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Ku. Anupama Narang vs Ravi Lal Jogi
2026 Latest Caselaw 1864 Chatt

Citation : 2026 Latest Caselaw 1864 Chatt
Judgement Date : 20 April, 2026

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Chattisgarh High Court

Ku. Anupama Narang vs Ravi Lal Jogi on 20 April, 2026

                                                                     1/6
                                                        {Acq. A. No.-308 of 2019}




                                                                                            2026:CGHC:17837-DB

                                                                                                           अप्रतिवेद्य


                                                     छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर


                                                    दोषमुक्ति अपील क्रमांक-308/2019


                            ABC

                                                                                       -----अपीलार्थी/शिकायतकर्ता

                                                                     विरूद्घ

                        1.

रवि लाल जोगी पिता-ईतवारी राम जोगी, उम्र-लगभग 19 वर्ष, निवासी-ग्राम गुड़ेला

भाठा, पुलिस थाना-पिथौरा, जिला-महासमुंद, छत्तीसगढ़ (अभियुक्त)

2. छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा जिला दण्डाधिकारी, महासमुंद, जिला-महासमुंद, छत्तीसगढ़,

(राज्य)

-----उत्तरवादीगण

अपीलार्थी/शिकायतकर्ता द्वारा : श्री किशन कु मार यादव, अधिवक्ता ।

अभियुक्त/उत्तरवादी क्रमांक-1 : ज़मील अख़्तर लोहानी, अधिवक्ता ।

राज्य/उत्तरवादी क्रमांक-2 : श्री दीपक कु मार सिंह, पैनल अधिवक्ता ।

युगल पीठः माननीय न्यायमूर्ति श्री नरेन्द्र कु मार व्यास, न्यायाधीश

माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल, न्यायाधीश

!! निर्णय पीठ पर पारित !!

द्वारा संजय कु मार जायसवाल, न्यायाधीश

Digitally signed by POMAN POMAN DEWANGAN DEWANGAN Date:

2026.04.21 13:05:36 +0530

{Acq. A. No.-308 of 2019}

20/04/2026

1. प्रारंभिक स्तर पर तर्क सुने गए ।

2. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-372 के तहत दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत इस

अपील में विचारण न्यायालय-द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, महासमुंद, जिला-महासमुंद,

छत्तीसगढ़ द्वारा सत्र प्रकरण क्रमांक-63/2012 "छत्तीसगढ़ राज्य विरूद्घ रवि लाल

जोगी" में पारित निर्णय दिनांक-30.01.2013 की वैधता को चुनौती दी गई है । जिसके

तहत अभियोजन का मामला प्रमाणित न पाते हुए अभियुक्त को धारा-376 भारतीय दण्ड

संहिता, 1860 के अपराध से दोषमुक्त किया गया । जिसे आगे संक्षेप में "प्रश्नाधीन

निर्णय" कहा गया है ।

3. प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं कि दिनांक 19.06.2012 को अभियोक्त्री के पिता

(अ.सा.-2) द्वारा यह सूचना दी गई कि उसकी लगभग 19 वर्ष आयु की पुत्री दिनांक

18.06.2012 को समय लगभग 12:00 बजे बिना किसी को बताए घर से कहीं चली गई

तथा वापस नहीं लौटी । पिता द्वारा अपने स्तर पर पर्याप्त खोजबीन किए जाने के बावजूद

उसका कोई पता नहीं चल सका, जिस पर पुलिस थाना पिथौरा, जिला महासमुंद में गुम

इंसान क्रमांक 36/12 दर्ज कर जांच प्रारंभ की गई । जांच के दौरान पिता द्वारा यह

आशंका व्यक्त की गई कि अभियुक्त रविलाल जोगी, जो पूर्व से उसकी पुत्री के संपर्क में था,

उसे बहला-फु सलाकर अपने साथ ले गया है । गुमशुदगी जांच के दौरान दिनांक 23.06.

