Citation : 2026 Latest Caselaw 1544 Chatt
Judgement Date : 10 April, 2026
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{Cr. R. No.-752 of 2017 & 784 of 2017}
2026:CGHC:16546
प्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
निर्णय सुरक्षित दिनांक-19/03/2026
निर्णय उद्घोषित दिनांक-10/04/2026
दाण्डिक पुनरीक्षण क्रमांक-752/2017
1.
राजेन्द्र, पिता- टीकाराम निराला, आयु लगभग 22 वर्ष, निवासी-ग्राम सरसीवा, थाना
सरसीवा, तहसील बिलाईगढ़, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़)।
2. दिनेश, पिता-दाउराम जांगड़े, आयु लगभग 22 वर्ष, निवासी-ग्राम सरधाभाठा, थाना
सरसीवा, तहसील बिलाईगढ़, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़)।
3. सौरभ बजाज, पिता-सीताराम बजाज, आयु लगभग 19 वर्ष, निवासी-ग्राम सरधाभाठा,
थाना सरसीवा, तहसील बिलाईगढ़, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छत्तीसगढ़)।
-----आवेदकगण/अभियुक्तगण
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरायपाली, जिला महासमुंद, छत्तीसगढ़
-----अनावेदक/राज्य
आवेदकगण/अभियुक्तगण द्वारा : श्री शिखर शर्मा, अधिवक्ता ।
अनावेदक/राज्य द्वारा : श्री वीथिका चौबे, पैनल अधिवक्ता ।
एवं
Digitally
signed by
POMAN
POMAN DEWANGAN
DEWANGAN Date:
2026.04.10
11:48:35
+0530
{Cr. R. No.-752 of 2017 & 784 of 2017}
दाण्डिक पुनरीक्षण क्रमांक-784/2017
1. मोहम्मद नौसार खान (त्रुटिवश मोहम्मद जौहर उल्लेखित) पिता-इस्माइल खान,
उम्र-लगभग 20 वर्ष, निवासी-रहुआपाड़ा, पुलिस थाना-पाण्डु का, जिला-हुगली
(पश्चिम बंगाल),
2. सुरजीत दुबे, पिता-प्रभुनाथ दुबे, उम्र-लगभग 20 वर्ष, निवासी विवेकनेरा, पुलिस
थाना-पाण्डु का, जिला-हुगली (पश्चिम बंगाल),
दोनों वर्तमान निवासी-पठानिया ढाबा, एन.एच.-53, सरायपाली, राजस्व एवं सिविल
जिला महासमुंद (छत्तीसगढ़)।
-----आवेदकगण/अभियुक्तगण
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-सरायपाली, जिला महासमुंद, छत्तीसगढ़
-----अनावेदक/राज्य
आवेदकगण/अभियुक्तगण द्वारा : श्री जमील अख्तर लोहानी, अधिवक्ता ।
अनावेदक/राज्य द्वारा : सुश्री वीथिका चौबे, पैनल अधिवक्ता ।
न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल
!! सी.ए.वी. निर्णय !!
1. दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा-397 सहपठित धारा-401 के तहत प्रस्तुत इस
दाण्डिक पुनरीक्षण में अपीलीय न्यायालय-अपर सत्र न्यायाधीश, सरायपाली, जिला-
महासमुंद (छत्तीसगढ़) द्वारा दाण्डिक अपील क्रमांक 29/2016 "राजेन्द्र वगैरह विरुद्ध
छत्तीसगढ़ राज्य" तथा दाण्डिक अपील क्रमांक 30/2016 "शेख समीम उर्फ पप्पू वगैरह
विरुद्ध छत्तीसगढ़ राज्य" में संयुक्त रूप से पारित निर्णय दिनांक 28/07/2017 को
{Cr. R. No.-752 of 2017 & 784 of 2017}
चुनौती दी गई है । जिसके तहत अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण की अपील निरस्त कर दी
गई ।
2. अभियोजन मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3),
जो थाना सरायपाली, जिला महासमुंद (छत्तीसगढ़) में पदस्थ था, उसे दिनांक
27/06/2016 की रात्रि लगभग 03:30 बजे मुखबिर से सूचना प्राप्त हुई कि कृ षिक
पशुओं को वध के प्रयोजन से एक मालवाहक कं टेनर में परिवहन कर ले जाया जा रहा है ।
उक्त सूचना पर वह हमराह स्टाफ के साथ ग्राम जलपुर मोड़ पहुंचा । वहाँ पाया कि
अभियुक्तगण ट्र क कं टेनर क्रमांक एच.आर.-42-डी-0350 में 32 नग बैल भरकर के दुंवा
से उड़ीसा की ओर ले जा रहे थे । उक्त कं टेनर वाहन को अभियुक्त मोहम्मद नौसार खान
चला रहा था तथा उसके साथ सह-अभियुक्त शेख समीम उर्फ पप्पू कं टेनर में उपस्थित
था । कं टेनर के आगे बोलेरो वाहन क्रमांक सी.जी.-13-यू.ई.-1977 में अन्य
अभियुक्तगण राजेन्द्र, दिनेश, सौरभ बजाज एवं सुरजीत दुबे उक्त ट्र क कं टेनर की अगुवाई
कर रहे थे । अभियुक्तगण को रोककर उनसे वैध अभिलेख प्रस्तुत करने हेतु कहा गया,
किन्तु उनके पास कोई वैध अभिलेख उपलब्ध नहीं था । तत्पश्चात 32 नग बैलों का
परीक्षण पशु चिकित्सक संतोष चौधरी (अ.सा.-1) द्वारा किया गया, जिनका प्रतिवेदन
प्रदर्श पी-1 के रूप में प्रस्तुत किया गया । प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) द्वारा
कु ल 06 अभियुक्तगण (एक सह-अभियुक्त शेख समीम उर्फ पप्पू जिसका पुनरीक्षण पेश
नहीं) के कब्जे से 32 नग बैल तथा ट्र क कं टेनर एवं बोलेरो वाहन की जब्ती प्रदर्श पी-2
के अंतर्गत की गई तथा देहाती नालसी प्रदर्श पी-3 के रूप में दर्ज किया गया । उक्त
देहाती नालसी के आधार पर थाना सरायपाली, जिला महासमुंद में प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श
पी-4 के रूप में दर्ज किया गया । घटनास्थल का नक्शा प्रदर्श पी-5 तैयार किया गया ।
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जब्त बैलों को सुरक्षार्थ श्री गोविन्द गौशाला समिति, जोगीदादर, बसना, जिला महासमुंद
के सुपुर्द किया गया । अभियुक्तगण को गिरफ्तार किया गया तथा संपूर्ण विवेचना उपरांत
उनके विरुद्ध अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया ।
3. विचारण के दौरान आरोप के प्रमाणन हेतु अभियोजन की ओर से अपने पक्ष के समर्थन में
कु ल 05 साक्षियों का परीक्षण कराया गया तथा 12 दस्तावेजों को प्रदर्श चिन्हांकित कराया
गया । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत कथन में अभियुक्तगण ने अपने
विपरीत आए साक्षियों के कथनों से इंकार करते हुए स्वयं को निर्दोष होना बताया जिन्होंने
बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया । उभयपक्ष को सुना जाकर विचारण न्यायालय-
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, सरायपाली, जिला महासमुंद (छत्तीसगढ़) द्वारा दाण्डिक
प्रकरण क्रमांक 250/2016 "छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध मोहम्मद समीम उर्फ पप्पू वगैरह"
