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नोटेरी अधिनियम, 1952 ( Notaries Act, 1952 )


 

नोटेरी अधिनियम, 1952

(1952 का अधिनियम संख्यांक 53)

[9 अगस्त, 1952]

नोटेरियों की वृत्ति को विनियमित

करने के लिए

अधिनियम

संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) यह अधिनियम नोटेरी अधिनियम, 1952 कहा जा सकता है ।

(2) इसका विस्तार  *** सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख  को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

                                 *                                            *                                             *                                             *                            

                                (ख) “लिखत" के अन्तर्गत ऐसी प्रत्येक दस्तावेज है जिसके द्वारा कोई अधिकार या दायित्व का सृजन, अन्तरण, उपान्तरण, परिसीमन, विस्तार, निलम्बन, निर्वापन या अभिलेखन किया गया है या किया जाना तात्पर्यित है ;

 [(ग) “विधि व्यवसायी" से, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) के उपबंधों के अधीन किसी नामावली में प्रविष्ट किया गया कोई अधिवक्ता अभिप्रेत है ;]

(घ) “नोटेरी" से इस अधिनियम के अधीन इस रूप में नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है :

परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की कालावधि के लिए इसके अन्तर्गत वह व्यक्ति भी होगा जो ऐसे प्रारम्भ के पूर्व  [परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) के अधीन]  *** नोटेरी पब्लिक नियुक्त किया गया था, और जो ऐसे प्रारम्भ के ठीक पहले,  [भारत के किसी भाग में] नोटेरी का व्यवसाय कर रहा था :

परन्तु यह और भी कि, जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में उक्त दो वर्ष की कालावधि की संगणना उस तारीख से की जाएगी जिसको यह अधिनियम उस राज्य में प्रवत्त होगा;]

(ङ) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;]

(च) “रजिस्टर" से धारा 4 के अधीन सरकार द्वारा रखा गया नोटेरी का रजिस्टर अभिप्रेत है ;

 [(छ) “राज्य सरकार" से संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।]

3. नोटेरी नियुक्त करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, सम्पूर्ण भारत के लिए या उसके किसी भाग के लिए और राज्य सरकार, सम्पूर्ण राज्य के लिए या उसके किसी भाग के लिए, किन्हीं विधि-व्यवसायियों को या अन्य व्यक्तियों को जिनके पास ऐसी अर्हताएं हैं जो विहित की जाएं, नोटेरी नियुक्त कर सकती है ।

4. रजिस्टर-(1) केन्द्रीय सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार, ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, उस सरकार द्वारा नियुक्त और इस अधिनियम के अधीन उसी रूप में व्यवसाय करने के हकदार नोटेरियों का एक रजिस्टर रखेगी ।

(2) ऐसे प्रत्येक रजिस्टर में जिस नोटेरी का नाम प्रविष्ट है उसके बारे में निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी :-

                (क) उसका पूरा नाम, जन्म तिथि, निवास का और कार्यालय का पता ;

                (ख) रजिस्टर में उसका नाम प्रविष्ट किए जाने की तारीख ;

                (ग) उसकी अर्हताएं ; और

                (घ) कोई अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं ।

5. रजिस्टर में नामों की प्रविष्टि और व्यवसाय के प्रमाणपत्रों का जारी किया जाना या नवीकरण-(1) प्रत्येक नोटेरी, जो इस रूप में व्यवसाय करना चाहता है, उसको नियुक्त करने वाली सरकार को विहित फीस का, यदि कोई हो, संदाय करने पर निम्नलिखित का हकदार  [हो सकेगा] :-

                (क) धारा 4 के अधीन उस सरकार द्वारा रखे जाने वाले रजिस्टर में अपने नाम की प्रविष्टि कराने का ; और

                (ख) उसको प्रमाणपत्र जारी किए जाने की तारीख से [पांच वर्ष] की कालावधि के लिए उसको व्यवसाय करने के लिए प्राधिकृत करने वाले प्रमाणपत्र का ।

 [(2) नोटेरी को नियुक्त करने वाली सरकार आवेदन और विहित फीस की प्राप्ति पर एक समय में पांच वर्ष की अवधि के लिए किसी नोटेरी के व्यवसाय के प्रमाणपत्र का नवीकरण कर सकेगी ।]

6. नोटेरियां की सूचियों का वार्षिक प्रकाशन-केन्द्रीय सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार, प्रत्येक वर्ष के जनवरी मास के दौरान, राजपत्र में उस सरकार द्वारा नियुक्त और उस वर्ष के प्रारम्भ में व्यवसाय करने वाले नोटेरियों की सूची उनके बारे में ऐसे ब्यौरों के साथ, जो विहित किए जाएं, प्रकाशित करेगी ।

