एनएचआरसी, भारत ने नई दिल्ली स्थित अपने परिसर में हाइब्रिड मोड में ‘प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों का संरक्षण: सरकार और निजी क्षेत्र की साझा जिम्मेदारी’ पर एक कोर ग्रुप बैठक आयोजित की। बैठक की अध्यक्षता करते हुए, एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री वी. रामासुब्रमण्यन ने कहा कि अन्य श्रमिकों की तुलना में प्रवासी श्रमिक अधिक चुनौतियों का सामना करते हैं क्योंकि उनमें से अधिकांश असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। भाषा की बाधा, निरंतर आवागमन और स्थायी आवास की कमी उन्हें संगठित तरीके से अपने अधिकारों की रक्षा करने से रोकती है। उन्होंने श्रमिकों के अधिकारों के लिए ट्रेड यूनियनों की मजबूत परंपरा को भी याद किया। बैठक में एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन षड़ंगि, महासचिव श्री भरत लाल, महानिदेशक (अन्वेषण) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्रा, रजिस्ट्रार (विधि) श्री जोगिंदर सिंह, संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार और श्रीमती साईडिंगपुई छकछुआक के साथ-साथ भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञ और विभिन्न संयुक्त राष्ट्र निकायों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

न्यायमूर्ति रामासुब्रमण्यन ने 1979 के कानून (जो प्रवासी श्रमिकों को मान्यता देता है) और औद्योगिक विवाद अधिनियम के उन प्रावधानों का उल्लेख किया, जो 240 दिनों के निरंतर कार्य के बाद सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने नियोक्ताओं द्वारा पात्रता अवधि पूरी होने से पहले ही काम में 'ब्रेक' देने जैसी खामियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने सरकारों को सलाह देने में एनएचआरसी, भारत और उसके कोर ग्रुप की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हालांकि भारत में 1979 से ही प्रवासी श्रमिक सुरक्षा सहित मजबूत श्रम कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रवासी श्रमिकों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याएं व्यापक रूप से ज्ञात हैं और आयोग को आशा है कि इस बहु-हितधारक चर्चा के परिणामस्वरूप व्यावहारिक समाधान सामने आएंगे, जिन्हें केंद्र और राज्य सरकारों को कार्यान्वयन हेतु सिफारिशों के रूप में भेजा जाएगा।

न्यायमूर्ति रामासुब्रमण्यन ने प्रवासी श्रमिकों के लिए 'अनुपालन-आधारित दृष्टिकोण' से हटकर एक 'अधिकार-आधारित संस्कृति' की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने अंतरराज्यीय समन्वय, पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा और श्रम कानूनों के सख्त कार्यान्वयन जैसे प्रणालीगत सुधारों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि तत्काल ध्यान निर्माण, होटल, व्यवसाय और घरेलू कार्यों में लगे प्रवासी श्रमिकों पर होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रवासी श्रमिकों के पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के लिए भाषाई पहचान-आधारित संघों के सदस्यों को समन्वय परिषदों में शामिल किया जाना चाहिए।

एनएचआरसी, भारत के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन षड़ंगि ने कहा कि प्रवासी श्रमिकों को न तो उचित सम्मान दिया जाता है और न ही मजदूरी। उन्होंने कहा कि समय पर पारिश्रमिक का भुगतान न होना, श्रमिकों के अपने घर छोड़कर आजीविका की तलाश में बाहर आने के मूल उद्देश्य को ही निष्फल कर देता है। उन्हें सम्मान के साथ जीने के लिए पर्याप्त मजदूरी, आवास, स्वास्थ्य और उनके बच्चों के लिए शैक्षिक सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके साथ आने वाले परिवार के सदस्यों का भी एक डेटाबेस बनाया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें भी सभी देय लाभ मिल सकें।

इससे पहले, एनएचआरसी, भारत के महासचिव श्री भरत लाल ने प्रवास पर एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया भर में प्रवासी हर स्तर पर अर्थव्यवस्था को गति दे रहे हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि भारत की लगभग 28.9% आबादी प्रवासी श्रमिकों की है जो ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आवागमन करते हैं, और अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कोविड-19 संकट के दौरान सामना की गई गंभीर कठिनाइयों को याद करते हुए, उन्होंने आउटसोर्स किए गए श्रमिकों के शोषण पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसी खबरें हैं कि इनमें से कई श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिलती है, और ठेकेदार कथित तौर पर भुगतान ऐप के माध्यम से बड़ी राशि काट लेते हैं। उन्होंने प्रवासियों के प्रति अधिक सामाजिक संवेदनशीलता की आवश्यकता पर बल दिया।

