधार पर वह सदस्य है, धारण करता है ।

(3) धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि, उसके नामनिर्देशन की तारीख से दो वर्ष के लिए होगी । 

(4) पदेन सदस्य से भिन्न, बोर्ड का कोई सदस्य, जो बोर्ड की लगातार तीन बैठकों में उपस्थित होने में असफल रहता है, बोर्ड का सदस्य नहीं रहेगा ।

(5) इस धारा में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी सेवा छोड़ने वाला कोई सदस्य, जब तक परिषद् ऐसा निदेश न दे, तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता ।

(6) बोर्ड के सदस्य, बोर्ड की या जो संस्थान द्वारा आयोजित की जाएं, बैठकों में उपस्थित होने के लिए ऐसे भत्तों के हकदार होंगे जो परिनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

15. शासक बोर्ड की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के रहते हुए, प्रत्येक संस्थान का बोर्ड, संस्थान के कार्यकलापों के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और उसको धारा 6 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संस्थान के कार्यकलापों को शासित करने वाले परिनियमों या अध्यादेशों को विरचित करने, संशोधित करने, उपांतरित करने या विखंडित करने की शक्ति होगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड को निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

(क) संस्थान की प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति के प्रश्नों का विनिश्चय करना;

(ख) संस्थान में विभागों, संकायों या अध्ययन विद्यापीठों की स्थापना करना और कार्यक्रमों या अध्ययन पाठ्यक्रमों को आरंभ करना;

(ग) ऐसे संस्थान के वार्षिक बजट प्राक्कलनों की परीक्षा और अनुमोदन करना;

(घ) ऐसे संस्थान के विकास के लिए योजना की परीक्षा और अनुमोदन करना और योजना के क्रियान्वयन के लिए वित्त के स्रोतों की पहचान करना;

(ङ) शिक्षण और अन्य शैक्षणिक पदों को सृजित करना, ऐसे पदों की संख्या और उनकी उपलब्धियां परिनियमों द्वारा अवधारित करना और शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के कर्तव्यों और उनकी सेवा शर्तों को परिभाषित करना:

परंतु बोर्ड, सिनेट की सिफारिशों पर विचार करने से भिन्न कोई कार्रवाई नहीं करेगा;

(च) ऐसे संस्थान में शैक्षिक और अन्य पदों पर नियुक्ति की अर्हताएं, मानदंड और प्रक्रियाएं परिनियमों द्वारा उपबंधित करना;

(छ) संस्थान में अध्ययन करने के लिए मांगी जाने वाली फीसें और अन्य प्रभार परिनियमों द्वारा नियत करना;

(ज) संस्थान के प्रशासन, प्रबंधन और प्रचालनों को शासित करने के लिए परिनियम बनाना;

(झ) इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसको प्रदत्त या उस पर अधिरोपित अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और अन्य कर्तव्यों का पालन करना ।

(3) बोर्ड को, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए ऐसी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी, जो वह आवश्यक समझे ।

(4) बोर्ड, संस्थान के उद्देश्यों की प्राप्ति के संदर्भ में निदेशक के नेतृत्व के विनिर्दिष्ट संदर्भ में उसके कार्यों का वार्षिक पुनर्विलोकन करेगा ।

(5) जहां निदेशक या अध्यक्ष की राय में स्थिति इस प्रकार आपातिक है कि संस्थान के हित में तत्काल कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है, वहां अध्यक्ष, निदेशक के परामर्श से उसकी राय के लिए कारण को अभिलिखित करने के पश्चात् ऐसे आदेश जारी कर सकेगा, जो आवश्यक हों:

परंतु ऐसे आदेश बोर्ड की आगामी बैठक में अनुसमर्थन के लिए रखे जाएंगे ।

16. सिनेट-(1) प्रत्येक संस्थान के सिनेट में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -

(क) संस्थान का निदेशक, पदेन अध्यक्ष;

(ख) उप निदेशक, पदेन;

(ग) संकायाध्यक्ष, पदेन;

(घ) संस्थान के विभागाध्यक्ष, पदेन;

(ङ) संकायाध्यक्षों और विभागाध्यक्षों से भिन्न सभी आचार्य;

(च) ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों या संस्थान के क्रियाकलापों से संबंधित अन्य क्षेत्रों के व्यक्तियों में से तीन व्यक्ति जो संस्थान की सेवा में नहीं हैं, जो कि शासक बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे;

(छ) ऐसे तीन व्यक्ति जो शैक्षिक कर्मचारिवृंद के सदस्य नहीं है जिन्हें उनके विशेषीकृत ज्ञान के लिए सिनेट द्वारा सहयोजित किया जाए;

(ज) संस्थान का रजिस्ट्रार, पदेन सचिव ।

(2) पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्यों की पदावधि उनके नामनिर्देशन की तारीख से दो वर्ष होगी ।

(3) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को, जिसके आधार पर वह सदस्य है, धारण करता है ।

17. सिनेट की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सिनेट, संस्थान का प्रधान शैक्षणिक निकाय होगा और उसको शैक्षणिक विषयों तथा संस्थान के छात्रों के कार्यकलाप और कल्याण को शासित करने वाले अध्यादेशों को अधिनियमित, संशोधित या उपांतरित करने की शक्ति होगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना सिनेट के पास निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