7. नोटेरियों की मुद्रा-प्रत्येक नोटेरी की ऐसे प्ररूप में और ऐसे डिजाइन की, जो विहित की जाए, एक मुद्रा होगी और आवश्यकतानुसार वह उसका उपयोग करेगा ।

8. नोटेरियों के कृत्य-(1) नोटेरी अपने पद के आधार पर निम्नलिखित में से सभी या कोई कार्य कर सकता है, अर्थात् :-

(क) किसी लिखत के निष्पादन को सत्यापित, अधिप्रमाणित, प्रमाणित या अनुप्रमाणित करना ;

(ख) किसी वचनपत्र, हुण्डी या विनिमयपत्र को प्रतिग्रहण के लिए या संदाय के लिए प्रस्तुत कर सकना या अधिक अच्छी प्रतिभूति की मांग कर सकना ;

(ग) किसी वचनपत्र, हुण्डी या विनिमयपत्र के अप्रतिग्रहण या असंदाय द्वारा अनादर को नोट करना या उसका प्रसाक्ष्य करना या अधिक अच्छी प्रतिभूति के लिए प्रसाक्ष्य करना या परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) के अधीन आदर का कार्य तैयार करना, या ऐसी नोट या प्रसाक्ष्य की सूचना तामील करना ;

(घ) पोत का प्रसाक्ष्य, नौका का प्रसाक्ष्य या डेमरेज और अन्य वाणिज्यिक मामलों के बारे में प्रसाक्ष्य नोट करना और लेखबद्ध करना ;

(ङ) किसी व्यक्ति को शपथ देना या उससे शपथपत्र लेना ;

(च) बाटमारी और जहाजी माल बन्धपत्र, पोत भाटक पत्र और अन्य वाणिज्यिक दस्तावेज बनाना ;

(छ) भारत से बाहर किसी देश या स्थान में प्रभावी होने के लिए आशयित किसी दस्तावेज की ऐसी प्ररूप में और ऐसी भाषा में जो उस स्थान की विधि के अनुरूप हैं जहां ऐसे विलेख का प्रवर्तन आशयित है, तैयार करना, अधिप्रमाणित या अनुप्रमाणित करना ;

(ज) एक भाषा से दूसरी भाषा में किसी दस्तावेज का अनुवाद करना और ऐसे अनुवाद को सत्यापित करना ;

 [(जक) यदि किसी न्यायालय या प्राधिकारी द्वारा ऐसा निदेश दिया जाए तो, किसी सिविल या दांडिक विचारण में साक्ष्य अभिलिखित करने के लिए आयुक्त के रूप में कार्य करना ;

(जख) यदि ऐसा अपेक्षित हो तो, मध्यस्थ, बिचौलिया या सुलहकार के रूप में कार्य करना ;]

(झ) कोई अन्य कार्य करना जो विहित किया जाए ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कोई कार्य उस दशा के सिवाय जब वह नोटेरी द्वारा उसके हस्ताक्षर और पदीय मुद्रा के साथ किया गया है, नोटेरी का कार्य नहीं समझा जाएगा ।

9. बिना प्रमाणपत्र के व्यवसाय करने का वर्जन-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति नोटेरी के रूप में व्यवसाय नहीं करेगा या नोटेरी की पदीय मुद्रा के अधीन कोई नोटेरी का काम नहीं करेगा जब तक उसके पास धारा 5 के अधीन उसे जारी किया गया व्यवसाय का चालू प्रमाणपत्र न हो ;

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी नोटेरी की ओर से कार्य करने वाले ऐसे नोटेरी के लिपिक द्वारा प्रतिग्रहण या संदाय के लिए किसी वचनपत्र, हुण्डी या विनिमयपत्र के प्रस्तुतीकरण को लागू नहीं होगी ।

(2) उपधारा (1) की कोई बात इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष समाप्त हो जाने तक किसी ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होगी जिसके प्रति धारा 2 के खण्ड (घ) के परन्तुक में निर्देश किया गया है :

 [परन्तु जम्मू-कश्मीर राज्य के सम्बन्ध में, दो वर्ष की उक्त कालावधि की संगणना उस तारीख से की जाएगी जिसको यह अधिनियम उस राज्य में प्रवृत्त होगा ।]

10. नामों का रजिस्टर के हटाया जाना-किसी नोटेरी की नियुक्ति करने वाली सरकार, आदेश द्वारा धारा 4 के अधीन उसके द्वारा रखे जाने वाले रजिस्टर से नोटेरी का नाम हटा सकती है यदि-