में दिनांक 20/09/2016 को निर्णय पारित कर आवेदकगण एवं सह-अभियुक्त मोहम्मद
समीम उर्फ पप्पू को छत्तीसगढ़ कृ षिक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 10 के
अंतर्गत दोषसिद्ध पाते हुए 01 वर्ष के सश्रम कारावास तथा 1,000/- रुपये के अर्थदण्ड
से दण्डित किया गया तथा अर्थदण्ड अदा न करने की दशा में 01 माह के साधारण
कारावास से दण्डित किया जाना निर्धारित किया गया ।
4. विचारण न्यायालय के उक्त निर्णय को अभियुक्तगण राजेन्द्र, दिनेश एवं सौरभ बजाज द्वारा
दाण्डिक अपील क्रमांक 29/2016 में तथा अभियुक्तगण शेख समीम उर्फ पप्पू, मोहम्मद
नौसार खान एवं सुरजीत दुबे द्वारा दाण्डिक अपील क्रमांक 30/2016 में चुनौती दी गई ।
उक्त दोनों अपीलों पर अपीलीय न्यायालय-अपर सत्र न्यायाधीश, सरायपाली, जिला
महासमुंद द्वारा संयुक्त रूप से विचार करते हुए दिनांक 28/07/2017 को निर्णय पारित
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किया गया, जिसके द्वारा अपीलें निरस्त करते हुए विचारण न्यायालय द्वारा पारित
दोषसिद्धि एवं दण्डादेश की पुष्टि की गई । उक्त निर्णय दिनांक को अभियुक्त शेख समीम
उर्फ पप्पू के अनुपस्थित रहने पर उसके विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश
दिया गया तथा शेष अभियुक्तगण को दण्ड भुगताये जाने हेतु कारागार भेजा गया, जिनके
संबंध में इस न्यायालय द्वारा पश्चात में दण्डादेश स्थगित किया गया ।
5. उपरोक्त दोनों दाण्डिक पुनरीक्षण याचिकाओं में अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित प्रश्नाधीन
निर्णय दिनांक 28/07/2017 को चुनौती दी गई है ।
6. आवेदकगण/अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्तागण का तर्क है कि प्रधान आरक्षक सुशील
शर्मा (अ.सा.-3) द्वारा वर्णित कार्यवाही की पुष्टि स्वतंत्र साक्षी पंचराम पनका (अ.सा.-2)
तथा गिरधारी भोई (अ.सा.-4) द्वारा नहीं की गई है । अभियोजन इस संबंध में कोई भी
अभिलेख प्रस्तुत करने में असफल रहा है कि कथित ट्र क कं टेनर की अगुवाई बोलेरो वाहन
द्वारा की जा रही थी । अभियोजन यह भी प्रमाणित करने में असफल रहा है कि कथित
32 नग बैलों का परिवहन उनके वध के आशय से किया जा रहा था तथा यह भी प्रमाणित
नहीं कर सका कि उक्त बैलों को वध के प्रयोजन से कहाँ ले जाया जा रहा था । घटनास्थल
पर अभियुक्तगण की पहचान भी किसी स्वतंत्र साक्ष्य द्वारा नहीं की गई है । इस प्रकार
प्रश्नाधीन दोषसिद्धि एवं दण्डादेश विधि की दृष्टि में उपयुक्त न होने से स्थिर रखे जाने योग्य
नहीं है ।
7. अभियुक्त मोहम्मद नौसार खान, जो कथित ट्र क कं टेनर वाहन का चालक था, के विद्वान
अधिवक्ता ने तर्क किया है कि उसे उक्त बैलों के परिवहन हेतु अभियुक्त राजेन्द्र, दिनेश,
सौरभ बजाज एवं सुरजीत दुबे द्वारा किराये पर लिया गया था, जबकि अभियुक्त राजेन्द्र,
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दिनेश एवं सौरभ बजाज के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि उन्होंने उक्त वाहन किराये पर
नहीं लिया था, वे घटनास्थल पर उपस्थित नहीं थे तथा अभियुक्त मोहम्मद नौसार खान
द्वारा भी विचारण के दौरान ऐसा कोई बचाव नहीं लिया गया कि उसके वाहन को सह-
अभियुक्तों द्वारा किराये पर लिया गया था । अतः अपील स्वीकार की जाए तथा विचारण
न्यायालय एवं अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि एवं दण्डादेश को अपास्त करते
हुए आवेदकगण/अभियुक्तगण को दोषमुक्त किया जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क
के समर्थन में न्यायदृष्टांत Shankar & Another v. State of Chhattisgarh, 2014
