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Santosh Mishra vs State Of Chhattisgarh
2026 Latest Caselaw 1903 Chatt

Citation : 2026 Latest Caselaw 1903 Chatt
Judgement Date : 21 April, 2026

[Cites 7, Cited by 0]

Chattisgarh High Court

Santosh Mishra vs State Of Chhattisgarh on 21 April, 2026

                                                                 1 / 16
                                                      {Cr. A. No.-2273 of 2025}




                                                                                      2026:CGHC:18118


                                                                                                        प्रतिवेद्य


                                                   छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर

                                                  निर्णय सुरक्षित दिनांक-27/03/2026

                                                  निर्णय उद्घोषित दिनांक-21/04/2026

                                                  दाण्डिक अपील क्रमांक-2273/2025


                             संतोष मिश्रा पिता-ओमप्रकाश मिश्रा, उम्र-लगभग 52 वर्ष, निवासी-ग्राम-नरसिंहपुर,

                              पुलिस थाना व तहसील-राजपुर, जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज, छत्तीसगढ़

                                                                                      -----अपीलार्थी/अभियुक्त


                                                                  विरूद्घ


                         1.

छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा थाना प्रभारी, पुलिस थाना-राजपुर, जिला-बलरामपुर-

रामानुजगंज, छत्तीसगढ़ (राज्य)

2. जगवंशी यादव पिता-शिवमंगल यादव, उम्र-लगभग 38 वर्ष, निवासी-ग्राम-डांडखंडु वा,

नया राजपुर, पुलिस थाना-राजपुर, जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज, छत्तीसगढ़ (प्रार्थी)

-----उत्तरवादीगण

अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा : श्री गगन पाण्डेय, अधिवक्ता ।

उत्तरवादी/राज्य द्वारा : श्री अनीश तिवारी, उप शासकीय अधिवक्ता ।




                                                   न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल



         Digitally
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POMAN    DEWANGAN
DEWANGAN Date:
         2026.04.21
         15:08:15
         +0530

                                {Cr. A. No.-2273 of 2025}



                                  !! सी.ए.वी. निर्णय !!


1. धारा 14(क)(i) अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण)

अधिनियम, 1989 (जिसे आगे संक्षेप में "विशेष अधिनियम" से संबोधित किया जा रहा है)

के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में विचारण न्यायालय-विशेष न्यायाधीश (विशेष

अधिनियम), बलरामपुर स्थान रामानुजगंज, छत्तीसगढ़ द्वारा विशेष सत्र प्रकरण (एट्रो.)

क्रमांक-37/2025 "छत्तीसगढ़ राज्य विरूद्घ संतोष कु मार मिश्रा" में दिनांक-10/10/

2025 को अपीलार्थी पर विरचित आरोप अंतर्गत धारा-296 भारतीय न्याय संहिता,

2023 तथा विशेष अधिनियम की धारा-3(1)(ध) को चुनौती दी गई है । उक्त आदेश को

आगे संक्षेप में "प्रश्नाधीन आदेश" से संबोधित किया जा रहा है ।

2. तथ्य संक्षेप में इस प्रकार है कि अपीलार्थी/अभियुक्त संतोष मिश्रा, जनपद पंचायत राजपुर

में सहायक श्रेणी-III के पद पर कार्यरत है । अभिलेख से यह परिलक्षित होता है कि

संबंधित क्षेत्र के निर्वाचित विधायक, जो वर्तमान में मंत्री पद पर आसीन हैं, तथा उसी जिले

के अन्य विधानसभा क्षेत्र की एक अन्य महिला विधायक, जो अनुसूचित जनजाति वर्ग से

संबंधित हैं (जिन्हें आगे संक्षेप में क्रमशः 'मंत्री जी' एवं 'विधायक' के रूप में संबोधित

किया गया है), प्रकरण की पृष्ठभूमि से संबंधित हैं । उक्त दोनों जनप्रतिनिधि छत्तीसगढ़

