सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006
(2006 का अधिनियम संख्यांक 38)
[30 अगस्त, 2006]
सरकारी प्रतिभूतियों और भारतीय रिर्जव बैंक द्वारा उनके प्रबंध से
संबंधित विधि को समेकित तथा संशोधित करने के लिए
तथा उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक
विषयों के लिए
अधिनियम
सरकारी प्रतिभूतियों और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उनके प्रबंध से संबंधित विधि को समेकित तथा संशोधित करना समीचीन है;
और संसद् को, संविधान के अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 250 में यथा उपबंधित के सिवाय, पूर्वोक्त किसी विषय के संबंध में राज्यों के लिए विधि बनाने की कोई शक्ति नहीं है;
और संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अनुसरण में, जम्मू-कश्मीर राज्य विधान-मंडल के सिवाय, सभी राज्यों के विधान-मंडलों के सदनों द्वारा, इस आशय के संकल्प पारित कर दिए गए हैं कि पूर्वोक्त विषयों को उन राज्यों में संसद् द्वारा, विधि द्वारा, विनियमित किया जाना चाहिए;
भारत गणराज्य के सतावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम, लागू होना और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006 है ।
(2) यह अधिनियम ऐसी सरकारी प्रतिभूतियों को लागू होता है, जो केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के प्रारंभ होने के पूर्व या पश्चात् सृजित और निर्गमित की गई हैं ।
(3) यह प्रथमतः, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, सभी राज्यों को और सभी संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होता है और यह जम्मू-कश्मीर राज्य को भी जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अधीन इस अधिनियम को उस निमित्त पारित संकल्प द्वारा अंगीकार करे, लागू होगा ।
(4) यह, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों में उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और जम्मू-कश्मीर राज्य में जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अधीन इस अधिनियम को अंगीकृत करे, उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिस तारीख को यह अंगीकार किया जाता है और किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में इस अधिनियम में, इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रतिनिर्देश से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसको ऐसे राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में यह अधिनियम प्रवृत्त होता है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) अभिकर्ता" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खंड (ङ) के अर्थांतर्गत कोई अनुसूचित बैंक या उस रूप में विनिर्दिष्ट कोई अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है;
(ख) बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;
(ग) बंधपत्र खाता लेखा" से बैंक या किसी अभिकर्ता के पास ऐसा कोई लेखा अभिप्रेत है जिसमें सरकारी प्रतिभूतियां, धारक के खाते में अभौतिक रूप में धारित की जाती हैं;
(घ) संघटक सहायक साधारण खाता लेखा" से किसी अभिकर्ता द्वारा ऐसे अभिकर्ता के संघटकों की ओर से बैंक में खोला या रखा गया सहायक साधारण खाता लेखा अभिप्रेत है;
(ङ) किसी सरकारी प्रतिभूति के संबंध में, सरकार" से प्रतिभूति निर्गमित करने वाली केंद्रीय या राज्य सरकार अभिप्रेत है;
(च) सरकारी प्रतिभूति" से ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो सरकार द्वारा लोक ऋण जुटाने के प्रयोजन के लिए या किसी अन्य ऐसे प्रयोजन के लिए, जो सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित की जाए सृजित और निर्गमित की गई है और धारा 3 में वर्णित रूपों में से किसी एक रूप में है;
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ज) वचनपत्र" के अंतर्गत कोई खजाना हुंडी भी है;
(झ) विनिर्दिष्ट" से राजपत्र में बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट अभिप्रेत है ।
3. सरकारी प्रतिभूतियों के रूप-सरकारी प्रतिभूति, ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे रूपों में, जो विहित की जाएं या निम्नलिखित रूपों में से किसी एक रूप में हो सकेगी, अर्थात्: -
(i) निश्चित व्यक्तियों को या उनके आदेश पर संदेय सरकारी वचनपत्र; या
(ii) वाहक को संदेय वाहक बंधपत्र; या
(iii) स्टॉक; या
(iv) बंधपत्र खाता लेखा में धारित बंधपत्र ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, स्टॉक" से कोई ऐसी सरकारी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो, -
(i) बैंक की बहियों में रजिस्ट्रीकृत है और जिसके लिए स्टॉक प्रमाणपत्र जारी किया गया है; या
(ii) सहायक साधारण खाता लेखा में, जिसके अंतर्गत बैंक की बहियों में रखा जाने वाला संघटक का सहायक साधारण खाता लेखा भी है, धारक के खाते में धारित है,
और बैंक की बहियों में रजिस्ट्रीकरण द्वारा अंतरणीय है ।
4. सहायक साधारण खाता लेखा-(1) सहायक साधारण खाता लेखा, जिसके अंतर्गत संघटक सहायक साधारण खाता लेखा और बंधपत्र खाता लेखा भी है, बैंक द्वारा ऐसी शर्तों और निर्बंधनों के अधीन रहते हुए, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसे प्ररूप में और ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाएं, खोला जा सकेगा और रखा जा सकेगा ।
(2) बेनामी संव्यवहार (प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 (1988 का 45) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, सरकारी प्रतिभूतियां उपधारा (1) के अधीन संघटक सहायक साधारण खाता लेखा में किसी संघटक की ओर से धारित की जा सकेंगी और ऐसे खाते का धारक उस खाते में धारित प्रतिभूतियों का धारक समझा जाएगा:
परन्तु सरकारी प्रतिभूति के हिताधिकारी स्वामी के रूप में संघटक, संघटक सहायक साधारण खाता लेखा में धारित सरकारी प्रतिभूतियों के संबंध में धारक से सभी फायदों का दावा करने का हकदार होगा और सभी दायित्वों के अध्यधीन होगा ।
(3) संघटक सहायक साधारण खाता लेखा का धारक, संघटकों के हितों की रक्षा के लिए ऐसे अभिलेख रखेगा और ऐसी प्रक्रिया अपनाएगा, जो विनिर्दिष्ट की जाए ।
5. सरकारी प्रतिभूतियों का अंतरण-(1) सरकारी प्रतिभूति का कोई अंतरण विधिमान्य नहीं होगा, यदि उसका तात्पर्य प्रतिभूति के संपूर्ण हक को हस्तांतरित करना नहीं है ।
(2) सरकारी प्रतिभूतियों का अंतरण ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, किया जाएगा ।
(3) सरकारी प्रतिभूति से संबंधित कोई दस्तावेज या सरकार द्वारा निर्गमित वचनपत्र पर कोई पृष्ठांकन, ऐसे व्यक्ति द्वारा मांग किए जाने पर, जो किसी कारण से लिखने में असमर्थ है, उसकी ओर से ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, निष्पादित किया जाएगा ।
(4) इस धारा की कोई बात इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा किए गए किसी आदेश, या बैंक के संबंध में किसी न्यायालय द्वारा किए गए किसी आदेश को प्रभावित नहीं करेगी ।
6. लोक पदों के धारकों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों का धारण करना-(1) ऐसे किसी लोक पद की दशा में, जिसके संबंध में सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह घोषित करे कि उसे यह उपधारा लागू है, सरकारी प्रतिभूति उस पद के नाम में धारित की जा सकेगी ।
(2) जब सरकारी प्रतिभूति इस प्रकार धारित की जाती है, तब यह समझा जाएगा कि वह उक्त पद के प्रत्येक धारक से पद के उत्तरवर्ती धारक को उस तारीख से ही जिसको पदधारी, पश्चात्वर्ती उस पद का भार ग्रहण करता है, किसी या अतिरिक्त पृष्ठांकन या अंतरण विलेख के बिना अंतरित हो गई है ।
(3) जब उस पद का धारक किसी ऐसे पक्षकार को, जो उस पद में उसका उत्तरवर्ती नहीं है, जिसमें सरकारी प्रतिभूति इस प्रकार धारित है, अंतरण करता है तब ऐसा अंतरण, पदधारी के हस्ताक्षर द्वारा और पदनाम द्वारा, धारा 5 में अधिकथित रीति में किया जाएगा ।
(4) जहां पद का धारक अपने कार्यालय से, किसी कारण से पन्द्रह दिन से अधिक के लिए अस्थायी रूप से अनुपस्थित है, वहां वह, ऐसे किसी अन्य व्यक्ति को, जो उसकी ऐसी अनुपस्थिति की अवधि के दौरान उस कार्यालय का भारसाधक होगा, सरकारी प्रतिभूतियों का अंतरण करने के लिए लिखित में प्राधिकृत कर सकेगा ।
(5) यह धारा उस पद को भी, जिसके दो या अधिक संयुक्त धारक हैं, वैसे ही लागू होती है, जैसे यह उस पद को लागू होती है जिसका एकल धारक है ।
7. मृत एकमात्र धारक या संयुक्त धारकों की सरकारी प्रतिभूति के हक की मान्यता-(1) उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि सरकारी प्रतिभूति के एकमात्र धारक की मृत्यु पर या सभी संयुक्त धारकों की मृत्यु पर कोई नामनिर्देशन प्रवृत्त नहीं है तो, यथास्थिति, मृत एकमात्र धारक या सभी मृत संयुक्त धारकों के निष्पादक या प्रशासक या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के भाग 10 के अधीन जारी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का धारक ही एकमात्र वह व्यक्ति होगा, जिसे सरकारी प्रतिभूति का कोई हक रखने वाले के रूप में बैंक द्वारा मान्यता दी जा सकेगी ।
(2) इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति की बैंक द्वारा मान्यता को वर्जित नहीं करेगी, जो सरकारी प्रतिभूति का हक, किसी सक्षम न्यायालय द्वारा, उस व्यक्ति को सरकारी प्रतिभूति का हक रखने की घोषणा करते हुए या सरकारी प्रतिभूति का कब्जा लेने के लिए प्रापक की नियुक्ति करते हुए पारित किसी डिक्री, आदेश या निदेश के आधार पर या किसी ऐसे अन्य प्राधिकारी द्वारा, जिसे किसी कानून के अधीन ऐसे किसी व्यक्ति को सरकारी प्रतिभूति का हक प्रदान करने के लिए सशक्त किया गया हो, जारी किए गए किसी प्रमाणपत्र या पारित आदेश के आधार पर या ऐसे अन्य दस्तावेजों के आधार पर, जो विहित किए जाएं, रखता है ।
(3) इस धारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां, यथास्थिति, मृत एकमात्र धारक या मृत संयुक्त धारकों द्वारा धारित सरकारी प्रतिभूति का विद्यमान मूल्य एक लाख रुपए की रकम या एक करोड़ रुपए से अनधिक ऐसी उच्चतर रकम से, जो केंद्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर नियत की जाएं, अधिक नहीं है, वहां बैंक, ऐसे किसी व्यक्ति को, जो मृत एकमात्र धारक या मृत संयुक्त धारकों की ऐसी सरकारी प्रतिभूति का हक रखता है, ऐसे रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, मान्यता दे सकेगा ।
8. संयुक्त धारकों या कई पाने वालों के उत्तरजीवियों के अधिकार-भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 45 में किसी बात के होते हुए भी और धारा 7 तथा धारा 10 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, -
(क) जब कोई सरकारी प्रतिभूति दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्तः धारित है और दोनों में से एक की या उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है तब सरकारी प्रतिभूति का हक उन व्यक्तियों के उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों में निहित होगा; और
(ख) जब कोई सरकारी प्रतिभूति दो या अधिक व्यक्तियों को पृथक्-पृथक् रूप से संदेय है और दोनों में से एक की या उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है तक सरकारी प्रतिभूति उन व्यक्तियों के उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों या मृतक के प्रतिनिधि को या उनमें से किसी एक को संदेय होगी:
परन्तु इस धारा की कोई बात किसी ऐसे दावे पर प्रभाव नहीं डालेगी जो, यथास्थिति, सरकारी प्रतिभूति के मृत संयुक्त धारक या मृत धारकों का कोई प्रतिनिधि या सरकारी प्रतिभूति का उत्तरजीवी संयुक्त धारक, किसी ऐसी सरकारी प्रतिभूति के, जिसको यह धारा लागू होती है, अधीन या उसके संबंध में उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों या प्रतिनिधियों के विरुद्ध रखता है या रखते हैं ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) या व्यष्टियों के संगम के निगमन से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन निगमित या निगमित समझा गया निकाय तब समाप्त हुआ समझा जाएगा जब वह विघटित हो गया है ।
9. सरकारी प्रतिभूतियों के धारकों द्वारा नामनिर्देशन-(1) धारा 7 और धारा 8 या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (2) के उपबंधों के सिवाय, -
(क) जहां वचनपत्र या वाहक बंधपत्र के रूप से भिन्न सरकारी प्रतिभूति, यथास्थिति, किसी व्यक्ति द्वारा अपने नाम में या किसी अन्य नाम या नामों के साथ संयुक्त रूप से धारित है, वहां सरकारी प्रतिभूति के एकमात्र धारक या सभी संयुक्त धारक एक साथ एक या अधिक व्यक्तियों को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, नामनिर्देशित कर सकेंगे जो, यथास्थिति, एकमात्र धारक की मृत्यु या सभी संयुक्त धारकों की मृत्यु की दशा में सरकारी प्रतिभूति और उस पर संदाय का, सभी अन्य व्यक्तियों को अपवर्जित करके, तब तक हकदार होगा जब तक कि नामनिर्देशन में, विहित रीति में फेरफार न कर दिया जाए या उसे रद्द न कर दिया जाए;
(ख) जहां सरकारी प्रतिभूति की बाबत कोई नामनिर्देशन, दो या अधिक नामनिर्देशितियों के पक्ष में किया गया है और दोनों में से किसी एक या उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, वहां, यथास्थिति, उत्तरजीवी नामनिर्देशिती सरकारी प्रतिभूति और उसके संदाय का हकदार होगा या होंगे;
(ग) जहां नामनिर्देशिती अवयस्क है, वहां यथास्थिति, सरकारी प्रतिभूति के एकमात्र धारक या सभी संयुक्त धारकों के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वे विहित रीति में किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करे, जिसमें सरकारी प्रतिभूति के ऐसे धारक या संयुक्त धारकों की मृत्यु की दशा में, नामनिर्देशिती की अवयस्कता के दौरान, सरकारी प्रतिभूति निहित हुई समझी जाएगी;
(घ) यथास्थिति, किसी एकमात्र धारक या संयुक्त धारकों द्वारा धारित सरकारी प्रतिभूति के नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों के अधिकार और दावे की मान्यता तथा सरकार या बैंक द्वारा नामनिर्देशिती या नामनिर्देशितियों को किया गया कोई संदाय पूर्ण उन्मोचन होगा और उक्त सरकारी प्रतिभूति की बाबत सरकार या बैंक को उसके दायित्व से मुक्त करेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया कोई नामनिर्देशन या नियुक्ति शून्य होगी यदि नामनिर्देशिती की या जहां दो या अधिक नामनिर्देशिती हैं वहां यदि नामनिर्देशन करने वाले सभी नामनिर्देशितियों की सरकारी प्रतिभूति के धारक या संयुक्त धारकों से पहले मृत्यु हो जाती है ।
(3) जहां सरकारी प्रतिभूति पर तत्समय देय रकम दो या अधिक नामनिर्देशितियों को संदेय है और दोनों में से किसी एक की या उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, तो सरकारी प्रतिभूति का हक उन नामनिर्देशितियों के उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों में निहित होगा और उस पर तत्समय देय रकम का तद्नुसार संदाय किया जाएगा ।
(4) धारा 5 की उपधारा (2) के अनुसार किया गया किसी सरकारी प्रतिभूति का अंतरण स्वतः ही पहले किए गए नामनिर्देशन को रद्द कर देगा:
परन्तु जहां कोई सरकारी प्रतिभूति किसी प्रयोजन के लिए गिरवी या प्रतिभूति के रूप में किसी व्यक्ति के कब्जे में है वहां ऐसे कब्जे का प्रभाव नामनिर्देशन के रद्दकरण का नहीं होगा, किन्तु नामनिर्देशिती का अधिकार, उस पर इस प्रकार कब्जा रखने वाले व्यक्ति के अधिकार के अध्यधीन रहते हुए होगा ।
(5) सरकार, बैंक की सिफारिश पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी सरकारी प्रतिभूति के, जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए, नामनिर्देशन की सुविधा का विस्तार कर सकेगी ।
(6) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट कोई बात ऐसे किसी अधिकार या दावे को प्रभावित नहीं करेगी जिसे कोई व्यक्ति, ऐसे किसी व्यक्ति के विरुद्ध रखता है जिसका सरकारी प्रतिभूति के प्रति अधिकार और हक, सरकार या बैंक द्वारा मान्यताप्राप्त है या जिसको सरकारी प्रतिभूति पर देय रकम का संदाय, सरकार या बैंक द्वारा उपधारा (1) के अधीन किया जाता है ।
(7) उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों, जिनके नाम में सरकारी प्रतिभूति धारित है या उनके नामनिर्देशिती से भिन्न किसी व्यक्ति के किसी दावे की सूचना न तो बैंक या सरकार द्वारा प्राप्य होगी, न ही बैंक या सरकार किसी ऐसी सूचना से आबद्ध होगी भले ही वह उसे स्पष्टतः दी गई हो:
परन्तु जहां ऐसी सरकारी प्रतिभूति से संबंधित सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय से कोई डिक्री, आदेश, प्रमाणपत्र या अन्य प्राधिकार, बैंक या सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, वहां बैंक या सरकार ऐसी डिक्री, आदेश, प्रमाणपत्र या अन्य प्राधिकार पर सम्यक् ध्यान देगी ।
10. अवयस्क या विक्षिप्त व्यक्ति की सरकारी प्रतिभूतियां-(1) जहां कोई सरकारी प्रतिभूति किसी अवयस्क की ओर से धारित की जाती है वहां तत्समय किसी सरकारी प्रतिभूति पर या तो बकाया मूलधन या उस पर ब्याज के रूप में देय का संदाय, ऐसे अवयस्क के पिता या माता को और जहां माता-पिता नहीं है या जहां जीवित माता-पिता या केवल जीवित माता-पिता कार्य करने में असमर्थ हैं, वहां तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन अवस्यक की संपत्ति की देखभाल करने के लिए हकदार व्यक्ति को, किया जा सकेगा ।