(4) C.G.L.J. 239 का हवाला दिया है ।
8. राज्य/उत्तरवादी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि छत्तीसगढ़ कृ षिक पशु परिरक्षण
अधिनियम, 2004 की धारा 6 के अनुसार अभियोजन द्वारा साक्ष्य के माध्यम से यह
संदेह से परे प्रमाणित किया गया है कि कथित ट्रक कं टेनर वाहन में 32 नग कृ षिक पशुओं
का परिवहन के दुंवा से उड़ीसा की ओर किया जा रहा था । इस प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य से
अन्य राज्य उड़ीसा में ले जाने हेतु परिवहन किया जाना प्रमाणित हुआ है । उक्त ट्र क
कं टेनर वाहन में चालक के रूप में अभियुक्त मोहम्मद नौसार खान एवं परिचालक के रूप में
अभियुक्त शेख समीम उर्फ पप्पू उपस्थित थे । उक्त ट्र क कं टेनर वाहन की अगुवाई बोलेरो
वाहन द्वारा की जा रही थी, जिसमें अभियुक्त राजेन्द्र, दिनेश, सौरभ बजाज एवं सुरजीत
उपस्थित थे । जब्ती के साक्षी पंचराम पनका (अ.सा.-2) द्वारा अपना हस्ताक्षर किया
जाना स्वीकार किया गया है तथा अन्य साक्षी गिरधारी भोई (अ.सा.-4) ने भी इस तथ्य
की पुष्टि की है कि पुलिस द्वारा ट्र क कं टेनर वाहन एवं बोलेरो वाहन को पकड़ा गया था तथा
उसमें 32 नग मवेशी पाए जाकर जब्ती की कार्यवाही की गई थी । इस प्रकार प्रधान
आरक्षक सुशील शर्मा द्वारा वर्णित कार्यवाही पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है ।
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अभियुक्त पक्ष उक्त कृ षिक पशुओं के परिवहन के संबंध में कोई भी वैध अभिलेख प्रस्तुत
करने में असफल रहा है, जिससे यह स्पष्ट है कि अभियुक्तगण द्वारा कृ षिक पशुओं का बिना
अनुमति परिवहन किया गया । अधिनियम, 2004 की धारा 6 के अंतर्गत एक स्थान से
दूसरे स्थान तक परिवहन किया जाना प्रमाणित है तथा अधिनियम, 2004 की धारा 11 के
प्रावधानानुसार यह दायित्व अभियुक्तगण पर था कि वे यह प्रमाणित करें कि कृ षिक पशुओं
का वध, परिवहन या विक्रय अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में नहीं था ।
9. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।
10. छत्तीसगढ़ कृ षिक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा-06 एवं धारा-10 के
प्रावधान निम्नानुसार हैः-
"6. वध के लिये गौ वंश के परिवहन का प्रतिषेध-(1) कोई भी व्यक्ति
किसी कृ षिक पशु का, इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में उसके
वध के प्रयोजन के लिये या यह जानते हुये कि उसका इस प्रकार वध
किया जावेगा या वध किये जाने की संभावना है, राज्य के भीतर के
किसी स्थान से राज्य के भीतर किसी स्थान पर या राज्य के बाहर के
किसी स्थान को न तो बिक्री करेगा, न परिवहन करेगा, न ही परिवहन
के लिये देगा और न उसका परिवहन कराएगा ।
(2) xxxxxxxxxx
(3) xxxxxxxxxx
10. शास्ति-जो कोई धारा 4, 5 एवं 6 के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या
उल्लंघन का प्रयास करेगा या उसका दुष्प्रेरण करेगा वह किसी भी भांति
के कारावास से, जो [सात] वर्ष तक का हो सके गा या जुर्माना से जो
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[पचास] हजार रूपये तक का हो सके गा या दोनों से दण्डित यिका
जायेगा ।"
11. अभियोजन का महत्वपूर्ण साक्षी प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) है, जिसने संपूर्ण
अभियोजन मामले की पुष्टि करते हुए यह कथन किया है कि मुखबिर सूचना प्राप्त होने पर
हमराह स्टाफ के साथ दिनांक 27/06/2016 की रात्रि में वह मौके पर पहुँचा तथा ग्राम
के दुंवा की ओर से उड़ीसा की दिशा में जा रहे बोलेरो वाहन एवं ट्र क कं टेनर वाहन को
