मिजोरम राज्य अधिनियम, 1986
(1986 का अधिनियम संख्यांक 34)
[14 अगस्त, 1986]
मिजोरम राज्य की स्थापना का और उससे
संबंधित विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
भाग 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मिजोरम राज्य अधिनियम, 1986 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त प्रशासक अभिप्रेत है ;
(ख) नियत दिन" से वह दिन अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ;
(ग) अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है ;
(घ) निर्वाचन आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है ;
(ङ) विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र" से नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ;
(च) विधि" के अंतर्गत नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान सम्पूर्ण मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग में विधि का बल रखने वाली कोई अधिनियमिति, अध्यादेश, विनियम, आदेश, उपविधि, नियम, स्कीम, अधिसूचना या अन्य लिखत है ;
(छ) संसद् के दोनों सदनों में से किसी सदन या विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के संबंध में, आसीन सदस्य" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस सदन या उस विधान सभा का सदस्य है ;
(ज) खजाना" के अन्तर्गत उपखजाना भी है ।
भाग 2
मिजोरम राज्य की स्थापना
3. मिजोरम राज्य की स्थापना-नियत दिन से ही, एक नया राज्य स्थापित किया जाएगा, जिसका नाम मिजोरम राज्य होगा, जिसमें वे राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, जो उस दिन के ठीक पूर्व विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में समाविष्ट थे ।
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भाग 3
विधान मंडलों में प्रतिनिधित्व
राज्य सभा
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6. आसीन सदस्य का आबंटन-(1) नियत दिन से ही, विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला राज्य सभा का आसीन सदस्य, राज्य सभा में मिजोरम राज्य को आबंटित स्थान को भरने के लिए अनुच्छेद 80 के खंड (4) के अधीन सम्यक् रूप से निर्वाचित किया गया समझा जाएगा ।
(2) ऐसे आसीन सदस्य की पदावधि अपरिवर्तित रहेगी ।
1। । । । ।
लोक सभा
8. विद्यमान लोक सभा में स्थान का आबंटन-(1) नियत दिन से ही मिजोरम राज्य को लोक सभा में स्थान का आबंटन तथा उस राज्य की अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किए जाने वाले स्थान की संख्या एक होगी और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की प्रथम अनुसूची तद्नुसार संशोधित की गई समझी जाएगी ।
(2) नियत दिन से ही विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र का संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र मिजोरम राज्य का संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र समझा जाएगा और संसदीय तथा सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 1976 का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ।
9. आसीन सदस्य के बारे में उपबंध-ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र का, जो नियत दिन को धारा 8 के उपबंधों के आधार पर मिजोरम राज्य का निर्वाचन-क्षेत्र बन जाता है, प्रतिनिधित्व करने वाला लोक सभा का आसीन सदस्य उस निर्वाचन-क्षेत्र से लोक सभा के लिए अनुच्छेद 81 के खंड (1) के उपखंड (क) के अधीन निर्वाचित किया गया समझा जाएगा ।
विधान सभा
10. विधान सभा के बारे में उपबन्ध-नियत दिन से ही, मिजोरम राज्य की विधान सभा में सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या चालीस होगी और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम,1950 (1950 का 43) की द्वितीय अनुसूची तद्नुसार संशोधित समझी जाएगी ।
11. निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-(1) निर्वाचन आयोग, नियत दिन से पूर्व और इसमें उपबन्धित रीति से धारा 10 के अधीन मिजोरम राज्य की विधान सभा के लिए समनुदिष्ट स्थानों को एक सदस्यीय प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में, वितरित करेगा और संविधान के उपबन्धों तथा निम्नलिखित उपबन्धों को ध्यान में रखते हुए, उनका परिसीमन करेगा, अर्थात् :-
(क) सभी निर्वाचन क्षेत्र-यथासाध्य भौगोलिक रूप से संहृत क्षेत्र होंगे और उनका परिसीमन करते समय उनकी प्राकृतिक विशेषताओं; प्रशासनिक इकाइयों की विद्यमान सीमाओं, संचार की सुविधाओं और सार्वजनिक सुविधा को ध्यान में रखना होगा ; और
