कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957
(1957 का अधिनियम संख्यांक 20)
[8 जून, 1957]
भारत के आर्थिक हित में कोयला खान उद्योग और उसके विकास पर व्यापक लोक नियंत्रण
स्थापित करने के लिए ऐसी भूमि का जिसकी खुदाई न हुई हो या जिसमें या
जिस पर कोयला भण्डार पाए जाने की संभावना हो या उसमें या
उस पर अधिकारों का राज्य द्वारा अर्जन करने के लिए,
किसी करार, पट्टे या अनुज्ञप्ति के आधार पर या
अन्यथा प्रोद्भूत ऐसे अधिकारों के निर्वापन
या उपान्तरण के लिए और उससे
संबंधित विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के आठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) सक्षम प्राधिकारी" से धारा 3 के अधीन सक्षम प्राधिकारी के रूप में नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है;
(ख) सरकारी कम्पनी" से कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में परिभाषित सरकारी कम्पनी अभिप्रेत है, जिसमें धारा 11 के अधीन कोई भूमि या किसी भूमि में या उस पर अधिकार निहित हैं;
(ग) खनिज रियायत नियम" से तत्समय प्रवृत्त वे नियम अभिप्रेत हैं, जो खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1948 (1948 का 35) के अधीन बनाए गए हैं;
[(गग) खनन पट्टा" के अन्तर्गत खनन उप-पट्टा भी है और पट्टाधारी" का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा;]
(घ) हितबद्ध व्यक्ति" पद के अन्तर्गत वे सभी व्यक्ति आते हैं, जो इस अधिनियम के अधीन भूमि का अर्जन किए जाने के या उस पर किन्हीं अधिकारों के अर्जन, निर्वापन या उपान्तरण के कारण दिए जाने वाले प्रतिकर में हित का दावा करते हैं;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(च) अधिकरण" से धारा 14 के अधीन गठित अधिकरण अभिप्रेत है ।
3. सक्षम प्राधिकारी की नियुक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किसी भी व्यक्ति को सक्षम प्राधिकारी नियुक्त कर सकेगी और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए तथा विभिन्न क्षेत्रों के लिए सक्षम प्राधिकारी के रूप में विभिन्न व्यक्तियों की नियुक्ति की जा सकेगी ।
4. किसी क्षेत्र में कोयले का पूर्वेक्षण करने के आशय की प्रारम्भिक अधिसूचना और उस पर सक्षम प्राधिकारियों की शक्तियां-(1) जब भी केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि किसी परिक्षेत्र की भूमि से कोयला प्राप्त होने की संभावना है, तो वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उस परिक्षेत्र में कोयले का पूर्वेक्षण करने के आशय की सूचना राजपत्र में अधिसूचना द्वारा देगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अधिसूचना में उस भूमि का संक्षिप्त वर्णन और उसके अनुमानित क्षेत्र का कथन होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना जारी किए जाने पर सक्षम प्राधिकारी और उसके सेवकों तथा कर्मकारों के लिए विधिपूर्ण होगा कि-
(क) ऐसे परिक्षेत्र में किसी भूमि पर प्रवेश और उसका सर्वेक्षण करें;
(ख) अवमृदा को खोदें या उसमें बोर करें;
(ग) उस भूमि में कोयले के पूर्वेक्षण के लिए वह सब अन्य कार्य करें, जो आवश्यक हों;
(घ) वह उस भूमि की, जिनमें पूर्वेक्षण करने का कार्य किए जाने की प्रस्थापना की गई है, सीमाएं और उस पर किए जाने के लिए प्रस्थापित कार्य की आशयित लाइन, यदि कोई हो, निश्चित करें;
(ङ) ऐसी सीमाओं और लाइन को चिह्निकित करें; और
(च) वहां अन्यथा सर्वेक्षण पूरा न किया जा सकता हो और सीमा और लाइन चिह्नित न की जा सकती हो किसी खड़ी फसल, बाड़ या जंगल के किसी भाग को काटें या साफ करें :
परन्तु कोई भी व्यक्ति किसी भवन में या अहाते में या किसी निवास गृह से लगे हुए उद्यान में (उसके अधिभोगी की सहमति लिए बिना) ऐसे अधिभोगी को ऐसा करने के अपने आशय की कम से कम सात दिन पूर्व लिखित सूचना दिए बिना प्रवेश नहीं करेगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन अधिसूचना जारी करते समय किसी भूमि के उस भाग को अपवर्जित करेगी, जिसमें तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियमिति, नियम या आदेश के उपबंधों के अनुरूप कोई कोयला खान संक्रिया की जा रही हो या ऐसे परिसरों को अपवर्जित किया जाएगा जिनमें ऐसी संक्रियाओं के परिणामस्वरूप प्राप्त कोयले को विक्रय के लिए प्राप्त करने की, संसाधन को या तैयार करने की अनुषंगी प्रक्रिया की जाती है ।
5. पूर्वेक्षण अनुज्ञप्तियों और खनन पट्टों पर अधिसूचना का प्रभाव-धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन किसी भूमि की बाबत अधिसूचना निकाले जाने पर-
(क) कोई पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति [जो किसी व्यक्ति को भूमि में कोयले या अन्य खनिज की खोज के लिए प्राधिकृत करती है] प्रवृत्त नहीं रह जाएगी; और