शासन के सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं तथा आदिवासी

समाज से संबंध रखते हैं ।

3. अभियोजन का मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि प्रार्थी/शिकायतकर्ता जगवंशी यादव,

भारतीय जनता पार्टी के राजपुर मण्डल के अध्यक्ष हैं । दिनांक 17.07.2025 को उन्हें

भारतीय जनता पार्टी के बरियो मण्डल अध्यक्ष जितेन्द्र जायसवाल द्वारा 'व्हाट्सऐप' एवं

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

दूरभाष के माध्यम से यह सूचना दी गई कि अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा 'मंत्री जी' एवं

'विधायक' के प्रति खुलेआम जातिसूचक गाली-गलौज करते हुए आदिवासी समाज तथा

भारतीय जनता पार्टी को अपमानित किया गया, जिससे क्षेत्र में आक्रोश व्याप्त हो गया ।

उक्त शिकायत के आधार पर थाना नया राजपुर, जिला बलरामपुर (छत्तीसगढ़) में उसी

दिन अपराध क्रमांक 165/2025 पंजीबद्ध किया गया । विवेचना के दौरान शिकायतकर्ता

से संबंधित ध्वनि-अंकन (ऑडियो क्लिप) युक्त पेन ड्राइव जब्त की गई, जिसके संबंध में

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63(4)(ग) के अंतर्गत प्रमाणपत्र प्रस्तुत

किया गया । साथ ही अपीलार्थी का नियुक्ति प्रमाणपत्र जब्त किया गया, साक्षियों के कथन

लेखबद्ध किए गए तथा विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।

4. अपीलार्थी/अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की

धारा 296 के अंतर्गत आरोप के लिए आवश्यक 'अश्लीलता' तथा 'लोक स्थान अथवा

उसके समीप' होने के तत्व प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं होते, अतः उक्त धारा के अंतर्गत

आरोप की रचना विधिसंगत नहीं है । यह तर्क दिया गया है कि 'मंत्री जी' का पुलिस द्वारा

कथन नहीं लिया गया है तथा महिला विधायक द्वारा इस अपील में अनापत्ति व्यक्त की गयी

है । यह भी तर्क किया गया है कि शिकायतकर्ता जगवंशी यादव इस प्रकरण में पीड़ित की

श्रेणी में नहीं आते, अतः उनके द्वारा प्रस्तुत शिकायत विधि की दृष्टि में ग्राह्य नहीं है । यह

भी तर्क किया गया है कि विशेष अधिनियम के अंतर्गत यह आवश्यक है कि कथित अपराध

लोक दृष्टि में आने वाले स्थान पर घटित हुआ हो, जिसे अभियोजन द्वारा प्रथमदृष्टया

स्थापित नहीं किया गया है । इस संबंध में कोई विशेष या स्पष्ट साक्ष्य संकलित नहीं किया

गया है । कथित ध्वनि-अंकन (ऑडियो क्लिप) का न तो लिप्यांतरण किया गया है और

न ही यह स्पष्ट है कि उसमें कौन-कौन से शब्द प्रयुक्त हुए हैं । यह भी स्पष्ट नहीं है कि

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

उक्त ध्वनि-अंकन किसके द्वारा प्रसारित किया गया, किस स्थान पर तैयार किया गया तथा

किस स्थान पर सुना गया । विद्वान अधिवक्ता का यह भी तर्क है कि विवेचना के दौरान

कथित घटनास्थल का कोई नक्शा तैयार नहीं किया गया, जिससे उसे 'लोक दृष्टि में आने

वाले स्थान' के रूप में स्थापित किया जा सके । साथ ही, कथित जातिसूचक गाली-

गलौज किसी विशिष्ट व्यक्ति के समक्ष किए जाने का भी कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं

है । अपीलार्थी/अभियुक्त की आवाज का नमूना नहीं लिया गया, न ही उसका कोई दूरभाष

उपकरण जब्त किया गया है, और न ही ऐसा कोई साक्ष्य संकलित किया गया है जिससे यह

स्थापित हो सके कि उक्त ध्वनि-अंकन का प्रसारण अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा किया गया ।

उपर्युक्त परिस्थितियों में यह तर्क दिया गया है कि धारा 296 भारतीय न्याय संहिता एवं

विशेष अधिनियम की धारा 3(1)(ध) के आवश्यक तत्वों की पूर्ति नहीं होती है, तथा

उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर विचारण जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा ।

अतः अपील स्वीकार करते हुए 'प्रश्नाधीन आदेश' अपास्त किया जाए तथा अपीलार्थी/

अभियुक्त को आरोपित अपराध से उन्मुक्त किया जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क

के समर्थन में निम्नवत न्यायदृष्टांतों का भी हवाला दिया गया है-

I. N.S. Madhanagopal and another v. K. Lalitha, (2022) 17 SCC

818.

II. Karuppudayar v. State Rep. by the Deputy Superintendent of Police, Lalgudi Trichy & Ors., SLP (Criminal) No. 8779-8779 of 2024 dated 31.01.2025(2025 INS 132).

III. Bhagwant Singh Randhawa and another v. State of Punjab, CRM-

P No.-42685 of 2021 (O&M).

5. राज्य/उत्तरवादी क्रमांक-1 के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि विवेचना के दौरान संबंधित

महिला विधायक का कथन पुलिस द्वारा अभिलिखित किया गया है, जिसमें उन्होंने कथित

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

ध्वनि-अंकन (ऑडियो क्लिप) को सुनकर स्वयं के क्षुब्ध होने का उल्लेख किया है । उक्त

ध्वनि-अंकन को एक विशिष्ट जाति वर्ग को अपमानित एवं क्षुब्ध करने के आशय से प्रसारित

किया गया, अतः 'पीड़ित' की परिधि में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित होते हैं जिन्होंने उक्त

ध्वनि-अंकन को सुना और जिनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ । उक्त महिला विधायक का जाति

प्रमाणपत्र अभिलेख पर उपलब्ध है । अपीलार्थी/अभियुक्त, अनुसूचित जाति/जनजाति

वर्ग का सदस्य नहीं है । अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा उक्त ध्वनि-अंकन को सामान्य जन के

मध्य 'व्हाट्सऐप' समूह के माध्यम से जानबूझकर प्रसारित किया गया, जिससे भारतीय

न्याय संहिता, 2023 की धारा 296 तथा विशेष अधिनियम की धारा 3(1)(ध) के

आवश्यक तत्वों की पूर्ति होती है । अपीलार्थी पक्ष के तर्क स्वीकार्य नहीं हैं अतः अपील

निरस्त किया जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में Sooraj V.

Sukumar v. State of Kerala Represented by Public Prosecutor and

Another के न्यायदृष्टांत का हवाला दिया गया है ।

6. इस अपील के संबंध में पीड़िता (महिला विधायक) को विधिवत् सूचना प्रेषित की गई थी ।

जिसके अनुपालन में पीड़िता द्वारा दिनांक 12.01.2026 को संबंधित जिला विधिक सेवा

प्राधिकरण के माध्यम से आभासी रूप से उपस्थित हुई तथा इस अपील के संबंध में कोई

आपत्ति न होने की अभिव्यक्ति की गई ।

7. उभयपक्ष के तर्क श्रवण किए गए और विचारण न्यायालय के मूल अभिलेख तथा इस

अपीलीय न्यायालय के अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।

8. विचारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थी/अभियुक्त पर "प्रश्नाधीन आदेश" के तहत विरचित