(ख) वे निर्वाचन-क्षेत्र, जिनमें अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित किए गए हैं, यथासाध्य उन क्षेत्रों में अवस्थित होंगे जहां कुल जनसंख्या से उनकी जनसंख्या का अनुपात अधिकतम है ।
(2) निर्वाचन आयोग, उपधारा (1) के अधीन अपने कृत्यों के पालन में अपनी सहायता करने के प्रयोजन के लिए सहयुक्त सदस्यों के रूप में निम्नलिखित को अपने साथ सहयुक्त करेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 9 में निर्दिष्ट लोक सभा का आसीन सदस्य ; और
(ख) विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के ऐसे छह सदस्य जिन्हें उसका अध्यक्ष नामनिर्दिष्ट करे :
परन्तु किसी सहयुक्त सदस्य को मत देने का या निर्वाचन आयोग के किसी विनिश्चय पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा ।
(3) यदि सहयुक्त सदस्य का पद मृत्यु या पद त्याग के कारण रिक्त हो जाता है तो वह, यदि साध्य हो तो, उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुसार भरा जाएगा ।
(4) निर्वाचन आयोग,-
(क) निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाएं, किसी ऐसे सहयुक्त सदस्य की विसम्मत प्रस्थापनाओं सहित, यदि कोई हों, जो उनका प्रकाशन चाहता है, राजपत्र में और ऐसी अन्य रीति से, जो आयोग ठीक समझे, प्रकाशित करेगा और उसके साथ एक सूचना भी प्रकाशित करेगा जिसमें प्रस्थापनाओं के संबंध में आक्षेप और सुझाव आमंत्रित किए गए हों और वह तारीख विनिर्दिष्ट हो जिसको या जिसके पश्चात् प्रस्थापनाओं पर उसके द्वारा आगे विचार किया जाएगा ;
(ख) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करेगा जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख से पहले प्राप्त हो गए हों ;
(ग) इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पहले प्राप्त सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात् एक या अधिक आदेश द्वारा, निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन अवधारित करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को राजपत्र में प्रकाशित करवाएगा और ऐसे प्रकाशन पर वह आदेश या वे आदेश विधि का पूर्ण बल रखेंगे और उसे या उन्हें किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
(5) सभा निर्वाचन-क्षेत्र से संबंधित ऐसा प्रत्येक आदेश, ऐसे प्रकाशन के पश्चात् यथाशीघ्र, विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।
12. परिसीमन आदेशों को अद्यतन रखने की निर्वाचन आयोग की शक्ति-(1) निर्वाचन आयोग, समय-समय पर राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) धारा 11 के अधीन किए गए किसी आदेश में किसी मुद्रण संबंधी भूल को या उसमें अनवधानता से हुई भूल या लोप के कारण हुई किसी गलती को ठीक कर सकेगा ;
(ख) जहां ऐसे किसी आदेश में वर्णित किसी प्रादेशिक खंड की सीमाओं या उसके नाम में परिवर्तन किया जाता है वहां ऐसे आदेश को अद्यतन रखने के लिए ऐसे संशोधन कर सकेगा, जो उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत होते हैं ।
(2) किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के संबंध में इस धारा के अधीन प्रत्येक अधिसूचना, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के समक्ष रखी जाएगी ।
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भाग 4
उच्च न्यायालय
15. असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम के लिए सामान्य उच्च न्यायालय-(1) नियत दिन से ही-
(क) असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के लिए एक सामान्य उच्च न्यायालय होगा जिसका नाम गोहाटी उच्च न्यायालय (असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम उच्च न्यायालय) होगा (जिसे इसमें इसके पश्चात् सामान्य उच्च न्यायालय कहा गया है) ;
(ख) असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय के वे न्यायाधीश, जो उस दिन के ठीक पूर्व पद धारण कर रहे हों, जब तक कि वे अन्यथा चयन न करें, उस दिन को सामान्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हो जाएंगे ।
(2) सामान्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों की बाबत व्यय असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों तथा संघ के बीच ऐसे अनुपात में आबंटित किया जाएगा जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अवधारित करे ।
