कर्नाटक हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला दिया है, जिसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। एक अहम फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश जरूर है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब उसने बेंगलुरु के मल्लेश्वरम ब्राह्मण सभा को शंकराचार्य जयंती मनाने की अनुमति देने से जुड़े मामले में नगर निगम के आदेश को रद्द कर दिया।

मामले में बेंगलुरु वेस्ट कॉर्पोरेशन ने यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया था कि संबंधित ऑडिटोरियम केवल योग और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए निर्धारित है, न कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि शंकराचार्य जयंती केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन भी है। जस्टिस एमआई अरुण ने अपने फैसले में कहा, ‘जो प्रतिबंधित नहीं है, यानी उसकी अनुमति है।’ उन्होंने अपने फैसले में कहा कि नगर निगम इस बात के स्पष्ट दिशा-निर्देश या नियम पेश करने में विफल रहा कि ऑडिटोरियम का उपयोग किन गतिविधियों के लिए किया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि सरकार पहले भी इस स्थल पर कई तरह के कार्यक्रमों की अनुमति देती रही है, ऐसे में उनके आवेदन को खारिज करने का कोई ठोस आधार नहीं था।

आदि शंकराचार्य के महत्व का भी उल्लेख

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आदि शंकराचार्य के महत्व का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि शंकराचार्य भारतीय दर्शन के सबसे सम्मानित आचार्यों में से एक हैं और उनका अद्वैत वेदांत देश की प्रमुख दार्शनिक परंपराओं में शामिल है। इसलिए उनकी जयंती को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

आत्‍मा कमजोर करने जैसा।।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय सभ्यता की महानता उसके धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़ी हुई है। इन्हें अलग करना देश की आत्मा को कमजोर करने जैसा होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्म और संस्कृति के साथ जुड़े आयोजनों का उत्सव मनाना न तो अवैध है और न ही असंवैधानिक। इस फैसले को धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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