Monday, 18, May, 2026
 
 
 
Expand O P Jindal Global University
 
  
  
 
 
 

Manish Kanwar vs The State Of Chhattisgarh
2026 Latest Caselaw 1215 Chatt

Citation : 2026 Latest Caselaw 1215 Chatt
Judgement Date : 2 April, 2026

[Cites 4, Cited by 0]

Chattisgarh High Court

Manish Kanwar vs The State Of Chhattisgarh on 2 April, 2026

                                                           1 / 17
                                        {Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}




                                                                                    2026:CGHC:15363

                                                                                               अप्रतिवेद्य


                                             छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर

                                           निर्णय सुरक्षित दिनांक-25/03/2026

                                           निर्णय उद्घोषित दिनांक-02/04/2026

                                            दाण्डिक अपील क्रमांक-1049/2025


                         मनीष कं वर पिता-परमानंद कं वर, उम्र-लगभग 21 वर्ष, निवासी-ग्राम खम्हरिया,

                          आवासपारा, पुलिस थाना-सीपत, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़

                                                                               -----अपीलार्थी/अभियुक्त


                                                            विरूद्घ


                         छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा जिला दण्डाधिकारी, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़

                                                                                  -----उत्तरवादी/राज्य


                                                             एवं

                                            दाण्डिक अपील क्रमांक-1199/2025


                         खिलेश कं वर उर्फ छोटू पिता-परमानंद कं वर, उम्र-लगभग 19 वर्ष, निवासी-ग्राम

                          खम्हरिया, आवासपारा, पुलिस थाना-सीपत, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़,

                                                                               -----अपीलार्थी/अभियुक्त


                                                            विरूद्घ


                         छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा जिला दण्डाधिकारी, जिला-बिलासपुर, छत्तीसगढ़

                                                                                  -----उत्तरवादी/राज्य


         Digitally
         signed by
         POMAN
POMAN    DEWANGAN
DEWANGAN Date:
         2026.04.02
         16:50:34
         +0530
                                            2 / 17
                         {Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}



अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण द्वारा       : श्री प्रवीण सोनी, अधिवक्ता ।

उत्तरवादी/राज्य द्वारा              : श्री अमन ताम्रकार, पैनल अधिवक्ता ।



                             न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल

                                    !! सी.ए.वी. निर्णय !!


1.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा-415 (2) के तहत प्रस्तुत इस दाण्डिक

अपील में विचारण न्यायालय-दशम अपर सत्र न्यायाधीश, बिलासपुर, जिला-बिलासपुर,

(छत्तीसगढ़) द्वारा सत्र प्रकरण क्रमांक 101/2022 "छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध खिलेश कं वर

उर्फ छोटू एवं एक अन्य" में पारित निर्णय दिनांक 23/05/2025 को चुनौती दी गई

है । जिसके तहत अपीलार्थीगण को निम्नानुसार दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है ।

जिसे आगे संक्षेप में "प्रश्नाधीन निर्णय" से संबोधित किया जा रहा हैः-

         अपीलार्थी का नाम           दोषसिद्धि                            दण्डादेश



                                                      07    वर्ष    का    सश्रम     कारावास एवं
                                                      10,000/-रूपये का अर्थदण्ड तथा
         खिलेश कं वर उर्फ    धारा-307        भारतीय
                                                      अर्थदण्ड राशि अदा न करने की दशा में
               छोटू          दण्ड संहिता, 1860
                                                      06 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास
                                                      की सजा ।



                                                      07    वर्ष    का    सश्रम     कारावास एवं
                             धारा-307/34              10,000/-रूपये का अर्थदण्ड तथा
             मनीष कं वर      भारतीय दण्ड संहिता, अर्थदण्ड राशि अदा न करने की दशा में
                             1860                     06 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास
                                                      की सजा ।

                    {Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}



2. अभियोजन मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि आहत/प्रार्थी सत्यनारायण सोनझरी

(अ.सा.-2) की पत्नी सुनीता बाई सोनझरी (अ.सा.-4) है । सुनीता बाई की बहन

धनकु मारी कं वर (अ.सा.-5) है तथा धनकु मारी कं वर के पति लव कु मार सोनझरी

(अ.सा.-10) हैं । इस प्रकार आहत सत्यनारायण (अ.सा.-2) एवं लव कु मार (अ.सा.-

10) आपस में साढ़ू भाई हैं । घटना, दिनांक 17/12/2021 को शाम लगभग 06:30

बजे की है । आहत सत्यनारायण, जो ग्राम खम्हरिया का निवासी है, पूजन सामग्री विक्रय

का कार्य करता है । ग्राम खम्हरिया में राउत बाजार लगता है, जहाँ घटना के दिन वह

अपनी दुकान लगाकर बैठा था । उसी समय उसका साढ़ू भाई लव कु मार (अ.सा.-10)

