हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से दायर एक अपील को अत्यधिक लापरवाही करार देते हुए खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि विभाग अपनी सुस्ती को छिपाने के लिए प्रशासनिक देरी का सहारा नहीं ले सकते। यह मामला एक ठेकेदार के बकाया बिलों से जुड़ा है, जिसका काम 2013 में ही पूरा हो चुका था। जनवरी 2024 में आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) ने ठेकेदार के पक्ष में लगभग 66.35 लाख का अवार्ड पारित किया था। राज्य सरकार ने इसके खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसे एकल जज ने पहले ही 23 दिन की देरी के कारण खारिज कर दिया था। एकल जज के उस फैसले को चुनौती देने के लिए सरकार ने फिर से करीब 323 दिनों की देरी के बाद अपील याचिका दायर की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार के उस तर्क को सिरे से नकार दिया, जिसमें विभाग का कहना था कि उन्हें एडवोकेट जनरल कार्यालय से फैसले की सूचना नहीं मिली थी। इस पर अदालत ने कहा कि यह विभाग का कर्तव्य है कि वह अपने केस की स्थिति जानने के लिए वकीलों के संपर्क में रहे, न कि वकील का कि वह विभाग को ढूंढता फिरे।अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जुलाई 2025 में मामले की जानकारी होने के बावजूद, सरकार ने सर्टिफाइड कॉपी लेने के लिए सितंबर तक का समय लगा दिया।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि देरी को माफ करना एक अपवाद है, अधिकार नहीं। अदालत ने टिप्पणी की कि एक ठेकेदार, जो 2013 से अपने कानूनी बकाया के लिए लड़ रहा है, उसे और इंतजार कराना न्याय का मजाक होगा।कोर्ट ने देरी को माफ करने के आवेदन के साथ-साथ मुख्य अपील को भी खारिज कर दिया, जिससे अब सरकार को संबंधित राशि का भुगतान करना होगा। एफआईआर दर्ज है और तीन लोगों को अगवा कर ले जा रहे हैं। वहीं 20 फरवरी की एफआईआर है और इसमें नाै लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और उनके पुलिस रिमांड आ चुके हैं। आज सुबह तीन लोगों को गिरफ्तार कर लाया जा रहा था लेकिन हिमाचल पुलिस ने कोर्ट में फंसा कर रखा।
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