2012 को अभियोक्त्री को बरामद किया गया तथा उसके कथन लिए गए, जिसमें उसने

आरोप लगाया कि अभियुक्त उसे अपने साथ ग्राम भीखापाली ले जाकर अपने पास रखकर

उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके साथ बलात्कार किया । अभियोक्त्री के उक्त कथन के

{Acq. A. No.-308 of 2019}

आधार पर पुलिस थाना पिथौरा, जिला महासमुंद में प्रथम सूचना पत्र 163/2012

पंजीबद्ध कर धारा 363, 366 एवं 376 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत अपराध कायम

कर विवेचना की गई । अभियुक्त एवं अभियोक्त्री का चिकित्सीय परीक्षण कराया गया,

घटना के समय पहने गए वस्त्र जप्त किए गए, घटना स्थल का नजरी नक्शा तैयार किया गया

तथा अन्य साक्षियों के कथन अभिलिखित किए गए । जप्त वस्तुओं को विधि विज्ञान

प्रयोगशाला परीक्षण हेतु प्रेषित किया गया । विवेचना के दौरान अभियुक्त को गिरफ्तार

किया गया तथा संपूर्ण विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।

4. आरोप के प्रमाणन वास्ते अभियोजन की ओर से अपने पक्ष समर्थन में 12 साक्षियों का

परीक्षण तथा 22 दस्तावेज प्रदर्श चिन्हांकित कराए गए । धारा-313 दण्ड प्रक्रिया संहिता

के तहत कथन में अभियुक्त ने अपने विपरीत साक्षियों के कथनों को इंकार करते हुए स्वयं

को निर्दोष होना बताते हुए कहा है कि अभियोक्त्री स्वयं उसके घर आकर 03-04 दिन

तक रूकी थी । जिसने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया । तब उभयपक्ष को सुना

जाकर विचारण न्यायालय द्वारा यह पाया गया कि अभियोक्त्री वयस्क थी और सहमति से

संबंध स्थापित किए गए थे । जिसके आधार पर अपराध प्रमाणित न होना पाते हुए

अभियुक्त की दोषमुक्ति का "प्रश्नाधीन निर्णय" पारित किया गया है जिसे इस अपील में

चुनौती दी गई है ।

5. न्यायदृष्टांत Mallappa and other v. State of Karnataka, (2024) 3 SCC 544 में

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत अपील के निराकरण हेतु कु छ

न्यायिक सिद्घांत प्रतिपादित किए गए हैं जो कण्डिका-42 में निम्नानुसार हैः-

{Acq. A. No.-308 of 2019}

"42. Our criminal jurisprudence is essentially based on the

promise that no innocent shall be condemned as guilty. All

the safeguards and the jurisprudential values of criminal

law, are intended to prevent any failure of justice. The

principles which come into play while deciding an appeal

from acquittal could be summarised as:

(i) Appreciation of evidence is the core element of a criminal trial and such appreciation must be comprehensive inclusive of all evidence, oral or documentary;

(ii) Partial or selective appreciation of evidence may result in a miscarriage of justice and is in itself a ground of challenge;

(iii) If the court, after appreciation of evidence, finds that two views are possible, the one in favour of the accused shall ordinarily be followed;

(iv) If the view of the trial court is a legally plausible view, mere possibility of a contrary view shall not justify the reversal of acquittal;

(v) If the appellate court is inclined to reverse the acquittal in appeal on a reappreciation of evidence, it must specifically address all the reasons given by the trial court for acquittal and must cover all the facts;

(vi) In a case of reversal from acquittal to conviction, the appellate court must demonstrate an illegality, perversity or error of law or fact in the decision of the trial court."

6. संपूर्ण साक्ष्य के परिशीलन से यह स्थिति स्पष्ट होती है कि अभियोक्त्री (अ.सा.-1) ने

अपने मुख्य परीक्षण में यह कथन किया है कि अभियुक्त रविलाल द्वारा उसके साथ मारपीट

एवं गाली-गलौच की गई तथा जब वह भागने का प्रयास कर रही थी, तब अभियुक्त ने उसे

पकड़कर सायकल में बिठाकर ग्राम भीखापाली ले गया । तथापि, प्रतिपरीक्षण की कं डिका

{Acq. A. No.-308 of 2019}

6 से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि उक्त महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख उसने अपने पुलिस

कथन (प्रदर्श डी.-1) में नहीं किया है । इस प्रकार, उसके कथन में विद्यमान उक्त सुधार

