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राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 ( National Tax Tribunal Act, 2005 )


 

राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005

(2005 का अधिनियम संख्यांक 49)

[20 दिसम्बर, 2005]

संविधान के अनुच्छेद 323के अनुसरण में राष्ट्रीय कर अधिकरण द्वारा प्रत्यक्ष करों के

उद्ग्रहण, निर्धारण, संग्रहण और प्रवर्तन के संबंध में विवादों के न्यायनिर्णयन का

उपबंध करने के लिए और उस अधिकरण द्वारा माल पर सीमाशुल्क और

केंद्रीय उत्पाद-शुल्क की दरों के और ऐसे शुल्कों के निर्धारण के

प्रयोजनों के लिए माल के मूल्यांकन के अवधारण के संबंध

में विवादों के और साथ ही सेवा पर कर के उद्ग्रहण से

संबंधित मामलों में न्यायनिर्णयन का उपबंध करने

के लिए भी और उससे संबंधित या उसके

आनुषंगिक विषयों के लिए

अधिनियम

भारतीय गणराज्य के छप्पनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे :

परंतु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवर्तन में आने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) न्यायपीठ" से राष्ट्रीय कर अधिकरण की कोई न्यायपीठ अभिप्रेत है;

(ख) प्रत्यक्ष-कर बोर्ड" से केंद्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित केंद्रीय प्रत्यक्ष-कर बोर्ड अभिप्रेत है;

(ग) उत्पाद-शुल्क और सीमाशुल्क बोर्ड" से केंद्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित केंद्रीय उत्पाद-शुल्क और सीमाशुल्क बोर्ड अभिप्रेत है;

  (घ) केंद्रीय उत्पाद-शुल्क अधिनियम" से केंद्रीय उत्पाद-शुल्क अधिनियम, 1944 (1944 का 1) अभिप्रेत है;

(ङ) केंद्रीय उत्पाद-शुल्क टैरिफ अधिनियम" से केंद्रीय उत्पाद-शुल्क टैरिफ अधिनियम, 1985 (1986 का 5) अभिप्रेत है;

(च) अध्यक्ष" से राष्ट्रीय कर अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(छ) कंपनी (लाभ) अतिकर अधिनियम" से कंपनी (लाभ) अतिकर अधिनियम, 1964 (1964 का 7) अभिप्रेत है;

(ज) सीमाशुल्क अधिनियम" से सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) अभिप्रेत है;

(झ) सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा-कर अपील अधिकरण" से सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 129 के अधीन गठित सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा-कर अपील अधिकरण अभिप्रेत है;

(ञ) सीमाशुल्क टैरिफ अधिनियम" से सीमाशुल्क टैरिफ अधिनियम, 1975 (1975 का 51) अभिप्रेत है; 

(ट) व्यय-कर अधिनियम" से व्यय-कर अधिनियम, 1987 (1987 का 35) अभिप्रेत है;

(ठ) दान-कर अधिनियम" से दान-कर अधिनियम, 1958 (1958 का 18) अभिप्रेत है;

(ड) आय-कर अधिनियम" से आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) अभिप्रेत है;

(ढ) आय-कर अपील अधिकरण" से आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 252 के अधीन गठित आय-कर अपील अधिकरण अभिप्रेत है;

(ण) ब्याज कर अधिनियम" से ब्याज कर अधिनियम, 1974 (1974 का 45) अभिप्रेत है;

(त) विधि अधिकारी" से भारत का महान्यायवादी, भारत का महा-सालिसिटर और भारत का अपर महा-सालिसिटर अभिप्रेत है;

(थ) सदस्य" से राष्ट्रीय कर अधिकरण का कोई सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है;

(द) राष्ट्रीय कर अधिकरण" से धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कर अधिकरण अभिप्रेत है;

(ध) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है;

(न) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(प) उच्चतम न्यायालय" से भारत का उच्चतम न्यायालय अभिप्रेत है;

(फ) धन-कर अधिनियम" से धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27) अभिप्रेत है;

(ब) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किंतु इसमें परिभाषित नहीं हैं और केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क अधिनियम, केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क टैरिफ अधिनियम, सीमाशुल्क अधिनियम, सीमाशुल्क टैरिफ अधिनियम (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् अप्रत्यक्ष करों के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) या उनके अधीन बनाए गए नियमों या वित्त अधिनियम, 1994 (1994 का 32) के अध्याय 5 में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके क्रमशः उक्त अधिनियमों या उनके अधीन बनाए गए नियमों में हैं;