श्रमिकों के लिए लक्षित निवेश और कल्याणकारी उपायों के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने कहा कि इनके परिणामस्वरूप उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इस संदर्भ में, उन्होंने प्रवासियों पर भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद के एक अध्ययन का हवाला दिया। कल्याणकारी उपायों से कारखाना श्रमिकों की दक्षता में 1.38 गुना की वृद्धि हुई और उनके बच्चों के लिए पारिवारिक कल्याण, शिक्षा और भविष्य की संभावनाओं में सुधार हुआ। उन्होंने गौर किया कि कथित भेदभाव और अन्याय कभी-कभी हिंसा का रूप ले सकते हैं। यह रेखांकित करते हुए कि उचित मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना एक सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसे नए श्रम कोड और डिजिटल शासन प्रणालियों का समर्थन प्राप्त है, उन्होंने कोविड-19 के दौरान एनएचआरसी, भारत की पहलों पर प्रकाश डाला। 'वन नेशन वन राशन कार्ड' जैसी पहलों की सराहना करते हुए, उन्होंने कानूनों और उनके कार्यान्वयन के बीच के अंतर को पाटने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने मजबूत अंतरराज्यीय समन्वय, पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा, श्रमिकों के कौशल विकास और अनुपालन-आधारित प्रथाओं से अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की ओर बढ़ने का भी आह्वान किया।

एनएचआरसी, भारत के संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार ने तीन तकनीकी सत्रों का विवरण प्रस्तुत किया, जिनमें 'कानूनी और संस्थागत ढांचा: संरक्षण और कार्यान्वयन में कमियां', 'भारत में प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा में व्यवसायों की भूमिका' और 'भारत में प्रवासी श्रमिकों के संरक्षण और कल्याण को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक उपायों की पहचान: बहु-हितधारक दृष्टिकोण' शामिल थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रवासी श्रमिक अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स, घरेलू काम और दैनिक जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस संदर्भ में, उन्होंने स्मरण किया कि कैसे नोएडा, उत्तर प्रदेश में श्रम विरोध प्रदर्शन विकसित हुए थे। उन्होंने हाल के विधानसभा चुनावों के दौरान प्रवासी श्रमिकों के घर लौटने का भी जिक्र किया, जिससे श्रम की कमी पैदा हो गई थी और इसने शहरों एवं सार्वजनिक प्रणालियों को प्रभावित किया था।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के उप महाप्रबंधक श्री विमल भट्टर ने बताया कि कैसे ईएसजी रिपोर्टिंग के तहत 'बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट' (बीआरएसआऱ), एक सूचीबद्ध कंपनी के पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन (ईएसजी) प्रदर्शन का खुलासा करती है, जिसमें प्रवासी और अनुबंध श्रमिकों सहित श्रम कल्याण डेटा दर्ज किया जाता है। हालांकि, उन्होंने उल्लेख किया कि एमएसएमई और असंगठित क्षेत्र में उपस्थिति के कारण अधिकांश प्रवासी नियमन के दायरे से बाहर रह जाते हैं। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की नीति प्रभाग की उप महानिदेशक श्रीमती अनुजा बापट ने इस बात पर जोर दिया कि प्रवासी श्रमिकों को एक व्यापक पारिवारिक और पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पीएम विश्वकर्मा, पीएमईजीपी और उद्यम पंजीकरण जैसी एमएसएमई योजनाएं स्थानीय आजीविका का सृजन करके संकटपूर्ण पलायन को कम कर सकती हैं।

श्रम और रोजगार मंत्रालय के निदेशक श्री दीपांकर गुहा ने कहा कि ई-श्रम पोर्टल एक मजबूत आधार है, लेकिन इसका वास्तविक मूल्य प्रवासी श्रमिकों के कल्याण के लिए सरकारी योजनाओं में इसके डेटा के बेहतर एकीकरण और उपयोग पर निर्भर करता है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के संयुक्त निदेशक (सीएसआर) श्री के. सी. मीणा ने अनुपालन ढांचे और रिपोर्टिंग संरचनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि सूचीबद्ध कंपनियों के लिए कुछ रिपोर्टिंग दायित्व स्वैच्छिक या विकसित हो रहे हैं और वैधानिक आवश्यकताएं अलग-अलग हैं।