अपनी पत्नी धनकु मारी कं वर (अ.सा.-5) के साथ बाजार घूमने आया था । राउत बाजार

में झूले के पास लव कु मार का अपीलार्थीगण से विवाद हो गया, जिसे आहत सत्यनारायण

ने समझाइश देकर शांत करा दिया और वह पुनः अपनी दुकान पर आकर बैठ गया ।

तत्पश्चात् शाम लगभग 06:30 बजे, जब सुनीता बाई सोनझरी (अ.सा.-4), लव कु मार

(अ.सा.-10) एवं धनकु मारी कं वर (अ.सा.-5) वहाँ उपस्थित थे, उसी समय

अपीलार्थीगण पुनः आए । अपीलार्थी मनीष ने प्रार्थी सत्यनारायण को माँ-बहन की गाली

देते हुए आरोप लगाया कि उसी ने उसे मारा था और एक थप्पड़ प्रार्थी सत्यनारायण को

मारा । इसी दौरान अपीलार्थी खिलेश कं वर उर्फ छोटू ने चाकू से सत्यनारायण के पेट में

वार किया, जिससे उसे गंभीर चोट आई और रक्तस्राव होने लगा । तत्पश्चात् उसे एंबुलेंस

के माध्यम से उपचार हेतु स्वास्तिक अस्पताल भेजा गया । उसी दिन रात्रि लगभग 11:45

बजे पुलिस द्वारा सत्यनारायण की सूचना पर देहाती नालसी (प्रदर्श पी-5) तैयार कर

थाना सीपत में अपराध क्रमांक 615/2021 का प्रथम सूचना पत्र (प्रदर्श पी-18) पंजीबद्ध

किया गया । आहत का चिकित्सीय परीक्षण एवं उपचार कराया गया । विवेचना के दौरान

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

बेड-हेड टिकट जब्त किया गया, घटनास्थल का नक्शा तैयार किया गया तथा साक्षियों के

कथन लिए गए । अपीलार्थी खिलेश के मेमोरण्डम कथन के आधार पर उससे घटना में

प्रयुक्त कथित चाकू की जब्ती की गई । तत्पश्चात् अपीलार्थीगण को गिरफ्तार कर संपूर्ण

विवेचना उपरांत अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया ।

3. विचारण के दौरान आरोप के प्रमाणन हेतु अभियोजन की ओर से अपने पक्ष के समर्थन में

कु ल 11 साक्षियों का परीक्षण कराया गया तथा 22 दस्तावेज प्रदर्शित चिन्हांकित कराए

गए । धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कथन में अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण ने

अपने विपरीत आए साक्षियों के कथनों को इंकार करते हुए कहा है कि वे मौके पर उपस्थित

ही नहीं थे । प्रार्थी सत्यनारायण और उसकी पत्नी द्वारा मिलकर उन्हें झूठा फं साया गया

है । बचाव साक्षी के रूप में अख्तर मोहम्मद (ब.सा.-1) और रंजीत सिंह (ब.सा.-2) का

परीक्षण कराया है जो मौके पर नहीं थे किं तु उन्होंने कहा है कि अपीलार्थीगण कथित घटना

के समय रायगढ़ आए हुए थे और मौके पर नहीं थे । उभयपक्ष काे सुना जाकर विचारण

न्यायालय द्वारा अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण को इस निर्णय की कण्डिका-1 के अनुसार

दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है । जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।

4. अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रार्थी सत्यनारायण के कथन

में गंभीर विरोधाभास हैं । परीक्षित सभी साक्षी, जिन्हें चश्मदीद साक्षी बताया गया है, प्रार्थी

सत्यनारायण के निकट संबंधी हैं, जिससे उनकी साक्ष्य की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती

है । यह भी तर्क प्रस्तुत किया कि अपीलार्थी खिलेश से कथित चाकू की जब्ती संदेह से परे

प्रमाणित नहीं हुई है । अभियोजन किसी स्वतंत्र साक्षी का परीक्षण कराने में असफल रहा