आरोप निम्नानुसार हैः-

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

"1. आपने दिनांक 17.07.2025 को शाम 14.12 बजे, राजपुर, जिला-बलरामपुर-रामानुजगंज (छ.ग.) में मंत्री (xxxx) एवं सामरी विधायक (xxxx) जो कि अनुसूचित जनजाति की सदस्य है, को जातिगत एवं अश्लील गाली गुप्तार कर उसे वाट्सअप ग्रुप में प्रसारित कर उन्हे व सुनने वालो को क्षोभ कारित किया ।

2. उक्त दिनांक, समय व स्थान पर आप स्वयं अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न होते हुए, मंत्री (xxxx) एवं सामरी विधायक (xxxx) जो कि अनुसूचिज जनजाति की सदस्य है, को जातिगत एवं अश्लील गाली गुप्तार कर उसे वाट्सअप ग्रुप में प्रसारित कर उन्हे व सुनने वालो को क्षोभ कारित किया ।"

9. सर्वप्रथम, अपीलार्थी पक्ष द्वारा 'पीड़ित' की स्थिति के संबंध में उठाए गए प्रश्न पर विचार

किया जाना अपेक्षित है । इस संदर्भ में अभिलेख का अवलोकन करने पर यह परिलक्षित

होता है कि 'मंत्री जी' का कोई कथन पुलिस द्वारा अभिलिखित नहीं किया गया है, जबकि

संबंधित महिला विधायक का कथन अवश्य अभिलिखित किया गया है । यह भी निर्विवाद

है कि अपीलार्थी/अभियुक्त स्वयं अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति वर्ग का

सदस्य नहीं है तथा इस संबंध में उसके द्वारा कोई दावा भी प्रस्तुत नहीं किया गया है ।

अभिलेख पर उपलब्ध जाति प्रमाणपत्र से यह स्पष्ट होता है कि उक्त महिला विधायक

'कं वर' जाति से संबंधित हैं, जो अनुसूचित जनजाति वर्ग में आती है, जबकि 'मंत्री जी' के

संबंध में कोई जाति प्रमाणपत्र अभिलेख पर उपलब्ध नहीं है । यह भी परिलक्षित होता है

कि पुलिस में प्रस्तुत लिखित शिकायत एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी द्वारा की गई है

तथा महिला विधायक के अतिरिक्त जिन अन्य साक्षियों के कथन अभिलिखित किए गए हैं,

वे भी उसी राजनीतिक दल अथवा संबंधित जाति वर्ग से संबद्ध व्यक्ति हैं ।

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

10. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की

धारा-2 (ङग) में "पीड़ित" को निम्नानुसार परिभाषित किया गया हैः-

"(ङग) "पीड़ित" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन 'अनूसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति' की परिभाषा के भीतर आता है तथा जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के होने के परिणामस्वरूप शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक या धनीय हानि या उसकी संपत्ति को हानि वहन या अनुभव करता है और जिसके अंतर्गत उसके नातेदार विधिक संरक्षक और विधिक वारिस भी हैं;"

11. पीड़ित की उपर्युक्त परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि यदि अनुसूचित जाति अथवा

अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसी व्यक्ति को अधिनियम में परिभाषित अपराध के

परिणामस्वरूप शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक अथवा आर्थिक हानि होती

है, या उसकी संपत्ति को क्षति पहुँचती है, तो वह 'पीड़ित' की श्रेणी में आएगा ।

12. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा-296 निम्नानुसार हैः-

"296. अश्लील कार्य और गाने-जो कोई,-

(क) किसी लोक स्थान में कोई अश्लील कार्य करता है; या

(ख) किसी लोक स्थान में या उसके समीप कोई अश्लील गाने, 'पवांड़े' या

शब्द गाएगा, सुनाएगा या उच्चारित करेगा, जिससे दूसरों को क्षोभ होता

हो,

वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास

तक की हो सके गी, या जुर्माने से जो एक हजार रूपये तक का हो सके गा, या

दोनों में से, दण्डित किया जाएगा ।"

