देशभर के मंदिरों में वर्षों से पूजा-अर्चना और धार्मिक सेवाएं देने वाले पुजारी, सेवादार और मंदिर कर्मचारी अब अपने हक और सम्मानजनक जीवन के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गए हैं। सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में काम करने वाले इन कर्मचारियों की खराब आर्थिक स्थिति को लेकर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करेगी। याचिका में मांग की गई है कि केंद्र और राज्य सरकारें एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करें, जो मंदिरों में कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और अन्य सुविधाओं की समीक्षा करे।

भगवान की सेवा करने वाले खुद आर्थिक संकट में

याचिका में दावा किया गया है कि सदियों से समाज को आध्यात्मिक मार्ग दिखाने वाले पुजारी आज आर्थिक असुरक्षा और उपेक्षा का शिकार हैं। कई मंदिरों में पुजारियों को इतना वेतन भी नहीं मिलता कि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। कई राज्यों में तो स्थिति ऐसी है कि पुजारियों को अकुशल मजदूरों से भी कम पारिश्रमिक मिल रहा है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि जब सरकार किसी मंदिर का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथ में लेती है, तो वहां काम करने वाले पुजारी और कर्मचारी एक तरह से सरकारी नियंत्रण में कार्यरत कर्मचारी बन जाते हैं। ऐसे में उन्हें न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है।

कर्मचारी का दर्जा देने की मांग

याचिका में यह भी मांग की गई है कि पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों को ‘वेतन संहिता 2019’ की धारा 2(k) के तहत ‘कर्मचारी’ माना जाए। अगर ऐसा होता है तो उन्हें न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सरकारी लाभ मिल सकते हैं।

अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा कि 4 अप्रैल को वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर में रुद्राभिषेक के दौरान उन्हें पता चला कि मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी वेतन तक नहीं मिल रहा। इसके बाद उन्होंने इस मुद्दे को अदालत तक पहुंचाने का फैसला किया।

दक्षिणा पर रोक से बढ़ा विवाद

याचिका में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के उदाहरण भी दिए गए हैं। इसमें बताया गया कि फरवरी 2025 में तमिलनाडु के मदुरै स्थित दंडायुथपाणि स्वामी मंदिर में पुजारियों द्वारा आरती की थाली में दक्षिणा लेने पर रोक लगा दी गई थी। हालांकि बाद में जनता के विरोध के बाद आदेश वापस लेना पड़ा, लेकिन इस घटना ने पुजारियों की आर्थिक निर्भरता और असुरक्षा को उजागर कर दिया। याचिका के अनुसार कई मंदिरों में पुजारियों को सरकार की ओर से नियमित वेतन नहीं मिलता और उनका गुजारा पूरी तरह श्रद्धालुओं की दक्षिणा पर निर्भर रहता है। ऐसे में दक्षिणा पर रोक जैसे फैसले उनके जीवनयापन पर सीधा असर डालते हैं।

संस्थागत शोषण का आरोप

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि सरकारें मंदिरों को नियंत्रित तो करती हैं, लेकिन वहां काम करने वाले कर्मचारियों के हितों की अनदेखी करती हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों ने न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किए थे।

PIL में कहा गया है कि बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत के बावजूद पुजारियों को उचित वेतन नहीं मिल रहा। इससे वे आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिए पर पहुंचते जा रहे हैं। याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के कल्याण के लिए ठोस नीति बनाने की मांग की गई है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी है। माना जा रहा है कि अदालत का फैसला देशभर के लाखों पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के भविष्य पर बड़ा असर डाल सकता है।

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