जलपुर मोड़ के समीप रोककर अभियुक्तगण से पूछताछ की । उसने यह भी बताया कि
ट्र क कं टेनर में तिरपाल से ढककर 32 नग गौवंशीय पशुओं को ठूंसकर भरा गया था ।
तत्पश्चात उसने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के अंतर्गत सूचना देकर वैध अभिलेख
प्रस्तुत करने की मांग की, किन्तु अभियुक्तगण कोई भी अभिलेख प्रस्तुत करने में असफल
रहे । साक्षी ने यह भी बताया कि उसने उक्त गौवंशीय पशुओं का स्वास्थ्य परीक्षण कराया,
देहाती नालसी प्रदर्श पी-3 तैयार किया, जब्ती पत्रक प्रदर्श पी-2 तैयार किया तथा उक्त
गौवंशीय पशुओं को गौ सेवा समिति, जोगीदादर, जिला महासमुंद के अध्यक्ष के सुपुर्द
किया ।
12. प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के कथन की पुष्टि करते हुए पशु चिकित्सक
संतोष चौधरी (अ.सा.-1) ने 32 नग बैलों का परीक्षण कर अपना प्रतिवेदन प्रदर्श पी-1
के रूप में प्रस्तुत किया तथा यह कथन किया कि सभी पशु कृ षि योग्य एवं हल चलाने
योग्य थे । इसी प्रकार गौ सेवा समिति, जोगीदादर, जिला महासमुंद के अध्यक्ष शाखाराम
(अ.सा.-5) ने भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए बताया कि 32 नग बैल उन्हें सुपुर्दनामा
प्रदर्श पी-12 के अंतर्गत सुपुर्द किए गए थे, जो स्वस्थ अवस्था में थे तथा वर्तमान में
गौशाला में संरक्षित हैं ।
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13. जहाँ तक जब्ती साक्षियों का प्रश्न है, पंचराम पनका (अ.सा.-2) ने प्रधान आरक्षक
सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के कथनों की पुष्टि नहीं की है, किन्तु जब्ती पत्रक पर अपने
हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है । अन्य साक्षी गिरधारी भोई (अ.सा.-4) ने यह कथन
किया है कि रात्रि लगभग 03:00 बजे पुलिस कर्मियों द्वारा उसे, उसके घर से बुलाकर
जलपुर ले जाया गया, जहाँ एक ट्र क कं टेनर वाहन में मवेशी पाए गए तथा लगभग 06
व्यक्तियों को पकड़ा गया था और एक बोलेरो वाहन भी वहाँ उपस्थित थी । उक्त साक्षी
किसी अभियुक्त की पहचान करने में असमर्थ रहा है तथा यह भी कहा है कि उसने कं टेनर
वाहन में चढ़कर मवेशियों को प्रत्यक्ष नहीं देखा था, किन्तु उसके कथनों से प्रधान आरक्षक
सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के इस कथन की पुष्टि होती है कि उक्त रात्रि में गौवंशीय पशुओं
से भरे ट्र क कं टेनर एवं बोलेरो वाहन के साथ 06 व्यक्तियों को पकड़ा गया था । चूँकि सभी
अभियुक्तगण उस ग्राम के निवासी न होकर अन्यत्र स्थान के निवासी हैं, ऐसी स्थिति में
साक्षी गिरधारी भोई (अ.सा.-4) से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह रात्रि में देखे
गए व्यक्तियों की पहचान कर सके , तथापि जिस प्रकार से उसने पुलिस द्वारा की गई
कार्यवाही की पुष्टि की है, उससे प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के कथनों पर
अविश्वास करने का कोई कारण परिलक्षित नहीं होता ।
14. प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) ने यह स्वीकार किया है कि उसके द्वारा दर्ज
रोजनामचा सान्हा की प्रति प्रस्तुत नहीं की गई है । प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श पी-4 की
कायमी देहाती नालसी प्रदर्श पी-3 के आधार पर की गई है । उक्त प्रथम सूचना पत्र में
रोजनामचा सान्हा क्रमांक 1479 का उल्लेख भी विद्यमान है । ऐसी स्थिति में मात्र इस
आधार पर कि रोजनामचा सान्हा की प्रति अभिलेख पर प्रस्तुत नहीं की गई है, प्रधान
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आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के कथनों पर अविश्वास किया जाना उचित नहीं प्रतीत