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

13. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की

धारा-3 (1)(ध) में "पीड़ित" को निम्नानुसार परिभाषित किया गया हैः-

"3. अत्याचार के अपराधों के लिए दंड़-(1) कोई भी व्यक्ति, जो अनुसूचित

जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है,-

(ध) लोक दृष्टि में आने वाले किसी स्थान पर जाति के नाम से अनुसूचित

जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को गाली गलौज करेगा;

वह, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी, किं तु

जो पांच वर्ष तक की हो सके गी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।"

14. विचाराधीन मामले में यह परिलक्षित होता है कि न के वल संबंधित महिला विधायक ने अपने

पुलिस कथन में क्षोभ/पीड़ा व्यक्त की है, बल्कि उनके जाति वर्ग के अन्य व्यक्तियों द्वारा भी

क्षोभ व्यक्त किया गया है । ऐसी स्थिति में यह अपेक्षित नहीं है कि शिकायत अनिवार्यतः

उस व्यक्ति द्वारा ही प्रस्तुत की जाए जिसके विषय में कहा गया है । यदि शिकायत किसी

अन्य व्यक्ति द्वारा की गई हो, किन्तु संबंधित जाति वर्ग के व्यक्तियों द्वारा क्षोभ व्यक्त किया

गया हो, तो मात्र इस आधार पर शिकायत को असंगत अथवा अभियोजन संचालन हेतु

अपर्याप्त नहीं ठहराया जा सकता । धारा 296 भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रावधान

अनुसार "दूसरों को क्षोभ होता हो" से भी हर वह व्यक्ति पीड़ित माना जाएगा जिसे क्षोभ

होता है । विशेष अधिनियम का उद्देश्य ही वर्ग विशेष को अत्याचार से निवारण प्रदान करना

है । अतः, अपीलार्थी पक्ष का यह प्रथम तर्क स्वीकार योग्य नहीं पाया जाता कि

शिकायतकर्ता, पीड़ित की श्रेणी में नहीं आता इसलिये आपराधिक मामला चलने योग्य नहीं

है ।

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

15. अपीलार्थी/अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की

धारा 296 के अंतर्गत अपराध स्थापित करने हेतु यह आवश्यक है कि अभियुक्त द्वारा

'अश्लील' शब्दों का उच्चारण किया गया हो, जिससे अन्य व्यक्तियों में क्षोभ उत्पन्न हुआ

हो । अपने इस तर्क के समर्थन में विद्वान अधिवक्ता ने N.S. Madhanagopal (पूर्वोक्त)

के न्यायदृष्टांत का हवाला दिया है, जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा 'अश्लीलता'

की अवधारणा के संबंध में अभिमत व्यक्त किया गया है, जो निम्नानुसार है--

"6. Section 294(b)IPC talks about the obscene acts and songs.

Section 294IPC as a whole reads thus:

"294. Obscene acts and songs.--Whoever, to the annoyance of others--

(a) does any obscene act in any public place, or

(b) sings, recites or utters any obscene songs, ballad or words, in or near any public place, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three months, or with fine, or with both."

7. It is to be noted that the test of obscenity under Section 294(b)IPC is whether the tendency of the matter charged as obscenity is to deprave and corrupt those whose minds are open to such immoral influences. The following passage from the judgment authored by K.K. Mathew, J. (as his Lordship then was) reported in P.T. Chacko v. Nainan Chacko [P.T. Chacko v. Nainan Chacko, 1967 SCC OnLine Ker 125 : 1967 KLT 799] explains as follows : (SCC OnLine Ker paras 5-6)

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

"5. The only point argued was that the 1st accused has not committed an offence punishable under Section 294(b)IPC, by uttering the words above-mentioned. The courts below have held that the words uttered were obscene and the utterance caused annoyance to the public. I am not inclined to take this view. In R. v. Hicklin [R. v. Hicklin, (1868) LR 3 QB 360] , QB at p.

