मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नर्सिंग ऑफिसर बनने का सपना देख रहे पुरुष अभ्यर्थियों के लिए यह बड़ी खबर है। जबलपुर हाईकोर्ट की जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने बुधवार को नर्सिंग ऑफिसर भर्ती विज्ञापन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पुरुष अभ्यर्थियों को भर्ती प्रक्रिया में शामिल करने का अंतरिम आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल जेंडर के आधार पर किसी को सार्वजनिक रोजगार से वंचित करना संविधान के विरुद्ध है।

क्या था पूरा विवाद?

कर्मचारी चयन मंडल ने हाल ही में नर्सिंग ऑफिसर एवं सिस्टर ट्यूटर भर्ती परीक्षा-2026 का विज्ञापन जारी किया था। इसमें नर्सिंग ऑफिसर के पदों को 100 प्रतिशत केवल महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित कर दिया गया। संतोष कुमार लोधी और अन्य पुरुष अभ्यर्थियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी दलील थी कि जब पुरुष और महिला दोनों एक ही पाठ्यक्रम (B.Sc. Nursing/GNM) पढ़ते हैं और उनके पास समान रजिस्ट्रेशन है, तो भर्ती में भेदभाव क्यों?

योग्यता जेंडर नहीं देखती। जब पाठ्यक्रम और रजिस्ट्रेशन एक है, तो केवल पुरुष होने के नाते किसी को नौकरी से बाहर रखना लोकतंत्र और संविधान का मजाक है।

नियमों के मुताबिक कोई प्रतिबंध नहीं

इस मामले में सबसे रोचक बात यह है कि मध्य प्रदेश चिकित्सा शिक्षा सेवा भर्ती नियम 2023 में नर्सिंग ऑफिसर के लिए कोई जेंडर आधारित प्रतिबंध नहीं है। इसके बावजूद विज्ञापन में 100% महिला आरक्षण देना सरकार की एक बड़ी प्रशासनिक चूक नजर आती है। वकील विशाल बघेल ने कोर्ट में अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (रोजगार में अवसर की समानता) का जो तर्क दिया, उसने सरकार की घेराबंदी कर दी। हाईकोर्ट का यह आदेश एक नजीर बनेगा, क्योंकि आने वाले समय में अन्य स्वास्थ्य सेवाओं में भी पुरुष अपनी भागीदारी के लिए इसी फैसले का सहारा लेंगे।

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