(2) जब कोई सरकारी प्रतिभूति किसी अवयस्क या किसी ऐसे व्यक्ति की है जो विक्षिप्त है और अपने कार्यकलाप का प्रबंध करने में असमर्थ है और सरकारी प्रतिभूति के बकाया मूल मूल्य, कुल मिलाकर एक लाख रुपए से अधिक नहीं है या एक करोड़ रुपए से अनधिक ऐसी उच्चतर रकम है, जो समय-समय पर केंद्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत की जाए, तब बैंक ऐसी सरकारी प्रतिभूति को ऐसे व्यक्ति में, जिसे वह अवयस्क या विक्षिप्त व्यक्ति का प्रतिनिधि समझे, निहित करने के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
11. संपरिवर्तन, समेकन, उपविभाजन, नवीकरण, विकृत होने या पुनर्गठन पर प्रतिभूतियों की दूसरी प्रतियों और नई प्रतिभूतियों का जारी किया जाना-(1) यदि कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी सरकारी प्रतिभूति का हकदार है बैंक को यह अभिकथन करते हुए आवेदन करता है कि सरकारी प्रतिभूति खो गई है, चोरी हो गई है या नष्ट हो गई है या विरूपित हो गई है या विकृत हो गई है तो बैंक उसके खोने, चोरी, नष्ट होने, विरूपण या विकृत होने के सबूत के संबंध में अपना समाधान हो जाने पर और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए और ऐसी फीस का संदाय किए जाने पर, जो विहित की जाए, आवेदक को दूसरी सरकारी प्रतिभूति निर्गमित किए जाने का आदेश दे सकेगा ।
(2) यदि सरकारी प्रतिभूति का हकदार कोई व्यक्ति, बैंक को, सरकारी प्रतिभूति को, किसी अन्य रूप की सरकारी प्रतिभूति में संपरिवर्तित करने के लिए या किसी अन्य ऋण के संबंध में जारी की गई सरकारी प्रतिभूति में या वैसी ही अन्य सरकारी प्रतिभूतियों में समेकित करने के लिए या उसे उपविभाजित या नवीकृत, विछिन्न या पुनर्गठित करने के लिए आवेदन करता है तो बैंक, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए और ऐसी फीसों का संदाय किए जाने पर, जो विहित की जाएं, सरकारी प्रतिभूति को रद्द कर सकेगा और नई सरकारी प्रतिभूति या प्रतिभूतियां जारी करने का आदेश दे सकेगा ।
स्पष्टीकरण-सरकारी प्रतिभूति को धारक के आवेदन पर ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनिर्दिष्ट की जाएं, ब्याज और मूलधन के लिए पृथक्तः विछिन्न या पुनर्गठित किया जा सकेगा ।
(3) वह व्यक्ति जिसे इस धारा के अधीन दूसरी सरकारी प्रतिभूति या नई सरकारी प्रतिभूति जारी की गई है, धारा 18 के प्रयोजनों के लिए बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूति के धारक के रूप में मान्यताप्राप्त समझा जाएगा; और किसी व्यक्ति को इस प्रकार जारी की गई दूसरी सरकारी प्रतिभूति या नई प्रतिभूति, सरकार और ऐसे व्यक्ति तथा उन सभी व्यक्तियों के बीच, जो उसके माध्यम से, तत्पश्चात् हक प्राप्त कर रहे हैं, नई संविदा हुई समझी जाएगी :
परन्तु इस धारा के अधीन नई प्रतिभूति का जारी किया जाना ऐसे तृतीय पक्षकारों के हित को, जिनके पक्ष में कोई प्रभार या अन्य हित विधिपूर्वक सृजित किया गया था और जो ऐसी नई प्रतिभूति जारी किए जाने के समय अस्तित्व में था, प्रभावित नहीं करेगा ।
12. विवाद की दशा में बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूति के हक का संक्षिप्त अवधारण-(1) यदि बैंक की यह राय है कि सरकारी प्रतिभूति के हक के संबंध में शंका विद्यमान है, तो वह ऐसे विनियमों के अनुसार जो बनाए जाएं, उस व्यक्ति का अवधारण के लिए कार्यवाही कर सकेगा, जिसे बैंक के प्रयोजनों के लिए उसका हकदार व्यक्ति समझा जाएगा ।
(2) ऐसा कोई आदेश करने के प्रयोजन के लिए, जिसे इस अधिनियम के अधीन करने के लिए सशक्त है, बैंक, जिला मजिस्ट्रेट को, ऐसे व्यक्ति के, जिससे साक्ष्य को प्रस्तुत करने की बैंक अपेक्षा करे, संपूर्ण साक्ष्य या उसके किसी भाग को अभिलिखित करने के लिए या करवाने के लिए अनुरोध कर सकेगा और जिला मजिस्ट्रेट, जिससे ऐसा अनुरोध किया गया है या तो स्वयं अभिलिखित कर सकेगा या किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को, जो राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त सशक्त है, साक्ष्य अभिलिखित करने का निदेश दे सकेगा और वह उसकी एक प्रति बैंक को अग्रेषित करेगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन निहित करने वाला आदेश करने के प्रयोजन के लिए, बैंक अपने अधिकारियों में से किसी अधिकारी को किसी ऐसे व्यक्ति का, साक्ष्य अभिलिखित करने का निदेश दे सकेगा जिसके साक्ष्य की बैंक अपेक्षा करता है या शपथ-पत्र पर साक्ष्य ले सकेगा ।
(4) इस धारा के अनुसरण में कार्य करते हुए कोई मजिस्ट्रेट या बैंक का कोई अधिकारी उसके द्वारा परीक्षा किए जाने वाले किसी साक्षी को शपथ दिला सकेगा ।
13. सरकारी प्रतिभूतियों के संबंध में लागू विधि-इस बात के होते हुए भी कि सुविधा की दृष्टि से सरकार ने सरकारी प्रतिभूति पर भारत से बाहर अन्यत्र किए जाने वाले संदायों के लिए व्यवस्था की हो, सरकारी प्रतिभूतियों के संबंध में सभी व्यक्तियों के अधिकार, ऐसे सभी प्रश्नों के संबंध में जिनका निपटारा इस अधिनियम द्वारा विधि द्वारा और भारत में न्यायालयों द्वारा किया जाता है, अवधारित किए जाएंगे ।
14. निहित करने वाले आदेश के किए जाने के लम्बित रहने तक संदायों और अन्तरणों के रजिस्ट्रीकरण का मुलावी रहना-जहां बैंक, किसी व्यक्ति में सरकारी प्रतिभूति निहित करने वाला, इस अधिनियम के अधीन कोई आदेश करने के लिए विचार करता है, वहां बैंक सरकारी प्रतिभूति पर ब्याज या परिपक्वता मूल्य के संदाय को, यथास्थिति, निलंबित कर सकेगा या धारा 7, धारा 10, धारा 11 या धारा 12 के अधीन किसी आदेश को, या सरकारी प्रतिभूति के किसी अंतरण के रजिस्ट्रीकरण को, निहित करने वाला आदेश किए जाने तक, मुल्तवी कर सकेगा ।