371 Cockburn, C.J. Laid down the test of "obscenity" in these words : (QB p. 371)

'... the test of obscenity is this, whether the tendency of the matter charged as obscenity is to deprave and corrupt those whose minds are open to such immoral influences....'

6. This test has been uniformly followed in India.

The Supreme Court has accepted the correctness of the test in Ranjit D. Udeshi v. State of Maharashtra [Ranjit D. Udeshi v. State of Maharashtra, 1964 SCC OnLine SC 52 : AIR 1965 SC 881] . In Roth v. United States [Roth v. United States, 1957 SCC OnLine US SC 106 : 1 L Ed 2d 1498 : 354 US 476 (1957)] , Chief Justice Warren said that the test of "obscenity" is the 'substantial tendency to corrupt by arousing lustful desires'. Mr Justice Harlan observed that in order to be "obscene" the matter must "tend to sexually impure thoughts". I do not think that the words uttered in this case have such a tendency. It may be that the words are defamatory of the complainant, but I do not think that the words

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

are "obscene" and the utterance would constitute an offence punishable under Section 294(b)IPC."

16. उपर्युक्त न्यायदृष्टांत में प्रतिपादित 'अश्लीलता' की अवधारणा के आलोक में विचाराधीन

प्रकरण के तथ्यों का परीक्षण करने पर यह परिलक्षित होता है कि जिस कथित ध्वनि-

अंकन (ऑडियो क्लिप) के प्रसारण का आरोप अपीलार्थी/अभियुक्त संतोष मिश्रा पर

लगाया गया है, उसके संबंध में न तो अपीलार्थी का कोई दूरभाष यंत्र जब्त किया गया है

और न ही उसकी आवाज का नमूना संकलित किया गया है । अभिलेख से यह भी स्पष्ट है

कि शिकायतकर्ता जगवंशी यादव द्वारा धारा 63(4)(ग) भारतीय साक्ष्य अधिनियम,

2023 के अंतर्गत प्रमाणपत्र सहित जो पेन ड्राइव प्रस्तुत की गई, उसका कोई लिप्यांतरण

तैयार नहीं किया गया है । यद्यपि लिखित शिकायत एवं साक्षियों के कथनों में इस तथ्य का

उल्लेख है कि उक्त ध्वनि-अंकन में जातिसूचक एवं अश्लील गाली-गलौज की गई है,

तथापि किन विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया, इसका कोई स्पष्ट एवं ठोस विवरण किसी

भी कथन में उपलब्ध नहीं है । यह भी परिलक्षित होता है कि उक्त ध्वनि-अंकन को

चलाकर सुनने संबंधी कोई पंचनामा तैयार नहीं किया गया है । परिणामतः, वर्तमान

अभिलेखीय स्थिति में यह परीक्षण करना संभव नहीं है कि विवादित ध्वनि-अंकन में कथित

रूप से प्रयुक्त शब्द वास्तव में जातिसूचक अथवा अश्लील थे या नहीं, अथवा वे किसी वर्ग

विशेष को अपमानित या क्षुब्ध करने वाले थे । अतः, उपर्युक्त न्यायदृष्टांत के आलोक में,

कथित शब्दों की प्रकृ ति के संबंध में कोई निश्चित अभिमत इस स्तर पर व्यक्त किया जाना

संभव नहीं है ।

17. अपीलार्थी/अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता का प्रमुख तर्क यह है कि भारतीय न्याय संहिता,

2023 की धारा 296 के अंतर्गत कथित घटना के संबंध में कोई विशिष्ट स्थान का उल्लेख

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

नहीं किया गया है, जिसके आधार पर उसे 'लोक स्थान' के रूप में निरूपित किया जा सके

अथवा यह स्थापित किया जा सके कि वह स्थान विशेष अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप

'लोक दृष्टि में आने वाला स्थान' था ।

18. अपीलार्थी/अभियुक्त के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत Karuppudayar (पूर्वोक्त) में

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित कण्डिका निम्नानुसार है--

"9. A perusal of Section 3(1)(r) of the SC-ST Act would reveal that for constituting an offence thereunder, it has to be established that the accused intentionally insults or intimidates with intent to humiliate a member of a Scheduled Caste or a Scheduled Tribe in any place within public view. Similarly, for constituting an offence under Section 3(1)(s) of the SC-ST Act, it will be necessary that the accused abuses any member of a Scheduled Caste or a Scheduled Tribe by caste name in any place within public view.