16. अधिवक्ताओं के बारे में उपबन्ध-(1) नियत दिन से ही,-
(क) अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (ख) के स्थान पर, निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात् :-
(ख) असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों के लिए तथा अरुणाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के लिए असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी ।" ;
(ख) असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा विधिज्ञ परिषद् असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम विधिज्ञ परिषद् समझी जाएगी ।
(2) कोई ऐसा व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व अधिवक्ता है और असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने का हकदार है, सामान्य उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय करने का हकदार होगा ।
(3) सभी ऐसे व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा विधिज्ञ परिषद् की नामावली में अधिवक्ता हैं, उसी दिन से असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम विधिज्ञ परिषद् की नामावली पर के अधिवक्ता हो जाएंगे ।
(4) सामान्य उच्च न्यायालय में सुनवाई का अधिकार ऐसे सिद्धान्तों के अनुसार विनियमित किया जाएगा जो नियत दिन के ठीक पूर्व असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय में सुनवाई के सम्बन्ध में प्रवृत्त हैं :
परन्तु असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों के महाधिवक्ताओं के बीच सुनवाई का अधिकार अधिवक्ता के रूप में उनके नामांकन की तारीखों के प्रति निर्देश से अवधारित किया जाएगा ।
17. सामान्य उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया-इस भाग के उपबंधों के अधीन रहते हुए, असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया के बारे में नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपान्तरों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय के सम्बन्ध में लागू होगी ।
18. सामान्य उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा-असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा के संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा के सम्बन्ध में लागू होगी ।
19. रिटों तथा अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप-असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों तथा अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों तथा अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप के सम्बन्ध में लागू होगी ।
20. न्यायाधीशों की शक्तियां-असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति, एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शक्तियों के सम्बन्ध में और उन शक्तियों के प्रयोग के आनुषंगिक सभी विषयों के सम्बन्ध में, नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।
21. सामान्य उच्च न्यायालय की बैठकों का मुख्य स्थान और अन्य स्थान-(1) सामान्य उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान उसी स्थान पर होगा जहां पर असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान नियत दिन के ठीक पूर्व अवस्थित है ।
(2) राष्ट्रपति, अधिसूचित आदेश द्वारा ऐसे राज्यक्षेत्रों के भीतर जिन पर उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार है, उच्च न्यायालय के मुख्य स्थान से भिन्न एक या अधिक स्थानों पर सामान्य उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायपीठ या न्यायपीठों की स्थापना के लिए और उससे सम्बन्धित विषयों के लिए उपबंध कर सकेगा :
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश निकालने के पूर्व राष्ट्रपति सामान्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायामूर्ति और उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श करेगा जिसमें न्यायपीठ या न्यायपीठों को स्थापित करने का प्रस्ताव है ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी सामान्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की बैठकें असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में ऐसे अन्य स्थान या स्थानों पर हो सकेंगी जो मुख्य न्यायामूर्ति संबद्ध राज्य के राज्यपाल के अनुमोदन से नियत करें ।
