सुप्रीम कोर्ट ने एक संवेदनशील मामले में लंबे समय तक चले लिव-इन रिलेशनशिप को आपराधिक शोषण के मामले में बदलने पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस बी वी नागरत्ना की अगुवाई वाली खंडपीठ ने कहा कि जब दोनों पक्ष 15 साल तक आपसी सहमति से साथ रहे और उनके रिश्ते से एक बच्चा भी हुआ, तो संबंध टूटने पर शादी के झूठे वादे का आरोप लगाकर आपराधिक मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है? कोर्ट ने महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखने का संकेत दिया, जिसमें आरोपी पुरुष के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था।
जस्टिस नागरत्ना ने साफ कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में शादीशुदा जीवन जैसी कानूनी सुरक्षा या बाध्यता नहीं होती। ऐसे रिश्तों के अपने जोखिम होते हैं और एक पक्ष द्वारा रिश्ता खत्म करने को आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता। अब इस मामले की अगली सुनवाई 25 मई को होगी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सहमति वाले रिश्ते को अपराध कैसे बनाएं?
सुनवाई के दौरान महिला के वकील ने तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल कम उम्र में विधवा हो गई थीं। आरोपी ने उनकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाते हुए शादी का वादा किया और यह छिपाया कि वह पहले से ही विवाहित है। इसी भरोसे महिला 15 साल तक उसके साथ रही और उनके रिश्ते से 7 साल का बच्चा हुआ। लेकिन जब आरोपी ने रिश्ता तोड़ा तो महिला ने भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज कराया।
लंबे समय तक बिना शादी के साथ क्यों रही?
जस्टिस बी वी नागरत्ना ने सख्त लहजे में पूछा, “जब संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से 15 साल तक चले, बच्चा भी हुआ, तो अब शोषण का आरोप कैसे बनता है?” कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि महिला इतने लंबे समय तक बिना शादी के साथ क्यों रही? अगर शादी हो जाती तो उसे भरण-पोषण और अन्य कानूनी अधिकार मिलते, लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप में ऐसा कोई स्थायी बंधन नहीं होता।
लिव-इन रिलेशनशिप के कानूनी जोखिम
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार जोर दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप शादी के समान कानूनी सुरक्षा नहीं देती। दोनों वयस्क पक्ष अपनी मर्जी से रिश्ता शुरू करते हैं और किसी भी समय इसे समाप्त कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि रिश्ता खत्म होना अपने आप में कोई आपराधिक अपराध नहीं है। यह रिश्ते का स्वाभाविक जोखिम है। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि अगर महिला शादीशुदा होती तो पति के अलग होने पर उसे मेंटेनेंस का अधिकार, द्विविवाह का केस आदि विकल्प उपलब्ध होते। लेकिन लिव-इन में ऐसे मजबूत कानूनी हक नहीं होते। कोर्ट ने महिला की स्थिति पर सहानुभूति जताते हुए भी कहा कि लंबे समय तक चली सहमति को अब आपराधिक शोषण में नहीं बदला जा सकता।
बच्चे के हित को प्राथमिकता
पीठ ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता (मेडिएशन) का सुझाव दिया ताकि कम से कम बच्चे के भरण-पोषण और भविष्य को लेकर कोई सकारात्मक समाधान निकाला जा सके। कोर्ट ने संकेत दिया कि आपराधिक मुकदमे की बजाय सिविल उपाय ज्यादा बेहतर और व्यावहारिक हो सकते हैं। मामले को 25 मई को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। इस दौरान कोर्ट देखेगा कि दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता संभव है या नहीं।
लिव-इन रिलेशनशिप वैध, यह शादी का पूरा विकल्प नहीं
यह मामला आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में लिव-इन रिलेशनशिप की बढ़ती स्वीकार्यता और उससे जुड़ी कानूनी अनिश्चितताओं को सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी लिव-इन को वैध माना है, लेकिन स्पष्ट किया है कि यह शादी का पूरा विकल्प नहीं है। लंबे समय तक सहमति से साथ रहना बाद में झूठे वादे का आरोप लगाने को कमजोर बनाता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अदालतों को बच्चे के कल्याण को सबसे ऊपर रखना चाहिए।
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