है । चिकित्सक ने यह अभिमत व्यक्त किया है कि प्रार्थी सत्यनारायण की चोटें ज़मीन पर

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

पड़े किसी धारदार लोहे के उपकरण पर गिरने से भी कारित हो सकती हैं । विद्वान

अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के अंतर्गत सामान्य

आशय के गठन हेतु "एकमत (meeting of minds)" का होना आवश्यक है, जिसे

अभियोजन प्रमाणित करने में असफल रहा है । यदि अपीलार्थी खिलेश द्वारा कोई कृ त्य

किया भी गया हो, तो उसमें अपीलार्थी मनीष का कोई सामान्य आशय विद्यमान था, यह

अभियोजन प्रमाणित नहीं कर सका है । अतः अपीलार्थी मनीष के विरुद्ध सामान्य आशय

के आधार पर अपराध में सहभागिता प्रमाणित नहीं होती है । विद्वान अधिवक्ता ने अपने

तर्क के समर्थन में Constable 907 Surendra Singh & Another v. State of

Uttarakhand, (2025) 5 SCC 433 के निर्णय का हवाला दिया है । जहाँ तक

अपीलार्थी खिलेश का संबंध है, उसके विरुद्ध भी अपराध संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुआ

है । तथापि, वैकल्पिक रूप से यह निवेदन किया गया है कि उसकी अभिरक्षा अवधि

लगभग 11 माह 10 दिन हो चुकी है । उपचार के दौरान उसने प्रार्थी सत्यनारायण को

लगभग ₹65,000 से ₹85,000 तक का आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया है ।

अपीलार्थी खिलेश की वर्तमान आयु लगभग 19 वर्ष है, उसका कोई पूर्व आपराधिक

इतिहास नहीं है तथा उस पर पारिवारिक दायित्व भी हैं । अतः निवेदन किया है कि यदि

उसे दोषी ठहराया भी जाता है, तो उसे प्रदत्त 07 वर्ष के कारावासी दण्ड को उसकी अब

तक की अभिरक्षा अवधि तक सीमित किया जाए ।

5. राज्य/उत्तरवादी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रार्थी सत्यनारायण द्वारा वर्णित घटना

के अनुसार, प्रारंभिक विवाद के कारण अपीलार्थीगण, जो आपस में सगे भाई हैं, रंजिशवश

एवं एकमत होकर पुनः प्रार्थी की दुकान पर आए थे । वहाँ अपीलार्थी मनीष ने पहले

सत्यनारायण को गाली-गलौज करते हुए थप्पड़ मारा तथा उसी दौरान अपीलार्थी खिलेश

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

ने उसके पेट में चाकू से वार किया । उक्त समस्त तथ्य एवं परिस्थितियाँ इस बात को स्पष्ट

करती हैं कि अपीलार्थीगण सामान्य आशय के साथ घटनास्थल पर आए थे और उसी

आशय की पूर्ति में पहले अपीलार्थी मनीष द्वारा मारपीट की शुरुआत की गई, तत्पश्चात

अपीलार्थी खिलेश द्वारा चाकू से वार किया गया । चश्मदीद साक्षियों का रिश्तेदार होना,

प्रकरण की परिस्थितियों में स्वाभाविक है और मात्र इस आधार पर उनके कथनों को

अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता । प्रार्थी सत्यनारायण ने अभियोजन के कथन का पूर्ण

समर्थन किया है, जो चिकित्सीय एवं अन्य साक्ष्य से भी पुष्ट है । इसके अतिरिक्त,

अपीलार्थी खिलेश से घटना में प्रयुक्त चाकू की विधिवत जब्ती की गई है । अतः विचारण

न्यायालय द्वारा अपीलार्थीगण को दोषसिद्ध कर पारित किया गया दण्डादेश विधिसम्मत एवं

न्यायोचित है, जिसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप अथवा परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है ।

अपीलार्थी पक्ष के तर्क स्वीकार योग्य नहीं हैं । अतएव, अपील खारिज की जाए ।

6. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।

7. प्रार्थी सत्यनारायण (अ.सा.-2) ने अभियोजन मामले की पुष्टि करते हुए अपने न्यायालयीन