(भ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किंतु इसमें परिभाषित नहीं हैं और आय-कर अधिनियम, धन-कर अधिनियम, दान-कर अधिनियम, व्यय-कर अधिनियम, ब्याज कर अधिनियम या कंपनी (लाभ) अतिकर अधिनियम (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् प्रत्यक्ष करों के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) या उनके अधीन बनाए गए नियमों में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके क्रमशः उक्त अधिनियमों या उनके अधीन बनाए गए नियमों में हैं ।

अध्याय 2

राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना

3. राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, एक कर अधिकरण की स्थापना करेगी जिसका नाम राष्ट्रीय कर अधिकरण" होगा, जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उस अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।

4. राष्ट्रीय कर अधिकरण की संरचना-राष्ट्रीय कर अधिकरण एक अध्यक्ष और उतने सदस्यों से मिलकर बनेगा जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे और जो उस सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त किए जाएंगे ।

5. न्यायपीठों का गठन और अधिकारिता-(1) राष्ट्रीय कर अधिकरण की अधिकारिता का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा गठित की जाने वाली उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ।

(2) राष्ट्रीय कर अधिकरण की न्यायपीठें साधारणतया राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली के किसी स्थान में या अन्य स्थानों में, जो केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष के परामर्श से, अधिसूचित करे, अधिविष्ट होंगी:

परंतु अध्यक्ष किसी न्यायपीठ को, पर्याप्त कारणों से, उसकी अस्थायी बैठक को, पन्द्रह दिन से अनधिक की अवधि के लिए, उसके अधिविष्ट होने के सामान्य स्थान से भिन्न किसी स्थान पर करने की अनुज्ञा दे सकेगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार, उन क्षेत्रों को, जिनके संबंध में राष्ट्रीय कर अधिकरण की प्रत्येक न्यायपीठ अपनी अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी, अधिसूचित करेगी ।

(4) केन्द्रीय सरकार, न्यायपीठों की संख्या अवधारित करेगी और प्रत्येक न्यायपीठ में दो सदस्य होंगे ।

(5) केन्द्रीय सरकार, । । । किसी सदस्य का, एक राज्य में एक न्यायपीठ के मुख्यालय से दूसरे राज्य में दूसरी न्यायपीठ के मुख्यालय में या एक राज्य के भीतर किसी अन्य न्यायपीठ के मुख्यालय में स्थानातरण कर सकेगी:

 [परंतु किसी सदस्य का स्थानातरण अध्यक्ष की सहमति के बिना नहीं किया जाएगा ।]

6. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) राष्ट्रीय कर अधिकरण का अध्यक्ष वह व्यक्ति होगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा है ।

(2) कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह, -

(क) किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या होने के लिए पात्र है; या

(ख) आय-कर अपील अधिकरण का या सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण का कम से कम [पांच वर्ष] तक सदस्य है या रहा है ।

7. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति-(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।

(2) अध्यक्ष और अन्य सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी चयन समिति की सिफारिशों पर नियुक्त किए जाएंगे जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, -

(क) भारत का मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा नामनिर्देशित किया गया उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश;

(ख) विधि और न्याय मंत्रालय (विधि कार्य विभाग) में सचिव;

(ग) वित्त मंत्रालय (राजस्व विभाग) में सचिव ।

(3) अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य की कोई नियुक्ति केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी कि चयन समति के गठन में कोई रिक्ति या कोई त्रुटि थी ।

8. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की पदावधि-अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य ऐसी तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि तक उस हैसियत में पद धारण करेगा किंतु पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:

परंतु अध्यक्ष या अन्य सदस्य, -

(क) अध्यक्ष की दशा में, अड़सठ वर्ष की आयु; और

(ख) किसी अन्य सदस्य की दशा में, पैंसठ वर्ष की आयु,

प्राप्त करने के पश्चात् उस हैसियत में पद धारण नहीं करेगा ।

9. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों का त्यागपत्र-अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा, अपना पद त्याग सकेगा ।

10. वेतन और भत्ते-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यक्ष का वेतन और भत्ते तथा अन्य निबंधन और शर्तें वही होंगी जो उच्चतम न्यायालय के किसी आसीन न्यायाधीश को लागू होती हैं, किंतु कोई अवकाश अनुज्ञात नहीं किया जाएगा:

परन्तु यदि कोई व्यक्ति जो अध्यक्ष के रूप में पद ग्रहण करने की तारीख से ठीक पूर्व, संघ या किसी राज्य की सरकार के अधीन उस व्यक्ति द्वारा धारित किसी पूर्व सेवा या पद के संबंध में कोई पेंशन प्राप्त कर रहा था या ऐसा करने के लिए पात्र होते हुए उसने उसे लेने का चयन किया था, तो अध्यक्ष के रूप में सेवा के संबंध में उसके वेतन में से उस पेंशन की रकम घटा दी जाएगी ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, रिक्ति" का वही अर्थ होगा, जो उसका उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्तें) अधिनियम, 1958 (1958 का 41) में है ।

(2) कोई सदस्य किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का वेतन लेगा और अन्य भत्ते तथा उसकी सेवा के निबंधन और शर्तें वही होंगी जो भारत सरकार के किसी सचिव को लागू होती हैं :

परन्तु यदि कोई व्यक्ति, जो सदस्य के रूप में पद ग्रहण करने की तारीख से ठीक पूर्व, संघ या किसी राज्य के कार्यकलापों के संबंध में उस व्यक्ति द्वारा धारित किसी पूर्व सेवा के संबंध में कोई पेंशन प्राप्त कर रहा था या ऐसा करने के लिए पात्र होते हुए उसने उसे लेने का चयन किया था, तो सदस्य के रूप में सेवा के संबंध में उसके वेतन में से उस पेंशन की सीमा तक रकम घटा दी जाएगी ।

(3) अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य के वेतन और भत्तों तथा सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में, नियुक्ति के पश्चात् उसको अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

11. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों का हटाया जाना और निलंबन-(1) केन्द्रीय सरकार, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से, ऐसे अध्यक्ष या किसी सदस्य को पद से हटा सकेगी जो,- 

(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत हो गया है; या

(ख) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें केंद्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या

(ग) राष्ट्रीय कर अधिकरण के ऐसे अध्यक्ष या सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है; या

(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिससे राष्ट्रीय कर अधिकरण के ऐसे अध्यक्ष या सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

(ङ) जिसने अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है जिससे उसके पद पर बने रहने से लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

(2) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य अपने पद से, साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात् जिसमें ऐसे अध्यक्ष या सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दे दी गई हो और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो, केंद्रीय सरकार द्वारा किए गए किसी आदेश से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

(3) केंद्रीय सरकार, अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, जिसके संबंध में उपधारा (2) के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को जांच करने के लिए निर्देश किया गया है, पद से तब तक के लिए निलंबित कर सकेगी जब तक कि केंद्रीय सरकार ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रिपोर्ट मिलने पर अपना आदेश पारित नहीं कर देती है ।

(4) केंद्रीय सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट अध्यक्ष या किसी सदस्य के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने के लिए प्रक्रिया को, नियमों द्वारा, विनियमित कर सकेगी ।

12. राष्ट्रीय कर अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी-(1) केंद्रीय सरकार, राष्ट्रीय कर अधिकरण को ऐसे अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जो वह उचित समझे ।

(2) राष्ट्रीय कर अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) राष्ट्रीय कर अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी इसके अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।

(4) अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को केंद्रीय सरकार द्वारा गठित चयन समिति की सिफारिशों पर नियुक्त किया जाएगा ।

13. राष्ट्रीय कर अधिकरण के समक्ष उपसंजाति-(1) सरकार से भिन्न किसी अपील का कोई पक्षकार राष्ट्रीय कर अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष-कथन प्रस्तुत करने के लिए व्यक्तिगत रूप से उपसंजात हो सकेगा या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउंटेंटों या विधि व्यवसायियों को प्राधिकृत कर सकेगा । । । ।

(2) सरकार राष्ट्रीय कर अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष-कथन प्रस्तुत करने के लिए एक या अधिक विधि व्यवसायियों या अपने अधिकारियों में से किसी को प्राधिकृत कर सकेगी ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) चार्टर्ड अकाउंटेंट" से ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिप्रेत है जो चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में परिभाषित है और जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

(ख) विधि व्यवसायी" से कोई अधिवक्ता, कोई वकील या किसी उच्च न्यायालय का कोई अटर्नी अभिप्रेत है और जिसमें व्यवसाय में कोई प्लीडर भी सम्मिलित है ।

14. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन करना-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग के कारण या अन्यथा उसके पद में हुई किसी रिक्ति की दशा में, केंद्रीय सरकार, ज्येष्ठतम सदस्य को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए उस दिन तक पदाभिहित कर सकेगी जिसको इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त किया गया कोई अध्यक्ष ऐसी रिक्ति को भरने के लिए अपना पद ग्रहण करता है ।