(ख) कोई खनन ॥। जहां तक वह किसी पट्टाधारी या उसके माध्यम से दावा करने वाले किसी व्यक्ति को भूमि में कोई संक्रिया करने के लिए प्राधिकृत करता है वहां उस समय तक प्रवृत्त नहीं रहेगा जब तक उस उपधारा के अधीन अधिसूचना प्रवृत्त रहती है ।
6. धारा 4 के अधीन हुए किसी आवश्यक नुकसान के लिए प्रतिकर-(1) जब कभी धारा 4 की उपधारा (3) में वर्णित प्रकार की कार्रवाई की जानी है तो सक्षम प्राधिकारी ऐसी कार्रवाई किए जाने के पूर्व या समय ऐसे सभी आवश्यक नुकसान के लिए, जिसके होने की संभावना है, संदाय करेगा या संदाय की निविदा करेगा और इस प्रकार संदत्त की गई या निविदत्त की गई रकम की अपर्याप्तता के या उस व्यक्ति के, जिसे रकम संदत्त या निविदत्त की जानी चाहिए, सम्बन्ध में, विवाद की दशा में, वह उस विवाद को तुरन्त केन्द्रीय सरकार को विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट करेगा और उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(2) इस धारा में विनिर्दिष्ट किसी ऐसे विवाद में विद्यमान कोई तथ्य धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन किसी कार्रवाई को वर्जित नहीं करेगा ।
7. धारा 4 के अधीन अधिसूचित भूमि या उसमें या उस पर के अधिकारों का अर्जन करने की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित सम्पूर्ण भूमि में या उसके किसी भाग में कोयला अभिप्राप्य है तो वह उक्त अधिसूचना की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर या ऐसी और अतिरिक्त अवधि के, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करें, जो कुल मिलाकर एक वर्ष से अधिक की नहीं होगी, भीतर, यथास्थिति, सम्पूर्ण भूमि या उसके किसी भाग का या ऐसी भूमि में या उस पर के किन्हीं अधिकारों का अर्जन करने के अपने आशय की सूचना देगी ।
(2) यदि भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के किन्हीं अधिकारों के अर्जन की सूचना उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञात की गई अवधि के भीतर नहीं दी जाती है, तो धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना उसके निकाले जाने की तारीख से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति पर प्रवृत्त न रहेगी ।
8. अर्जन की बाबत आपत्तियां-(1) कोई व्यक्ति, जो किसी भूमि में, जिसकी बाबत धारा 7 के अधीन अधिसूचना निकाली गई है, हितबद्ध है, अधिसूचना के निकाले जाने से तीस दिन के भीतर सम्पूर्ण भूमि या उसके किसी भाग या ऐसी भूमि में या उस पर के किन्हीं अधिकारों का अर्जन किए जाने के बारे में आपत्ति कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के अर्थान्तर्गत यह आपत्ति नहीं मानी जाएगी कि कोई व्यक्ति किसी भूमि में कोयला उत्पादन के लिए स्वयं खनन संक्रियाएं करना चाहता है और ऐसी संक्रियाएं केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य व्यक्ति को नहीं करनी चाहिए ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आपत्ति सक्षम प्राधिकारी को लिखित रूप में की जाएगी और सक्षम प्राधिकारी आपत्तिकर्ता को स्वयं सुने जाने का या विधि व्यवसायी द्वारा सुनवाई का अवसर देगा और ऐसी सभी आपत्तियों को सुनने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच, यदि कोई हो, करने के पश्चात्, जो वह आवश्यक समझता है [वह या तो धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित भूमि के या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों के सम्बन्ध में एक रिपोर्ट या ऐसी भूमि के विभिन्न टुकड़ों या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों के सम्बन्ध में आपत्तियों पर अपनी सिफारिशों और उसके द्वारा की गई कार्यवाही के अभिलेख सहित विभिन्न रिपोर्टें केन्द्रीय सरकार को उसके विनिश्चय के लिए देगा] ।
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए वह व्यक्ति किसी भूमि में हितबद्ध समझा जाएगा, जो प्रतिकर में हित का दावा करने का हकदार होता यदि भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकार इस अधिनियम के अधीन अर्जित कर लिए जाते ।
9. अर्जन की घोषणा-(1) जब केन्द्रीय सरकार का धारा 8 के अधीन दी गई रिपोर्ट पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात् समाधान हो जाता है कि किसी भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों का अर्जन कर लिया जाना चाहिए [तो वह इस बारे में किसी भूमि के विभिन्न टुकडों के या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों के सम्बन्ध में जो धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन उसी अधिसूचना के अन्तर्गत आते हों चाहे धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन (जहां कहीं अपेक्षित हो) एक रिपोर्ट दी गई हो या विभिन्न रिपोर्टें दी गई हों, एक घोषणा करेगी और समय-समय पर विभिन्न घोषणाएं की जा सकेंगी]