प्राक्सिस इंस्टीट्यूट फॉर पार्टिसिपेटरी प्रैक्टिसेज के सीईओ श्री टॉम थॉमस ने बेहतर डेटा प्रणालियों की आवश्यकता पर बल दिया, विशेष रूप से सामाजिक सुरक्षा कवरेज के लिए प्रवासी श्रमिकों को ट्रैक करने हेतु ई-श्रम पोर्टल जैसे प्लेटफार्मों को जोड़ने और मजबूत करने की बात कही। उन्होंने डेटाबेस के बीच डेटा प्रवाह में सुधार पर भी ध्यान केंद्रित किया ताकि आंशिक कवरेज भी नीतिगत लक्ष्य निर्धारण और कल्याण वितरण में महत्वपूर्ण सुधार ला सके।

डॉ. किशलय, रिसर्च एसोसिएट, सेंटर फॉर माइग्रेशन, मोबिलिटी एंड डायस्पोरा स्टडीज, भारतीय विश्व मामला परिषद ने निर्माण श्रमिकों पर ध्यान केंद्रित किया और उप-ठेकेदारी की समस्याओं, दस्तावेजों की कमी, कल्याणकारी योजनाओं से अलगाव और किफायती आवास व उचित न्यूनतम वेतन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) के कार्यालय प्रमुख श्री संजय अवस्थी ने व्यापार और मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के मार्गदर्शक सिद्धांतों के पालन, नैतिक भर्ती, शून्य भर्ती शुल्क, उप-ठेकेदारी श्रृंखलाओं में जवाबदेही और मजबूत शिकायत निवारण व डेटा प्रणालियों का आग्रह किया।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी भारत) की प्रतिनिधि और व्यापार व मानव अधिकार विशेषज्ञ सुश्री नुसरत ने प्रवासी श्रमिकों के प्रति कॉर्पोरेट जिम्मेदारी को अधिक स्पष्ट और क्षेत्र-विशिष्ट बनाने का आह्वान किया। उन्होंने जिम्मेदार व्यावसायिक आचरण पर राष्ट्रीय दिशानिर्देशों को अद्यतन करने और व्यापार व मानव अधिकारों पर मजबूत नीतिगत सामंजस्य का सुझाव दिया। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के विशेषज्ञ श्री इंसाफ निजाम ने केवल प्रवासियों के लिए ही नहीं बल्कि सभी श्रमिकों के लिए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण पर जोर दिया। उन्होंने संरचनात्मक और संस्थागत बाधाओं को दूर करने, श्रम कानूनों को बनाए रखने और शासन व प्रवर्तन प्रणालियों में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। वर्ल्ड बेंचमार्किंग एलायंस के एशिया पॉलिसी लीड श्री नमित अग्रवाल ने प्रवासी श्रमिकों के लिए वेतन संरचना के अंतर को संतुलित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

पार्टनर्स इन चेंज के निदेशक श्री प्रदीप नारायणन ने ईएसजी प्रकटीकरण में भारत के नेतृत्व को रेखांकित किया और ईएसजी रेटिंग को प्रवासी श्रमिक कल्याण से जोड़ने का प्रस्ताव रखा। पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के उप महासचिव डॉ. जतिंदर सिंह ने ई-श्रम पोर्टल को आधार, ईपीएफ, ईएसआईसी और राज्य की योजनाओं के साथ एकीकृत करने, क्यूआर-आधारित प्रवासी आईडी और एक राष्ट्रीय प्रवासी श्रम डैशबोर्ड बनाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने बहुभाषी शिकायत प्रणाली, ठेकेदारों द्वारा अनुपालन घोषणा, प्रस्थान-पूर्व प्रशिक्षण और बीआरएसआऱ रिपोर्टिंग में प्रवासी-विशिष्ट खुलासे का भी सुझाव दिया। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट के संस्थापक अध्यक्ष श्री एस. गिरिधया राजन ने वास्तविक समय के प्रवासन डेटा, क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेप और प्रवासियों को 'मेहमान' के बजाय 'स्थायी योगदानकर्ता' के रूप में मान्यता देने का आह्वान किया। उन्होंने निम्नस्तरीय जीवन स्थितियाँ, वेतन की चोरी, ओवरटाइम की कमी, सेवाओं में भाषाई बाधा, डिजिटल भुगतान, अंतरराज्यीय समन्वय और जलवायु संवेदनशीलता जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला। आजीविका ब्यूरो के निदेशक (ज्ञान और शिक्षण) श्री संतोष पूनिया ने स्वास्थ्य देखभाल तक प्रवासी श्रमिकों की पहुंच और 'एक ही नियम सब पर लागू' वाले दृष्टिकोण से दूर हटने की आवश्यकता का मुद्दा उठाया।