(2) जब अध्यक्ष, अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है, तब केंद्रीय सरकार ज्येष्ठतम सदस्य को अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए उस तारीख तक प्राधिकृत कर सकेगी जिसको अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है ।

(3) अध्यक्ष के उपधारा (1) के अधीन कार्य करने या उपधारा (2) के अधीन कृत्यों का निर्वहन करने के लिए पदाभिहित ज्येष्ठतम सदस्य एक सदस्य का ही वेतन और भत्ते ग्रहण करता रहेगा ।

अध्याय 3

राष्ट्रीय कर अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और कृत्य

15. राष्ट्रीय कर अधिकरण को अपील-(1) आय-कर अपील अधिकरण और सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण द्वारा अपील में पारित प्रत्येक आदेश से राष्ट्रीय कर अधिकरण को अपील होगी, यदि राष्ट्रीय कर अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि मामले में विधि का कोई सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है ।

(2) आय-कर अपील अधिकरण द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित, यथास्थिति, कोई आय-कर मुख्य आयुक्त या आयुक्त या सीमाशुल्क और केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क मुख्य आयुक्त या आयुक्त या कोई निर्धारिती या सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण द्वारा पारित किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति (जिसे इसमें इसके पश्चात् व्यथित व्यक्ति कहा गया है) राष्ट्रीय कर अधिकरण को अपील फाइल कर सकेगा और इस उपधारा के अधीन ऐसी अपील,-

(क) उस तारीख से जिसको उस आदेश की प्रति, जिसके विरुद्ध अपील की जानी है, यथास्थिति, निर्धारिती या व्यथित व्यक्ति या मुख्य आयुक्त या आयुक्त द्वारा प्राप्त की जाती है एक सौ बीस दिन के भीतर की जाएगी; 

(ख) अपील ज्ञापन के ऐसे प्ररूप में की जाएगी जिसमें अंतर्वलित विधि के सारवान् प्रश्न के संबंध में प्रमिततः कथन होगा; और

(ग) ऐसी फीस के साथ होगी जो विहित की जाए:

परंतु प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों को अंतर्वलित करने वाले मामलों के लिए अपील के ज्ञापन का पृथक् प्ररूप फाइल किया जाएगा :

परंतु यह और कि राष्ट्रीय कर अधिकरण एक सौ बीस दिन की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात् साठ दिन के भीतर अपील ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी को समय पर अपील न करने से पर्याप्त हेतुक से निवारित किया गया था ।

(3) जहां, उपधारा (1) के अधीन कोई अपील ग्रहण की जाती है वहां राष्ट्रीय कर अधिकरण-

(क) अपील की सुनवाई के लिए विधि के प्रश्न को विरचित करेगा; और

(ख) इस प्रकार विरचित प्रश्न के संबंध में किसी ऐसे सुसंगत विवाद्यक का अवधारण भी कर सकेगा, -

(i) जिसका आय-कर अपील अधिकरण द्वारा या सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण द्वारा इस प्रकार अवधारण नहीं किया गया है; या

(ii) जिसका आय-कर अपील अधिकरण द्वारा या सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण द्वारा गलत रूप में अवधारण किया गया है,

और इस प्रकार विरचित विधि के प्रश्न और इस प्रकार अवधारित अन्य सुसंगत विवाद्यक का विनिश्चय करेगा तथा उस पर ऐसा निर्णय सुनाएगा जिसमें वे आधार होंगे जिन पर ऐसा विनिश्चय आधारित है और ऐसी लागत अधिनिर्णींत कर सकेगा जो वह उपयुक्त समझे ।

(4) जहां, इस धारा के अधीन किसी अपील में, आय-कर अपील अधिकरण या सीमाशुल्क, उत्पाद-शुल्क और सेवा कर अपील अधिकरण का विनिश्चय किसी कर या शुल्क का संदाय अंतर्वलित करता है, वहां, यथास्थिति, निर्धारिती या व्यथित व्यक्ति को ऐसी अपील तब तक करने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक वह उस आदेश के आधार पर जिसके विरुद्ध अपील की गई है, संदेय ऐसे कर या शुल्क का कम से कम पच्चीस प्रतिशत निक्षिप्त नहीं कर देता है :