[परन्तु कोई घोषणा किसी विशिष्ट भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों के सम्बन्ध में, जो धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) संशोधन और विधिमान्यकरण अधिनियम, 1971 के प्रारम्भ के पश्चात् जारी की गई अधिसूचना के अन्तर्गत हैं, उक्त अधिसूचना की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं की जाएगीः
परन्तु यह और कि जहां कोई घोषणा] राज्य सरकार की किसी ऐसी भूमि या भूमि में या उस पर के किन्हीं अधिकारों के सम्बन्ध में हैं, जो पट्टे पर नहीं दी गई या दिए गए हैं, वहां ऐसी घोषणा राज्य सरकार से पूर्व परामर्श के पश्चात् की जाएगी ।
(2) [प्रत्येक घोषणा] राजपत्र में, प्रकाशित की जाएगी और-
(क) उस दशा में, जहां भूमि अर्जित की जानी है, वहां उस भूमि का, जिला या अन्य सीमावर्ती समभाग, जिसमें भूमि स्थित है, और उसके अनुमानित क्षेत्र का, और जहां भूमि का रेखांक बनाया गया हो, वहां उस स्थान का जहां ऐसे रेखांक का निरीक्षण किया जाना है, घोषणा में कथन किया जाएगा;
(ख) उस दशा में, जहां ऐसी भूमि या उस पर अधिकार अर्जित किए जाते हैं, वहां खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट भूमि से संबंधित विषयों के अतिरिक्त उनके प्रकार और विस्तार की घोषणा में कथन किया जाएगा, और
ऐसी घोषणा की एक प्रति संबंधित राज्य सरकार को भेजी जाएगी ।
[9क. आत्यंतिकता की दशा में विशेष शक्तियां-यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित संपूर्ण भूमि या उसके किसी भाग को या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों को तुरन्त अर्जित किया जाना आवश्यक है तो केन्द्रीय सरकार यह निदेश दे सकेगी कि धारा 8 के उपबंध लागू नहीं होंगे, यदि वह इस प्रकार निदेश देती है तो धारा 7 के अधीन अधिसूचना निकाले जाने के पश्चात् किसी भी समय धारा 9 के अधीन उसके बारे में एक घोषणा की जाएगी ।]
10. भूमि या अधिकारों का केन्द्रीय सरकार में निहित होना-(1) धारा 9 के अधीन घोषणा के राजपत्र में प्रकाशित होने पर, यथास्थिति, भूमि या भूमि में या उस पर के अधिकार [समस्त विल्लंगमों से मुक्त होकर] आत्यंतिक रूप से केन्द्रीय सरकार में निहित होंगे ।
(2) जहां किसी व्यक्ति के खनन पट्टे के अधीन [जो किसी राज्य सरकार द्वारा अनुदत्त किया गया या अनुदत्त किया गया समझा जाता हो] अधिकार इस अधिनियम के अधीन अर्जित किए जाते हैं वहां केन्द्रीय सरकार के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसे निहित होने की तारीख से राज्य सरकार की पट्टाधारी ऐसे हो गई है मानो राज्य सरकार द्वारा खनिज रियायत नियम के अधीन केन्द्रीय सरकार को खनन पट्टा अनुदत्त किया गया था, जबकि उसकी सम्पूर्ण अवधि वह अवधि होगी, जिसके लिए ऐसा कोई पट्टा राज्य सरकार द्वारा उन नियमों के अधीन अनुदत्त किया गया होता ।
11. भूमि या अधिकारों को किसी सरकारी कम्पनी में निहित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 10 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि कोई सरकारी कम्पनी ऐसी शर्तों और निबन्धनों का, जो केन्द्रीय सरकार अधिरोपित करना उचित समझे, अनुपालन करने के लिए रजामन्द है या उसने उनका अनुपालन कर लिया है तो वह लिखित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि, यथास्थिति, भूमि या भूमि में या उस पर के अधिकार धारा 10 के अधीन केन्द्रीय सरकार में इस प्रकार निहित होने या निहित बने रहने के बजाय या तो घोषणा के प्रकाशन की तारीख को या ऐसी अन्य तारीख को, जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, सरकारी कम्पनी में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां इस अधिनियम के अधीन अर्जित किसी खनन पट्टे के अधिकार उपधारा (1) के अधीन किसी सरकारी कम्पनी में निहित हो जाते हैं वहां वह सरकारी कम्पनी ऐसे निहित होने की तारीख से राज्य सरकार की पट्टेदारी ऐसी समझी जाएगी मानो राज्य सरकार द्वारा खनिज रियायत नियम के अधीन खनन पट्टा सरकारी कम्पनी को अनुदत्त किया गया था, उसकी संपूर्ण अवधि वह अवधि होगी, जिसके लिए ऐसा कोई पट्टा राज्य सरकार द्वारा उन नियमों के अधीन अनुदत्त किया जा सकता हो और उसे निहित होने की तारीख से किसी पट्टे या उसके अन्तर्गत आने वाली किसी भूमि की बाबत केन्द्रीय सरकार के सभी अधिकार और दायित्व सरकारी कम्पनी के अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
12. अर्जित की गई भूमि का कब्जा लेने की शक्ति-सक्षम प्राधिकारी लिखित सूचना द्वारा किसी व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह इस अधिनियम के अधीन उसके कब्जे में की अर्जित की गई किसी भूमि का कब्जा ऐसी अवधि के भीतर जो सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, समर्पित कर दे या दे दे और यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी सूचना का अनुपालन करने से इंकार करता है या अनुपालन करने में असफल रहता है तो सक्षम प्राधिकारी उस भूमि का कब्जा लेने के लिए उस भूमि पर प्रवेश कर सकेगा और उस प्रयोजन के लिए यथावश्यक बल का प्रयोग करेगा या करवाएगा ।