22. उच्चतम न्यायालय को अपीलों के बारे में प्रक्रिया-असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा के उच्च न्यायालय और उसके न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों से उच्चतम न्यायालय को अपीलों से संबंधित नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि आवश्यक उपांतरों के साथ सामान्य उच्च न्यायालय के बारे में लागू होंगी ।
23. असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय से कार्यवाहियों का सामान्य उच्च न्यायालय को अन्तरण-(1) असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालय में नियत तारीख के ठीक पूर्व लंबित सभी कार्यवाहियां ऐसी तारीख से सामान्य उच्च न्यायालय को अन्तरित हो जाएंगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अन्तरित प्रत्येक कार्यवाही सामान्य उच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकार निपटाई जाएगी मानो ऐसी कार्यवाही उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण की गई थी ।
24. निर्वचन-धारा 23 के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कार्यवाहियां किसी न्यायालय में तब तक लम्बित समझी जाएंगी जब तक उस न्यायालय ने उसके पक्षकारों के बीच सभी विवाद्यकों को, जिनके अन्तर्गत कार्यवाहियों के खर्चों के विनिर्धारण की बाबत कोई विवाद्यक भी है, निपटा न दिया हो और उसके अंतर्गत अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील करने के लिए इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के लिए आवेदन, पुनरीक्षण के लिए अर्जियां और रिटों के लिए अर्जियां हैं ; और
(ख) किसी उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उसके किसी न्यायाधीश या खंड न्यायालय के प्रति निर्देश हैं ; और किसी न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा किए गए किसी आदेश के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अंतर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा पारित या किए गए दण्डादेश, निर्णय या डिक्री के प्रति निर्देश हैं ।
25. सामान्य उच्च न्यायालय को अन्तरित कार्यवाहियों में उपस्थित होने या कार्य करने का अधिकार-प्रत्येक व्यक्ति को, जो नियत दिन से ठीक पूर्व अधिवक्ता है, जो असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा के उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने का हकदार है और जो धारा 23 के अधीन उस उच्च न्यायालय से सामान्य उच्च न्यायालय को अन्तरित किसी कार्यवाही में उपस्थित होने या कार्य करने के लिए प्राधिकृत था, उन कार्यवाहियों के संबंध में सामान्य उच्च न्यायालय में, यथास्थिति, उपस्थित होने या कार्य करने का अधिकार होगा ।
26. व्यावृत्ति-इस भाग की कोई बात संविधान के किन्हीं उपबंधों के सामान्य उच्च न्यायालय को लागू होने पर प्रभाव नहीं डालेगी, और इस भाग का प्रभाव किसी ऐसे उपबन्ध के अधीन रहते हुए होगा, जो नियत दिन को या उसके पश्चात् उस उच्च न्यायालय की बाबत किसी विधान-मंडल या ऐसे उपबन्ध करने के लिए शक्ति रखने वाले किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा किया जाए ।
[26क. मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों को इस भाग का लागू न होना-पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) और अन्य संबंधित विधियां (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ की तारीख से ही धारा 15 से धारा 26 (जिनमें दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) के उपबंध मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों को लागू नहीं होंगे ।]
भाग 5
व्यय का प्राधिकृत किया जाना और राजस्व का वितरण
27. विधान-मंडल द्वारा मंजूरी के लंबित रहने तक व्यय का प्राधिकृत किया जाना-(1) राष्ट्रपति, नियत दिन के पूर्व किसी भी समय मिजोरम राज्य की संचित निधि में से ऐसा व्यय जो वह नियत दिन को प्रारम्भ होने वाली छह मास से अनधिक की अवधि के लिए आवश्यक समझता है मिजोरम राज्य की विधान सभा द्वारा ऐसे व्यय की मंजूरी दी जाने तक आदेश द्वारा प्राधिकृत कर सकेगा :
परंतु मिजोरम का राज्यपाल नियत दिन के पश्चात् किसी अवधि के लिए जो छह मास की उक्त अवधि से परे की नहीं होगी मिजोरम राज्य की संचित निधि में से ऐसा अतिरिक्त व्यय जो वह आवश्यक समझता है आदेश द्वारा प्राधिकृत कर सकेगा ।
(2) यथास्थिति, राष्ट्रपति या मिजोरम का राज्यपाल भिन्न वित्तीय वर्षों के अन्तर्गत आने वाली अवधियों की बाबत उपधारा (1) के अधीन अलग आदेश करेंगे ।
28. विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं से संबंधित रिपोर्टें-(1) नियत दिन के पूर्व किसी अवधि की बाबत विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं के सम्बन्ध में संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 की धारा 49 में निर्दिष्ट भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें मिजोरम के राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएंगी जो उन्हें राज्य की विधान सभा के समक्ष रखवाएगा ।
(2) सरकार, आदेश द्वारा,-
(क) वित्तीय वर्ष 1986-87 के दौरान नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत किसी सेवा पर विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से उपगत या किसी पूर्वतर वित्तीय वर्ष की बाबत उस सेवा के लिए अनुदत्त रकम से अधिक और उपधारा (1) में निर्दिष्ट रिपोर्टों में यथाप्रकटित उस वर्ष के लिए किसी व्यय को, सम्यक् रूप से प्राधिकृत किया गया घोषित कर सकेगी, और
(ख) उक्त रिपोर्टों से उद्भूत होने वाले किसी विषय पर की जाने वाली किसी कार्रवाई के लिए उपबंध कर सकेगी ।
29. मिजोरम के राज्यपाल के भत्ते और विशेषाधिकार-मिजोरम के राज्यपाल के भत्ते और विशेषाधिकार, जब तक अनुच्छेद 158 के खंड (3) के अधीन संसद् द्वारा इस निमित्त उपबन्ध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे होंगे जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा अवधारित करे ।
30. राजस्व का वितरण-राष्ट्रपति, मिजोरम राज्य के राजस्व के सहायता अनुदान और उस राज्य के संघ के उत्पाद-शुल्क, संपदा-शुल्क और आय पर करों में अंश को आदेश द्वारा अवधारित करेगा और उस प्रयोजन के लिए उसके द्वारा अतिरिक्त उत्पाद-शुल्क (विशेष महत्व का माल) अधिनियम, 1957 (1957 का 58), संघ उत्पाद-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1979 (1979 का 24), संपदा-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1962 (1962 का 9) और संविधान (राजस्व वितरण) आदेश, 1985 के सुसंगत उपबन्धों का ऐसी रीति से संशोधन करेगा जो वह ठीक समझे ।
भाग 6
आस्तियां और दायित्व
31. संपत्ति, आस्तियां, अधिकार, दायित्व, बाध्यताएं, आदि-(1) विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के भीतर सभी ऐसी संपत्ति और आस्तियां, जो संघ द्वारा नियत दिन से ठीक पूर्व उस संघ राज्यक्षेत्र के शासन के लिए धारित है, उस दिन से ही मिजोरम राज्य को संक्रांत हो जाएंगी जब तक कि वे प्रयोजन, जिनके लिए ऐसी संपत्ति और आस्तियां इस प्रकार धारित हैं, संघ के प्रयोजन नहीं हैं :
परन्तु नियत दिन के पूर्व मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में खजानों में नकद अतिशेष उसी दिन से मिजोरम राज्य में निहित हो जाएंगे ।
(2) सभी अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं (जो संघ के किसी प्रयोजन से सम्बन्धित या उसके सम्बन्ध में सभी अधिकारों, दायित्वों और बाध्यताओं से भिन्न हैं) चाहे किसी संविदा से या अन्यथा उद्भूत हों, जो नियत दिन के ठीक पूर्व,-
(क) मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के शासन से या उसके सम्बन्ध में उद्भूत होने वाले केन्द्रीय सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं हैं ; या
(ख) विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के उसके उस हैसियत में या उस संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं हैं, नियत दिन से ही मिजोरम राज्य की सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं होंगी ।
(3) (क) किसी कर या शुल्क की, जो संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य-सूची में प्रगणित कर या शुल्क है, या
(ख) अनुच्छेद 268 में निर्दिष्ट किसी शुल्क की, या
(ग) केन्द्रीय विक्रय कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन किसी कर की, जो विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में शोध्य हो गया है बकाया को वसूल करने का अधिकार मिजोरम राज्य को संक्रांत हो जाएगा ।
(4) इस धारा के उपबंध,-
(क) किसी ऐसी संस्था, उपक्रम या परियोजना को या उसके संबंध में लागू नहीं होंगे जिसके संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व व्यय भारत की संचित निधि में से किया जाता है ;