15. बैंक की बंधपत्र की अपेक्षा करने की शक्ति-(1) ऐसा कोई आदेश करने से पूर्व, जिसे बैंक इस अधिनियम के अधीन करने के लिए सशक्त है, वह, ऐसे व्यक्ति से, जिसके पक्ष में आदेश किया जाना है, एक या अधिक प्रतिभूतिओं के साथ क्षतिपूर्ति बंधपत्र, ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, निष्पादित करने या आदेश की विषय-वस्तु के मूल्य के दुगुने से अनधिक की प्रतिभूति देने, जो बैंक के व्ययन पर धारित की जानी है, बैंक या किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे बैंक, उपधारा (2) को अग्रसर करने में क्षतिपूर्ति बंधपत्र या प्रतिभूति समनुदेशित करें, उसकी रकम का संदाय करने की अपेक्षा कर सकेगी ।
(2) ऐसा कोई न्यायालय, जिसके समक्ष ऐसे किसी आदेश की विषय-वस्तु की बाबत कोई दावा साबित किया जाता है, उस सफल दावेदार को क्षतिपूर्ति बंधपत्र या प्रतिभूति समनुदेशित किए जाने का आदेश कर सकेगा जो तदुपरि ऐसे दावे के परिमाण तक क्षतिपूर्ति बंधपत्र को प्रवृत्त कराने या प्रतिभूति की वसूली के लिए हकदार होगा ।
16. सूचनाओं का राजपत्र में प्रकाशन-इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा दिए जाने के लिए अपेक्षित कोई भी सूचना, डाक द्वारा तामील की जा सकेगी किन्तु ऐसी प्रत्येक सूचना बैंक द्वारा, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा निर्गमित सरकारी प्रतिभूति से संबंधित सूचनानुसार राजपत्र में या राज्य के राजपत्र में भी प्रकाशित की जाएगी और ऐसे प्रकाशन पर, सूचना उन सभी व्यक्तियों को परिदत्त की गई समझी जाएगी जिनको उसका दिया जाना आशयित है ।
17. निहित करने वाले आदेश की प्रक्रिया और उसका विस्तार क्षेत्र-(1) बैंक, धारा 7, धारा 10, धारा 11 या धारा 12 के अधीन निहित करने वाला आदेश करते समय, ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जो विहित की जाए ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा किया गया आदेश, सरकारी प्रतिभूति का पूर्ण हक प्रदान कर सकेगा या पूर्ण हक निहित करने वाले किसी और आदेश के लंबित रहने तक सरकारी प्रतिभूति पर प्रोद्भूत और प्रोद्भूत होने वाले ब्याज का केवल हक प्रदान कर सकेगा ।
18. बैंक द्वारा किए गए आदेशों का विधिक प्रभाव-बैंक द्वारा किसी व्यक्ति के सरकारी प्रतिभूति के धारक के रूप में, किसी मान्यता को और इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा किए गए किसी आदेश को, किसी न्यायालय द्वारा प्रश्नगत नहीं किया जाएगा जहां ऐसी मान्यता तक या आदेश, सरकार या बैंक के, बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूति के धारक के रूप में मान्यताप्राप्त किसी व्यक्ति के साथ या ऐसी प्रतिभूति में किसी हित का दावा करने वाले किसी व्यक्ति के साथ संबंधों को प्रभावित करता है; और बैंक द्वारा किसी व्यक्ति की ऐसी कोई मान्यता या बैंक द्वारा किसी व्यक्ति में सरकारी प्रतिभूति को निहित करने वाला कोई आदेश उस व्यक्ति पर प्रतिभूति का हक प्रतिभूति के सही स्वामी के केवल धन के लिए और उसके लेखे प्राप्त धन के लिए भी, निजी दायित्व के अधीन रहते हुए, प्रदान करने के लिए प्रवृत्त होगा ।
19. न्यायालय के आदेश पर कार्यवाहियों का रोका जाना-जहां किसी सरकारी प्रतिभूति के संदर्भ में बैंक, कोई आदेश करने का इरादा रखता है जिसे करने के लिए वह इस अधिनियम के अधीन सशक्त है और ऐसा आदेश करने से पूर्व बैंक भारत में किसी न्यायालय से ऐसा आदेश करने से रोकने का कोई आदेश प्राप्त करता है तो बैंक या तो,-
(क) प्रतिभूति को उस पर असंदत्त किसी ब्याज या प्रोद्भूत ब्याज सहित तब तक धारित करेगा जब तक कि न्यायालय से और आदेश प्राप्त नहीं हो जाते हैं; या
(ख) न्यायालय को आवेदन करेगा कि वह उस राज्य के लिए जिसमें ऐसा न्यायालय स्थित है, नियुक्त शासकीय न्यासियों को उस न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के निपटारे के लंबित रहने के दौरान प्रतिभूति अंतरित कर दें ।
20. बैंक द्वारा निहित करने की कार्यवाहियों का रद्दकरण-जहां बैंक इस अधिनियम के अधीन सरकारी प्रतिभूति को किसी व्यक्ति में निहित करने वाला कोई आदेश करने के लिए विचार करता है वहां बैंक, ऐसा आदेश किए जाने से पूर्व किसी समय, उस प्रयोजन के लिए पहले की गई किन्हीं कार्यवाहियों को रद्द कर करेगा और ऐसे रद्दकरण पर ऐसा आदेश करने के लिए नए सिरे से अग्रसर हो सकेगा ।
21. सरकारी प्रतिभूतियों पर ब्याज की बाबत उन्मोचन-सरकारी प्रतिभूति के निबंधनों में स्पष्ट रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति ऐसी प्रतिभूति पर किसी ऐसी अवधि की बाबत ब्याज का दावा करने का हकदार नहीं होगा जो उस पूर्वतम तारीख के पश्चात् व्यपगत हो गर्इ है जिसको ऐसी प्रतिभूति पर शोध्य रकम के संदाय के लिए मांग की जा सकती थी ।
22. वाहक बंधपत्र की बाबत उन्मोचन-सरकार को, किसी वाहक बंधपत्र पर या ऐसे किसी बंधपत्र के ब्याज कूपन पर सभी दायित्वों से ऐसे बंधपत्र या कूपनधारक को, ऐसी तारीख या उसके पश्चात् प्रस्तुत किए जाने पर जिसको वह उसमें वर्णित रकम के लिए शोध्य हो जाता है, संदाय पर उन्मोचित कर दिया जाएगा जब तक कि ऐसे संदाय से पूर्व, भारत में किसी न्यायालय के संदाय करने से उसे अवरुद्ध करने वाले आदेश की सरकार पर तामील नहीं कर दी जाती है ।
23. ब्याज की बाबत सरकार के दायित्व की परिसीमा की अवधि-(1) जहां तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा परिसीमा की कोई लघुतर अवधि नियत नहीं की जाती है, वहां सरकारी प्रतिभूति पर शोध्य किसी ब्याज के संदाय की बाबत सरकार का दायित्व, उस तारीख से जिसको ब्याज के रूप में शोध्य रकम संदेय हो गई है, छह वर्ष के अवसान पर, समाप्त हो जाएगा:
परंतु सरकार उन मामलों में जहां प्रतिभूतिधारक छह वर्ष की उक्त अवधि के भीतर अपने दावे प्रस्तुत नहीं कर सके, छह वर्ष की अवधि के अवसान के पश्चात् ब्याज के संदाय के लिए सद्भावपूर्वक दावे को अनुज्ञात कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, बैंक ऐसी प्रतिभूतियों को, जिनकी बाबत, उन परिस्थितियों को, जिनके अधीन और ऐसे निबंधनों और शर्तों को, जिनके अधीन रहते हुए उक्त उपधारा में विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान के पश्चात् भी ब्याज का संदाय किया जा सकेगा, विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