साक्ष्य में कहा है कि घटना दिनांक 17/12/2021 को, जब वह ग्राम खम्हरिया के राउत

बाजार में अपनी दुकान लगाकर बैठा था, तब उसका साढ़ू भाई लव कु मार वहाँ घूमने आया

था, जहाँ अपीलार्थीगण का उससे विवाद हो गया । उसने समझाइश देकर उक्त विवाद को

शांत कराया, जिसके पश्चात अपीलार्थीगण वहाँ से चले गए । कु छ समय बाद

अपीलार्थीगण अन्य व्यक्तियों के साथ पुनः उसकी दुकान पर आए, जहाँ अपीलार्थी मनीष ने

उसे माँ-बहन की गाली देते हुए एक थप्पड़ मारा । तत्पश्चात अपीलार्थी खिलेश ने चाकू से

उसके पेट में वार किया, जिससे उसे चोट आई और रक्तस्राव होने लगा । इसके बाद उसे

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

एंबुलेंस के माध्यम से उपचार हेतु अस्पताल ले जाया गया । प्रतिपरीक्षण में प्रार्थी ने यह

कहा है कि अपीलार्थीगण से उसकी कोई पूर्व शत्रुता नहीं थी । उसके उक्त कथन का

समर्थन मौके पर उपस्थित उसकी पत्नी सुनीता बाई सोनझरी (अ.सा.-4), साढ़ू भाई लव

कु मार (अ.सा.-10) तथा धनकु मारी कं वर (अ.सा.-5) ने भी अपने न्यायालयीन साक्ष्य में

किया है जिसका खण्डन नहीं हुआ है ।

8. चिकित्सक अभिषेक मिश्रा (अ.सा.-7) ने अपने न्यायालयीन साक्ष्य में बताया है कि वह

स्वास्तिक अस्पताल का संचालक है, जहाँ दिनांक 17/12/2021 को शाम लगभग

07:37 बजे आहत सत्यनारायण को उपचार हेतु लाया गया था । उसके पेट में चाकू से

चोट लगी थी तथा दर्द के कारण पेट में कड़ापन पाया गया । दायीं पसली से लगभग 4

से.मी. नीचे घाव विद्यमान था । उसने आहत को भर्ती कर उपचार प्रारंभ किया तथा सिटी

स्कै न कराने की सलाह दी । रिपोर्ट प्राप्त होने पर यह पाया कि पेट के अमाशय/पाइलोरस

(stomach pylorus) में फटने के लक्षण थे तथा पेट में वायु एवं रक्त उपस्थित था ।

स्थिति की गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए ऑपरेशन एवं उपचार की सलाह दी गई ।

चिकित्सक ने यह भी बताया कि आं तरिक रूप से रक्त के थक्के (clots) पाए गए थे ।

उन्होंने इस संबंध में प्रतिवेदन (प्रदर्श पी-16) प्रस्तुत किया तथा स्पष्ट किया कि आहत

को लगी चोटें गंभीर प्रकृ ति की थीं ।

9. ओंकार अस्पताल के चिकित्सक आकाश मिश्रा (अ.सा.-3) ने अपने न्यायालयीन साक्ष्य

में बताया है कि दिनांक 18/12/2021 को आहत सत्यनारायण को उपचार हेतु अस्पताल

लाया गया था । परीक्षण करने पर पाया गया कि उसके पेट में धारदार हथियार से चोट

लगी थी, जिससे आं त फट चुकी थी तथा पेट में रक्त का जमाव था । स्थिति की गंभीरता

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

को देखते हुए उसका तत्काल ऑपरेशन किया गया । उपचार उपरांत दिनांक 24/12/

2021 को उसे अस्पताल से छु ट्टी (डिस्चार्ज) दे दी गई ।

10. इस प्रकार, उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि आहत सत्यनारायण को पेट में

धारदार हथियार, अर्थात् चाकू से गंभीर चोट पहुंचाई गई थी । अभियोजन प्रकरण में

अपीलार्थी खिलेश के प्रकटीकरण कथन के आधार पर घटना में प्रयुक्त चाकू की विधिवत

जब्ती की गई है । उक्त चाकू का परीक्षण कर चिकित्सक अभिषेक मिश्रा (अ.सा.-7) द्वारा

प्रतिवेदन (प्रदर्श पी-17) को पुष्ट कर बताया है कि आहत सत्यनारायण को कारित चोटें

उक्त चाकू से हो सकती हैं । समस्त साक्ष्य के परीक्षण से यह तथ्य स्पष्ट रूप से स्थापित