10. The term "any place within public view" initially came up for consideration before this Court in the case of Swaran Singh v. State through Standing Counsel, (2008) 8 SCC 435. This Court in the case of Hitesh Verma v. State of Uttarakhand, (2020) 10 SCC 710 referred to Swaran Singh (supra) and reiterated the legal position as under:

"14. Another key ingredient of the provision is insult or intimidation in "any place within public view". What is to be regarded as "place in public view" had come up for consideration before this Court in the judgment reported as Swaran Singh v. State [Swaran Singh v. State, (2008) 8 SCC 435 : (2008) 3 SCC (Cri) 527].

The Court had drawn distinction between the

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

expression "public place" and "in any place within public view". It was held that if an offence is committed outside the building e.g. in a lawn outside a house, and the lawn can be seen by someone from the road or lane outside the boundary wall, then the lawn would certainly be a place within the public view. On the contrary, if the remark is made inside a building, but some members of the public are there (not merely relatives or friends) then it would not be an offence since it is not in the public view (sic) [Ed. : This sentence appears to be contrary to what is stated below in the extract from Swaran Singh, (2008) 8 SCC 435, at p. 736d-e, and in the application of this principle in para 15, below:"Also, even if the remark is made inside a building, but some members of the public are there (not merely relatives or friends) then also it would be an offence since it is in the public view."]. The Court held as under : (SCC pp. 443-44, para

28)

"28. It has been alleged in the FIR that Vinod Nagar, the first informant, was insulted by Appellants 2 and 3 (by calling him a "chamar") when he stood near the car which was parked at the gate of the premises.

In our opinion, this was certainly a place within public view, since the gate of a house is certainly a place within public view. It could have been a different matter had the alleged offence been committed inside a building, and also was not in the public view. However, if the offence is committed outside the building e.g. in a lawn outside a house, and the lawn can be seen by someone from the road or lane outside the boundary wall, the lawn would certainly be a place within the public view. Also, even if the remark is made inside a

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

building, but some members of the public are there (not merely relatives or friends) then also it would be an offence since it is in the public view. We must, therefore, not confuse the expression "place within public view" with the expression "public place". A place can be a private place but yet within the public view. On the other hand, a public place would ordinarily mean a place which is owned or leased by the Government or the municipality (or other local body) or gaon sabha or an instrumentality of the State, and not by private persons or private bodies." (emphasis in original)"

11. It could thus be seen that, to be a place 'within public view', the place should be open where the members of the public can witness or hear the utterance made by the accused to the victim. If the alleged offence takes place within the four corners of the wall where members of the public are not present, then it cannot be said that it has taken place at a place within public view."

19. उपर्युक्त न्यायदृष्टांतों के आलोक में विचाराधीन प्रकरण के तथ्यों का परीक्षण करने पर यह

स्पष्ट होता है कि कथित ध्वनि-अंकन (ऑडियो क्लिप) से संबंधित घटना का कोई विशिष्ट

स्थान अभियोजन द्वारा अभिलेख पर स्पष्ट नहीं किया गया है, न ही अभियोजन का यह

मामला है कि उक्त घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी है । अभिलेख से यह भी परिलक्षित

होता है कि उक्त ध्वनि-अंकन के प्रसारण अथवा परिचालन के संबंध में अपीलार्थी/

अभियुक्त के विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य संकलित नहीं किया गया है । यद्यपि कु छ साक्षियों

द्वारा यह कथन किया गया है कि उसमें आवाज़ अपीलार्थी की है, तथापि इसकी पुष्टि हेतु न