होता ।
15. प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) ने प्रतिपरीक्षण में यह भी स्वीकार किया है कि
उक्त मवेशियों से भरे ट्र क कं टेनर की अगुवाई बोलेरो वाहन द्वारा की जा रही थी, तथापि
इस संबंध में कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है । यह उल्लेखनीय है कि अगुवाई
(पायलटिंग) के संबंध में किसी प्रकार का दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध होना स्वाभाविक नहीं
माना जा सकता । अभियोजन के अनुसार इस संबंध में कोई सीसीटीवी अभिलेखन भी
उपलब्ध नहीं है, जिससे कोई पृथक अभिलेख तैयार किया जा सके । इस प्रकरण में जिस
प्रकार ट्र क कं टेनर के आगे-आगे बोलेरो वाहन में चार अभियुक्तों का चलना बताया गया है
तथा प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा अपने इस कथन पर स्थिर रहा है कि उक्त दोनों वाहनों
के बीच कोई अन्य वाहन नहीं था, साथ ही ट्र क कं टेनर में उपस्थित दो अभियुक्तों का यह
बचाव रहा है कि शेष अभियुक्तगण उनके ट्र क कं टेनर को किराये पर लेकर जा रहे थे,
जबकि बोलेरो वाहन में सवार चार अभियुक्तों के विद्वान अधिवक्ता द्वारा उक्त तथ्य से
इनकार किया गया है । इन समस्त परिस्थितियों एवं साक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुए प्रधान
आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के इस कथन में कोई संदेह उत्पन्न नहीं होता कि उक्त
समय बोलेरो वाहन, ट्र क कं टेनर की अगुवाई कर रहा था तथा उसमें चारों अभियुक्तगण
उपस्थित थे ।
16. प्रधान आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के कथन में यह तथ्य भी आया है कि जब
उन्होंने अभियुक्तगण को वैध अभिलेख प्रस्तुत करने हेतु सूचित किया, तब उनकी ओर से
कोई भी अभिलेख प्रस्तुत नहीं किया गया । अन्य साक्षियों के कथनों से समर्थित प्रधान
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आरक्षक सुशील शर्मा (अ.सा.-3) के इस कथन पर अविश्वास करने का कोई कारण
परिलक्षित नहीं होता कि कथित ट्र क कं टेनर में 32 नग कृ षिक पशुओं का परिवहन के दुंवा
से उड़ीसा की ओर किया जा रहा था तथा उसकी अगुवाई बोलेरो वाहन में सवार 04
अभियुक्तगण द्वारा की जा रही थी । इस प्रकार धारा 10 के अपराध के प्रयोजनार्थ राज्य
के एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर कृ षिक पशुओं का परिवहन किया जाना प्रमाणित
होता है ।
17. न्यायदृष्टांत शंकर (पूर्वोक्त) के मामले में न्यायालय ने यह पाते हुए दोषमुक्ति प्रदान की थी
कि अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत अभियोजन द्वारा यह आरोप न तो विशिष्ट रूप से
विरचित किया गया था और न ही इस संबंध में स्पष्ट साक्ष्य प्रस्तुत किया गया था कि
कृ षक पशुओं को राज्य के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर अथवा राज्य के बाहर
अन्यत्र ले जाया जा रहा था । किन्तु, वर्तमान प्रकरण में विचारण न्यायालय द्वारा
अभियुक्तगण के विरुद्ध जो आरोप विरचित किया गया है, उसमें इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख
है । आरोप इस प्रकार है--
"01. कि आपने दिनांक 27.06.2016 को समय रात 03.30 बजे स्थान-
जलपुर मोड़ सारंगढ-सरायपाली रोड़ अंतर्गत आरक्षी के न्द्र सरायपाली में अन्य अभियुक्त मो. समीम, राजेन्द्र, दिनेश, सौरभ, सुरजीत दुबे के साथ सामान्य आशय बनाकर सामान्य आशय के अग्रशरण में 32 नग बैल (किमती 8,00,000/-रूपये) को वध किये जाने अथवा वध किया जाना संभाव्य जानते हुए परिवहन किया?"
