"2006 के मालेगांव बम ब्लास्ट केस में बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए अंतिम चार बचे आरोपियों के खिलाफ लगे आरोपों को रद्द कर दिया। अदालत ने महाराष्ट्र एटीएस (ATS) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच में पाए गए गहरे अंतर्विरोधों को आधार बनाते हुए कहा कि इन दोनों जांचों के बीच कोई तालमेल नहीं है और यह मामला अब बंद होने की कगार पर पहुंच गया है। "
"मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम सी. चांडक की पीठ ने विशेष एनआईए अदालत के 30 सितंबर, 2025 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपियों को आरोपमुक्त करने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि विशेष अदालत के आदेश में न्यायिक बुद्धि का प्रयोग नहीं दिखता है।"
किन 4 लोगों को किया बरी?
"अदालत के इस फैसले के बाद अब इस मामले में कोई भी आरोपी मुकदमे का सामना नहीं कर रहा है। जिन चार लोगों को डिस्चार्ज किया गया है, उनके नाम मनोहर नरवरिया, राजेंद्र चौधरी, धन सिंह और लोकेश शर्मा हैं। ये चारों 2019 से जमानत पर थे। इससे पहले 2016 में विशेष अदालत ने उन नौ मुस्लिम लोगों को भी आरोपमुक्त कर दिया था जिन्हें शुरुआत में एटीएस ने गिरफ्तार किया था।"
कोई ठोस सबूत नहीं
"हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में इसे एक रहस्य बताया कि एनआईए ने 2011 में जांच हाथ में लेने के बाद कोई नया ठोस सबूत क्यों नहीं जुटाया। अदालत ने पाया कि एनआईए ने मुख्य रूप से उन गवाहों और बयानों पर भरोसा किया जिन्हें पहले ही वापस लिया जा चुका था।"
"8 सितंबर, 2006 को मालेगांव की एक मस्जिद और कब्रिस्तान के पास हुए विस्फोटों में 31 लोग मारे गए थे। शुरुआत में एटीएस और सीबीआई ने नौ मुस्लिम युवकों को आरोपी बनाया था। लेकिन बाद में एनआईए ने अपनी जांच का रुख बदला और एक हिंदू दक्षिणपंथी समूह की संलिप्तता का दावा किया।"
असीमानंद के बयान का दिया हवाला
"एनआईए का मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। इसमें स्वामी असीमानंद के 2010 के उस बयान का हवाला दिया गया था जिसे उन्होंने बाद में वापस ले लिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो गवाह अपने बयान से पलट जाता है, उसकी गवाही विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।"
"कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि ट्रायल कोर्ट ने एटीएस और सीबीआई द्वारा जुटाए गए फॉरेंसिक सबूतों और वॉयस सैंपल्स को कैसे नजरअंदाज कर दिया। पीठ ने कहा, "एटीएस और एनआईए द्वारा पेश की गई दोनों कहानियों का किसी भी तरह मिलन संभव नहीं है। ये एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं।""
"बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि एटीएस द्वारा जुटाए गए सबूत रिकॉर्ड से मिटाए नहीं जा सकते। कोर्ट ने सवाल किया कि एक ही अपराध के लिए दो अलग-अलग जांच एजेंसियां अलग-अलग आरोपियों के खिलाफ सबूत कैसे पेश कर सकती हैं? फैसले के अनुसार, "आज की स्थिति में जांच दो विरोधाभासी दिशाओं में खड़ी है, जिसका कोई अंत नजर नहीं आता।""
"अदालत ने यह भी गौर किया कि एनआईए के पास ऐसा कोई गवाह नहीं था जिसने घटनास्थल पर इन चारों आरोपियों में से किसी की पहचान की हो। अधिकांश गवाह केवल सुनी सुनाई बातों पर आधारित थे।"
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