परंतु जहां किसी विशिष्ट मामले में राष्ट्रीय कर अधिकरण की यह राय है कि इस उपधारा के अधीन कर या शुल्क के निक्षेप से ऐसे व्यक्ति को अनुचित कठिनाई कारित होगी वहां वह ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह राजस्व के हित की सुरक्षा करने के लिए अधिरोपित करना उपयुक्त समझे, ऐसे निक्षेप से अभिमुक्ति दे सकेगा ।

16. राष्ट्रीय कर अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) राष्ट्रीय कर अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा, किंतु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होगा ।

(2) राष्ट्रीय कर अधिकरण को इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्तियां होंगी ।

(3) राष्ट्रीय कर अधिकरण की, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजनों के लिए, वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908(1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों के संबंध में किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्ः-

(क) लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों को प्रकट करने और पेश करने की अपेक्षा करना;

(ख) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से कोई लोक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रतिलिपि की अध्यपेक्षा करना;

(ग) व्यतिक्रम के लिए कोई अपील खारिज करना या उसका एकपक्षीय निर्णय करना;

(घ) व्यतिक्रम के लिए किसी अपील को खारिज करने के किसी आदेश को या उसके द्वारा पारित किसी एकपक्षीय आदेश को अपास्त करना;

(ङ) अभिलेख में प्रत्यक्षतः प्रकट किसी भूल या गलती में सुधार करना; और

(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।

(4) राष्ट्रीय कर अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत तथा धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी और राष्ट्रीय कर अधिकरण को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

17. राष्ट्रीय कर अधिकरण के आदेशों की अंतिमता-राष्ट्रीय कर अधिकरण द्वारा पारित कोई आदेश अंतिम होगा और उसे तद्नुसार प्रभावी किया जाएगा और किसी सिविल न्यायालय को राष्ट्रीय कर अधिकरण की अधिकारिता के भीतर आने वाले विषयों में से किसी से संबंधित कोई अधिकारिता, शक्ति नहीं होगी या प्राधिकार नहीं होगा या वह उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।

18. बहुमत द्वारा विनिश्चय-यदि दो सदस्यों वाली किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद है तो वे ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का जिन पर उनमें मतभेद है, कथन तैयार करेंगे और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे, जो ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर स्वयं सुनवाई करेगा या किसी अन्य सदस्य को ऐसी सुनवाई के लिए नामनिर्देशित करेगा तथा ऐसे प्रश्न और प्रश्नों का उस बहुमत के अनुसार विनिश्चय किया जाएगा जिसने उस मामले की सुनवाई की है जिनमें वे भी सम्मिलित होंगे, जिन्होंने उस मामले की प्रथम बार सुनवाई की थी ।

19. विशेष न्यायपीठ-जहां, किसी न्यायपीठ द्वारा विधि के किसी प्रश्न पर सुनाया गया कोई निर्णय तत्पश्चात् किसी न्यायपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आता है, और पश्चात्वर्ती न्यायपीठ की यह राय है कि विधि के प्रश्न पर पुनर्विचार किया जाना अपेक्षित है तो पश्चात्वर्ती न्यायपीठ विधि के ऐसे प्रश्न पर सुनवाई और विनिश्चय करने के लिए पांच सदस्यों से मिलकर बनने वाली एक विशेष न्यायपीठ का गठन करने के लिए अध्यक्ष को निर्देश करेगी ।

20. अंतरिम आदेश-इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन किसी अपील के संबंध में कोई अंतरिम आदेश (व्यादेश के रूप में या रोक के रूप में या अन्यथा) तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि-

(क) ऐसे पक्षकार को, जिसके विरुद्ध ऐसी अपील की गई है, ऐसी अपील की और ऐसे अंतरिम आदेश के लिए अभिवचन के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतिलिपियां नहीं दे दी जाती हैं; और 

(ख) ऐसे पक्षकार को मामले में सुनवाई का अवसर नहीं दे दिया जाता है ।

21. अवमान के लिए दंड देने की शक्ति-राष्ट्रीय कर अधिकरण को अपने अवमान के संबंध में वही अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार होंगे और वह उनका प्रयोग करेगा जो किसी उच्च न्यायालय को हैं और वह ऐसी शक्ति या प्राधिकार का इस प्रयोजन के लिए न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 (1971 का 70) के उपबंधों के अधीन प्रयोग कर सकेगा, जो निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे, अर्थात्ः-

(क) उसमें किसी उच्च न्यायालय के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत राष्ट्रीय कर अधिकरण के प्रति निर्देश भी है;