होता है कि अपीलार्थी खिलेश ने चाकू से सत्यनारायण के पेट में वार कर उसे गंभीर

उपहति कारित की, जिससे उसकी आं तें फट गईं । इन परिस्थितियों के आधार पर यह

प्रमाणित होता है कि अपीलार्थी खिलेश द्वारा किया गया कृ त्य हत्या के प्रयास के अपराध

की श्रेणी में आता है ।

11. जहाँ तक, अपीलार्थी मनीष का मुख्य अभियुक्त खिलेश के साथ सामान्य आशय निर्मित

होने का प्रश्न है । इस संदर्भ में अपीलार्थी पक्ष द्वारा न्यायदृष्टांत कॉन्स्टेबल 907 सुरेन्द्र

सिंह एवं अन्य (पूर्वोक्त) के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कण्डिका-30 में

निम्नानुसार विधि सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है--

"30. By now it is a settled principle of law that for convicting the accused with the aid of Section 34IPC the prosecution must establish prior meetings of minds. It must be established that all the accused had pre- planned and shared a common intention to commit the crime with the accused who has actually committed the

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

crime. It must be established that the criminal act has been done in furtherance of the common intention of all the accused. Reliance in support of the aforesaid proposition could be placed on the following judgments of this Court in the cases of:

(i) Ezajhussain Sabdarhussain v. State of Gujarat, (2019) 14 SCC 339;

             (ii)    Jasdeep Singh v. State of Punjab, (2022) 2 SCC
                     545;
             (iii)   Gadadhar Chandra v. State of W.B., (2022) 6
                     SCC 576; and
             (iv)    Madhusudan v. State of M.P., (2024) 15 SCC
                     757."

12. उपरोक्त के अलावा 'सामान्य आशय' के विषय में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा

समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण अभिमत दिया गया है । जिनका उल्लेख यहां किया जाना

आवश्यक व उचित होगा ।

13. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मोहन सिंह बनाम पंजाब राज्य, AIR 1963 SC 174 में

यह प्रतिपादित किया गया है कि सामान्य आशय का तात्पर्य सामूहिक रूप से किया गया

कार्य तथा पूर्व में मतों का मिलन है, और कृ त्य भिन्न-भिन्न एवं स्वरूप में अलग-अलग हो

सकते हैं, किन्तु वे सभी एक ही सामान्य आशय से प्रेरित होते हैं । उक्त निर्णय की

कण्डिका-13 निम्नानुसार है--

"13. That inevitably takes us to the question as to whether the appellants can be convicted under Section 302/34. Like Section 149, Section 34 also deals with cases of constructive criminal liability. It provides that where a criminal act is done by several persons in furtherance of the common intention of all, each of such persons is

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

liable for that act in the same manner as if it were done by him alone. The essential constituent of the vicarious criminal liability prescribed by Section 34 is the existence of common intention. If the common intention in question animates the accused persons and if the said common intention leads to the commission of the criminal offence charged, each of the persons sharing the common intention is constructively liable for the criminal act done by one of them. Just as the combination of persons sharing the same common object is one of the features of an unlawful assembly, so the existence of a combination of persons sharing the same common intention is one of the features of Section

34. In some ways the two sections are similar and in some cases they may overlap. But, nevertheless, the common intention which is the basis of Section 34 is different from the common object which is the basis of the composition of an unlawful assembly. Common intention denotes action-in-concert and necessarily postulates the existence of a prearranged plan and that must mean a prior meeting of minds. It would be noticed that cases to which Section 34 can be applied disclose an element of participation in action on the part of all the accused persons. The acts may be different; may vary in their character, but they are all actuated by the same common intention. It is now well-settled that the common intention required by Section 34 is different from the same intention or similar intention. As has been observed by the Privy Council in Mahbub Shah v. King-Emperor4 common intention within the meaning of Section 34 implies a pre- arranged plan, and to convict the accused of an offence applying the section

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

it should be proved that the criminal act was done in concert pursuant to the pre-arranged plan and that the inference of common intention should never be reached unless it is a necessary inference deducible from the circumstances of the case."

14. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा शिवराम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1973) 3

SCC 110 में यह प्रतिपादित किया गया है कि पूर्व नियोजन (pre-concert) के रूप में

किसी स्पष्ट पूर्व योजना का सिद्ध किया जाना आवश्यक नहीं है; सामान्य आशय किसी

विशेष परिणाम को प्राप्त करने के लिए, प्रकरण के तथ्यों एवं परिस्थितियों के संदर्भ में,

अनेक व्यक्तियों के बीच घटना स्थल पर ही विकसित हो सकता है ।

15. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दुखमोचन पांडेय एवं अन्य बनाम बिहार राज्य, (1997)

8 SCC 405 में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के

अनुप्रयोग हेतु यह आवश्यक है कि साक्ष्य एवं प्रकरण की परिस्थितियाँ इस तथ्य को

स्थापित करें कि विभिन्न अभियुक्तों के मध्य मनों का मिलन (meeting of minds) एवं

विचारों का समन्वय (fusion of ideas) हुआ था ।

16. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सुरेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2001) 3 SCC 673

में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के आकर्षण हेतु दो

आवश्यक तत्व अनिवार्य हैं, अर्थात् अपराध किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं बल्कि एक से

अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो तथा ऐसे प्रत्येक व्यक्तिगत कृ त्य का समेकित परिणाम,

जो अपराध के घटित होने में परिणत हुआ हो, सभी व्यक्तियों के सामान्य आशय की पूर्ति में

किया गया हो; उक्त निर्णय की कण्डिका-23 निम्नानुसार हैः-

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

"23. Thus to attract Section 34 IPC two postulates are indispensable: (1) The criminal act (consisting of a series of acts) should have been done, not by one person, but more than one person. (2) Doing of every such individual act cumulatively resulting in the commission of criminal offence should have been in furtherance of the common intention of all such persons."

17. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दानी सिंह बनाम बिहार राज्य, 2005 SCC (Cri)

127 में यह प्रतिपादित किया गया है कि सामान्य आशय का निष्कर्ष प्रत्यक्ष साक्ष्य से

अथवा परिवेशी परिस्थितियों एवं पक्षकारों के आचरण से निकाला जा सकता है; अतः यह

कि कोई कृ त्य सामान्य आशय की पूर्ति में किया गया है, यह तथ्य का प्रश्न है, न कि विधि

का प्रश्न ।

18. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सनी कपूर बनाम संघ शासित क्षेत्र चंडीगढ़, (2006)

10 SCC 182 में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 के

आकर्षण हेतु दो तत्वों का स्थापित होना आवश्यक है--प्रथम, अपराध करने का सामान्य

आशय तथा द्वितीय, अपराध के क्रियान्वयन में सहभागिता; यदि ये दोनों तत्व सिद्ध हो

जाते हैं, तो सामान्य आशय साझा करने वाले प्रत्येक अभियुक्त के विरुद्ध पृथक रूप से

प्रत्यक्ष कृ त्य (overt act) का होना आवश्यक नहीं है ।

19. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सैयद यूसुफ हुसैन बनाम आं ध्र प्रदेश राज्य, (2013) 4

SCC 517 में यह प्रतिपादित किया गया है कि अपराध का कृ त्य एक से अधिक व्यक्तियों

द्वारा किया जाना आवश्यक है तथा अपराध के क्रियान्वयन में वे सभी व्यक्ति, कृ त्य या

उपेक्षा (commission या omission) के माध्यम से, समान आशय साझा करते हों;

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

प्रत्येक अभियुक्त द्वारा पृथक-पृथक कृ त्य किया जाना आवश्यक नहीं है ताकि उसे अंतिम

आपराधिक कृ त्य के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सके ।

20. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा विजेन्द्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2017) 11 SCC

129 में यह प्रतिपादित किया गया है कि यह सिद्धांत अपराध करने के सामान्य आशय के

साथ किसी कृ त्य में सहभागिता को समाहित करता है, और जैसे ही ऐसी सहभागिता

स्थापित हो जाती है, धारा 34 का प्रावधान तत्काल लागू हो जाता है ।

21. उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के प्रकाश में, प्रकरण में उपलब्ध तथ्य एवं साक्ष्य पर विचार करने पर

आहत सत्यनारायण के साढ़ू भाई लव कु मार (अ.सा.-10) के कथन से यह स्थापित होता

है कि मड़ई मेले में अपीलार्थीगण द्वारा उसकी पत्नी धनकु मारी (अ.सा.-5) के साथ

छेड़छाड़ की गई थी, जिसके कारण विवाद उत्पन्न हुआ था । उक्त विवाद को आहत

सत्यनारायण द्वारा समझाइश देकर शांत कराया गया था । किन्तु इसके कु छ समय पश्चात

ही दोनों अपीलार्थीगण पुनः प्रार्थी सत्यनारायण की दुकान पर आए, जहाँ उसकी पत्नी

सुनीता बाई (अ.सा.-4), साढ़ू भाई लव कु मार (अ.सा.-10) तथा धनकु मारी (अ.सा.-

5) उपस्थित थे । वहाँ अपीलार्थी मनीष ने पहले प्रार्थी सत्यनारायण को थप्पड़ मारा,

तत्पश्चात अपीलार्थी खिलेश ने उसके पेट में चाकू से वार किया । साक्षियों के कथनों से