13. पूर्वेक्षित कोयला क्षेत्र अनुज्ञप्तियों के प्रभावी न रहने पर, खनन पट्टों के अधीन अधिकारों के अर्जन आदि के लिए प्रतिकर-(1) जहां धारा 5 के अधीन कोई पूर्वेक्षित कोयला क्षेत्र अनुज्ञप्ति प्रवृत्त नहीं रह जाती है वहां हितबद्ध व्यक्ति को प्रतिकर का संदाय किया जाएगा, जिसकी रकम, वह राशि होगी, जो भूमि की बाबत सभी मदों के लिए युक्तियुक्त रूप से और सद्भावपूर्वक वस्तुतः व्यय की गई हो, अर्थात्: -
(i) वह व्यय, जो अनुज्ञप्ति प्राप्त करने में खर्च किया गया हो;
(ii) वे व्यय, जो भूमि सम्बन्धी नक्शे, चार्ट और अन्य दस्तावेजें, यदि कोई हों, तैयार करने के लिए भूमि से खनिज पदार्थया अन्य खनिज के नमूनों के संग्रहण और उनके सम्यक् विश्लेषण के लिए तथा अन्य सुसंगत अभिलेख या उपादान तैयार करने के लिए किए गए हों;
(iii) वे व्यय, यदि कोई हों, जो सड़कों के निर्माण या भूमि पर अन्य अनिवार्य संकर्मों की बाबत यदि ऐसी सड़कें या संकर्म विद्यमान हैं और उपयोज्य दशा में हैं, किए गए हों;
(iv) वे व्यय, जो भूमि में किए गए पूर्वेक्षण के लिए आवश्यक किसी अन्य संक्रिया की बाबत किए गए हों ।
(2) जहां इस अधिनियम के अधीन खनन पट्टे के अन्तर्गत अधिकार अर्जित किए जाते हैं वहां हितबद्ध व्यक्ति को प्रतिकर का संदाय किया जाएगा, जिसकी रकम वह राशि होगी, जो निम्नलिखित मदों से मिलकर बनेगी, अर्थात्-
(i) यदि पट्टा किसी पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति के अधीन भूमि के संबंध में पूर्वेक्षण संक्रिया के पश्चात् अनुदत्त किया गया था तो युक्तियुक्त और सद्भावपूर्वक व्यय की सभी मदों की राशि, जो उपधारा (1) के खण्ड (i), (ii), (iii) और (iv) में विनिर्दिष्ट विषयों की बाबत पट्टे की तारीख के पूर्व वस्तुतः उपगत की गई हैः
परन्तु जहां किसी भूमि के संबंध में, जो पहले से ही किसी एक पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति के अन्तर्गत आती हो, या अधिक खनिज पट्टे अनुदत्त किए गए हों वहां उपर्युक्त व्यय की केवल उतनी राशि, जिसका कुल व्यय से वही अनुपात होगा जितना खनन पट्टे के अधीन किसी क्षेत्र का, जिसकी बाबत अधिकार अर्जित किए गए हैं उस कुल क्षेत्र से होगा, जो खनन पट्टों के अन्तर्गत आते हैं, इस खण्ड के अन्तर्गत संदेय होगी;
(ii) उपधारा (1) के खण्ड (i), (ii) और (iii) में निर्दिष्ट प्रकार का कोई युक्तियुक्त और सद्भावपूर्वक किया गया व्यय, जो वस्तुतः किसी पट्टे के संबंध में पट्टा प्राप्त करने के लिए संदत्त सलामी सहित, यदि कोई हो, उपगत किया गया हो;
(iii) व्यय यदि कोई हो, जो किसी वर्ष या वर्षों के दौरान जब कि कोयले का कोई उत्पादन नहीं हुआ था, अनिवार्य भाटक या न्यूनतम रायल्टी के रूप में उपगत किया गया हो;
(iv) खण्ड (i), (ii) और (iii) में विनिर्दिष्ट किसी ऐसे व्यय पर, जो उस वर्ष [तक] वस्तुतः किया गया हो, जिसमें पट्टे के अधीन अधिकार अर्जित किए गए हैं, ब्याज निम्नलिखित रीति से संगणित किया जाएगा, अर्थात्: -
प्रत्येक कलैण्डर वर्ष के दौरान उपगत व्यय पर प्रथम पांच वर्षों के लिए पांच प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज, जो उस वर्ष से आरम्भ होगा, जिसमें ऐसा व्यय उपगत किया गया था, जिसमें प्रथम पांच वर्षों की समाप्ति के पश्चात् प्रत्येक पश्चात्वर्ती वर्ष के लिए चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज जोड़ा जाएगा और जिसकी समाप्ति उस वर्ष होगी, जिसमें पट्टे के अधीन अधिकार अर्जित कर लिए जाते हैं:
परन्तु इस खण्ड के अधीन संदेय कुल राशि [खण्ड (i), (ii) और (iii)] में विनिर्दिष्ट कुल रकम के ड्योढ़े से अधिक नहीं होगी ।
(3) जहां धारा 9 के अधीन अर्जित खनन पट्टे के अधिकार खनन पट्टे के अन्तर्गत आने वाली भूमि के केवल एक भाग से सम्बन्धित हों वहां संदेय प्रतिकर की रकम ऐसी होगी, जिसका उस कुल प्रतिकर से जो संदेय होता, यदि सम्पूर्ण भूमि की बाबत खनन पट्टेदार के अधिकारों का अर्जन कर लिया जाता वही अनुपात होगा, जो खनन पट्टे के अन्तर्गत आने वाली भूमि के कुल क्षेत्र का उस भूमि के क्षेत्र के बीच है, जिसकी बाबत अधिकार अर्जित किए जाते हैं ।
(4) जहां धारा 5 के खण्ड (ख) के अधीन कोई खनन पट्टा किसी अवधि के लिए प्रवृत्त नहीं रह जाता है वहां उस अवधि के लिए, जिसके दौरान पट्टा प्रवृत्त नहीं रहता है, प्रतिकर के रूप में किसी ऐसे व्यय के पांच प्रतिशत के बराबर जो उपधारा (2) के खण्ड (i), (ii) और (iii) में विनिर्दिष्ट किया गया है उतनी राशि प्रत्येक वर्ष के लिए संदत्त की जाएगी, जिसके दौरान पट्टा निलंबित रहता है ।