उसे अविश्वसनीय बनाते हैं, विशेषतः तब जब ऐसी गंभीर बातों का प्रथम अवसर पर उल्लेख

अपेक्षित था ।

7. अभियोक्त्री के कथनानुसार अभियुक्त उसे सायकल द्वारा ग्राम भीखापाली ले गया तथा रात्रि

में उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध दुष्कर्म किया । किन्तु अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य

से यह परिलक्षित होता है कि सायकल से ले जाते समय अथवा घटनास्थल पर, जहाँ वह

अभियुक्त के साथ एक ही कक्ष में थी, अभियोक्त्री के पास प्रतिरोध करने, भागने अथवा

सहायता हेतु पुकारने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध थे, जिनका उसने उपयोग नहीं किया ।

यह आचरण स्वाभाविक मानव व्यवहार के प्रतिकू ल प्रतीत होता है तथा अभियोक्त्री कथन

की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न करता है ।

8. अभियोक्त्री ने यह भी अभिकथित किया है कि वह अभियुक्त के साथ भीखापाली से

बागबाहरा होते हुए रायपुर गई तथा वहाँ अभियुक्त की बहन के निवास पर दिनभर रही ।

प्रतिपरीक्षण में यह तथ्य भी आया है कि उक्त अवधि में वह सार्वजनिक स्थलों--जैसे रेलवे

स्टेशन एवं यात्रा के दौरान बस-स्टैण्ड पर रही, जहाँ पुलिस एवं अन्य व्यक्तियों की

उपस्थिति थी, तथापि उसने किसी को भी घटना के संबंध में अवगत नहीं कराया । यद्यपि

उसने भय एवं धमकी का कारण बताया है, किन्तु यह तथ्य भी अभिलेख पर है कि अवसर

प्राप्त होने पर वह स्वयं अपने घर लौट आई, जिससे यह अपेक्षित था कि वह पूर्व में भी

सहायता प्राप्त कर सकती थी । यह आचरण अभियोजन कथन के अनुरूप प्रतीत नहीं

होता ।

{Acq. A. No.-308 of 2019}

9. अभियोक्त्री के प्रतिपरीक्षण से यह भी स्पष्ट होता है कि रायपुर में पर्याप्त समय व्यतीत करने

एवं रात्रि में अभियुक्त के साथ पुनः अपने क्षेत्र में लौटने के दौरान भी उसने न तो किसी

प्रकार का प्रतिरोध किया और न ही किसी अन्य व्यक्ति से सहायता लेने का प्रयास किया ।

अभिलेख के अनुसार घटना दिनांक को अभियोक्त्री की आयु लगभग 18 वर्ष 11 माह थी ।

चिकित्सक (अ.सा.-10) द्वारा प्रदत्त चिकित्सा प्रमाणपत्र (प्रदर्श पी.-20) से यह भी स्पष्ट

होता है कि उसके शरीर, विशेषतः निजी अंगों पर, किसी प्रकार की बाह्य चोट के चिह्न

परिलक्षित नहीं हुए । उपर्युक्त समस्त परिस्थितियों के मूल्यांकन से यह पाया जाता है कि

अभियोक्त्री सहमत पक्ष थी, जिससे अभियोजन प्रकरण संदेह से परे प्रमाणित नहीं होता ।

10. इस प्रकार, उपरोक्त न्यायदृष्टांत के आधार पर साक्ष्य विवेचना के फलस्वरूप हम पाते हैं कि

विचारण न्यायालय द्वारा सहमति के आधार पर जो दोषमुक्ति का निष्कर्ष अंकित किया गया

है । वह अभिलेख में उपलब्ध तथ्य और साक्ष्य के विपरीत या विरोधाभासी नहीं है ।

प्रश्नाधीन दोषमुक्ति के निर्णय में कोई अवैधता या अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती । इसलिए

उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती ।

11. अतः दोषमुक्ति के विरूद्घ प्रस्तुत यह अपील ग्राह्य योग्य न होने से प्रारंभिक स्तर पर खारिज

की जाती है ।

12. निर्णय की प्रतिलिपि के साथ विचारण न्यायालय का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक वापस प्रेषित

हो ।

                     सही/-                                          सही/-
              (नरेन्द्र कु मार व्यास)                      (संजय कु मार जायसवाल)
                   न्यायाधीश                                       न्यायाधीश
पोमन
 

 
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