(ख) किसी संपत्ति को या उसके संबंध में लागू नहीं होंगे जो विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के व्ययनाधीन इस शर्त के अधीन रखी गई है उसका स्वामित्व संघ में बना रहेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) दायित्व" के अन्तर्गत किसी सिविल निक्षेप, स्थानीय निधि निक्षेप, पूर्त या अन्य विन्यास, भविष्य निधि, लेखे, पेंशन या अनुयोज्य दोष की बाबत दायित्व भी है ;
(ख) संघ प्रयोजन" से संघ सूची में उल्लिखित किन्हीं विषयों से संबंधित सरकार के प्रयोजन अभिप्रेत हैं ।
भाग 7
सेवाओं के बारे में उपबंध
32. अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित उपबंध-भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय वन सेवा का प्रत्येक सदस्य जो नियत दिन से ठीक पूर्व विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में कोई पद धारण कर रहा है, जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न किया जाए सेवा के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर जो सुसंगत काडर नियमों के अधीन उसे लागू हैं, नियत दिन से ही मिजोरम राज्य की सरकार में प्रतिनियुक्ति पर समझा जाएगा :
परन्तु ऐसी प्रतिनियुक्ति की अवधि किसी भी दशा में नियत दिन से तीन वर्ष की अवधि से अधिक नहीं होगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में काडर नियम" से, यथास्थिति, भारतीय प्रशासनिक सेवा (काडर) नियम, 1954, भारतीय पुलिस सेवा (काडर) नियम, 1954 या भारतीय वन सेवा (काडर) नियम, 1956 अभिप्रेत है ।
33. अन्य सेवाओं से संबंधित उपबंध-(1) ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में जो नियत दिन के ठीक पूर्व मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन संघ के कार्यकलापों के संबंध में सेवा कर रहा है, जब तक कि केन्द्रीय सरकार के किसी आदेश द्वारा अन्यथा निदेश न दिया जाए, यह समझा जाएगा कि वह उस तारीख से मिजोरम राज्य के कार्यकलापों के संबंध में सेवाओं के लिए आबंटित कर दिया गया है :
परन्तु नियत दिन से एक वर्ष की अवधि के अवसान के पश्चात् इस धारा के अधीन कोई निदेश नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के उपबंध ऐसे व्यक्तियों के संबंध में लागू नहीं होंगे, जिन्हें धारा 32 के उपबंध लागू होते हैं ।
34. सेवाओं के बारे में अन्य उपबंध-(1) इस धारा या धारा 33 की कोई बात नियत दिन को या उसके पश्चात् मिजोरम राज्य के कार्यकलापों के संबंध में सेवा करने वाले व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के अवधारण के संबंध में संविधान के भाग 14 के अध्याय 1 के उपबंधों के प्रवर्तन पर कोई प्रभाव डालने वाली वहीं समझी जाएगी :
परन्तु धारा 33 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के मामले में नियत दिन के ठीक पूर्व लागू सेवा की शर्तों में केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ही ऐसा परिवर्तन किया जाएगा, जो उसके लिए अहितकर हो, अन्यथा नहीं ।
(2) नियत दिन के पूर्व मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संबंध में धारा 33 के अधीन आबंटित समझे गए व्यक्तियों द्वारा की गई सभी सेवाएं उनकी सेवा की शर्तों को विनियमित करने वाले नियमों के प्रयोजनों के लिए मिजोरम राज्य के कार्यकलाप के संबंध में की गई समझी जाएंगी ।
35. अधिकारियों के उन्हीं पदों पर बने रहने के बारे में उपबंध-ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र के कार्यकलाप के संबंध में कोई पद या अधिकार-पद धारण करता है या उसके कर्तव्यों का निर्वहन करता है, उसी पद या अधिकार पद को धारण करता रहेगा और उस तारीख से ही मिजोरम राज्य की सरकार या उसके अन्य समुचित प्राधिकारी द्वारा उसी पद या अधिकार पद पर नियुक्ति के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर और उसी अवधि के लिए अधिकार-पद पर सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया समझा जाएगा जिसके लिए वह उस दिन से पूर्व उस पद या अधिकार-पद को धारण करता था :
परन्तु इस धारा की कोई बात किसी सक्षम प्राधिकारी को नियत दिन से ही ऐसे व्यक्ति के संबंध में ऐसा कोई आदेश जो ऐसे पद या अधिकार-पद पर बने रहने पर प्रभाव डालने वाला हो, पारित करने से निवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी ।
36. सलाहकार समितियां-केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा,-
(क) इस भाग के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने ; और
(ख) इस धारा के उपबंधों द्वारा प्रभावित सभी व्यक्तियों के लिए ऋजु और साम्यापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करने तथा ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए किसी अभ्यावेदन पर सम्यक् रूप से विचार करने,