(5) जहां कोई भूमि धारा 9 के अधीन अर्जित की जाती है वहां हितबद्ध व्यक्ति को प्रतिकर की रकम संदत्त की जाएगी, जिसका अवधारण निम्नलिखित को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा, अर्थात्: -
(क) धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख को भूमि का बाजार मूल्य ।
स्पष्टीकरण-किसी भूमि का बाजार मूल्य अवधारित करने में भूमि में के किन्हीं खनिजों के मूल्य पर विचार नहीं किया जाएगा;
(ख) भूमि का कब्जा लेते समय उस पर खड़ी किन्हीं फसलों या वृक्षों को ले लेने के कारण हिबतद्ध व्यक्ति को हुआ नुकसान;
(ग) भूमि का कब्जा लेते समय, ऐसी भूमि को किसी अन्य भूमि से पृथक् करने के कारण, हितबद्ध व्यक्ति को हुआ नुकसान, यदि कोई हो;
(घ) भूमि का कब्जा लेते समय, अर्जन के कारण किसी अन्य रीति से उसकी अन्य जंगम सम्पत्ति को या उसके उपार्जनों को क्षतिकर रूप से प्रभावित करने से, हितबद्ध व्यक्ति को हुआ नुकसान, यदि कोई हो;
(ङ) भूमि के अर्जन के परिणामस्वरूप यदि हितबद्ध व्यक्ति को अपना निवास-स्थान या कारबार का स्थान बदलने के लिए विवश होना पड़ता है तो ऐसी तब्दीली से आनुषंगिक युक्तियुक्त व्यय, यदि कोई हो; और
(च) धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन के समय और धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन घोषणा के प्रकाशन के समय के बीच भूमि के लाभ में कमी से सद्भावपूर्वक हुआ नुकसान, यदि कोई हो ।
[(5क) धारा 9 के अधीन अर्जित की गई किसी भूमि के लिए प्रतिकर की रकम का अवधारण करते समय हितबद्ध व्यक्ति की अन्य भूमि के मूल्य में जो वृद्धि ऐसे उपयोग से उद्भूत होगी, जो अर्जित भूमि का किया जाएगा उस पर विचार नहीं किया जाएगा ।]
(6) जहां केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसकी ओर से इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी के कारण भूतल या उस पर के किसी संकर्म को कोई नुकसान होता है या होने की संभावना है और जिसकी बाबत प्रतिकर के लिए इस अधिनियम में कहीं भी कोई उपबंध नहीं किया गया है, वहां सक्षम प्राधिकारी ऐसे सभी नुकसान के लिए संदाय करेगा या संदाय की निविदा करेगा और इस प्रकार संदत्त या संदाय के लिए निविदत्त रकम की अपर्याप्तता के या उस व्यक्ति के, जिसे वह रकम संदत्त या निविदत्त की गई है विवाद की दशा में वह विवाद को विनिश्चय के लिए अधिकरण को विनिर्दिष्ट करेगा ।
(7) इस धारा के अधीन नक्शे, चार्ट और अन्य दस्तावेजों की बाबत प्रतिकर का किसी व्यक्ति को संदाय, जिसे यह संदेय है, तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसने विहित प्राधिकारी को सभी नक्शे, चार्ट और दस्तावेजें न दे दी हों ।
14. प्रतिकर के अवधारण का ढंग-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी प्रतिकर की रकम किसी करार द्वारा नियत की जा सकती हो, वहां वह ऐसे करार के अनुसार संदत्त किया जाएगा ।
(2) जहां ऐसा करार न हो सकता हो, वहां केन्द्रीय सरकार रकम के अवधारण के प्रयोजन के लिए एक अधिकरण का गठन करेगी, जो ऐसे व्यक्ति से बनेगा, जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या होने के लिए अर्ह है ।
(3) केन्द्रीय सरकार किसी विशिष्ट मामले में अधिकरण की सहायता के लिए खनन संबंधी विशेष ज्ञान रखने वाले किसी व्यक्ति को नामनिर्देशित कर सकेगी और जहां ऐसा नामनिर्देशन किया जाता है वहां हितबद्ध व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी उसी प्रयोजन के लिए किसी अन्य व्यक्ति का नामनिर्देशन किया जा सकेगा ।
(4) अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों के प्रारम्भ होने पर केन्द्रीय सरकार और हितबद्ध व्यक्ति द्वारा यह कथन किया जाएगा कि उनकी राय में प्रतिकर की उचित रकम क्या होगी ।
(5) अधिकरण विवाद की सुनवाई के पश्चात् उसे न्यायसंगत प्रतीत होने वाले प्रतिकर की रकम की बाबत पंचाट देगा और उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट करेगा, जिनको प्रतिकर संदत्त किया जाएगा और पंचाट देने में अधिकरण प्रत्येक मामले में परिस्थितियों का, और उस रीति की बाबत, जिसमें प्रतिकर की रकम का अवधारण किया जाएगा इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों का जहां तक कि उक्त उपबंध या उनमें से कोई लागू होंगे, ध्यान रखेगा ।
(6) जहां प्रतिकर के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों की बाबत कोई विवाद है और अधिकरण को यह प्रतीत होता है कि प्रतिकर के हकदार एक से अधिक व्यक्ति हैं वहां वह ऐसे व्यक्तियों के बीच और ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, उसकी रकम प्रभाजित करेगा ।
(7) माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 (1940 का 10) की कोई बात इस धारा के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों को लागू नहीं होगी ।
[(8) अधिकरण को अपने समक्ष की कार्यवाहियों में निम्नलिखित विषयों की बाबत वे सभी शक्तियां होंगी, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय को किसी वाद के विचारण के सम्बन्ध में होती हैं, अर्थात्: -