तो अपीलार्थी की आवाज का नमूना लिया गया है और न ही कोई वैज्ञानिक परीक्षण कराया

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

गया है । इसी प्रकार, उक्त घटना किस स्थान पर घटित हुई, इस संबंध में भी कोई साक्ष्य

संकलित नहीं है । न ही यह स्पष्ट किया गया है कि कथित ध्वनि-अंकन को शिकायतकर्ता

अथवा अन्य साक्षियों द्वारा कब और कहाँ सुना गया । साथ ही, पुलिस द्वारा कथित

घटनास्थल का कोई नक्शा भी तैयार नहीं किया गया है । यही कारण है कि विरचित

आरोप में भी घटनास्थल के रूप में किसी विशिष्ट स्थान का उल्लेख नहीं है । उपर्युक्त

परिस्थितियों में, यह निष्कर्षित करना संभव नहीं है कि कथित घटना किसी 'लोक स्थान'

पर घटित हुई अथवा वह 'लोक दृष्टि में आने वाला स्थान' था ।

20. राज्य के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत Sooraj (पूर्वोक्त) में माननीय के रल उच्च

न्यायालय द्वारा 'लोक दृष्टि' की अवधारणा को निम्न अभिमत के माध्यम से स्पष्ट किया

गया है--

"29. The digital presence of persons through the internet has brought a change to the concept, purport and meaning of the word 'public view' in sections 3(1)(r) and 3(1)(s). When the victim accesses the content already uploaded to the internet, she becomes directly and constructively present for the purpose of applying the penal provisions of the Act. Thus, when insulting or abusive content is uploaded to the internet, the victim of the abuse or insult can be deemed to be present each time she accesses it. The third ingredient of sections 3(1)(r) and 3(1)(s) of the Act is also thus satisfied."

21. इस न्यायदृष्टांत वाले मामले में समाचार प्रसारण माध्यम द्वारा साक्षात्कार का दृश्य-श्रव्य

प्रसारण किया गया था तथा उसके प्रसारण का स्थान भी स्पष्ट रूप से ज्ञात था, जबकि

विचाराधीन प्रकरण के तथ्य इससे पूर्णतः भिन्न हैं । इसलिए उक्त न्यायदृष्टांत का लाभ

{Cr. A. No.-2273 of 2025}

अभियोजन/राज्य पक्ष को प्राप्त नहीं होता ।

22. उपर्युक्त विवेचना के आधार पर यह न्यायालय पाती है कि मामले में 'लोक स्थान' अथवा

'लोक दृष्टि में आने वाले स्थान' के संबंध में आवश्यक साक्ष्य संकलित नहीं किए गए हैं,

तथा पुलिस विवेचना में अन्य महत्वपूर्ण कमियां भी परिलक्षित होती हैं । फलतः अपीलार्थी

/अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्टया आरोप स्थापित नहीं होते । ऐसी स्थिति में विचारण को

जारी रखा जाना न्यायालय के समय का अपव्यय होगा तथा न्यायिक प्रक्रिया का समुचित

उपयोग नहीं कहा जा सकता । अतः 'प्रश्नाधीन आदेश' के तहत विरचित आरोप स्थिर

रखे जाने योग्य नहीं हैं । परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की जाती है । 'प्रश्नाधीन

आदेश' अपास्त किया जाता है तथा अपीलार्थी/अभियुक्त को भारतीय न्याय संहिता,

2023 की धारा 296 एवं विशेष अधिनियम की धारा 3(1)(ध) के आरोप से उन्मुक्त

किया जाता है ।

23. निर्णय की प्रति के साथ विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख आवश्यक कार्यवाही हेतु

सूचनार्थ एवं अनुपालनार्थ शीघ्रतापूर्वक प्रेषित हो ।

सही/-

(संजय कु मार जायसवाल)

न्यायाधीश

पोमन

 
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