के संबंध में अपनी सहायता करने के प्रयोजन के लिए एक या अधिक सलाहकार समितियां स्थापित कर सकेगी ।
37. कुछ समय के पश्चात् प्रतिनिधित्व का प्रतिषेध-तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या नियम में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस भाग के उपबन्धों के अधीन पारित किसी आदेश के विरुद्ध कोई भी अभ्यावेदन ऐसे आदेश के प्रकाशन या उसकी तामील से, जो भी पूर्वतर हो, तीन मास की समाप्ति पर नहीं होगा :
परन्तु केन्द्रीय सरकार स्वप्रेरणा से या अन्यथा और ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे किसी मामले को पुनः प्रारम्भ कर सकेगी और उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जो उसे उपयुक्त प्रतीत हों यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किसी प्रभावित व्यक्ति को घोर अन्याय से बचाने की दृष्टि से ऐसा करना आवश्यक है ।
38. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, मिजोरम राज्य की सरकार को ऐसे निदेश दे सकेगी जो इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक प्रतीत हों और राज्य सरकार ऐसे निदेशों का पालन करेगी ।
भाग 8
विधिक और प्रकीर्ण उपबंध
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43. विद्यमान विधियों का जारी रहना और उनके अनुकूलन-(1) नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियां मिजोरम राज्य में तब तक प्रवृत्त बनी रहेंगी जब तक कि उन्हें सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित नहीं कर दिया जाता है ।
(2) नियत दिन के पूर्व बनाई गई किसी विधि के मिजोरम राज्य के संबंध में लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए सक्षम सरकार उस तारीख से दो वर्ष के भीतर आदेश द्वारा विधि के ऐसे अनुकूलन और उपांतर चाहे वे निरसन के रूप में हों या संशोधन के रूप में, जो आवश्यक या समीचीन हों, कर सकेगी और तब ऐसी प्रत्येक विधि इस प्रकार किए गए अनुकूलनों और उपांतरों के अधीन रहते हुए तब तक प्रभावी रहेगी जब तक उसे सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित नहीं कर दिया जाता है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में समुचित सरकार" पद से संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची में प्रगणित किसी विषय से संबंधित किसी विधि की बाबत केन्द्रीय सरकार और किसी अन्य विधि की बाबत मिजोरम राज्य की सरकार अभिप्रेत है ।
44. विधियों के अर्थान्वयन की शक्ति-इस बात के होते हुए भी कि नियत दिन के पूर्व बनाई गई किसी विधि के अनुकूलन के लिए धारा 43 के अधीन कोई उपबंध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबंध किया गया है ऐसी विधि को प्रवर्तित करने के लिए अपेक्षित या सशक्त कोई न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण मिजोरम राज्य के संबंध में उसके लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए उस विधि का अर्थान्वयन ऐसी रीति से कर सकेगा, जो उसके सार पर प्रभाव न डालती हो और जो, यथास्थिति, ऐसे न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण के समक्ष के किसी मामले के बारे में आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
45. न्यायालयों आदि के बने रहने के बारे में उपबंध-नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र में सर्वत्र या उसके किसी भाग में विधिपूर्ण कृत्यों के निर्वहन करने वाले सभी न्यायालय और अधिकरण तथा सभी प्राधिकरण उस समय तक जब तक उनका बना रहना इस अधिनियम के उपबंध से असंगत न हो या जब तक सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्य उपबंध नहीं कर दिए जाते हैं अपने-अपने कृत्यों का निर्वहन करते रहेंगे ।
46. अन्य विधियों से असंगत अधिनियम के उपबंधों का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध किसी अन्य विधि में इससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
47. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राष्ट्रपति आदेश द्वारा कोई ऐसी बात कर सकेगा जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो और जो ऐसी कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
48. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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