अन्य वक्ताओं में फिक्की के महासचिव, श्री अनंत स्वरूप; भारतीय उद्योग परिसंघ के प्रधान सलाहकार, श्री सुनील मिश्रा; सेबी के मुख्य महाप्रबंधक, डॉ. राजेश कुमार दांगेती; आईआईएम-बैंगलोर की प्रो. वसंती श्रीनिवास; आदित्य बिड़ला मैनेजमेंट कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड की वरिष्ठ उपाध्यक्ष, डॉ. विद्या टिकू; डीडब्ल्यूटी-दक्षिण एशिया की श्रम प्रवासन विशेषज्ञ, सुश्री कैथरीन लॉज़; व्यापार और मानव अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कार्य समूह की एशिया-प्रशांत सदस्य, सुश्री पिछामोन येओफंतोंग; सार्वजनिक उद्यम विभाग के संयुक्त निदेशक, श्री कैलाश भंडारी; आईआईएमएडी के संस्थापक अध्यक्ष, श्री एस. इरुदैया राजन; एनएचआरसी के विशेष मॉनिटर, श्री डी. एस. धपोला; और विशेष प्रतिवेदक, श्रीमती शोमिता बिस्वास, आदि शामिल थे।

चर्चा से निकले कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:

• प्रवासी श्रमिकों के मुद्दों के समाधान हेतु एक समन्वय परिषद की आवश्यकता।

• क्षेत्र-आधारित संघों और साझा भाषाई पहचान पर आधारित सदस्य नेटवर्कों पर ध्यान देना, ताकि प्रवासी श्रमिक सहायता और संवाद के लिए उनसे आसानी से जुड़ सकें।

• प्रवासी श्रमिकों की जिला-वार आवाजाही को ट्रैक करने के लिए राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक डैशबोर्ड विकसित करना।

• केवल ई-श्रम ही नहीं, बल्कि विभिन्न सरकारी प्रणालियों के डेटाबेस को जोड़कर और समन्वित कर एक एकीकृत प्रवासी श्रमिक सूचना तंत्र बनाना, ताकि रियल-टाइम शासन संभव हो सके।

• वैल्यू-चेन/सप्लाई-चेन प्रकटीकरण मानकों को अधिक व्यापक और समान बनाना, ताकि प्रवासी श्रमिकों का डेटा ईसीजी / बीआरएसआऱ प्रकार की रिपोर्टिंग का हिस्सा बने, केवल शीर्ष सूचीबद्ध कंपनियों तक सीमित न रहे।

• वस्त्र, गिग वर्क और निर्माण जैसे प्रवासी श्रमिक-प्रधान क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट कॉर्पोरेट जिम्मेदारी दिशानिर्देश लागू करना, केवल सामान्य व्यापारिक जिम्मेदारी ढाँचों पर निर्भर न रहना।

• प्रवासी श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक सलाहकार या परामर्श तंत्र बनाना, ताकि वे स्वयं नीति निर्माण में प्रत्यक्ष रूप से प्रतिनिधित्व कर सकें।

• विभागों के बीच संस्थागत समन्वय को परिचालन स्तर पर बेहतर बनाना, ताकि श्रमिक शिकायतों के समाधान में बहु-स्तरीय नौकरशाही देरी कम हो।

• जिला और रियल-टाइम स्तर पर प्रवासन डेटा प्रणालियों को अद्यतन करना, क्योंकि वर्तमान राष्ट्रीय डेटा को पुराना और संकट प्रबंधन के लिए अपर्याप्त बताया गया है।

• निर्माण, आतिथ्य और घरेलू कार्य जैसे क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं हेतु प्रवासी श्रमिकों की प्रमाणन प्रक्रिया को मानकीकृत करना, ताकि वे शिक्षा सहायता और बीमा जैसी सुविधाओं का लाभ उठा सकें।

• शहरी नियोजन ढाँचों में प्रवासी श्रमिकों की आवश्यकताओं को मुख्य घटक के रूप में शामिल करना, न कि बाद में विचार करने योग्य विषय के रूप में।

