पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त है और किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, भले ही दोनों में से एक साथी पहले से विवाहित ही क्यों न हो।
अदालत ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता पर खतरे की वास्तविक आशंका हो तो संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व है कि वे मामले का मूल्यांकन कर आवश्यक कार्रवाई करें।
यह टिप्पणी जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की एकल पीठ ने एक जोड़े द्वारा दायर याचिका का निपटारा करते हुए की। याचिका में निजी प्रतिवादियों से कथित धमकियों का आरोप लगाते हुए सुरक्षा की मांग की गई थी। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और स्वतंत्रता का संरक्षण किसी व्यक्ति की सामाजिक या वैवाहिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है।
मामले में याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दोनों बालिग हैं और अपनी इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। हालांकि महिला याचिकाकर्ता पहले से विवाहित है और उसकी पूर्व विवाह से तीन संतानें भी हैं, लेकिन इसके बावजूद दोनों साथ रह रहे हैं। उनका कहना था कि उनके इस रिश्ते का कुछ लोग विरोध कर रहे हैं और उनसे उन्हें नुकसान पहुंचाए जाने का खतरा है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को यह भी बताया कि उन्होंने पांच मार्च 2026 को हांसी के पुलिस अधीक्षक को एक लिखित आवेदन देकर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि पुलिस को उनके आवेदन पर विचार कर आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए जाएं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि हाई कोर्ट पहले भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले वयस्कों को कानून के तहत सुरक्षा मिल सकती है, अगर उनके जीवन या स्वतंत्रता को खतरा हो। उन्होंने अदालत से कहा कि अगर पुलिस को उनके आवेदन पर विचार कर खतरे की आशंका का आकलन करने का निर्देश दे दिया जाए तो वे संतुष्ट होंगे।
मामले के तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने हांसी के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं द्वारा पांच मार्च को दिए गए अभ्यावेदन की जांच करें। साथ ही यह भी आकलन करें कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को किसी प्रकार का वास्तविक खतरा है या नहीं। अदालत ने कहा कि यदि जांच के बाद खतरे की आशंका पाई जाती है तो पुलिस कानून के अनुसार आवश्यक और उचित कार्रवाई करे।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को यह भी बताया कि उन्होंने पांच मार्च 2026 को हांसी के पुलिस अधीक्षक को एक लिखित आवेदन देकर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि पुलिस को उनके आवेदन पर विचार कर आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए जाएं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी दलील दी गई कि हाई कोर्ट पहले भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले वयस्कों को कानून के तहत सुरक्षा मिल सकती है, अगर उनके जीवन या स्वतंत्रता को खतरा हो। उन्होंने अदालत से कहा कि अगर पुलिस को उनके आवेदन पर विचार कर खतरे की आशंका का आकलन करने का निर्देश दे दिया जाए तो वे संतुष्ट होंगे।
मामले के तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने हांसी के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं द्वारा पांच मार्च को दिए गए अभ्यावेदन की जांच करें। साथ ही यह भी आकलन करें कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को किसी प्रकार का वास्तविक खतरा है या नहीं। अदालत ने कहा कि यदि जांच के बाद खतरे की आशंका पाई जाती है तो पुलिस कानून के अनुसार आवश्यक और उचित कार्रवाई करे।
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