(i) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ii) किसी दस्तावेज को प्रकट करने और पेश करने की अपेक्षा करना;
(iii) शपथ पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(iv) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की मांग करना; और
(v) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।]
15. खर्चे-अधिकरण द्वारा किए गए प्रत्येक अधिनिर्णय में उसके समक्ष कार्यवाहियों में उपगत खर्चे की रकम और जिन व्यक्तियों द्वारा और जिस अनुपात में वे संदत्त किए जाते हैं, उनका कथन होगा ।
16. अधिनिर्णीत प्रतिकर पर ब्याज-यदि कोई राशि अधिकरण की राय में प्रतिकर के रूप में अधिनिर्णीत की जानी चाहिए थी, उस राशि से अधिक है, जिसे केन्द्रीय सरकार ने प्रतिकर की उचित रकम बतलाया है तो अधिकरण के अधिनिर्णय में यह निदेश होगा कि केन्द्रीय सरकार ऐसे आधिक्य ब्याज पर उस तारीख से भुगतान की तारीख तक, जिसको ऐसा आधिक्य संदेय हो जाता है, पांच प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज का संदाय करेगी ।
17. प्रतिकर का संदाय-(1) इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर उसके हकदार हितबद्ध व्यक्तियों को निविदत्त या संदत्त किया जा सकेगा और केन्द्रीय सरकार उनको उसका संदाय तब तक नहीं करेगी जब तक कि उपधारा (2) में वर्णित किसी या किन्हीं आकस्मिकताओं द्वारा उन्हें निवारित न किया गया हो ।
(2) यदि प्रतिकर के हकदार हितबद्ध व्यक्ति उसे प्राप्त करने के लिए सहमत नहीं होते हैं या यदि प्रतिकर की रकम की पर्याप्तता के या उसे प्राप्त करने के हक की या उसके प्रभाजन की बाबत कोई विवाद है, तो केन्द्रीय सरकार प्रतिकर की रकम अधिकरण के पास जमा कर देगी:
परन्तु कोई व्यक्ति, जिसका हितबद्ध होना स्वीकृत है, ऐसा संदाय रकम की पर्याप्तता का विरोध करते हुए प्राप्त कर सकेगाः
[परन्तु यह भी कि प्रत्येक व्यक्ति, जिसके अन्तर्गत पूर्ववर्ती परन्तुक में विनिर्दिष्ट व्यक्ति भी सम्मिलित है, जो हितबद्ध व्यक्ति होने का दावा करता है (चाहे ऐसे व्यक्ति का हितबद्ध होना स्वीकृत किया गया हो या नहीं) प्रतिकर के लिए अधिकरण के समक्ष दावा करने का हकदार होगा:
परन्तु यह और भी कि कोई भी व्यक्ति, जिससे विरोध करने से अन्यथा रकम प्राप्त कर ली है, अधिकरण के समक्ष कोई ऐसा दावा करने का हकदार नहीं होगा ।]
(3) जबकि इस धारा द्वारा अपेक्षित प्रतिकर की रकम संदत्त या जमा नहीं की गई है, तो केन्द्रीय सरकार उस पर प्रतिकर के शोध्य होने के समय से उस समय तक जब तक कि रकम इस प्रकार संदत्त या जमा नहीं की जाएगी, पांच प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज का संदाय करने के दायित्वाधीन होगी ।
18. खनिज रियायत नियम के अनुरूप पूर्वेक्षण और खनन सम्बन्धी कार्य का केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाना-जहां किसी राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में स्थित किसी ऐसी भूमि में इस अधिनियम के अधीन कार्य केन्द्रीय सरकार या उसकी ओर से किया गया है या यदि इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या कोई सरकारी कम्पनी किसी भूमि की बाबत किसी राज्य सरकार की पट्टेदार हो गई है तो वहां किए जा सकने वाले पूर्वेक्षण के लिए या पट्टे के अधीन अधिकारों के प्रयोग के लिए शर्तें और निबन्धन, जहां तक हो सके वही शर्तें और निबन्धन होंगे, जो खनिज रियायत नियम के अधीन किन्हीं पूर्वेक्षण अनुज्ञप्तियों और खनन पट्टों को लागू होते हैं और शंका या विवाद की दशा में शंका का समाधान या विवाद का निपटारा माध्यस्थम् द्वारा या ऐसी अन्य रीति से किया जाएगा, जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार विनिश्चित करे ।
[18क. रायल्टी के बदले में राज्य सरकारों को संदाय-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी जहां कोई भूमि या भूमि में या उस पर के अधिकार (जो राज्य सरकार द्वारा किसी व्यक्ति को किसी खनन पट्टे के अधीन मंजूर किए गए या मंजूर किए गए समझे गए अधिकारों से भिन्न हों) जो किसी राज्य के स्वामित्वाधीन हैं, धारा 10 के अधीन केन्द्रीय सरकार में या धारा 11 के अधीन किसी सरकारी कम्पनी में निहित हैं, वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी राज्य सरकार को ऐसी धनराशि का संदाय कर सकेगी, जो किसी राज्य सरकार द्वारा मंजूर किए गए किसी खनन पट्टे के अधीन ऐसी भूमि या अधिकारों के लिए रायल्टी के रूप में किसी पट्टेदार द्वारा संदेय होगी ।]
