इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बहराइच जिले में दर्ज FIR को लेकर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायालय का कहना है कि FIR में फिल्मों के डायलाग का इस्तेमाल किया गया है, जो न सिर्फ भ्रामक है बल्कि वास्तविकता को भी छुपा रहा है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ऐसी FIR किसी भी कामकाज की स्थिति को रिकॉर्ड नहीं करती।
प्रमुख सबूतों की अनदेखी
कोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस सम्बंध में आशंका जताई है कि पुलिस एक ही पैटर्न का बार-बार इस्तेमाल कर रही है। FIR में उल्लेख किया गया “तुम लोग पुलिस से घिर चुके हो” जैसे डायलाग पूरी तरह से न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ा रहे हैं। जस्टिस अब्दुल मोइन और प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि समय आ गया है कि कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप करे।
अस्पष्ट समय का मामला
आदेश के मुताबिक, FIR में एनकाउंटर का समय सुबह 10:45 बताया गया है, जबकि FIR में जो बातें लिखी गई हैं, उनके अनुसार उस समय पुलिस टीम को तत्वावधान में कई संदेह था। FIR की समयावधि में असंगतियों की भरमार है जो संदेह को और बढ़ाती है।
पुलिस सुपरिटेंडेंट को चुनौती
कोर्ट ने बहराइच के पुलिस सुपरिटेंडेंट को निर्देश दिया है कि वे दो हफ्ते के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा। यह मामला एक आरोपी, अकबर अली की जमानत की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया।
कानूनी धारा और गंभीर आरोप
FIR 22 जनवरी को विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज की गई थी, जिसमें UP काउ स्लॉटर प्रिवेंशन एक्ट शामिल है। इसके अनुसार, FIR में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि आरोपी गोहत्या के कार्य में शामिल थे और पुलिस को जब मौके पर बताया गया, तो मौके पर पहुंचने पर आरोपी पुलिस पर फायरिंग करने की बात करते हैं।
यहां तक कि फिल्मी डायलाग भी नहीं बचे
कोर्ट ने FIR में दर्ज ऐसे उद्दरण के लिए सवाल किए हैं जो न केवल असंभव हैं, बल्कि कानून के स्पष्ट दुरूपयोग को भी दिखाते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आरोप वास्तविकता से बिल्कुल बंचित हैं और पुलिस ऐसे आरोपों के साथ नहीं चल सकती है।
आवश्यक संवेदनशीलता की कमी
कोर्ट ने बार-बार ये बताया है कि इस तरह की FIR पुलिस के अधिकारों का अनुचित उपयोग है। पुलिस हमेशा जनता की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती है, लेकिन जब वे ऐसे मामलों में गलत तरीके से काम करते हैं, तो न्यायालय की भूमिका बढ़ जाती है।
जीवंत रहस्य से पर्दा उठता है
इस पूरे मामले ने एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या पुलिस के कामकाज की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है। अदालत के आदेश से यह स्पष्ट है कि फिल्मी डायलाग से दूर रहने की जरूरत है और सच्चाई को सामने लाने का प्रयास होना चाहिए।
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