18. उपरोक्त विरचित आरोप तथा अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अवलोकन से यह
न्यायालय पाती है कि न्यायदृष्टांत शंकर (पूर्वोक्त) के तथ्य वर्तमान प्रकरण से भिन्न हैं ।
अतः उक्त न्यायदृष्टांत का लाभ अभियुक्त पक्ष को प्राप्त नहीं होता ।
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19. अभियोजन साक्ष्य में यह तथ्य स्पष्ट रूप से नहीं आया है कि उड़ीसा राज्य के किस विशिष्ट
स्थान पर उक्त पशुओं को ले जाया जा रहा था तथा उड़ीसा राज्य में कत्लखाना स्थित है
या नहीं, तथापि इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ कृ षिक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा
11 का प्रावधान महत्वपूर्ण है, जिसमें सबूत के भार के संबंध में प्रावधान किया गया है, जो
निम्नानुसार हैः-
"11. सबूत का भार अभियुक्त पर होगा-इस अधिनियम की धारा 4, 5 या 6
के उपबंधों का उल्लंघन के लिए धारा 10 के अधीन दण्डनीय किसी
उपधारा के किसी विचारण में यह साबित करने का भार अभियुक्त पर
होगा कि कृ षिक पशु का वध, परिवहन या विक्रय इस अधिनियम के
उपबंधों के उल्लंघन में नहीं था ।"
20. उल्लेखनीय है कि अभियुक्तगण को धारा 6 सहपठित धारा 10 के अंतर्गत दोषसिद्ध कर
दण्डित किया गया है । धारा 6 के अंतर्गत यह प्रमाणित पाया गया है कि 32 नग कृ षिक
पशुओं का परिवहन एक स्थान से दूसरे स्थान पर किया जा रहा था, जिसके लिए
अभियुक्तगण के पास कोई वैध अभिलेख उपलब्ध नहीं था । धारा 11 के विशेष प्रावधान
को दृष्टिगत रखते हुए परिवहन के उद्देश्य के संबंध में प्रमाण का भार अभियुक्तगण पर आता
है । उन्हें यह प्रमाणित करना अपेक्षित था कि कृ षिक पशुओं का वध, परिवहन या विक्रय
अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में नहीं किया जा रहा था । किन्तु उक्त प्रमाण-भार के
निर्वहन में अभियुक्तगण न तो मवेशियों के क्रय-विक्रय से संबंधित कोई रसीद प्रस्तुत किये
और न ही दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत अपने कथन में यह स्पष्ट किये
कि वे उक्त पशुओं को कहाँ से लाए थे और कहाँ ले जा रहे थे । ऐसी स्थिति में, जब
परिवहन किया जाना अभियोजन द्वारा प्रमाणित कर दिया गया है, तब यह प्रमाणित करने
का भार कि उक्त परिवहन अवैध नहीं था अथवा वध के उद्देश्य से नहीं था, अभियुक्तगण
{Cr. R. No.-752 of 2017 & 784 of 2017}
पर था, जिसके निर्वहन में वे असफल रहे हैं । परिणामस्वरूप, विचारण न्यायालय एवं
अपीलीय न्यायालय द्वारा अभियुक्तगण की दोषसिद्धि में कोई त्रुटि परिलक्षित नहीं होती,
अतः दोषसिद्धि के बिंदु पर यह पुनरीक्षण स्वीकार योग्य नहीं पाया जाता ।
दण्डादेश
21. अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि घटना वर्ष 2016 की है तथा उसके
पश्चात लगभग 10 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं । घटना के समय अभियुक्तगण की आयु लगभग
20 से 22 वर्ष के मध्य थी तथा वे अपने-अपने परिवार के भरण-पोषण में संलग्न हैं ।
अभिलेख पर उनके विरुद्ध किसी प्रकार का पूर्व आपराधिक आचरण नहीं है । वे कु छ
समय अभिरक्षा में रह चुके हैं । अतः उसे पर्याप्त मानते हुए उन्हें रिहा किया जावे ।
22. गिरफ्तारी पत्रक के अनुसार अभियुक्त मोहम्मद नौसार खान अशिक्षित होकर वाहन चालक
का कार्य करता है, अभियुक्त राजेन्द्र स्नातक शिक्षित होकर वेल्डर का कार्य करता है,
अभियुक्त दिनेश 12वीं तक शिक्षित होकर कृ षि कार्य करता है, अभियुक्त सौरभ बजाज
12वीं तक शिक्षित होकर अध्ययनरत है तथा अभियुक्त सुरजीत दुबे अशिक्षित होकर
परिचालक का कार्य करता है । इन समस्त परिस्थितियों, अभियुक्तगण के सामाजिक एवं
आर्थिक परिवेश तथा दीर्घ समयावधि के व्यतीत हो जाने को दृष्टिगत रखते हुए यह
न्यायालय पाती है कि अभियुक्तगण को पुनः कारागार भेजा जाना न्यायोचित नहीं होगा ।
23. परिणामस्वरूप, छत्तीसगढ़ कृ षिक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 10 के
अंतर्गत आरोपित 01 वर्ष के सश्रम कारावास को घटाकर अभियुक्तगण द्वारा अब तक
व्यतीत की गई अभिरक्षा अवधि तक सीमित किया जाता है, जो अभियुक्त मोहम्मद नौसार
खान एवं सुरजीत दुबे के संबंध में 02 माह 24 दिन तथा अभियुक्त राजेन्द्र, दिनेश एवं
{Cr. R. No.-752 of 2017 & 784 of 2017}
सौरभ बजाज के संबंध में 02 माह 02 दिन है । साथ ही, अर्थदण्ड की राशि 1,000/-
रुपये से बढ़ाकर 10,000/- रुपये प्रत्येक अभियुक्त के लिए निर्धारित की जाती है, जिसे
60 दिन में जमा किया जाना होगा, अन्यथा अदायगी न करने की दशा में प्रत्येक अभियुक्त
05 माह का अतिरिक्त साधारण कारावास का भागी होगा । पूर्व में जमा की गई अर्थदण्ड
राशि समायोजित की जायेगी ।
24. अतः पुनरीक्षण याचिकाएं आं शिक रूप से स्वीकार की जाती हैं । आवेदकगण/
अभियुक्तगण जमानत पर है । उनका जमानत-मुचलका आगामी 06 माह के लिए
प्रभावशील रहेगा । इसके पश्चात, यदि किसी अन्य न्यायालय में उनकी उपस्थिति की
आवश्यकता नहीं पाई जाती है, तो उसे मुक्त समझा जाएगा ।
25. निर्णय की प्रति के साथ अपीलीय न्यायालय और विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख
आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ एवं पालनार्थ शीघ्रतापूर्वक वापस प्रेषित किया जाए ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल)
न्यायाधीश
पोमन
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