(ख) उक्त अधिनियम की धारा 15 में महाधिवक्ता के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसे विधि अधिकारी के प्रति निर्देश है जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे:

परंतु ऐसे मामले अध्यक्ष द्वारा गठित विशेष न्यायपीठ द्वारा, जो पांच न्यायिक सदस्यों से मिलकर बनेगी, सुने जाएंगे ।

22. राष्ट्रीय कर अधिकरण का आदेश-राष्ट्रीय कर अधिकरण, अपने समक्ष किन्हीं कार्यवाहियों के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस पर ऐसे आदेश पारित करेगा, जिन्हें वह ठीक समझे ।

23. उच्च न्यायालय से लंबित मामलों का अंतरण-(1) ऐसी तारीख से ही जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, उच्च न्यायालय के समक्ष उस तारीख के ठीक पूर्व लंबित सभी मामले और कार्यवाहियां, जिनमें प्रत्यक्ष करों और अप्रत्यक्ष करों के अधीन अपीलें और निर्देश भी हैं, राष्ट्रीय कर अधिकरण को अन्तरित हो जाएंगी ।

(2) जहां कोई ऐसा मामला या कार्यवाही, जिसमें अपील और निर्देश भी हैं, उपधारा (1) के अधीन उच्च न्यायालय से राष्ट्रीय कर अधिकरण को अंतरित हो जाता है वहां, -

(क) उच्च न्यायालय ऐसे अंतरण के पश्चात् यथाशीघ्र ऐसे मामले या कार्यवाही से संबंधित अभिलेख राष्ट्रीय कर अधिकरण को भेजेगा;

(ख) राष्ट्रीय कर अधिकरण, ऐसे अभिलेखों की प्राप्ति पर, ऐसे मामले या कार्यवाही में उस प्रक्रम से, जिससे उसका अंतरण किया गया है या किसी पूर्वतर प्रक्रम से या नए सिरे से, जो वह ठीक समझे, कार्रवाई कर सकेगा;

(ग) अध्यक्ष इस धारा के अधीन अन्तरित मामलों की सुनवाई के लिए ऐसी संख्या में सदस्यों की न्यायपीठ गठित करेगा, जो वह उचित समझे ।

24. उच्चतम न्यायालय को अपील-राष्ट्रीय कर अधिकरण के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति जिसके अंतर्गत सरकार का कोई विभाग भी है उसे राष्ट्रीय कर अधिकरण के विनिश्चय या आदेश की संसूचना प्राप्त होने की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकेगा: 

परंतु उच्चतम न्यायालय, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी को उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल न करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था, तो वह उसे ऐसी अवधि के भीतर जो वह उचित समझे, अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।

अध्याय 4

प्रकीर्ण

25. सदस्यों आदि का लोक सेवक होना-राष्ट्रीय कर अधिकरण के अध्यक्ष, सदस्य और अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।

26. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-राष्ट्रीय कर अधिकरण या उसके अध्यक्ष, सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध किसी ऐसे कार्य से, जो इस अधिनियम के अधीन किसी कृत्य के निर्वहन में सद्भावपूर्वक किया गया है या किए जाने के लिए आशयित है, कारित या कारित होने के लिए संभाव्य किसी हानि या नुकसान के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।

27. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत होते हैं:

परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

28. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) अध्यक्ष या अन्य सदस्यों के कदाचार या उनकी असमर्थता के आरोपों के अन्वेषण के लिए धारा 11 की उपधारा (4) के अधीन प्रक्रिया;

(ख) धारा 12 की उपधारा (2) के अधीन राष्ट्रीय कर अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा अन्य सेवा शर्तें;

(ग) धारा 15 की उपधारा (2) के खंड (ग) के अधीन संदेय फीस की रकम;

(घ) अन्य विषय, जिनके संबंध में राष्ट्रीय कर अधिकरण धारा 16 की उपधारा (3) के खंड (च) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;

 (ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए या जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार से नियम बनाने की अपेक्षा है ।

29. नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो वह नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

30. पारिणामिक संशोधन-ऐसी तारीख से ही जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, अनुसूची में उल्लिखित अधिनियमितियां उसमें विनिर्दिष्ट रीति से संशोधित हो जाएंगी ।

अनुसूची

(धारा 30 देखिए)

कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन

भाग ii

आय-कर अधिनियम, 1961 का संशोधन

(1961 का 43)

1. धारा 2 में, खंड (29ग) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-

(29घ) राष्ट्रीय कर अधिकरण" से राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कर अधिकरण अभिप्रेत है; ।