यह तथ्य निर्विवाद रूप से प्रमाणित होता है कि पूर्व में हुए विवाद को लेकर दोनों

अपीलार्थीगण अन्य व्यक्तियों के साथ सत्यनारायण की दुकान पर आए थे । घटनाक्रम से

यह भी स्पष्ट होता है कि पहले अपीलार्थी मनीष द्वारा मारपीट की शुरुआत की गई और

उसके पश्चात अपीलार्थी खिलेश द्वारा चाकू से वार किया गया । ये समस्त परिस्थितियाँ

इस बात की ओर संके त करती हैं कि अपीलार्थीगण सामान्य आशय के साथ घटनास्थल

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

पर आए थे । यह भी परिलक्षित होता है कि अपीलार्थी मनीष द्वारा थप्पड़ मारकर उक्त

सामान्य आशय के क्रियान्वयन की शुरुआत की गई तथा उसके पश्चात अपीलार्थी खिलेश

द्वारा चाकू से वार कर उसे आगे बढ़ाया गया । इस प्रकार यह प्रमाणित होता है कि घटना

से पूर्व ही दोनों अपीलार्थीगण के मध्य प्रार्थी सत्यनारायण को उक्त चोट पहुँचाने का

सामान्य आशय विद्यमान था । अतः विचारण न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष निकालना कि

अपीलार्थी खिलेश द्वारा प्रार्थी सत्यनारायण को चाकू से मारकर हत्या का प्रयास किया गया

तथा उस कृ त्य में अपीलार्थी मनीष का भी सामान्य आशय था, विधिसम्मत एवं उचित

प्रतीत होता है । फलस्वरूप, अपीलार्थी खिलेश की धारा 307 भारतीय दण्ड संहिता के

अंतर्गत तथा अपीलार्थी मनीष की धारा 307/34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई

दोषसिद्धि में कोई अवैधता या अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती है । अतः उक्त दोषसिद्धि की

पुष्टि की जाती है ।

दण्डादेश

22. जहाँ तक दण्डादेश का प्रश्न है, इस संबंध में उल्लेखनीय है कि स्वयं प्रार्थी सत्यनारायण ने

अपने प्रतिपरीक्षण की कण्डिका-7 में यह स्वीकार किया है कि उपचार के दौरान

अपीलार्थीगण द्वारा उसे लगभग ₹65,000 से ₹85,000 तक की आर्थिक सहायता

प्रदान की गई थी । अपीलार्थी पक्ष का यह भी तर्क है कि दोनों अपीलार्थी दिनांक

18/12/2021 से 14/01/2022 तक, अर्थात् लगभग 28 दिनों तक कारावास में रहे

तथा विचारण न्यायालय के निर्णय दिनांक 23/05/2025 से अब तक निरंतर अभिरक्षा

में हैं । इस प्रकार उनकी कु ल अभिरक्षा अवधि लगभग 11 माह 12 दिन की हो चुकी है ।

यह भी अभिलेख पर है कि अपीलार्थियों का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है तथा

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

उन्होंने उपचार के दौरान प्रार्थी की सहायता भी की है । अतः इन समस्त परिस्थितियों को

दृष्टिगत रखते हुए यह निवेदन किया गया है कि कारावासीय दण्ड को उनकी अब तक की

अभिरक्षा अवधि तक सीमित किया जाए ।

23. राज्य पक्ष के विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपराध की गंभीरता को रेखांकित करते हुए यह तर्क

प्रस्तुत किया गया है कि विचारण न्यायालय द्वारा पारित दण्डादेश विधिसम्मत एवं

न्यायोचित है ।

24. जहाँ तक दण्ड के प्रश्न का संबंध है, मोहम्मद गियासुद्दीन बनाम आं ध्र प्रदेश राज्य,

(1977) 3 SCC 287 के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दण्ड निर्धारण के