                (क) वह हटाए जाने के लिए अनुरोध करता है ; या

                (ख) उसने संदाय किए जाने के लिए अपेक्षित विहित फीस का संदाय नहीं किया है ; या

                (ग) वह अननुमोचित दिवालिया है ; या

 (घ) यह विहित रीति से जांच करने के पश्चात्, ऐसे वृत्तिक या अन्य कदाचार का दोषी पाया गया है जो सरकार की राय में उसे नोटेरी के रूप में व्यवसाय करने के लिए अयोग्य बनाता है ;  [याट

2[(ङ) ऐसे किसी अपराध के लिए जिसमें नैतिक अधमता अंतर्वलित हो, किसी न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किया जाता है ; या

(च) अपने व्यवसाय के प्रमाणपत्र को नवीकृत नहीं कराता है ।]

11. अन्य विधि में नोटेरी पब्लिक के प्रति निर्देश का अर्थान्वयन-किसी अन्य विधि में नोटेरी पब्लिक के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इस अधिनियम के अधीन व्यवसाय करने के हकदार नोटेरी के प्रति निर्देश है ।

12. नोटेरी के रूप में मिथ्या व्यपदेशन के लिए शास्ति-कोई व्यक्ति जो-

                (क) नोटेरी के रूप में नियुक्त हुए बिना यह मिथ्या व्यपदेशन करेगा कि वह नोटेरी है, या

                (ख) नोटेरी के रूप में व्यवसाय करेगा या धारा 9 के उल्लंघन में नोटेरी का कोई काम करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि  [एक वर्ष] तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

13. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई न्यायालय केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा लिखित रूप में किए गए परिवाद के सिवाय इस अधिनियम के अधीन किसी नोटेरी द्वारा उसके कृत्यों के तात्पर्यित प्रयोग या प्रयोग में किए गए किसी अपराध का संज्ञान नहीं करेगा ।

(2) प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई मजिस्ट्रेट इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

14. विदेशी नोटेरियों द्वारा किए गए नोटेरी कामों की मान्यता के लिए व्यतिकारी व्यवस्था-यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि भारत से बाहर किसी देश या स्थान की विधि या पद्धति द्वारा, भारत के अन्दर नोटेरियों द्वारा किए गए नोटेरी के कार्य उस देश या स्थान में सभी या किन्हीं सीमित प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त हैं तो, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकती है कि ऐसे देश या स्थान के अन्दर नोटेरियों द्वारा विधिपूर्णतः किए गए नोटेरी के कार्य भारत के अन्दर, यथास्थिति, सभी प्रयोजनों के लिए या सीमित प्रयोजनों के लिए, जैसे अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, मान्यता प्राप्त होंगे ।

15. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकती है ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर सकते हैं , अर्थात् :-

(क) नोटेरी की अर्हताएं, वह प्ररूप और रीति जिससे नोटेरी के रूप में नियुक्ति के लिए आवेदन किए जा सकते हैं और ऐसे आवेदनों का निपटान ;

                (ख) वे प्रमाणपत्र, प्रशंसापत्र या चरित्र, आर्जव, योग्यता और क्षमता के बारे में साक्ष्य जो नोटेरी के रूप में नियुक्ति के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति से देने की अपेक्षा की जाए ;

                 [(ग) नोटेरी के रूप में नियुक्ति के लिए और व्यवसाय के प्रमाणपत्र के जारी किए जाने और उसके नवीकरण के लिए, व्यवसाय के क्षेत्र या व्यवसाय के क्षेत्र के विस्तारण के लिए संदेय फीस और विनिर्दिष्ट वर्गों के मामलों में ऐसी फीस से पूर्णतः या भागतः छूट ;]

                (घ) नोटेरी का काम करने के लिए किसी नोटेरी को संदेय फीस ;

                (ङ) रजिस्टरों का प्ररूप और उनमें प्रविष्ट की जाने वाली विशिष्टियां ;

                (च) नोटेरी की मुद्रा का प्ररूप और डिजाइन ;

                (छ) वह रीति जिससे नोटेरियों के विरुद्ध वृत्तिक या अन्य अवचारों के अभिकथनों की जांच की जा सके ;

                (ज) वे कार्य जो नोटेरी धारा 8 में विनिर्दिष्ट कामों के अतिरिक्त कर सके और वह रीति जिससे नोटेरी अपने कृत्यों का निर्वहन करे :

                (झ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

 [(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यह उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

16. [1881 के अधिनियम 26 का संशोधनट-1957 के अधिनियम संख्यांक 36 की धारा 2 और प्रथम अनुसूची द्वारा निरसित ।

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