24. दस्तावेजों का निरीक्षण-कोई भी व्यक्ति, सरकार के कब्जे में या उसकी अभिरक्षा में की किसी सरकारी प्रतिभूति या सरकारी प्रतिभूतियों या किसी सरकारी प्रतिभूति के संबंध में सरकार द्वारा या सरकार की ओर से रखी गई या अनुरक्षित किसी बही, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज का निरीक्षण करने या उससे व्युत्पन्न सूचना प्राप्त करने का, ऐसी परिस्थितियों और ऐसी रीति में तथा ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, के सिवाय हकदार नहीं होगा ।
25. दस्तावेजों की माइक्रोफिल्म, अनुकृति प्रतियां, चुंबकीय टेप और कंप्यूटर प्रिंट आउट का साक्ष्य के दस्तावेज होना-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) किसी दस्तावेज की माइक्रो फिल्म या ऐसी माइक्रो फिल्म में दी गई प्रतिरूप या प्रतिरूपों की प्रतिकृति (चाहे विस्तारित हों अथवा नहीं); या
(ख) किसी दस्तावेज की अनुकृति प्रति; या
(ग) किसी दस्तावेज में अंतर्विष्ट कोई कथन जो कंप्यूटर द्वारा प्रस्तुत मुद्रित सामग्री में सम्मिलित है, चुंबकीय टेप या यांत्रिकी या इलेक्ट्रानिक डाटा पुनःप्राप्ति तंत्र का कोई अन्य रूप (जिसे इसमें इसके पश्चात् कंप्यूटर प्रिंट आउट कहा गया है), यदि उपधारा (2) में उल्ल्िखित शर्तों और इस धारा में अंतर्विष्ट अन्य उपबंधों का उस कथन और प्रश्नगत कंप्यूटर के संबंध में समाधान हो जाता है,
इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए विनियमों के प्रयोजनों के लिए दस्तावेज समझा जाएगा और उसके अधीन किसी कार्यवाही में, अतिरिक्त सबूत या उस मूल दस्तावेज को पेश किए बिना मूल दस्तावेज की किन्हीं अंतर्वस्तुओं के या उसमें कथित किसी तथ्य के साक्ष्य के रूप में उसी प्रकार ग्राह्य होगा जिस प्रकार उसका प्रत्यक्ष साक्ष्य ग्राह्य होता ।
(2) किसी कंप्यूटर प्रिंट आउट के संबंध में उपधारा (1) में निर्दिष्ट शर्तें निम्नलिखित होंगी, अर्थात्: -
(क) वह कंप्यूटर प्रिंट आउट, जिसमें कथन अंतर्विष्ट है, कंप्यूटर द्वारा उस अवधि के दौरान निकाला गया था जिसमें कंप्यूटर का उपयोग लगातार उस व्यक्ति द्वारा, जिसका कंप्यूटर के उपयोग पर विधिपूर्ण नियंत्रण था, उस अवधि के दौरान नियमित रूप से किए गए किन्हीं क्रियाकलापों के प्रयोजनों के लिए सूचना भंडारित करने या उसका प्रसंस्करण करने के लिए किया गया था;
(ख) उक्त अवधि के दौरान, कंप्यूटर को उक्त क्रियाकलापों के सामान्य अनुक्रम में कथन में अंतर्विष्ट किसी प्रकार की सूचना या उस प्रकार की जिससे ऐसी अंतर्विष्ट सूचना व्युत्पन्न की जाती है नियमित रूप से प्रदाय की गई थी;
(ग) उक्त अवधि के दौरान अधिकांशतः कंप्यूटर, उचित रूप से कार्य कर रहा था या यदि ऐसा नहीं था तब ऐसा किसी अवधि की बाबत जिसके दौरान कार्य नहीं कर रहा था ऐसा खराब था जिससे दस्तावेजों के प्रस्तुतीकरण या उसकी अंतर्वस्तु की यथार्थता प्रभावित करे; और
(घ) उक्त क्रियाकलापों के सामान्य अनुक्रम में कंप्यूटर को प्रदाय की गई सूचना से प्रत्युत्पादित किए गए कथन में अंतर्विष्ट कोई सूचना व्युत्पन्न की जाती है ।
(3) जहां किसी अवधि के दौरान उपधारा (2) के खंड (क) में यथाउल्लिखित अवधि के दौरान नियमित रूप से किए जाने वाले किन्हीं क्रियाकलापों के प्रयोजनों के लिए सूचना के भंडारकरण या प्रसंस्करण का कार्य कंप्यूटर द्वारा नियमित रूप से किया जा रहा था, भले ही-
(क) उस अवधि के दौरान क्रियाशील कंप्यूटरों के किसी समुच्चय द्वारा; या
(ख) उस अवधि के दौरान उतरोत्तर कार्यरत विभिन्न कंप्यूटरों द्वारा; या
(ग) उस अवधि के दौरान लगातार क्रियाशील कंप्यूटरों के विभिन्न समुच्चय द्वारा; या
(घ) ऐसी किसी अन्य रीति में जिसमें उस अवधि के दौरान लगातार क्रिया अंतर्वलित थी चाहे वह एक या अधिक कंप्यूटरों द्वारा और एक या अधिक कंप्यूटरों के समुच्चयों द्वारा किसी भी क्रम में थी,
वहां उस अवधि के दौरान उस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त सभी कंप्यूटरों को, इस धारा के प्रयोजनों के लिए एकल कंप्यूटर माना जाएगा और इस धारा में कंप्यूटर के प्रतिनिर्देशों का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा ।
(4) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन किसी कार्यवाही में, जहां इस धारा के आधार पर साक्ष्य में किसी कथन का किया जाना वांछनीय है, वहां निम्नलिखित बातों में से कोई बात करने वाला प्रमाणपत्र, अर्थात्: -
(क) उस दस्तावेज की पहचान करना जिसमें उक्त कथन अंतर्विष्ट है और उस रीति का वर्णन करना जिसमें वह प्रस्तुत किया गया था;
(ख) उस दस्तावेज के प्रस्तुतीकरण में अंतर्वलित किसी युक्ति कि ऐसी विशिष्टियां देना जो यह दर्शित करने के प्रयोजन के लिए उपयुक्त हों कि दस्तावेज कंप्यूटर द्वारा प्रस्तुत किया गया था;
(ग) किन्हीं ऐसे विषयों के बारे में व्यवहार करना जिनसे उपधारा (2) में वर्णित शर्तें संबंधित हैं और उस व्यक्ति द्वारा उस पर हस्ताक्षर किया जाना तात्पर्यित है जिसकी सुसंगत युक्ति के प्रचालन के संबंध में या सुसंगत क्रियाकलापों के प्रबंधन के संबंध में बैंक में उत्तरदायित्वपूर्ण शासकीय स्थिति है, (जो भी उपयुक्त हो),
प्रमाणपत्र में कथित किसी विषय का साक्ष्य होगा; और इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए वह ऐसी पर्याप्त सामग्री होगी जिसके बारे में यह कथन किया गया है कि वह उसके और उस कथन को करने वाले व्यक्ति के सर्वोत्तम ज्ञान और विश्वास में पर्याप्त है ।
(5) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) सूचना के बारे में तब यह समझा जाएगा कि वह किसी कंप्यूटर को प्रदाय की गई है जब वह उसमें किसी उचित रूप में प्रदाय की जाती है और चाहे वह सीधे उस रूप में प्रदाय की जाती है या (मानव हस्तक्षेप के साथ या उसके बिना) किसी समुचित उपस्कर के माध्यम से प्रदाय की जाती है;