(क) संस्थान द्वारा प्रस्थापित अध्ययन के पाठ्यक्रमों या कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए मानदंड और प्रक्रिया विनिर्दिष्ट करना; 

(ख) शिक्षण और अन्य शैक्षणिक पदों को सृजित करने के लिए बोर्ड को सिफारिश करना, ऐसे पदों की संख्या और उपलब्धियों का अवधारण करना और अध्यापकों और अन्य शैक्षणिक पदों के कर्तव्य तथा सेवा की शर्तें परिभाषित करना;

(ग) नए कार्यक्रमों या अध्ययन के पाठ्यक्रमों के प्रारंभ के बारे में बोर्ड को सिफारिश करना;

(घ) कार्यक्रमों और अध्ययन के पाठ्यक्रमों की विस्तृत शैक्षणिक अंतर्वस्तु को विनिर्दिष्ट करना और उसमें उपांतरणों का जिम्मा लेना; 

(ङ) शैक्षणिक कलैन्डर विनिर्दिष्ट करना और डिग्रियों, डिप्लोमाओं और अन्य शैक्षणिक उपाधियों और पदवियों को दिए जाने का अनुमोदन करना;

(च) विभिन्न परीक्षाओं के लिए परीक्षकों, अनुसीमकों, सारणीकारों और ऐसे अन्य कार्मिकों को नियुक्त करना;

(छ) डिप्लोमाओं और डिग्रियों या विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थानों को मान्यता प्रदान करना और संस्थान के डिप्लोमाओं या डिग्रियों की समतुल्यता अवधारित करना;

(ज) विभागीय समन्वय के उपाय सुझाना;

(झ) शासक बोर्ड को निम्नलिखित पर मुख्य सिफारिशें करना-

(क) शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान के स्तर में सुधार के उपाय;

(ख) पदों, अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, अध्ययनवृत्तियों निःशुल्कवृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थान और अन्य संबंधित विषय;

(ग) विभागों या केन्द्रों का स्थापन या उत्सादन; और

(घ) संस्थान के शैक्षणिक कृत्य, अनुशासन, निवास, प्रवेश, परीक्षाएं, अध्येतावृत्तियों और अध्ययनवृत्तियों, निःशुल्कवृत्तियों, छूटों के दिए जाने, उपस्थिति और अन्य संबंधित विषयों को समाविष्ट करने वाली उपविधियां;

(ञ) ऐसे विनिर्दिष्ट विषयों पर, जो शासक बोर्ड द्वारा या स्वयं द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, सलाह देने के लिए उप समितियां नियुक्त करना;

(ट) उप समितियों की सिफारिशों पर विचार करना और ऐसी कार्रवाई करना, जो अपेक्षित हों, जिसके अंतर्गत शासक बोर्ड को सिफारिशें करना भी है;

(ठ) विभागों और केन्द्रों के क्रियाकलापों का कालिक पुनर्विलोकन करना और समुचित कार्रवाई करना, जिसके अंतर्गत संस्थान में शिक्षण के स्तर को बनाए रखने और उसमें सुधार करने के दृष्टिकोण से शासक बोर्ड को सिफारिशें करना भी है; और

(ड) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना, जो उसको परिनियमों द्वारा या अन्यथा बोर्ड द्वारा सौंपे जाएं ।

18. वित्त समिति-(1) प्रत्येक संस्थान की वित्त समिति में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -

(क) अध्यक्ष, शासक बोर्ड, पदेन जो समिति का अध्यक्ष होगा;

(ख) भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि, जो भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान से संबंधित मामलों का संचालन करता हो, पदेन;

(ग) भारत सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्चतर शिक्षा विभाग का एक प्रतिनिधि, जो वित्त से संबंधित मामलों का संचालन करता हो, पदेन;

(घ) बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट दो व्यक्ति;

(ङ) निदेशक, पदेन;

(च) संस्थान के वित्त और लेखाओं का प्रभारी अधिकारी, पदेन सचिव ।

(2) पदेन सदस्यों से भिन्न, वित्त समिति के सदस्य तीन वर्ष की कालवधि के लिए पद धारण करेंगे ।

19. वित्त समिति की शक्तियां और कृत्य-वित्त समिति, संस्थान के लेखाओं की परीक्षा, व्यय के लिए प्रस्तावों और वित्तीय प्राक्कलनों की संवीक्षा करेगी और उसके पश्चात् उसे अनुमोदन के लिए अपनी टिप्पणियों के साथ शासक बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करेगी ।

20. भवन और संकर्म समिति-प्रत्येक संस्थान की भवन और संकर्म समिति में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -

(क) निदेशक, पदेन, जो समिति का अध्यक्ष होगा;

(ख) उस राज्य में, जिसमें संस्थान अवस्थित है, स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा नामनिर्दिष्ट एक व्यक्ति;

(ग) बोर्ड द्वारा इसके सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट एक व्यक्ति;

(घ) संकायाध्यक्ष, योजना निर्माण और विकास;

(ङ) बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट, सरकार या सरकारी अभिकरण में अधीक्षण इंजीनियर से अनिम्न पंक्ति का एक सिविल इंजीनियर;

(च) बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट, सरकार या सरकारी अभिकरण में अधीक्षण इंजीनियर से अनिम्न पंक्ति का एक विद्युत इंजीनियर; 