2. अध्याय 20 में, -

(i) धारा 254 की उपधारा (4) में, धारा 256 या धारा 260क में यथा उपबंधित के सिवाय" शब्दों, अंकों और अक्षर के स्थान पर, राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 में यथा उपबंधित के सिवाय" शब्द और अंक रखे जाएंगे;

(ii) उपशीर्ष ग. उच्च न्यायालय को निर्देश" और धारा 256, 258 और 259 का लोप किया जाएगा;

(iii) धारा 260 के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएगा, अर्थात्: -

260. उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय कर अधिकरण के विनिश्चयों का प्रभाव-(1) उच्चतम न्यायालय धारा 257 के अधीन अपील अधिकरण द्वारा उसको किए गए किसी निर्देश को सुनने पर उसमें उठाए गए विधि के प्रश्न का विनिश्चय करेगा और उस पर, ऐसे आधार अंतर्विष्ट करने वाला अपना निर्णय देगा, जिन पर विनिश्चय आधारित है और न्यायालय की मुद्रा के अधीन और रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर सहित निर्णय की एक प्रति अपील अधिकरण को भेजी जाएगी जो ऐसे आदेश पारित करेगा जैसे मामले को ऐसे निर्णय के अनुरूप निपटाने के लिए आवश्यक हैं ।

(2) जहां राष्ट्रीय कर अधिकरण उसके समक्ष फाइल की गई किसी अपील में या राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 के अधीन उसको अंतरित किसी मामले में कोई निर्णय देता है वहां उस अधिकरण के आदेश को निर्णय की प्रमाणित प्रति के आधार पर निर्धारण अधिकारी द्वारा प्रभावी बनाया जाएगा ।

(3) उच्चतम न्यायालय को किए गए किसी निर्देश का खर्च, जिसके अंतर्गत निर्देश करने की फीस नहीं होगी, न्यायालय के विवेकानुसार होगा ।”;

(iv) धारा 260क की उपधारा (1) में अपील अधिकरण द्वारा किसी अपील में पारित प्रत्येक आदेश" शब्दों के पूर्व राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना की तारीख के पूर्व" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;

(v) धारा 261 में, उच्च न्यायालय के 1 अक्तूबर, 1998 के पूर्व" शब्दों के पूर्व राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना के पूर्व" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे;

(vi) धारा 263 की उपधारा (3) में अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात् राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जांएगे;

(vii) धारा 264 की उपधारा (7) में अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात् राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

भाग 2

धन-कर अधिनियम, 1957 का संशोधन

(1957 का 27)

1. धारा 2 में, खंड (ठग) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः-

(ठघ) राष्ट्रीय कर अधिकरण" से राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कर अधिकरण अभिप्रेत है; ।

2. धारा 25 की उपधारा (4) में अपील अधिकरण" शब्दों के पश्चात् राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

3. धारा 27क की, -

(i) उपधारा (1) में, 1 अक्तूबर, 1998 को या उसके पश्चात्" अंकों और शब्दों के पश्चात् किन्तु राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना की तारीख के पूर्व" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;

(ii) उपधारा (2) में, अपील उच्च न्यायालय को तभी होगी" शब्दों के स्थान पर, अपील राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना की तारीख के पूर्व उच्च न्यायालय को तभी होगी" शब्द रखे जाएंगे ।

4. धारा 29 की उपधारा (1) में, उच्च न्यायालय को धारा 27 के अधीन कथित मामले पर दिए गए निर्णय की अपील या धारा 27क के अधीन फाइल की गई अपील किसी ऐसे मामले में जिसके संबंध में उच्च न्यायालय यह प्रमाणित करता है कि वह मामला उच्चतम न्यायालय की अपील के लिए उचित है, उच्चतम न्यायालय में हो सकेगी ।" शब्दों, अंकों और अक्षर के स्थान पर, धारा 27 के अधीन कथित किसी मामले में राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना की तारीख के पूर्व परिदत्त उच्च न्यायालय के किसी निर्णय से या किसी ऐसे मामले में, जिसे उच्च न्यायालय उच्चतम न्यायायल में अपील के लिए योग्य मामले के रूप में प्रमाणित करता है, धारा 27क के अधीन फाइल की गई किसी अपील से उच्चतम न्यायालय को अपील होगी ।" शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे । 

5. धारा 29क में, इस बात के होते हुए भी कि" शब्दों के पश्चात् राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 के प्रारंभ से पूर्व इस अधिनियम के अधीन" शब्द और अंक अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

