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State Of Chhattisgarh vs Shivendra Singh Rathore
2026 Latest Caselaw 1975 Chatt

Citation : 2026 Latest Caselaw 1975 Chatt
Judgement Date : 22 April, 2026

[Cites 0, Cited by 0]

Chattisgarh High Court

State Of Chhattisgarh vs Shivendra Singh Rathore on 22 April, 2026

                                                              1/7
                                                  {Acq. A. No.-236 of 2017}




                                                                                   2026:CGHC:18415

                                                                                                      अप्रतिवेद्य


                                               छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर


                                              दोषमुक्ति अपील क्रमांक-236/2017


                         छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा प्रभारी, पुलिस थाना-भैरमगढ़, जिला-बीजापुर, छत्तीसगढ़

                                                                                      -----अपीलार्थी/राज्य

                                                              विरूद्घ

                         शिवेन्द्र सिंह राठौर पिता-रामसिंह राठौर, उम्र-लगभग 31 वर्ष, निवासी-ग्राम पुसनार,

                          पुलिस थाना-भैरमगढ़, जिला-बीजापुर, छत्तीसगढ़

                                                                                   -----उत्तरवादी/अभियुक्त



                 अपीलार्थी/राज्य द्वारा       : श्री राम नारायण साहू, उप शासकीय अधिवक्ता ।

                 अभियुक्त/उत्तरवादी द्वारा    : श्री पार्थ कु मार झा, अधिवक्ता ।



                                              न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल,

                                                   !! निर्णय पीठ पर पारित !!

                 22/04/2026


                 1.

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 378(3) के अंतर्गत दोषमुक्ति के विरुद्ध प्रस्तुत इस

अपील में, न्यायालय-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बीजापुर (छत्तीसगढ़) द्वारा आपराधिक

प्रकरण क्रमांक 80/2016 "छत्तीसगढ़ राज्य बनाम शिवेन्द्र सिंह राठौर" में पारित निर्णय

Digitally signed by POMAN POMAN DEWANGAN DEWANGAN Date:

2026.04.22 17:12:31 +0530

{Acq. A. No.-236 of 2017}

दिनांक 10/04/2017 की वैधता को चुनौती दी गई है । जिसके तहत अभियोजन का

मामला प्रमाणित न पाते हुए अभियुक्त को धारा-304 (क) भारतीय दण्ड संहिता के

अपराध से दोषमुक्त किया गया । जिसे आगे संक्षेप में "प्रश्नाधीन निर्णय" से संबोधित

किया जा रहा है ।

2. अभियोजन मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि घटना दिनांक 02/12/2015 को दोपहर

लगभग 02:00 बजे, प्रार्थी चमराराम यादव (अ.सा.-1) अपने पुत्र धनीराम (मृतक) के

साथ ग्राम मंगलनार से पुसनार सोसायटी राशन लेने जा रहा था । जब वे सी.सी. रोड

पुलिया के पास पहुँचे, तब विपरीत दिशा से आ रहे ट्रैक्टर क्रमांक सी.जी.-18-जे-8634

के चालक/अभियुक्त शिवेन्द्र कु मार राठौर ने वाहन को उपेक्षापूर्ण एवं लापरवाही पूर्वक

चलाते हुए धनीराम को टक्कर मार दी । टक्कर के पश्चात ट्रैक्टर सड़क किनारे पलट

गया, जिसके नीचे दबने से धनीराम की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई । प्रार्थी चमराराम

की सूचना पर थाना भैरमगढ़ में अभियुक्त के विरुद्ध अपराध क्रमांक 57/2015 के तहत

प्रथम सूचना पत्र (प्रदर्श पी-1) एवं मर्ग दर्ज किया गया । तदुपरांत, पुलिस द्वारा शव का

पंचनामा कर परीक्षण कराया गया । विवेचना के दौरान घटनास्थल का नजरी नक्शा (प्रदर्श

पी-2) तैयार किया गया तथा साक्षियों के कथन लेखबद्घ किए गए । घटना में प्रयुक्त

ट्रैक्टर-ट्रॉली को प्रदर्श पी-8 के माध्यम से एवं संबंधित दस्तावेजों को प्रदर्श पी-9 के

माध्यम से जब्त किया गया । जब्त वाहन का यांत्रिक परीक्षण कराने के पश्चात अभियुक्त

को गिरफ्तार किया गया और विवेचना पूर्ण कर अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया गया ।

3. विचारण के दौरान आरोप के प्रमाणन हेतु अभियोजन की ओर से अपने पक्ष समर्थन में कु ल