(छ) संस्थान की संपदा का प्रभारी अधिकारी, पदेन सचिव ।

21. भवन और संकर्म समिति की शक्तियां और कृत्य-भवन और संकर्म समिति, निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करेगी, अर्थात्: -

(क) समिति का, बोर्ड से आवश्यक प्रशासनिक अनुमोदन और वित्तीय मंजूरी को सुनिश्चित करने के पश्चात् सभी महत्वपूर्ण प्रमुख संकर्मों के सन्निर्माण का उत्तरादायित्व होगा;

(ख) इसकी, सभी सन्निर्माण कार्यों और रखरखाव तथा मरम्मत से संबंधित कार्य हेतु उस प्रयोजन के लिए संस्थान के निस्तारण पर दिए गए अनुदान के भीतर आवश्यक प्रशासनिक अनुमोदन और वित्तीय मंजूरी देने की शक्ति होगी;

(ग) यह भवन और अन्य बड़े कार्यों, छोटे संकर्मों, मरम्मत, रखरखाव और इसी प्रकार के अन्य कार्यों की लागत के प्राक्कलन तैयार कराएगी:

(घ) ऐसे प्रत्येक कार्य की, जो यह आवश्यक समझे, तकनीकी संवीक्षा करने के लिए उत्तरदायी होगी;

(ङ) यह उपयुक्त ठेकेदारों की सूची बनाने और निविदाओं की स्वीकृति के लिए उत्तरदायी होगी और इसे, जहां कहीं आवश्यक हो, विभागीय संकर्मों के लिए निदेश की शक्ति होगी ।

22. अनुसंधान परिषद्-(1) प्रत्येक संस्थान, निदेशक और ऐसे अन्य सदस्यों से, जो बोर्ड द्वारा, परिनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं, मिलकर बनने वाली अनुसंधान परिषद् की स्थापना करेगा ।

(2) प्रत्येक संस्थान की अनुसंधान परिषद्-

(क) अनुसंधान संबंधी वित्तपोषण करने वाले संगठनों, उद्योग और सिविल सोसाइटी के साथ अनुसंधान के संभाव्य क्षेत्रों की पहचान के लिए मध्यस्थता करेगी;

(ख) ऐसे संस्थान में या उच्चतर शिक्षा की किसी संस्था या अनुसंधान प्रयोगशालाओं के सहयोग से अनुसंधान का आयोजन और संवर्धन करेगी;

(ग) अध्यापकों द्वारा तैयार की गई अनुसंधान परियोजनाओं के लिए बाह्य स्रोतों से वित्तपोषण अभिप्राप्त करने में उनकी सहायता करेगी;

(घ) बोर्ड द्वारा, उसके नियंत्रण में रखी गई निधियों में से अनुसंधान स्रोत प्रदान करेगी और ऐसे संस्थान में अध्यापकों द्वारा की जाने वाली प्रस्तावित अनुसंधान परियोजनाओं के लिए सहायता प्रदान करेगी;

(ङ) अनुसंधान से प्रकट प्रौद्योगिकी उपयोजनों के उद्भवन के लिए उपबंध करेगी और संस्थानों में अनुसंधान से अभिप्राप्त बौद्धिक संपदा का संरक्षण और उपयोग करेगी;

(च) अनुसंधान और सलाहकारी सेवाओं के लिए उपबंध करेगी और उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं, उद्योग, सिविल सोसाइटी या अन्य संगठनों से ऐसे ठहराव करेगी और ऐसे ठहरावों के माध्यम से उद्योग और समाज में प्रसार किए जाने के लिए अनुसंधान के परिणामों को समर्थकारी बनाएगी;

(छ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी, जो परिनियमों द्वारा उसको समनुदेशित किए जाएं ।

23. अधिवेशन-(1) अध्यक्ष, संस्थान के बोर्ड, वित्त समिति के अधिवेशनों और दीक्षांत समारोहों की सामान्यतः अध्यक्षता करेगा ।

(2) अध्यक्ष का यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य होगा कि बोर्ड द्वारा लिए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित किया जाए । 

(3) अध्यक्ष, ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

24. निदेशक-(1) किसी संस्थान का निदेशक, केंद्रीय सरकार द्वारा, कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से खोजबीन-सह-चयन समिति द्वारा योग्यता के क्रम में सिफारिश किए गए नामों के पैनल में से नियुक्त किया जाएगा ।

(2) खोजबीन-सह-चयन समिति में निम्नलिखित होंगे, अर्थात्: -

(क) भारत सरकार के मानव संसाधन और विकास के प्रभारी मंत्री द्वारा नामनिर्दिष्ट एक विख्यात व्यक्ति, जो समिति का अध्यक्ष होगा;

(ख) संबद्ध भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के शासक बोर्ड का अध्यक्ष-सदस्य, पदेन;

(ग) भारत सरकार में उच्चतर शिक्षा का प्रभारी सचिव-सदस्य, पदेन;

(घ) मानव संसाधन विकास के प्रभारी मंत्री द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों का निदेशक;

(ङ) मानव संसाधन विकास के प्रभारी मंत्री द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विख्यात व्यक्ति;

(च) भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों से संबंधित मानव संसाधन विकास मंत्रालय का ब्यूरो प्रमुख-गैर-सदस्य सचिव, पदेन ।

(3) निदेशक, सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं, नियुक्त किया जाएगा ।

