उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से एक बड़ी खबर आ रही है। जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मां की मृत्यु के बाद पिता ही बच्चे का प्राकृतिक और कानूनी अभिभावक होता है और बिना किसी ठोस कारण के उसे बच्चे की देखरेख से दूर नहीं किया जा सकता।अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे को उसके पिता से अलग रखने से उसके भावनात्मक संबंधों और मानसिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
जानिए पूरी जानकारी ?
यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने मऊ निवासी विपिन पाण्डेय की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मामले में 13 माह के बच्चे की अभिरक्षा को लेकर विवाद था। याची विपिन पाण्डेय ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर अपने बच्चे की कस्टडी मांगी थी। याचिका में बताया गया कि 10 फरवरी 2025 को बच्चे की मां का निधन हो गया, जिसके बाद से बच्चे का पालन-पोषण उसकी मौसी और मौसा कर रहे थे। विपिन पाण्डेय ने अदालत को बताया कि वह अपने बच्चे की पूरी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं और उसे अपने पास रखना चाहते हैं।
कोर्ट ने सभी पक्षों
हालांकि, प्रतिवादी पक्ष की ओर से याचिका का विरोध किया गया और बच्चे को मौसी-मौसा के पास ही रखने की दलील दी गई। लेकिन कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि पिता को बच्चे की अभिरक्षा से वंचित करने के लिए कोई ठोस और पर्याप्त कारण प्रस्तुत नहीं किया गया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बच्चे के समुचित पालन-पोषण, मानसिक संतुलन और भावनात्मक विकास के लिए उसके प्राकृतिक अभिभावक यानी पिता के साथ रहना अधिक उचित है। साथ ही यह भी कहा कि पिता से बच्चे को अलग रखना उसके अधिकारों के विपरीत होगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बच्चे को उसके पिता विपिन पाण्डेय को सौंपने का निर्देश दिया। यह फैसला अभिभावकता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें बच्चे के सर्वोत्तम हित को सर्वोपरि रखा गया है।
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