(ख) क्या वह सूचना किसी पदधारी द्वारा किए गए क्रियाकलापों के दौरान उन क्रियाकलापों के अनुक्रम में से भिन्न अनुक्रम में प्रचालित कंप्यूटर द्वारा भंडारित या प्रसंस्कृत किए जाने के उद्देश्य से प्रदाय की जाती है, या वह सूचना, यदि उस कंप्यूटर को सम्यक् रूप से प्रदाय की गई है, तो उन क्रियाकलापों के अनुक्रम में उसे प्रदाय की गई समझी जाएगी;
(ग) दस्तावेज कंप्यूटर द्वारा प्रस्तुत किया गया समझा जाएगा चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से उत्पादित किया गया था या (मानव हस्तक्षेप के साथ या उसके बिना) किसी समुचित उपस्कर के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कंप्यूटर" से ऐसी इलेक्ट्रानिक, चुंबकीय, प्रकाशीय या अन्य उच्च गति डाटा प्रसंस्करण सेवा युक्ति या प्रणाली अभिप्रेत है जो इलेक्ट्रानिक, चुंबकीय या प्रकाशीय तंरगों के अभिचालन द्वारा तर्कसंगत, गणितीय और स्मृति फलन के रूप में काम करती है और इसके अंतर्गत सभी निवेश, उत्पाद, प्रक्रमण, भंडारकरण, कंप्यूटर साफ्टवेयर या संचार सुविधाएं भी हैं जो किसी कप्यूटर प्रणाली या कंप्यूटर नेटवर्क में कंप्यूटर से संयोजित या संबंधित होती हैं;
(ख) कंप्यूटर प्रिंट आउट" के अंतर्गत बैंक या अभिकर्ता के कारबार के सामान्य अनुक्रम में रखे गए खाते, दैनिक बहियां, लेखा बहियां और अन्य अभिलेख भी हैं, जो कंप्यूटर में भंडारित सूचना से या ऐसी सूचना से व्युत्पन्न करके कागज पर मुद्रित हों; और
(ग) अन्य सूचना से व्युत्पन्न की जा रही सूचना के प्रतिनिर्देश, उस सूचना के प्रतिनिर्देश होगा जो संगणना, मिलान या किसी अन्य प्रक्रिया द्वारा उसे व्युत्पन्न की जा रही है ।
26. बैंक और उसके अधिकारियों का लोक अधिकारी होना-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 124, अपनी पदीय हैसियत में, लोक अधिकारियों द्वारा या उनके विरुद्ध वादों से संबंधित, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के भाग 4 के उपबंधों और उक्त संहिता के आदेश 5 के नियम 27 तथा आदेश 21 के नियम 52 के उपबंधों के प्रयोजनों के लिए, बैंक और अपनी उस हैसियत में कार्य करने वाले बैंक के किसी अधिकारी को लोक अधिकारी माना जाएगा
27. सहायक साधारण खाता लेखा सुविधा का दुरुपयोग-जहां बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूति के किसी धारक के पक्ष में धारा 4 के निबंधनों के अनुसार कोई सहायक साधारण खाता लेखा खोला जाता है और, -
(क) बैंक की जानकारी में यह बात आती है कि उक्त लेखा का प्रचालन उन निबंधनों और शर्तों के प्रतिकूल किया जा रहा है जिनके अधीन उक्त खाता खोला गया था; या
(ख) सहायक साधारण खाता लेखा अंतरण प्ररूप सरकारी प्रतिभूति या निधियों की अपर्याप्तता के कारण लौटा दिया गया है; या
(ग) बैंक की यह राय है कि उक्त लेखा का प्रचालन बैंककारी पद्धति के प्रतिकूल या सरकारी प्रतिभूतियों के धारकों के हितों पर, साधारणतः प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति में किया जा रहा है; या
(घ) सहायक साधारण खाता लेखा का किसी रीति में दुरुपयोग किया जा रहा है,
वहां बैंक, लिखित आदेश द्वारा, ऐसे लेखा धारक को, उसे सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् सहायक साधारण खाता लेखा सुविधा के साथ व्यापार करने से अस्थायी रूप से या स्थायी रूप से, जैसा वह ठीक समझे, विवर्जित कर सकेगा ।
28. गिरवी, आडमान या धारणाधिकार-(1) ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, सरकारी प्रतिभूति धारक, ऐसी प्रतिभूति को गिरवी रख सकेगा या उसके संबंध में आडमान या धारणाधिकार सृष्ट कर सकेगा ।
(2) सरकारी प्रतिभूति धारक से गिरवी या आडमान या धारणाधिकार की सूचना की प्राप्ति पर, बैंक या ऐसी प्रतिभूति की बाबत लेखा रखने वाला कोई अभिकर्ता अपने अभिलेख में आवश्यक प्रविष्टि करेगा और ऐसी प्रविष्टि, यथास्थिति, गिरवी, आडमान या उसके धारणाधिकार का साक्ष्य होगी ।
29. जानकारी मांगने, निरीक्षण कराने और निदेश जारी करने की शक्ति-(1) बैंक, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, किसी समय, किसी अभिकर्ता या सहायक साधारण खाता लेखा के, जिसके अंतर्गत संघटकों का सहायक साधारण खाता लेखा भी है, धारक से सरकारी प्रतिभूति के सबंध में ऐसी जानकारी, जिसे वह आवश्यक समझे, मांग सकेगा और अपने किसी एक या अधिक अधिकारियों या किसी अभिकर्ता या सहायक साधारण खाता लेखा के, जिसके अंतर्गत संघटकों का सहायक साधारण लेखा भी है, धारक के अन्य व्यक्तियों के द्वारा निरीक्षण या संवीक्षा करवा सकेगा ।
(2) बैंक, यदि ऐसा करना आवश्यक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए सरकारी प्रतिभूति के संबंध में निम्नलिखित को ऐसे निदेश जारी कर सकेगा, जिन्हें वह ठीक समझे, -
(i) सहायक साधारण खाता लेखा धारक, जिनके अंतर्गत संघटकों के सहायक साधारण खाता लेखा भी हैं;
(ii) बंधपत्र खाता लेखा रखने वाले अभिकर्ता; और
(iii) ऐसा कोई अन्य व्यक्ति, जो सरकारी प्रतिभूतियों में व्यवहार कर रहा है ।
30. उल्लंघन और शास्तियां-(1) यदि कोई व्यक्ति, स्वयं अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए सरकारी प्रतिभूति के संबंध में कोई हक अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए, किसी प्राधिकारी को इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आवेदन में या इस अधिनियम के अनुसरण में की जाने वाली किसी जांच के अनुक्रम में ऐसा कथन करेगा जो मिथ्या है और जिसके बारे में या तो वह यह जनता है कि वह मिथ्या है या उसे उसके सत्य होने के बारे में विश्वास नहीं है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा ।
(2) कोई भी न्यायालय उपधारा (1) के अधीन किसी भी अपराध का संज्ञान, बैंक के परिवाद के सिवाय नहीं करेगा ।