(4) निदेशक, संस्थान का मुख्य शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा तथा बोर्ड और सिनेट के विनिश्चयों के क्रियान्वयन तथा संस्थान के दिन-प्रतिदिन प्रशासन के लिए उत्तरदायी होगा ।

(5) निदेशक, ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसको सौंपे जाएं अथवा बोर्ड या सिनेट या अध्यादेशों द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं ।

(6) निदेशक, बोर्ड को वार्षिक रिपोर्ट और संपरीक्षित लेखा प्रस्तुत करेगा ।

(7) निदेशक, मुख्यालय से उसकी अनुपस्थिति के दौरान उपस्थित उप निदेशक या एक संकायाध्यक्ष या ज्येष्ठतम आचार्य को कर्मचारिवृंद के यात्रा भत्तों, आकस्मिक व्ययों और चिकित्सीय उपचार के लिए अग्रिमों को मंजूर करने के लिए और उसकी ओर से बिलों को हस्ताक्षरित तथा प्रतिहस्ताक्षरित करने के लिए उसके द्वारा लिखित में प्राधिकृत किया जा सकेगा तथा उपस्थित उप निदेशक या एक संकायाध्यक्ष या ज्येष्ठतम आचार्य को प्राधिकृत कर सकेगा ।

25. कुलसचिव-(1) प्रत्येक संस्थान का कुलसचिव ऐसी शर्तों और निबंधनों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा अधिकथित किए जाएं और वह संस्थान के अभिलेख, उसकी सामान्य मुद्रा, निधि और ऐसी अन्य संपत्ति का अभिरक्षक होगा जो बोर्ड उसके भारसाधन में सौंपे ।

(2) कुलसचिव, बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों का सचिव होगा जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।

(3) कुलसचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।

(4) कुलसचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे अधिनियम या परिनियमों या निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।

26. अन्य प्राधिकरण और अधिकारी-(1) बोर्ड, परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकरणों के रूप में ऐसे अन्य पदों की घोषणा और ऐसे प्रत्येक प्राधिकरण के कर्तव्यों और कृत्यों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।

(2) बोर्ड, ऐसे प्राधिकरणों का गठन कर सकेगा जो वह संस्थान के कार्यकलाप के उचित प्रबंध के लिए ठीक समझे ।

27. संस्थान के कार्यों का पुनर्विलोकन-(1) प्रत्येक संस्थान, इस अधिनियम के अधीन ऐसे संस्थान की स्थापना और निगमन से पांच वर्ष के भीतर और उसके पश्चात् प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से उक्त अवधि में संस्थान के उद्देश्यों को प्राप्त करने में उसके कार्य का मूल्यांकन और पुनर्विलोकन करने के लिए एक समिति का गठन करेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन समिति, ऐसे संस्थान में शिक्षण, विद्या और अनुसंधान के जो उससे सुसंगत होने वाले ज्ञान के ऐसे क्षेत्रों से बनाई गई है, शैक्षिक या उद्योग के अभिस्वीकृत ख्यातिप्राप्त सदस्यों से मिलकर बनेगी ।

(3) समिति, संस्थान के कार्यों का निर्धारण करेगी और निम्नलिखित के लिए सिफारिशें करेगी-

(क) शैक्षणिक, विद्या तथा अनुसंधान की दशा से यथा प्रदर्शित धारा 6 में निर्दिष्ट संस्थान के उद्देश्यों को पूरा करने का विस्तार और समाज को उसका योगदान;                

(ख) रूपांतरणात्मक अनुसंधान का संवर्धन और उसका उद्योग और समाज पर समाघात;

(ग) ज्ञान की वर्तमान सीमाओं से परे मूलभूत अनुसंधान का अभिवर्धन;

(घ) सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणियों के बीच संस्थान की स्थापना;

(ङ) ऐसे अन्य विषय जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(4) बोर्ड उपधारा (3) में निर्दिष्ट सिफारिशों पर विचार करेगा और उस पर ऐसी कार्रवाई, जो वह ठीक समझे, करेगा:

परंतु की गई कार्रवाई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई पर स्पष्टीकारक ज्ञापन के साथ समिति की सिफारिशें उनके कारणों को विनिर्दिष्ट करते हुए, केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत की जाएंगी ।

अध्याय 4

लेखा और संपरीक्षा

28. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-(1) संस्थानों को इस अधिनियम के अधीन उनके दक्ष कृत्यों का निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजनों के लिए इस निमित्त विधि द्वारा संसद् द्वारा सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्रत्येक संस्थान को ऐसी धनराशियों का, ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, संदाय कर सकेगी ।

(2) केन्द्रीय सरकार, प्रत्येक संस्थान को, धन की ऐसी राशियों का अनुदान देगी जो उसके द्वारा स्थापित छात्रवृत्तियों या अध्येतावृत्तियों पर, जिनमें ऐसे संस्थान में नागरिकों के सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के अभ्यावेशित छात्रों के लिए छात्रवृत्तियां या अध्येतावृत्तियां सम्मिलित हैं, व्यय को पूरा करने के लिए अपेक्षित हैं ।

29. संस्थान की निधि-(1) प्रत्येक संस्थान एक निधि रखेगा, जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे-

(क) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;

(ख) संस्थान द्वारा छात्रों से प्राप्त सभी फीसें और अन्य प्रभार;

