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विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939 ( Registration of Foreigners Act, 1939 )


 

विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939

(1939 का अधिनियम संख्यांक 16)*

[8 अप्रैल, 1939]

[भारत] में विदेशियों के रजिस्ट्रीकरण का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

1[भारत] में प्रवेश करने वाले, उसमें उपस्थित और उससे प्रस्थान करने वाले विदेशियों के रजिस्ट्रीकरण के लिए उपबन्ध करना समीचीन है;

अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :- 

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) यह अधिनियम विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939 कहा जा सकता है ।

(2) इसका विस्तार  [सम्पूर्ण भारत] पर है  *** । 

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में,-

 [(क) “विदेशी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारत का नागरिक नहीं है ;]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।              ।

(ख) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है । 

3. नियम बनाने की शक्ति- [(1)] केन्द्रीय सरकार, पूर्व प्रकाशन के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विदेशियों के सम्बन्ध में निम्नलिखित किन्हीं या सभी प्रयोजनों के लिए नियम  बना सकती है, अर्थात् :-

(क)  [भारत] के प्रवेश करने वाले या उसमें उपस्थित किसी भी विदेशी से यह अपेक्षा करने के लिए कि वह अपनी उपस्थिति की विहित प्राधिकारी को ऐसे समय के अन्दर और ऐसी रीति से और ऐसी विशिष्टियों के साथ, जो विहित की जाएं, रिपोर्ट करे; 

(ख) 8[भारत] में एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने वाले किसी ऐसे विदेशी से, ऐसे अन्य स्थानों पर, उसके आगमन पर, यह अपेक्षा करने के लिए कि वह अपनी उपस्थिति की विहित प्राधिकारी को ऐसे समय के अन्दर, ऐसी रीति में और ऐसी विशिष्टियों के साथ, जो विहित की जाएं, रिपोर्ट करे; 

(ग) ऐसे किसी विदेशी से जो 8[भारत] छोड़ने वाला है यह अपेक्षा करने के लिए कि वह अपने आशयित प्रस्थान की तारीख और ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं ऐसे प्राधिकारी को प्रस्थान से पूर्व ऐसी कालावधि के अन्दर, जो विहित की जाए, रिपोर्ट करे; 

(घ) 8[भारत] में प्रवेश करने वाले, उसमें उपस्थित या उससे प्रस्थान करने वाले किसी भी विदेशी से यह अपेक्षा करने के लिए कि वह किसी विहित प्राधिकारी द्वारा मांग किए जाने पर अपनी पहचान का ऐसा सबूत पेश करे जैसा विहित किया जाए; 

(ङ) ऐसे किसी व्यक्ति से, जिसके अधीन किसी होटल, बोर्डिंग हाउस, सराय या इसी प्रकार के किन्हीं अन्य परिसरों का प्रबन्ध है, यह अपेक्षा करने के लिए कि वह उसमें किसी भी अवधि के लिए निवास करने वाले किसी विदेशी का नाम विहित प्राधिकारी को ऐसे समय के अन्दर और ऐसी रीति से और ऐसी विशिष्टियों के साथ, जो विहित की जाएं, रिपोर्ट करे; 

(च) ऐसे किसी व्यक्ति से जिसके अधीन किसी जलयान या वायुयान का प्रबन्ध या नियंत्रण है, यह अपेक्षा करने के लिए कि वह  [भारत] में किसी ऐसे जलयान या वायुयान से प्रवेश करने वाले या उससे प्रस्थान करने का आशय रखने वाले विदेशी की बाबत विहित प्राधिकारी को ऐसी सूचना दे जो विहित की जाए तथा ऐसे प्राधिकारी को इस अधिनियम को प्रभावी करने के लिए ऐसी सहायता दे जो आवश्यक या विहित हो; 

(छ) ऐसे आनुषंगिक या अनुपूरक मामलों के लिए उपबन्ध करने के लिए जो केन्द्रीय सरकार को इस अधिनियम को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों । 

 [(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।] 

4. सबूत का भार-यदि इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के संदर्भ में कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं है, या किसी विशिष्ट वर्ग या विवरण का विदेशी है, या नहीं है, तो यह साबित करने का भार कि ऐसा व्यक्ति, यथास्थिति, विदेशी नहीं है या किसी ऐसे विशिष्ट वर्ग या विवरण का विदेशी नहीं है, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे व्यक्ति पर होगा ।

5. शास्तियां-कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्ध का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या अनुपालन करने में असफल रहेगा, यदि वह विदेशी है, तो कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक हो सकेगा या दोनों से, या यदि वह विदेशी नहीं है, तो जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।

6. अधिनियम के लागू होने से छूट देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, आदेश  द्वारा यह घोषित कर सकती है कि इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में कोई या सभी उपबन्ध किसी भी विदेशी या विदेशियों के किसी वर्ग या विवरण को या के सम्बन्ध में लागू नहीं होंगे या केवल ऐसे उपान्तरों सहित या ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो उक्त आदेश में विहित की जाएं, लागू होंगे :

परन्तु ऐसे प्रत्येक आदेश की एक प्रति उसके प्रख्यापन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र संसद्  *** के पटल पर रखी जाएगी । 

7. इस अधिनियम के अधीन कार्य करने वाले व्यक्तियों को परित्राण-किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी ऐसी बात के लिए जिसे इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक किया जाता है या जिसका किया जाना आशयित है, कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी । 

                8. अन्य विधियों का लागू होना वर्जित नहीं है-इस अधिनियम के उपबन्ध, विदेशियों विषयक अधिनियम,  [1946ट (1946 का 31) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में । 

 9. [भाग राज्यों को इस अधिनियम का लागू किया जाना ।]-भाग ख राज्य (विधि) अधिनियम, 1951 (1951 का  3) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा निरसित ।

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