संदर्भ में सुधारात्मक सिद्धांत को विशेष महत्व देते हुए George Bernard Shaw के

विचारों का उद्धरण किया है, जो इस प्रकार है--"यदि आप किसी व्यक्ति को

प्रतिशोधात्मक रूप से दण्डित करना चाहते हैं, तो आपको उसे आहत करना होगा; किन्तु

यदि आप उसे सुधारना चाहते हैं, तो आपको उसे बेहतर बनाना होगा, और मनुष्य चोट

पहुँचाने से बेहतर नहीं बनते ।"

25. अपीलार्थीगण के विरुद्ध कोई पूर्व आपराधिक इतिहास अभिलेख पर नहीं है । गिरफ्तारी

पत्रक प्रदर्श पी-10 एवं पी-11 के अनुसार अपीलार्थी खिलेश कक्षा 10वीं तक तथा

अपीलार्थी मनीष कक्षा 12वीं तक शिक्षित हैं एवं दोनों डी.जे. संचालित करने का व्यवसाय

करते हैं । अपीलार्थी खिलेश की आयु लगभग 19 वर्ष तथा अपीलार्थी मनीष की आयु

लगभग 21 वर्ष है । घटना वर्ष 2021 की है तथा अपीलार्थीगण पर पारिवारिक दायित्व भी

हैं । किन्तु, यह भी स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ है कि अपीलार्थीगण ने सामान्य आशय के

अग्रसरण में प्रार्थी सत्यनारायण को पेट में चाकू से वार कर गंभीर उपहति कारित की,

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

जिससे उसकी आं त फट गई और उसका शल्यक्रिया (ऑपरेशन) द्वारा उपचार करना

पड़ा । अतः अपराध की प्रकृ ति एवं उसकी गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए, साथ ही

उपर्युक्त समस्त परिस्थितियों पर विचार करते हुए, यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थीगण

को प्रदत्त कारावासी दण्ड में कु छ सीमा तक कमी किया जाना न्यायोचित होगा । जहाँ तक

अर्थदण्ड का संबंध है, यह भी दृष्टिगत है कि अपीलार्थीगण द्वारा उपचार के दौरान प्रार्थी

सत्यनारायण को आर्थिक सहयोग प्रदान किया गया था, अतः अर्थदण्ड में किसी प्रकार का

परिवर्तन किया जाना आवश्यक प्रतीत नहीं होता ।

26. अतः अपील आं शिक रूप से स्वीकार की जाती है । अपीलार्थीगण की दोषसिद्धि की पुष्टि

की जाती है । अपीलार्थीगण को धारा 307 भारतीय दण्ड संहिता / धारा 307 सहपठित

धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत प्रदत्त 07 वर्ष के सश्रम कारावास के दण्ड को

घटाकर 02 वर्ष 06 माह के सश्रम कारावास में परिवर्तित किया जाता है । अर्थदण्ड

यथावत रखा जाता है ।

27. अपीलार्थीगण द्वारा विचारण एवं अपील के दौरान व्यतीत की गई अभिरक्षा अवधि को उनके

उपर्युक्त कारावासी दण्ड (जो इस निर्णय द्वारा 02 वर्ष 06 माह किया गया है) में

समायोजित किया जाए ।

28. अपीलार्थीगण को वर्तमान में जेल में निरुद्ध बताया गया है । अतः उन्हें शेष कारावासी दण्ड

की अवधि भुगतायी जाये ।

29. अर्थदण्ड राशि जमा हो जाने पर बतौर प्रतिकर के आहत सत्यनारायण सोनझरी को प्रदान

की जावे ।

{Cr. A. No.-1049 of 2025 & 1199 of 2025}

30. निर्णय की प्रति के साथ विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख तथा निर्णय की

सत्यप्रतिलिपि संबंधित जेल अधीक्षक को आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ एवं पालनार्थ

शीघ्रतापूर्वक प्रेषित हो ।

सही/-

(संजय कु मार जायसवाल)

न्यायाधीश

पोमन

 
Download the LatestLaws.com Mobile App
 
 
Latestlaws Newsletter
 

Publish Your Article

 

Campus Ambassador

 

Media Partner

 

Campus Buzz

 

LatestLaws Guest Court Correspondent

LatestLaws Guest Court Correspondent Apply Now!
 

LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026

 

LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!

 
 

LatestLaws Partner Event : IJJ

 

LatestLaws Partner Event : MAIMS

 
 
Latestlaws Newsletter