(ग) संस्थान द्वारा अनुदानों, दानों, संदानों, उपकृतियों, वसीयतों या अंतरणों के रूप में प्राप्त सभी धन;

(घ) संस्थान द्वारा संचालित अनुसंधान या उसके द्वारा सलाहकारी या परामर्श सेवाओं के प्रदान से उद्भूत बौद्धिक संपदा के उपयोग से प्राप्त सभी धन;

(ङ) संस्थान द्वारा किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सभी धन ।

(2) प्रत्येक संस्थान की निधि का उपयोग संस्थान के व्यय को पूरा करने के लिए किया जाएगा जिनमें इस अधिनियम के अधीन संस्थान में अनुसंधान को अग्रसर करने में उसकी शक्तियों के प्रयोग और उसके कर्तव्यों के निर्वहन में, या अन्य शैक्षणिक संस्थानों अथवा उद्योगों के सहयोग से और संस्थान की वृद्धि और विकास पर लक्ष्यित पूंजी विनिधान के लिए उपगत व्यय सम्मिलित हैं ।

30. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) प्रत्येक संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलन-पत्र भी है, ऐसे प्ररूप और लेखा मानक में, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, तैयार करेगा ।

(2) जहां संस्थान का आय और व्यय का विवरण और तुलन-पत्र लेखा मानकों का अनुपालन नहीं करता है, वहां संस्थान, अपने आय और व्यय के विवरण तथा तुलन-पत्र में निम्नलिखित का प्रकटन करेगा, अर्थात्: -

(क) लेखा मानकों से विचलन;

(ख) ऐसे विचलन के कारण; और

(ग) ऐसे विचलन के कारण उद्भूत वित्तीय प्रभाव, यदि कोई हो ।

(3) प्रत्येक संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में संपरीक्षा दल द्वारा उपगत कोई व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के तथा संस्थान के लेखाओं की परीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियों, लेखाओं, संबद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागजपत्र को पेश किए जाने की मांग करने और संस्थान के कार्योलयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा । 

(5) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रत्येक संस्थान के यथाप्रमाणित लेखे, उस पर संपरीक्षा-रिपोर्ट सहित ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जो, केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिकथित की जाए केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

31. पेशन और भविष्य निधि-(1) प्रत्येक संस्थान, अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, ऐसी भविष्य या पेशंन निधि स्थापित कर सकेगा या ऐसी बीमा स्कीम का उपबंध कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

(2) जहां ऐसी कोई भविष्य-निधि या पेंशन निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां, केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य-निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य-निधि है ।

32. नियुक्तियां-प्रत्येक संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां, निदेशक की नियुक्ति को छोड़कर, परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार, निम्नलिखित के द्वारा की जाएंगी, -

(क) यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृंद में सहायक आचार्य के पद पर की जाती है या यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृंद से भिन्न प्रत्येक काडर में की जाती है, जिसका अधिकतम वेतनमान समूह क अधिकारियों के लिए विद्यमान ग्रेड वेतनमान से अधिक है तो बोर्ड द्वारा;

(ख) किसी अन्य दशा में निदेशक द्वारा ।

33. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) मानद डिग्री का प्रदान किया जाना;

(ख) शिक्षण विभागों का बनाया जाना;

(ग) संस्थान में पाठ्यक्रमों के लिए और संस्थान की डिग्रियों और डिप्लोमाओं की परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;

(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र-सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;

(ङ) संस्थान के अधिकारियों की पदावधि और उनकी नियुक्ति की पद्धति;

(च) संस्थान के शिक्षकों की अर्हताएं;

(छ) संस्थान के शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद का वर्गीकरण, नियुक्ति की पद्धति और उनकी सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;

(ज) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद के फायदे के लिए पेंशन, बीमा और भविष्य-निधियों की स्थापना;

(झ) संस्थान के प्राधिकरणों का गठन, उनकी शक्तियां और कर्तव्य;

(ञ) छात्र-निवासों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;

(ट) संस्थान के छात्रों के आवास की शर्तें और छात्र-निवासों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण;

(ठ) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;

(ड) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन; और

(ढ) बोर्ड, सिनेट या किसी समिति के अधिवेशन, ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति और उनके कामकाज के संचालन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ।

34. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) प्रत्येक संस्थान के प्रथम परिनियम, कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से बोर्ड द्वारा बनाए जाएंगे और उनकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

(2) बोर्ड समय-समय पर, इस धारा में उपबंधित रीति से नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या परिनियमों को संशोधित या निरसित कर सकेगा ।

(3) प्रत्येक नए परिनियम या परिनियमों में परिवर्धन या परिनियमों में किसी संशोधन या निरसन के ऐसे कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन की अपेक्षा होगी जो अनुमति प्रदान या विधारित कर सकेगा या उसको बोर्ड के पास विचारार्थ भेज सकेगा ।

(4) किसी नए परिनियम या विद्यमान परिनियम को संशोधित या निरसित करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष उसके लिए अनुमति नहीं दे देता है:

परंतु केन्द्रीय सरकार, कुलाध्यक्ष के पूर्व अनुमोदन से संस्थान के परिनियमों को बना या संशोधित कर सकेगी यदि वह समानता के लिए अपेक्षित है और उसकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

35. अध्यादेश-इस अधिनियम के उपबंधों और परिनियमों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान के अध्यादेश निम्नलिखित सभी या किन्हीं मामलों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