10 साक्षियों का परीक्षण कराया गया तथा 15 दस्तावेज प्रदर्शित कराए गए । धारा 313

{Acq. A. No.-236 of 2017}

दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत अभियुक्त ने अपने विरुद्ध आए साक्षियों के कथनों से इंकार

करते हुए स्वयं को निर्दोष होना बताया । जिसने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया ।

तत्पश्चात उभयपक्ष को सुनकर विचारण न्यायालय द्वारा "प्रश्नाधीन निर्णय" पारित करते

हुए अभियुक्त को दोषमुक्त किया गया, जिस दोषमुक्ति को राज्य द्वारा इस अपील में चुनौती

दी गई है ।

4. अपीलार्थी/राज्य के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी चमराराम

यादव (अ.सा.-1), जो मृतक के पिता हैं, ने अभियोजन के कथानक का पूर्ण समर्थन किया

है । साक्षी ने स्पष्ट किया है कि अभियुक्त द्वारा ट्रैक्टर-ट्रॉली को अत्यधिक गति एवं

लापरवाही पूर्वक चलाने के कारण ही यह दुर्घटना कारित हुई, अतः उसके साक्ष्य पर

अविश्वास करने का कोई न्यायोचित आधार नहीं था । विचारण न्यायालय ने के वल

ट्रैक्टर-ट्रॉली के यांत्रिक परीक्षण प्रतिवेदन को आधार मानकर अभियोजन के मामले को

अस्वीकार करने में गंभीर त्रुटि की है । ट्रेक्टर की स्टेयरिंग दुर्घटना के पश्चात क्षतिग्रस्त हुई

थी । ऐसी दशा में, चमराराम के साक्ष्य पर विश्वास न कर त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष निकाला गया

है, जो विधि की दृष्टि में स्थिर रखे जाने योग्य नहीं है । अभियुक्त के विरुद्ध अभियोजन का

मामला पूर्णतः प्रमाणित रहा है । अतः प्रश्नाधीन दोषमुक्ति का निर्णय अपास्त करते हुए

अपील स्वीकार की जाकर अभियुक्त को दोषसिद्ध कर दण्डित किया जाए ।

5. अभियुक्त/उत्तरवादी के विद्वान अधिवक्ता ने विचारण न्यायालय के 'प्रश्नाधीन निर्णय' का

समर्थन करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया है कि यांत्रिक परीक्षण करने वाले साक्षी संजय सिंह

(अ.सा.-10) ने अपने साक्ष्य में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि ट्रैक्टर के परीक्षण

उपरांत दिए गए प्रतिवेदन (प्रदर्श पी-15) के अनुसार ट्रैक्टर का बोनट, मडगार्ड, छतरी,

{Acq. A. No.-236 of 2017}

साइलेंसर, स्टयरिंग, ब्रेक लाइट एवं हेड लाइट क्षतिग्रस्त पाए गए थे तथा इंजन ऑयल का

रिसाव हो रहा था । साथ ही, ट्रॉली का हब और डिस्क भी टू टा हुआ था । उक्त साक्षी ने

प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि स्टयरिंग टू ट जाने की स्थिति में वाहन पर चालक का

कोई नियंत्रण नहीं रहता और वाहन के पलटने की पूर्ण संभावना बनी रहती है । अतः यह

स्पष्ट है कि दुर्घटना वाहन में हुई आकस्मिक यांत्रिक खराबी (स्टयरिंग का टू टना) के कारण

हुई थी । अभियोजन यह प्रमाणित करने में पूर्णतः असफल रहा है कि दुर्घटना अभियुक्त के

उतावलेपन अथवा उपेक्षापूर्ण संचालन का परिणाम थी । ऐसी स्थिति में विचारण न्यायालय

द्वारा पारित दोषमुक्ति का निष्कर्ष न्यायोचित एवं विधि सम्मत है । अपीलार्थी/राज्य द्वारा

अपील में प्रस्तुत किए गए तर्क स्वीकार योग्य नहीं हैं, अतः अपील निरस्त की जाए ।

6. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और विचारण न्यायालय के अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक

परिशीलन किया गया ।

7. न्यायदृष्टांत Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 में

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत अपील के निराकरण हेतु कु छ

न्यायिक सिद्घांत प्रतिपादित किए गए हैं जो कण्डिका-42 में निम्नानुसार हैः-

"42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the

promise that no innocent shall be condemned as guilty. All

the safeguards and the jurisprudential values of criminal

law, are intended to prevent any failure of justice. The

principles which come into play while deciding an appeal

from acquittal could be summarised as:

{Acq. A. No.-236 of 2017}

(i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary;

(ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge;

(iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed;

(iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal;

(v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts;

(vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, perversity or error of law or fact in the decision of the trial court."

