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हाई कोर्ट ने ठुकराई पिता की मांग, कहा- 'लीगल शादी से जन्मे बच्चे का नहीं होगा डीएनए टेस्ट'


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22 Apr 2026
Categories: Hindi News

हाई कोर्ट ने पति की नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच की मांग को निरस्त करने से संबंधित पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे निर्देश सामान्य रूप से नहीं दिए जा सकते और कानून वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता, गरिमा और गोपनीयता की कड़ी सुरक्षा करता है।

अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में डीएनए जांच की अनुमति देना धारा-112 के तहत सुरक्षा को कमजोर करेगा और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत संरक्षित नाबालिग बच्चे की गोपनीयता और गरिमा में अनुचित हस्तक्षेप होगा।

वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने अपील को निरस्त करते हुए कहा कि अपीलकर्ता डीएनए परीक्षण की मांग के लिए आवश्यक कानूनी आधार स्थापित करने में विफल रहा। यह अपील नैनीताल के निवासी की ओर से 16 दिसंबर, 2025 को पारिवारिक न्यायालय, नैनीताल के न्यायाधीश की ओर से पारित आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।

वैवाहिक दुराचार का आरोप

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-13 के तहत वैवाहिक कार्रवाई में पति ने पत्नी के विरुद्ध व्यभिचार सहित वैवाहिक दुराचार का आरोप लगाया। पति ने व्यभिचार के आरोप का समर्थन करने के लिए नाबालिग बच्चे की डीएनए जांच की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया।

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पारिवारिक न्यायालय ने आवेदन के उद्देश्य को गलत समझा। यह कहा गया कि पति बच्चे की पितृत्व पर कोई घोषणा नहीं चाहता था और न ही बच्चे की कानूनी स्थिति को बाधित करने का इरादा रखता था।

अनुरोध केवल व्यभिचार की दलील को पुष्ट करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य प्राप्त करने तक सीमित था, विशेष रूप से ऐसी स्थिति में जहां प्रत्यक्ष साक्ष्य शायद ही उपलब्ध होता है। हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-112 के तहत कानूनी स्थिति निर्णायक बनी हुई है।

पीठ ने कहा कि यह प्रविधान वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता के लिए एक निर्णायक अनुमान बनाता है और इस अनुमान को केवल प्रासंगिक समय पर पति-पत्नी के बीच गैर-प्रवेश को साबित करके ही हटाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि वैधता को खारिज करने के लिए गैर-प्रवेश स्थापित करने का बोझ उस व्यक्ति पर भारी पड़ता है, जो इसे चुनौती देना चाहता है।

खंडपीठ ने पाया कि अपीलकर्ता ने न तो विशेष रूप से गैर-प्रवेश का दावा किया और न ही प्रासंगिक अवधि के दौरान इसे स्थापित करने का प्रयास किया। ऐसी आधारभूत याचिका और सामग्री की अनुपस्थिति में, वैधानिक अनुमान बरकरार रहा। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में डीएनए जांच की अनुमति देना धारा 112 के तहत सुरक्षा को कमजोर करेगा और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत संरक्षित नाबालिग बच्चे की गोपनीयता और गरिमा में अनुचित हस्तक्षेप होगा।

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