19. प्रत्यायोजन की शक्ति-केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि उसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन प्रयुक्त की जाने वाली किसी या किन्हीं शक्तियों का या पालन किए जाने वाले किसी या किन्हीं कर्तव्यों का ऐसी परिस्थितियों में और ऐसे निबन्धनों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, इस निमित्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा प्रयोग या पालन किया जा सकेगा और ऐसा व्यक्ति केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से लिखित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि उसके द्वारा किसी शक्ति का या कर्तव्य का, जिसका उसे प्रयोग या पालन करने का निदेश दिया गया है, ऐसी परिस्थितियों में और निबन्धनों के, यदि कोई हों, अधीन जैसा कि निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, उसके अधीनस्थ किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा भी जैसा उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रयोग या पालन किया जा सकेगा ।
20. अपील-(1) धारा 14 के अधीन अधिकरण के किसी अधिनिर्णय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे अधिनिर्णय की तारीख से तीस दिन के भीतर उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता में स्थित कोई भूमि या भूमि का कुछ भाग, जो अर्जित कर लिया गया है या किसी पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या किसी खनन पट्टे के अन्तर्गत आने वाली किसी भूमि या उस भूमि का कुछ भाग स्थित है, जिसकी बाबत खनन अधिकार अर्जित कर लिए गए हैं ।
(2) सक्षम प्राधिकारी द्वारा या इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किन्हीं शक्तियों के आधार पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की तारीख से इक्कीस दिन के भीतर केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन अपील की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार सक्षम प्राधिकारी या सम्बद्ध व्यक्ति से एक रिपोर्ट मंगवाए जाने और पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् तथा ऐसी और जांच, जो आवश्यक हो, करने के पश्चात् ऐसे आदेश पारित कर सकेगी, जो वह ठीक समझे और केन्द्रीय सरकार का आदेश अन्तिम होगा ।
(4) जहां उपधारा (2) के अधीन कोई अपील की गई है वहां केन्द्रीय सरकार सक्षम प्राधिकारी या सम्बद्ध व्यक्ति द्वारा दिए गए आदेश के प्रवर्तन को ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों पर, जो वह ठीक समझे रोक सकेगी ।
21. जानकारी प्राप्त करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार या उसके द्वारा लिखित रूप में इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति लिखित आदेश द्वारा किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसे प्राधिकारी को, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए किसी संपत्ति से संबंधित उसके कब्जे में की ऐसी जानकारी दे, जिसकी बाबत इस अधिनियम के अधीन प्रस्थापित कार्यवाही की जानी अपेक्षित है ।
22. प्रवेश और निरीक्षण करने की शक्ति-सक्षम प्राधिकारी या उसके द्वारा लिखित रूप में इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति साधारण या विशेष आदेश द्वारा यह अवधारण करने के प्रयोजन के लिए और यदि ऐसा है तो किस रीति से इस अधिनियम के अधीन आदेश किसी सम्पत्ति की बाबत किया जाना चाहिए या इस दृष्टि से कि अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए, किसी सम्पत्ति पर प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा ।
23. शास्तियां-जो कोई धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन प्राधिकृत किसी व्यक्ति को किन्हीं ऐसे कार्यों के करने में बाधा डालेगा या धारा 4 के अधीन जानबूझकर किसी चिह्न को भरेगा या नष्ट करेगा, नुकसान पहुंचाएगा या स्थानान्तरित करेगा या इस अधिनियम द्वारा या के अधीन प्रदत्त किसी अन्य शक्ति के विधिपूर्ण प्रयोग में जानबूझकर बाधा डालेगा या इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश या दिए गए किसी निदेश का पालन करने में असफल होगा, तो वह कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से दण्डनीय होगा ।
24. सूचनाओं और आदेशों की तामील-इस अधिनियम के अधीन जो नियम बनाए जा सकेंगे उनके अधीन रहते हुए इस अधिनियम के अधीन जारी की गई प्रत्येक सूचना या किया गया आदेश, -
(क) उस दशा में जब कि कोई सूचना या आदेश साधारण प्रकृति का है या वह कई व्यक्तियों को प्रभावित करता है, तो उसे राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए उसे परिक्षेत्र में प्रकाशित भी किया जाएगा, और
(ख) उस दशा में जब कि कोई सूचना या आदेश किसी व्यष्टि को निदिष्ट है, तो उसकी [तामील ऐसे ही व्यष्टि पर]-
(i) जहां कहीं ऐसा करना साध्य है तो उस व्यष्टि को उसका परिदान या निविदान करके की जाएगी, या