 (क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;

(ख) संस्थान की सभी डिग्रियों और डिप्लोमाओं के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;

(ग) वे शर्तें, जिनके अधीन छात्रों को संस्थान की डिग्री या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों और उसकी परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा और वे डिग्रियों तथा डिप्लोमाओं के लिए पात्र होंगे;

(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र-सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों को प्रदान करने की शर्तें;

(ङ) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग तथा उनके कर्तव्य;

(च) परीक्षाओं का संचालन;

(छ) संस्थान के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना; और

(ज) ऐसा कोई अन्य विषय जिसका इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा अध्यादेशों द्वारा उपबंध किया जाना है या उपबंध किया जा सकेगा ।

36. अध्यादेश कैसे बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे ।

(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश उस तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निदेश दे, किन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, बोर्ड को यथाशीघ्र प्रस्तुत किया जाएगा और उस पर बोर्ड द्वारा उसके अगले अधिवेशन में विचार किया जाएगा ।

(3) बोर्ड को किसी ऐसे अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित करने या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसा अध्यादेश ऐसे संकल्प की तारीख से तद्नुसार, यथास्थिति, उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।

37. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) (क) किसी संस्थान और उसके कर्मचारी के बीच संविदा से उद्भूत होने वाला विवाद, संबद्ध कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान की प्रेरणा पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसमें संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य, कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य और कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।

(ख) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और किसी भी न्यायालय में उस पर कोई आक्षेप नहीं किया जा सकेगा ।

(ग) उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।

(घ) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी:

परंतु अधिकरण ऐसी प्रक्रिया बनाते समय नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का ध्यान रखेगा;

(ङ) माध्यस्थम् से संबंधित तत्सयम प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।

(2) किसी परीक्षा के लिए ऐसा कोई छात्र या अभ्यर्थी, जिसका नाम संस्थान के निदेशक के आदेशों या संकल्प द्वारा संस्थान की नामावलियों से हटा दिया गया है और जो संस्थान की परीक्षाओं में उपस्थित होने से एक वर्ष से अधिक के लिए विवर्जित किया गया है, उसके द्वारा ऐसे संकल्प की प्राप्ति की तारीख से दस दिन के भीतर शासक बोर्ड को अपील कर सकेगा, जो निदेशक के विनिश्चय को पुष्ट, उपांतरित कर सकेगा या उसको उलट सकेगा ।

(3) किसी छात्र के विरुद्ध संस्थान द्वारा की गई किसी अनुशासिक कार्रवाई से उद्भूत किसी विवाद को, ऐसे छात्र के अनुरोध पर माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा और उपधारा (1) के उपबंध इस उपधारा के अधीन किए गए निर्देश को यथासंभव लागू होंगे । 

(4) संस्थान के प्रत्येक कर्मचारी या छात्र को, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान के, यथास्थिति, किसी अधिकारी या प्राधिकारी के विनिश्चय के विरुद्ध शासक बोर्ड को ऐसे समय के भीतर, जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाए, अपील करने का अधिकार होगा और उस पर शासक बोर्ड ऐसे विनिश्चय को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट या उपांतरित कर सकेगा या उसको उलट सकेगा ।

38. निदेशक की वार्षिक रिपोर्ट-(1) प्रत्येक संस्थान के बोर्ड के समक्ष रखे गए लेखाओं के प्रत्येक विवरण के साथ निम्नलिखित के संबंध में उसके निदेशक द्वारा एक रिपोर्ट संलग्न की जाएगी-

(क) ऐसे संस्थान के कार्यकलाप की स्थिति;

(ख) ऐसी रकमें, यदि कोई हों, जिनका उसने अपने तुलन-पत्र में अधिशेष आरक्षितियों को आगे ले जाने का प्रस्ताव किया है;

(ग) वह सीमा, जिसके संबंध में संपरीक्षक की रिपोर्ट में व्यय पर आय के किसी अधिशेष या आय पर व्यय की किसी कमी की न्यूनोक्ति या अत्युक्ति को उपदर्शित किया गया है और ऐसी न्यूनोक्ति या अत्युक्ति के कारण;

(घ) संस्थान द्वारा की गई अनुसंधान परियोजनाओं की उपयोगिता जो ऐसे सन्नियमों के अनुसार मापी गई हैं, जो किसी कानूनी विनियामक प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं;

(ङ) संस्थान के अधिकारियों और शिक्षकों की नियुक्तियां;

(च) संस्थान द्वारा स्थापित संदर्भिका और आंतरिक मानक जिनके अंतर्गत शिक्षण, अनुसंधान और ज्ञान के उपयोजन में नवप्रवर्तनों की प्रकृति भी है ।

(2) निदेशक, संपरीक्षक की रिपोर्ट में अंतर्विष्ट प्रत्येक आरक्षण, अर्हता या प्रतिकूल टिप्पणी पर अपनी पूर्वोक्त रिपोर्ट में संपूर्ण जानकारी और स्पष्टीकरण देने के लिए आबद्ध होगा ।

