इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के बाद शिक्षक ग्रेच्युटी (उपदान) पाने के हकदार हैं और इसके लिए आयु सीमा का कोई बंधन नहीं लगाया जा सकता।
न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने मेहरजहां की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याची ने एक सहायता प्राप्त संस्थान में अपनी सेवाएं पूरी करने के बाद 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्ति प्राप्त की थी, लेकिन उन्हें ग्रेच्युटी का लाभ नहीं दिया गया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश स्कूल और कॉलेज शिक्षक ग्रेच्युटी फंड नियमावली 1964 के तहत ग्रेच्युटी केवल सेवा के दौरान मृत्यु होने पर ही देय थी, जो सेवानिवृत्त शिक्षकों के अधिकारों का पूर्ण संरक्षण नहीं करती।
कोर्ट ने माना कि सहायता प्राप्त संस्थानों के शिक्षक राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान ही होते हैं। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि शिक्षक ने 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने का विकल्प नहीं चुना था, इसलिए वे ग्रेच्युटी की पात्र नहीं हैं।
कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि एक सरकारी आदेश किसी वैधानिक प्रविधान या नियम का स्थान नहीं ले सकता। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी का भुगतान करना नियोक्ता की वैधानिक जिम्मेदारी है और इसे केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने ‘पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972’ के प्रविधानों का हवाला देते हुए कहा कि याची इस कानून के तहत लाभ पाने की पात्र हैं। संबंधित अधिकारियों को कोर्ट ने निर्देश दिया है कि वह याची की ग्रेच्युटी की गणना कर आठ सप्ताह के भीतर उसका भुगतान सुनिश्चित कराएं।
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