(ii) यदि इस प्रकार से परिदत्त या निविदत्त न किया जा सकता हो तो उस व्यष्टि के निवास के, जिसमें वह रहता है, दरवाजे पर या उसके किसी अन्य सहजदृश्य भाग पर उसे चिपकाकर की जाएगी और उसकी एक लिखित रिपोर्ट तैयार और उसके पड़ोस में रहनेवाले दो व्यक्तियों द्वारा साक्ष्यित की जाएगी, या
(iii) इन साधनों द्वारा तामील न होने पर डाक द्वारा ।
25. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशियत किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं की जाएगी ।
(2) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशियत किसी बात के कारण हुए नुकसान या संभावित नुकसान के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या सक्षम प्राधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं की जाएगी ।
26. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय किसी भी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे विषय का अवधारण करने की अधिकारिता नहीं होगी, जिसकी बाबत इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या सक्षम प्राधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति सशक्त किया गया है ।
27. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय की बाबत उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम के अधीन किसी जांच में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया;
(ख) धारा 14 के अधीन अधिकरण द्वारा कार्यवाहियों में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया;
(ग) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार को की जाने वाली अपीलों का प्ररूप और रीति; और
(घ) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
28. 1894 के अधिनियम 1 के अधीन जारी की गई अधिसूचनाओं का, जिनमें कार्यवाहियां लंबित हैं, इस अधिनियम के अधीन जारी की गई अधिसूचनाएं माना जाना-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की (जिसे इसमें इसके पश्चात् उक्त अधिनियम कहा गया है) धारा 4 के अधीन चाहे केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी राज्य सरकार द्वारा निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, जिसमें यह कथित किया गया था कि भारत के संघ द्वारा कोयला खानों के विकास के लिए कोयला खदानों के पूर्वेक्षण के लिए किन भूमियों की आवश्यकता है, इस अधिनियम की धारा 4 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे निकाली गई समझी जाएगी मानो अधिसूचना की तारीख को यह अधिनियम प्रवृत्त था ।
(2) इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व उक्त अधिनियम की धारा 6 के अधीन चाहे केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना, जिसमें यह कथित किया गया था कि कोयले के विकास के लिए भूमि की आवश्यकता है इस अधिनियम की धारा 9 के अधीन ऐसे निकाली गई समझी जाएगी मानो अधिसूचना की तारीख को यह अधिनियम प्रवृत्त था ।
(3) उक्त अधिनियम की धारा 5क के अधीन किसी भूमि की बाबत की गई कोई आपत्ति, जो उक्त अधिनियम की धारा 4 के अधीन निकाली गई अधिसूचना के अन्तर्गत आती हो, इस अधिनियम की धारा 8 के अधीन सम्बन्धित सक्षम प्राधिकारी को की गई आपत्ति समझी जाएगी और वह [उसके द्वारा ऐसे निपटाई जाएगी मानो वह [किसी ऐसी भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के किन्हीं अधिकारों की बाबत इस अधिनियम की धारा 7 के अधीन निकाली गई अधिसूचना थी और केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम की धारा 9 के अधीन किसी भी समय किसी भूमि या उसके भाग या ऐसी भूमि या उसके भाग में या उस पर के किन्हीं अधिकारों की बाबत कोई घोषणा कर सकेगी]] ।
[(3क) जहां किसी भूमि की बाबत जो उक्त अधिनियम की धारा 4 के अधीन निकाली गई अधिसूचना के अन्तर्गत आती है, धारा 5क के अधीन उस धारा में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर कोई आपत्ति नहीं की गई है वहां यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम की धारा 7 के अधीन किसी ऐसी भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के किन्हीं अधिकारों की बाबत अधिसूचना थी और इस अधिनियम की धारा 8 के अधीन उस भूमि या भूमि में, या उस पर अधिकारों के अर्जन की बाबत कोई आपत्ति नहीं की गई थी और तद्नुसार केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम की धारा 9 के अधीन किसी भी समय, किसी भूमि या उसके भाग या ऐसी भूमि या भाग में या उस पर के किन्हीं अधिकारों की बाबत कोई घोषणा कर सकेगी ।]
(4) इस धारा में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के उपबंध (जिसके अन्तर्गत प्रतिकर संबंधी उपबंध भी हैं) उपधारा (1) और उपधारा (2) में यथानिर्दिष्ट किसी ऐसी अधिसूचना की बाबत उसी प्रकार लागू होंगे, जैसे कि वे इस अधिनियम की, यथास्थिति, धारा 4 या धारा 9 के अधीन निकाली गई किसी अधिसूचना को लागू होते हैं ।
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