39. प्रत्येक संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट-(1) प्रत्येक संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट, बोर्ड के निदेशाधीन तैयार की जाएगी जिसके अंतर्गत, अन्य विषयों के साथ, संस्थान द्वारा उसके उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किए गए उपाय और ऐसे संस्थान में किए जा रहे अनुसंधान के परिणाम आधारित निर्धारण भी होंगे और बोर्ड को, ऐसी तारीख, जो विनिर्दिष्ट की जाए, को या उससे पूर्व प्रस्तुत की जाएगी और बोर्ड, अपने वार्षिक अधिवेशन में रिपोर्ट पर विचार करेगा ।

(2) वार्षिक रिपोर्ट, बोर्ड द्वारा उसके अनुमोदन पर संस्थान की वेबसाइट पर प्रकाशित की जाएगी ।

(3) प्रत्येक संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत की जाएगी जो उसको, यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

अध्याय 5

परिषद्

40. संस्थानों की परिषद्-(1) संस्थानों में बेहतर समन्वय किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, परिषद् के नाम से ज्ञात एक केन्द्रीय निकाय, अनुसूची के स्तंभ (5) में विनिर्दिष्ट सभी संस्थानों के लिए स्थापित किया जाएगा ।

                (2) परिषद्, निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्:-

(i) तकनीकी शिक्षा का प्रभारी, केन्द्रीय सरकार का मंत्री जो परिषद् का अध्यक्ष होगा, पदेन;

(ii) भारत की संसद् के दो सदस्य (लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाला एक सदस्य और राज्य सभा के सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला एक सदस्य), पदेन;

(iii) सचिव, भारत सरकार, मानव संसाधन मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग;

(iv) प्रत्येक संस्थान के अध्यक्ष, पदेन;

(v) प्रत्येक संस्थान के निदेशक, पदेन;

(vi) महानिदेशक, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, पदेन;

(vii) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन व्यक्ति, जिनमें प्रत्येक से एक वित्त, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी से संबद्ध मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करेगा;

(viii) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन व्यक्ति, जो प्रत्येक संस्थान द्वारा सिफारिश किए गए दो नामों से मिलकर बनने वाले किसी पैनल से परिषद् द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले उद्योग, शिक्षा, इंजीनियरी, पूर्व छात्र और सामाजिक विज्ञानों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति होंगे;

(ix) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक प्रतिनिधि;

(x) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् का एक प्रतिनिधि; और

(xi) अध्यक्ष, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ।

(3)  तकनीकी शिक्षा से संबद्ध उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार का एक अधिकारी, जो परिषद् के सचिव के रूप में कार्य करने के लिए उस सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।

(4) परिषद्, स्वविवेकानुसार, अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वहन में, परिषद् की सहायता करने के लिए भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान परिषद् की स्थायी समिति गठित कर सकेगी ।

(5) परिषद् के संबंध में व्यय की पूर्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी ।

41. परिषद् के सदस्यों की पदावधि और उनको संदेय भत्ते-(1) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, पदेन सदस्य से भिन्न परिषद् के सदस्य की पदावधि नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए होगी ।

(2) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को धारण करता है जिसके आधार पर वह सदस्य है ।

(3)  धारा 40 की उपधारा (2) के खंड (ii) के अधीन निर्वाचित सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह उस सदन का, जिसमें वह निर्वाचित हुआ था, सदस्य नहीं रहता है, समाप्त हो जाएगी ।

(4) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, पद छोड़ने वाला सदस्य, जब तक परिषद् निदेश न दे, तब तक पद पर बना रहेगा, जब तक कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता है ।

(5) परिषद् के सदस्य, परिषद् या उसकी समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए यात्रा तथा ऐसे अन्य भत्तों के लिए हकदार होंगे, जो विहित किए जाएं ।

42. परिषद् के कृत्य और कर्तव्य-(1) परिषद्, सभी संस्थानों के क्रियाकलापों का समन्वय करने का कार्य करेगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिषद् निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगी, अर्थात्: -

(क) पाठ्यक्रमों की अवधि, संस्थाओं द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों और अन्य विद्या संबंधी विशिष्ट उपाधियों, प्रवेश स्तर और अन्य शैक्षिक विषयों से संबंधित बातों पर सलाह देना;

(ख) कर्मचारियों के काडर, उनकी भर्ती की पद्धति और सेवा की शर्तें, छात्रवृत्तियां देने और फीस माफ करने, फीस के उद्ग्रहण और सामान्य हित के अन्य मामलों के बारे में नीति अधिकथित करना;

(ग) प्रत्येक संस्थान की विकास योजनाओं की जांच करना और उनमें से ऐसी योजनाओं का अनुमोदन करना, जो आवश्यक समझी जाएं और ऐसी अनुमोदित योजनाओं के वित्तीय परिणामों को भी मोटे तौर से उपदर्शित करना;

(घ) प्रत्येक संस्थान के वार्षिक बजट प्राक्कलनों की जांच करना और केन्द्रीय सरकार से इस प्रयोजन के लिए निधि आबंटन करने की सिफारिश करना;

(ङ) केन्द्रीय सरकार को छात्रवृत्तियों के संस्थापन की सिफारिश करना जिनके अंतर्गत अनुसंधान और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के छात्रों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए फायदे भी हैं;

(च) नए सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना के लिए प्रस्तावों की केन्द्रीय सरकार को सिफारिश करना;

(छ) कुलाध्यक्ष को इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा किए जाने वाले किसी कृत्य के संबंध में उस दशा में सलाह देना जिसमें ऐसी अपेक्षा की जाए; और