• मौजूदा योजनाओं से आगे बढ़कर पोर्टेबिलिटी व्यवस्था को मजबूत करना, ताकि राशन के साथ-साथ स्वास्थ्य, बीमा और अन्य कल्याणकारी अधिकारों तक अंतरराज्यीय पहुँच सुगम हो सके।

• व्यापार और मानव अधिकार ढाँचों के अंतर्गत विशेषकर अनौपचारिकता और सब-कॉन्ट्रैक्टिंग की अस्पष्टता को संबोधित करने हेतु ‘कॉर्पोरेट जिम्मेदारी’ की स्पष्ट व्याख्या विकसित करना।

• ईएसजी -आधारित प्रोत्साहन रेटिंग प्रणाली विकसित करना, ताकि प्रवासी श्रमिक कल्याण में सुधार करने वाली कंपनियों को बेहतर ईसीजी रेटिंग मिले और बाज़ार आधारित अनुपालन को बढ़ावा मिले।

• ‘अदृश्य वैल्यू चेन’ की पहचान और विनियमन करना, जहाँ कोई एक कंपनी जिम्मेदारी नहीं लेती; इसके लिए क्षेत्र की शीर्ष कंपनियों को संयुक्त रूप से जवाबदेह बनाना।

• एनएचआरसी/कोर ग्रुप मंचों में क्षेत्रीय उद्योग जगत के नेताओं को शामिल करना, ताकि व्यावहारिक और क्षेत्र-विशिष्ट प्रवासी कल्याण समाधान केवल नीति चर्चा तक सीमित न रहें सह-निर्मित किए जा सकें।

• पारंपरिक ट्रेड यूनियन संरचनाओं से बाहर के श्रमिकों के लिए सामूहिक सौदेबाजी में नवाचारों की शिक्षा को मजबूत करना।

• श्रम नीति में जाति-आधारित संवेदनशीलता विश्लेषण को शामिल करना, तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोगों और ऐतिहासिक रूप से प्रवासी समुदायों के साथ समन्वय स्थापित करना।

• ऐतिहासिक रूप से गतिशील आबादी के लिए मानव अधिकार , जाति और जनजातीय आयोगों के बीच समन्वित बहु-आयोगीय नीति प्रतिक्रियाएँ विकसित करना।

• ऐसी नीति संरचना स्थापित करना जो कार्यान्वयन-केंद्रित हो, ताकि चर्चाएँ केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित न रहें बल्कि व्यावहारिक तंत्रों में परिवर्तित हों।

• ठेकेदार-स्तर पर प्रवासी श्रमिक कल्याण घोषणाएँ अनिवार्य करना, जिनमें वेतन, सुरक्षा, आवास और भर्ती स्थितियों के अनुपालन का प्रमाणन शामिल हो।

• समयबद्ध और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र बनाना, ताकि शिकायतें केवल दर्ज न हों बल्कि निर्धारित समय सीमा में हल भी हों।

• उच्च-प्रवासन जिलों में संरचित प्री-डिपार्चर ओरिएंटेशन कार्यक्रम शुरू करना, जिनमें अधिकारों, अनुबंधों, वेतन और कानूनी सुरक्षा की जानकारी दी जाए।

• ईएसजी / बीआरएसआऱ ढाँचों में प्रवासी-विशिष्ट प्रकटीकरण अनुभाग शामिल करना, जिनमें पंजीकरण स्थिति, वेतन ऑडिट, शिकायत समाधान दर और आवास/सुरक्षा अनुपालन का विवरण हो।

• न्यूनतम वेतन के बजाय “जीविका योग्य वेतन” मानकों की ओर बढ़ना, जो वास्तविक शहरी जीवन-यापन लागत पर आधारित हों।

• प्रवासी-संवेदनशील शहरी नियोजन ढाँचे विकसित करना, जिनमें दीर्घकालिक आवास और सेवाओं तक पहुँच को शामिल किया जाए।

• वेतन चोरी कम करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए पेरोल रिकॉर्ड से जुड़े डिजिटल वेतन भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देना।

• विशेष रूप से अधिक पलायन वाले और अधिक आगमन वाले राज्यों के बीच अंतर-राज्यीय प्रवासन कॉरिडोर समन्वय तंत्र को मजबूत करना।

आयोग सरकार को अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने के लिए विभिन्न सुझावों पर आगे विचार-विमर्श करेगा।

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