इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पूर्व विधायकों एवं विधान परिषद सदस्यों को पेंशन, भत्ते तथा सेवानिवृत्ति उपरांत दी जाने वाली सुविधाओं की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति राजन राय एवं न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि संविधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक “सूक्ष्म संतुलन” की परिकल्पना करता है तथा विधायकों के वेतन, भत्तों और पेंशन का निर्धारण विधायिका के आंतरिक कार्यक्षेत्र का विषय है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि "ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप विधायी क्षेत्र में अतिक्रमण के समान होगा, जो तब तक स्वीकार्य नहीं है जब तक कोई स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन सिद्ध न हो जाए। न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका “दूसरी विधायिका” की भूमिका ग्रहण कर नीतिगत निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती।"

याचिकाकर्ता संस्था ‘लोक प्रहरी’ ने उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन, भत्ते एवं पेंशन) अधिनियम, 1980 की उन धाराओं को चुनौती दी थी, जिनके तहत वर्तमान एवं पूर्व विधायकों को पेंशन, यात्रा, चिकित्सा तथा अन्य सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 195 के अंतर्गत केवल वर्तमान सदस्यों के वेतन और भत्तों का ही प्रावधान है, न कि पूर्व विधायकों अथवा उनके परिवारों को आजीवन पेंशन और सुविधाएँ देने का।

वहीं राज्य सरकार ने दलील दी कि अनुच्छेद 195 तथा राज्य सूची की प्रविष्टि 38 के तहत विधानमंडल को ऐसे कानून बनाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। राज्य ने Lok Prahari v. Union of India तथा Common Cause v. Union of India जैसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों पर भी भरोसा किया।

खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक समीक्षा का दायरा केवल संवैधानिक वैधता की जांच तक सीमित है, न कि विधायी नीतियों की उपयुक्तता तय करने तक। अदालत ने पाया कि अधिनियम में न तो कोई प्रत्यक्ष संवैधानिक निषेध है और न ही कोई स्पष्ट मनमानी अथवा विधायी अक्षमता।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा:

“वर्तमान चुनौती मूलतः नीतिगत असहमति पर आधारित है, न कि किसी स्पष्ट संवैधानिक त्रुटि पर। संविधान की व्यवस्था विधायिका को अपने वर्तमान एवं पूर्व सदस्यों के लिए पेंशन, भत्ते एवं सामाजिक सुरक्षा संबंधी प्रावधान बनाने से नहीं रोकती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे विषय विधायिका की बुद्धिमत्ता और विवेक पर छोड़ दिए जाने चाहिए, जब तक कि कोई स्पष्ट संवैधानिक सीमा का उल्लंघन सिद्ध न हो।”

वाद विवरण:
मामला : जनहित याचिका संख्या 14796/2019
पीठ : न्यायमूर्ति राजन राय एवं न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी
पक्षकार : लोक प्रहरी, महासचिव एस.एन. शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य

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