(ज) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको निर्दिष्ट किए जाएं:

परंतु इस धारा की कोई बात, प्रत्येक संस्थान के बोर्ड या सिनेट या अन्य प्राधिकरणों में विधि द्वारा निहित शक्तियों और कृत्यों को अल्पीकृत नहीं करेगी । 

(3) परिषद् का अध्यक्ष, साधारणतया, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा उनमें से चुना गया कोई अन्य सदस्य, अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(4) परिषद्, प्रत्येक वर्ष में एक बार अधिवेशन करेगी और अपने अधिवेशनों में ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी, जो विहित की जाए ।

43. इस अध्याय के विषयों के बारे में नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अध्याय के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए पूर्व प्रकाशन के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) धारा 41 की उपधारा (5) के अधीन परिषद् के सदस्यों को संदेय यात्रा और अन्य भत्ते;

(ख) धारा 42 की उपधारा (4) के अधीन परिषद् के अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

44. रिक्तियों आदि से कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-(1) इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित परिषद्, या किसी संस्थान या बोर्ड या सिनेट या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य, केवल इस कारण अविधिमान्य न होगा कि-

(क) उसमें कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) इसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है; या

(ग) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के चयन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है ।

45. केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को विवरणियां और सूचना दिया जाना-प्रत्येक संस्थान, केन्द्रीय सरकार को अपनी नीतियों या क्रियाकलापों के संबंध में ऐसी विवरणियां या अन्य सूचना, जो केन्द्रीय सरकार, संसद् को रिपोर्ट करने के प्रयोजन के लिए या नीति बनाने के लिए समय-समय पर अपेक्षा करे, देगा ।

46. केन्द्रीय सरकार की निदेश जारी करने की शक्ति-संस्थान, ऐसे निदेशों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम के दक्ष प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको समय-समय पर जारी किए जाएं ।

47. संस्थान का सूचना का अधिकार अधिनियम के अधीन लोक प्राधिकारी होना-सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का 22) के उपबंध सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2 के खंड (ज) में परिभाषित प्रत्येक संस्थान को लागू होंगे ।

48. संक्रमणकालीन उपबंध-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी-

(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले संस्थान का शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक इस प्रकार कार्य करता रहेगा जब तक इस अधिनियम के अधीन उस संस्थान के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर बोर्ड के ऐसे सदस्य, जो इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व पद धारण कर रहे हैं, पद धारण नहीं करेंगे;

(ख) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व, प्रत्येक संस्थान के संबंध में गठित प्रत्येक सिनेट को, इस अधिनियम के अधीन गठित सिनेट का होना तब तक समझा जाएगा जब तक संस्थान के लिए इस अधिनियम के अधीन सिनेट गठित नहीं की जाती है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नई सिनेट के गठन पर इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व पद धारण करने वाले सिनेट के सदस्य पद धारण नहीं करेंगे:

(ग) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं, तब तक इस अधिनियम के प्रारंभ ठीक पूर्व प्रवृत्त प्रत्येक संस्थान के परिनियम, अध्यादेश, नियम, विनियम और उपविधियां, तत्स्थानी संस्थान को वहां तक लागू होती रहेंगी जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं;

(घ) किसी ऐसे छात्र के बारे में, जिसने शौक्षणिक सत्र 2007-2008 के प्रारंभ को या उसके पश्चात् विद्यमान संस्थान की कक्षाओं में जाना प्रारंभ कर दिया है या शैक्षणिक सत्र 2010-2011 को या उसके पश्चात् पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है, धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (ग) के प्रयोजन के लिए यह समझा जाएगा कि उसने कांचीपुरम में अवस्थित विद्यमान संस्थान में पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन किया है यह केवल तब, जब कि ऐसे छात्र को पहले से ही ऐसे ही पाठ्यक्रम के लिए कोई डिग्री या डिप्लोमा प्रदान नहीं किया गया हो ।

(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यदि वह ऐसा करना आवश्यक और समीचीन समझती है, तो अधिसूचना द्वारा, ऐसे उपाय कर सकेगी जो अनुसूची के स्तंभ (5) में उल्लिखित तत्समान संस्थान को अनुसूची के स्तम्भ (3) में वर्णित विद्यमान संस्थान के अन्तरण के लिए आवश्यक हों ।

49. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, और जो उसे कठिनाई दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत होते हों:

परंतु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश इसके किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

50. नियमों और अधिसूनाओं का रखा जाना-केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा/जाएगी, किन्तु नियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तन या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

अनुसूची

[धारा 4(1) देखिए]

क्रम सं०

राज्य का नाम

विद्यमान संस्थान का नाम

अवस्थान

इस अधिनियम के अधीन संस्थान का नाम

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

1.

उत्तर प्रदेश

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद,

इलाहाबाद

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, इलाहाबाद ।

2.

मध्य प्रदेश

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान ग्वालियर,

ग्वालियर

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंध संस्थान, ग्वालियर ।

3.

मध्य प्रदेश

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और विनिर्माण संस्थान,

जबलपुर

पंडित द्वारका प्रसाद मिश्रा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और विनिर्माण संस्थान, जबलपुर ।

4.

तमिलनाडु

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और विनिर्माण संस्थान

कांचीपुरम

भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी डिजाइन और विनिर्माण संस्थान, कांचीपुरम ।

 

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