(3) ऐसी किसी अन्य कार्रवाई पर, जिसे बैंक करना ठीक समझे, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बैंक, ऐसे किसी व्यक्ति पर, जो इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करता है या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी विनियम, निकाली गई किसी अधिसूचना या जारी किए गए किसी निदेश का उल्लंघन करेगा या संघटकों के सहायक साधारण खाता लेखा सहित सहायक साधारण लेखा खोलने और उसे रखने के लिए निबंधनों और शर्तों का अतिक्रमण करेगा, उसे सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, ऐसी शास्ति अधिरोपित कर सकेगा, जो पांच लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी और जहां ऐसा उल्लंघन जारी रहने वाला उल्लंघन है तो ऐसी अतिरिक्त शास्ति अधिरोपित कर सकेगा जो उस पहले दिन के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान उल्लंघन जारी रहता है, पांच हजार रुपए तक की हो सकेगी ।
31. कतिपय विधियों का सरकारी प्रतिभूतियों को लागू न होना-(1) लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) का उन सरकारी प्रतिभूतियों को जिनको यह अधिनियम लागू होता है, और सभी मामलों को भी, जिनके लिए इस अधिनियम द्वारा उपबंध किए गए हैं, लागू होना समाप्त हो जाएगा ।
(2) ऐसी समाप्ति के होते हुए भी, उस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में इस प्रकार की गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम सभी तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त था ।
(3) निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) या उसके अधीन बनाए गए विनियमों में की कोई बात इस अधिनियम के अन्तर्गत आने वाली सरकारी प्रतिभूतियों को तब तक लागू नहीं होगी जब तक निक्षेपागार अधिनियम, 1996 के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा, यथास्थिति, सरकार या बैंक के साथ कोई प्रतिकूल करार निष्पादित न किया गया हो ।
32. विनियम बनाने की शक्ति-(1) बैंक, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए विनियम, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) वह प्ररूप, जिसमें और वे निबंधन और शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए धारा 3 के अधीन सरकारी प्रतिभूतियां निर्गमित की जा सकेंगी;
(ख) वह प्ररूप जिसमें और धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन बैंक द्वारा सहायक साधारण खाता लेखा को, जिसके अंतर्गत संघटकों का सहायक साधारण खाता लेखा भी है और बंधपत्र खाता लेखा खोला जा सकेगा और रखा जा सकेगा तथा ऐसे लेखा खोलने और रखने के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस;
(ग) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन सरकारी प्रतिभूतियों का अंतरण किया जाएगा और वह रीति, जिसमें किसी सरकारी प्रतिभूति के संबंध में किसी दस्तावेज या वचनपत्र पर कोई पृष्ठांकन, उस व्यक्ति की ओर से निष्पादित किया जा सकेगा जो उस धारा की उपधारा (3) के अधीन, लिखने में असमर्थ है;
(घ) धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन मृत एकमात्र धारक या सभी मृत संयुक्त धारकों की सरकारी प्रतिभूति पर हक की मान्यता के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेज और वह रीति, जिसमें तथा वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए बैंक, उस धारा की उपधारा (3) के अधीन सरकारी प्रतिभूति के संबंध में हक को मान्यता दे सकेगा;
(ङ) वह प्ररूप और रीति, जिसमें नामनिर्देशन किया जा सकेगा, उसमें परिवर्तन किया जा सकेगा या उसे रद्द किया जा सकेगा और वह रीति, जिसमें किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकेगा जिसमें सरकारी प्रतिभूति के धारक या संयुक्त धारकों की मृत्यु की दशा में, धारा 9 के अधीन नामनिर्देशिती की अवयस्कता के दौरान सरकारी प्रतिभूति निहित हो गई समझी जाएगी;
(च) धारा 11 के अधीन दूसरी सरकारी प्रतिभूति जारी किए जाने को शासित करने वाली शर्तें और उनके लिए संदत्त की जाने वाली फीस;
(छ) वह रीति, जिसमें बैंक धारा 12 के अधीन सरकारी प्रतिभूति के संबंध में हक का अवधारण कर सकेगा;
(ज) धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन बंधपत्र का प्ररूप;
(झ) धारा 17 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट निहित करने वाला आदेश करने की प्रक्रिया;
(ञ) वे परिस्थितियां और रीति, जिसमें और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए धारा 24 के अधीन, सरकारी प्रतिभूतियां, बहियों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करने को अनुज्ञात किया जा सकेगा या उसमें से जानकारी दी जा सकेगी;
(ट) वे निबंधन और शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए धारा 28 की उपधारा (1) के अधीन, गिरवी या आडमान या धारणाधिकार सृजित किया जा सकेगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
33. ऐसे विधियों के प्रतिनिर्देश का अर्थान्वयन, जो जम्मू-कश्मीर में प्रवृत्त में नहीं हैं-इस अधिनियम में ऐसी किसी विधि, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवर्तन में नहीं है, के प्रति किसी निर्देश का, जहां भी आवश्यक हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के, यदि कोई हैं, प्रतिनिर्देश भी है ।
34. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, ऐसे आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
35. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भारतीय प्रतिभूति अधिनियम, 1920 (1920 का 10) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग में की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में इस प्रकार की हुई या की गई समझी जाएगी मानो यह अधिनियम उस दिन प्रवृत्त था जिसको ऐसी बात या कार्रवाई की गई थी ।
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