पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई आवंटी प्लाट का आवंटन रद्द होने के बाद स्वयं रिफंड मांगता है और बिना किसी विरोध के पूरी राशि स्वीकार कर लेता है तो वह बाद में उसी प्लाट की बहाली या वैकल्पिक प्लाट का दावा नहीं कर सकता।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में आवंटी का दावा एस्टॉपल के सिद्धांत से बाधित हो जाता है।जस्टिस सुवीर सहगल और जस्टिस दीपक मनचंदा खंडपीठ ने पूजा परवांडा की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

याचिकाकर्ता ने एचएसवीपी द्वारा सेक्टर-5, पिंजौर में आवंटित आठ मरला के प्लाट की रद्द की गई अलाटमेंट बहाल करने की मांग की थी।मामले के अनुसार एचएसवीपी ने जनवरी 2023 में ई-नीलामी आयोजित की थी।

याचिकाकर्ता सबसे ऊंची बोलीदाता रहीं और उन्हें 1.32 करोड़ रुपये से अधिक की राशि में प्लाट आवंटित किया गया। पूरी रकम जमा करने के बाद जुलाई 2023 में आवंटन पत्र भी जारी कर दिया गया।याचिकाकर्ता का आरोप था कि उन्हें प्लाट का कब्जा नहीं दिया गया और फरवरी 2024 में बिना नोटिस के आवंटन रद्द कर जमा राशि वापस कर दी गई।

इसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।सुनवाई के दौरान एचएसवीपी ने अदालत को बताया कि 12 दिसंबर 2023 को याचिकाकर्ता ने स्वयं लिखित आवेदन देकर जमा राशि वापस करने का अनुरोध किया था। इसी अनुरोध के आधार पर पूरी राशि लौटा दी गई थी।

प्राधिकरण ने कहा कि रिफंड स्वीकार करने के बाद अब आवंटन बहाली की मांग करना कानूनन उचित नहीं है।हाई कोर्ट ने रिकार्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि याचिकाकर्ता ने न केवल रिफंड मांगा बल्कि उसे बिना किसी आपत्ति के स्वीकार भी किया।

अदालत ने कहा कि एक बार किसी अनुबंध के समाप्त होने के बाद उससे जुड़ी राशि को अंतिम निपटान के रूप में स्वीकार कर लेने पर उसी विवाद को दोबारा नहीं उठाया जा सकता। खंडपीठ ने कहा कि जिस अन्य मामले का हवाला देकर समान राहत मांगी गई है, उसके तथ्य अलग थे क्योंकि वहां आवंटी ने न तो रिफंड मांगा था और न ही उसे स्वीकार किया था। इसलिए उस फैसले का लाभ वर्तमान मामले में नहीं दिया जा सकता। अदालत ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए उसे खारिज कर दिया।

Source link

Picture Source :