8. प्रस्तुत मामले में घटनास्थल के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के रूप में मृतक के पिता चमराराम यादव

(अ.सा.-1) ने अभियोजन का समर्थन किया है । उसके अतिरिक्त अन्य जितने भी

साक्षियों का परीक्षण कराया गया है, वे सभी अनुश्रुत साक्षी हैं और उन्हें घटना का प्रत्यक्ष

ज्ञान नहीं है । अन्य महत्वपूर्ण साक्षियों में चिकित्सक डॉ. रत्ना ठाकु र (अ.सा.-9) का

साक्ष्य उल्लेखनीय है, जिन्होंने मृतक धनीराम के शव का परीक्षण कर प्रतिवेदन (प्रदर्श पी-

14) प्रस्तुत किया और यह अभिमत दिया कि मृतक की मृत्यु 'दुर्घटनात्मक प्रकृ ति' की

थी । इसके अतिरिक्त, मामले के विवेचक डी.आर. मण्डावी (अ.सा.-8) ने अपने

प्रतिपरीक्षण में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि दुर्घटना के उपरांत ट्रैक्टर घटनास्थल पर

ही पलट गया था ।

{Acq. A. No.-236 of 2017}

9. प्रश्नाधीन निर्णय के अनुसार, यांत्रिक विशेषज्ञ के रूप में महत्वपूर्ण साक्षी संजय सिंह

(अ.सा.-10) ने यह कथन किया है कि वह भैरमगढ़ बस स्टैंड के समीप 'जय भैरमदेव

ऑटो पार्ट्स' के नाम से गैरेज संचालित करता है । उसने दुर्घटनाग्रस्त वाहन का यांत्रिक

परीक्षण कर अपना प्रतिवेदन (प्रदर्श पी-15) प्रस्तुत किया है । इस साक्षी ने स्पष्ट किया है

कि उक्त ट्रैक्टर के अन्य कलपुर्जों के क्षतिग्रस्त होने के साथ-साथ उसकी 'स्टयरिंग' भी

टू टी हुई थी । प्रतिपरीक्षण के दौरान इस साक्षी ने यह स्वीकार किया कि यदि किसी वाहन

की स्टयरिंग टू ट जाए, तो उस पर चालक का नियंत्रण समाप्त हो जाता है । ऐसी स्थिति में

वाहन के पलटने की पूर्ण संभावना बनी रहती है ।

10. विवेचक डी.आर. मण्डावी (अ.सा.-8) के कथनानुसार, दुर्घटना के उपरांत वाहन

घटनास्थल पर ही पलटा था । विधि का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि दाण्डिक मामलों में

अभियोजन को अपना मामला 'संदेह से परे' प्रमाणित करना होता है । जहां दो मत संभव

हो वहां वह मत प्रभावी होगा जो अभियुक्त के पक्ष में हो । प्रस्तुत मामले में, यांत्रिक परीक्षक

संजय सिंह (अ.सा.-10) के साक्ष्य के दृष्टिगत यह अधिक संभावित प्रतीत होता है कि

स्टयरिंग टू टने के कारण चालक, वाहन पर से नियंत्रण खो दिया, जिसके परिणामस्वरूप

दुर्घटना हुई और वाहन पलट गया । इसके विपरीत, अभियोजन ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत

करने में असफल रहा है जिससे यह प्रमाणित हो सके कि स्टयरिंग दुर्घटना के प्रभावस्वरूप

बाद में टू टी थी । ऐसी स्थिति में, अभियुक्त द्वारा उपेक्षा एवं उतावलेपन से वाहन चलाने का

तथ्य संदेह से परे प्रमाणित नहीं रहा है ।

11. न्यायदृष्टांत के प्रकाश में साक्ष्य विवेचना के फलस्वरूप यह न्यायालय पाती है कि विचारण

न्यायालय द्वारा जो दोषमुक्ति का निष्कर्ष अंकित किया गया है वह अभिलेख में उपलब्ध

{Acq. A. No.-236 of 2017}

तथ्य और साक्ष्य के विपरीत या विरोधाभासी नहीं है तथा प्रश्नाधीन दोषमुक्ति के निर्णय में

कोई अवैधता या अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती । इसलिए उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता

नहीं पायी जाती ।

12. अतः दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत यह अपील स्वीकार योग्य न होने से खारिज की जाती है ।

13. निर्णय की प्रतिलिपि के साथ विचारण न्यायालय का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक वापस प्रेषित

हो ।

सही/-

(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश

पोमन

 
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