भाग 3

व्यय-कर अधिनियम, 1987 का संशोधन

(1987 का 35)

1. धारा 13 की उपधारा (4) में, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी आदेश" शब्दों के स्थान पर, राष्ट्रीय कर अधिकरण या किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी आदेश" शब्द रखे जाएंगे ।

2. धारा 21 की उपधारा (7) में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे  

भाग 4

ब्याज कर अधिनियम, 1974 का संशोधन

(1974 का 45)

1. धारा 19 की उपधारा (3) में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द रखे जाएंगे ।

2. धारा 20 की उपधारा (7) में, अपील अधिकरण, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय" शब्दों के स्थान पर, अपील अधिकरण, राष्ट्रीय कर अधिकरण, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय" शब्द रखे जाएंगे ।

भाग 5

वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1998 का संशोधन

(1998 का 21)

धारा 76 की उपधारा (1) में, वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1998 द्वारा संशोधित रूप में धन-कर अधिनियम की धारा 23, धारा 23क, धारा 24, धारा 25, धारा 28, और धारा 29, तथा अंतःस्थापित रूप में धारा 27क" शब्दों, अंकों, अक्षर और कोष्ठकों के स्थान पर, धन-कर अधिनियम की धारा 23, धारा 23क, धारा 24 और धारा 25" शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे ।

भाग 6

सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 का संशोधन

(1962 का 52)

1. धारा 2 में, खंड (30) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्: -

(30क) राष्ट्रीय कर अधिकरण" से राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कर अधिकरण अभिप्रेत है; ।

2. धारा 27 की उपधारा (3) में अपील अधिकरण" शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे

3. धारा 27क के स्पष्टीकरण में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

4. धारा 28कक के स्पष्टीकरण 1 और स्पष्टीकरण 2 में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

5. धारा 28कख के स्पष्टीकरण 1 और स्पष्टीकरण 2 में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

6. धारा 28ख की उपधारा (1) में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

7. धारा 130, धारा 130क, धारा 130ख, धारा 130ग और धारा 130घ का लोप किया जाएगा ।

8. धारा 130ङ के खंड (ख) में, पारित ऐसे आदेश" शब्दों के पूर्व, राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना के पूर्व" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

9. धारा 131 में इस बात के होते हुए भी कि" शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 के प्रारंभ से पूर्व इस अधिनियम के अधीन" शब्द और अंक अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

10. धारा 131ग के खंड (ख) का लोप किया जाएगा ।

भाग 7

केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क अधिनियम, 1944 का संशोधन

(1944 का 1)

1. धारा 2 के खंड (च) के पश्चात्, निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्ः- 

(चच) राष्ट्रीय कर अधिकरण" से राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कर अधिकरण अभिप्रेत है; ।

2. धारा 11कक के स्पष्टीकरण 1 और स्पष्टीकरण 2 में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात् राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

3. धारा 11कख के स्पष्टीकरण 1 और स्पष्टीकरण 2 में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

4. धारा 11खख के स्पष्टीकरण में, अपील अधिकरण," शब्दों के पश्चात्, राष्ट्रीय कर अधिकरण" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

5. धारा 35ग की उपधारा (4) में, धारा 35छ या धारा 35ठ में यथा उपबंधित के सिवाय" शब्दों, अंकों और अक्षरों के स्थान पर, राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 में यथा उपबंधित के सिवाय" शब्द और अंक रखे जाएंगे ।

6. धारा 35छ, धारा 35ज, धारा 35झ और धारा 35ञ का लोप किया जाएगा ।

7. धारा 35ट में, -

(i) उपधारा (1) में, उच्च न्यायालय या" शब्दों का लोप किया जाएगा;

(ii) उपधारा (2) में, - 

(क) दोनों स्थानों पर आने वाले उच्च न्यायालय या" शब्दों का लोप किया जाएगा;

(ख) यथास्थिति" शब्द का लोप किया जाएगा । 

8. धारा 35ठ के खंड (ख) में, पारित ऐसे आदेश" शब्दों के पूर्व, राष्ट्रीय कर अधिकरण की स्थापना के पूर्व" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

9. धारा 35ढ में, इस बात के होते हुए भी कि" शब्दों के पश्चात् राष्ट्रीय कर अधिकरण अधिनियम, 2005 के प्रारंभ से पूर्व इस अधिनियम के अधीन" शब्द और अंक अंतःस्थापित किए जाएंगे ।

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