इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पेंशन व ग्रेच्युटी लंबी बेदाग सेवा के बाद कर्मचारी को मिला अधिकार है। यह कोई उपहार नहीं है। यह बुढ़ापे का सहारा है।
कोर्ट ने कहा- यदि किसी के पास वित्तीय साधन नहीं है, तो उसका जीवन अर्थहीन हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट तथा हाई कोर्ट ने अपने फैसलों में कई बार कहा है कि विभागीय गलती से हुए अधिक भुगतान की वसूली सेवानिवृत्त कर्मचारी से नहीं की जा सकती।
उक्त टिप्पणियों के साथ न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने सेवानिवृत्त कांस्टेबल संपत सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए उसके परिलाभों से अधिक वेतन भुगतान की कटौती मामले में पुलिस कमिश्नर व डीसीपी आगरा से स्पष्टीकरण मांगा है।
कोर्ट ने पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही कर विभागीय कार्रवाई के लिए निर्देश जारी किया जाए। अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित है, जिसमें अधिकारियों के हाजिर होने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह) से भी इस बात का व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हित संरक्षण में उनके द्वारा क्या कदम उठाए गए? मुकदमे से जुड़े तथ्य हैं कि याची दो अक्टूबर 1984 को कांस्टेबल नियुक्त हुआ और 31 मई 2025 को सेवानिवृत्त।
पुलिस कमिश्नर आगरा ने सेवानिवृत्ति परिलाभों से साढ़े पांच लाख से अधिक की कटौती कर ली। इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने याची के प्रत्यावेदन पर निर्णय लेने का आदेश दिया, किंतु प्रत्यावेदन निरस्त कर दिया गया।
याची का कहना था कि विभाग की गलती से अधिक वेतन भुगतान की सेवानिवृत्ति के बाद वसूली नहीं की जा सकती। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लघंन है।
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