मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में मिसाल पेश की है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि 'सिर्फ रिश्वत लेना ही नहीं, बल्कि रिश्वत की मांग करना भी कानूनन अपराध है।' इस सख्त टिप्पणी के साथ ही अदालत ने टीकमगढ़ जिले के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज लोकायुक्त की FIR को निरस्त करने की गुहार लगाई थी।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद टीकमगढ़ जिले के बल्देवगढ़ में पदस्थ ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. अंकित त्रिपाठी से जुड़ा है। आरोप है कि खड़गपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र परिसर में आधार कार्ड केंद्र के सुचारू संचालन के बदले डॉ. त्रिपाठी ने संचालक से हर माह 10,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। आधार केंद्र संचालक की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस ने मामले की जांच की और डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।
भ्रष्टाचार की शुरुआत मांग से होती है, और कानून इस मंशा को नजरअंदाज नहीं कर सकता। यदि जांच के इस स्तर पर FIR निरस्त की जाती है, तो यह भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी लड़ाई को कमजोर करेगा।
हाई कोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?
डॉ. अंकित त्रिपाठी की ओर से दायर याचिका में दलील दी गई थी कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं और FIR निरस्त की जानी चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट की युगलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया प्रकरण बनता नजर आ रहा है। कोर्ट ने साफ किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केवल नोटों की बरामदगी ही अपराध नहीं है, बल्कि पद का दुरुपयोग कर रिश्वत की मांग करना ही मामले को गंभीर बना देता है।
प्रशासनिक शुचिता पर बड़ा प्रहार
विश्लेषण के मुताबिक, अक्सर सरकारी अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि जब तक ट्रैप न हों या पैसे बरामद न हों, वे सुरक्षित हैं। हाई कोर्ट का यह फैसला उस भ्रम को तोड़ता है। यह आदेश प्रदेश के उन सभी अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो मंथली या कमीशन के नाम पर जमीनी स्तर के ऑपरेटरों का शोषण करते हैं। टीकमगढ़ जैसे जिलों में जहां प्रशासनिक पकड़ अक्सर ढीली होती है, वहां यह फैसला लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू के हाथ मजबूत करेगा।
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