Citation : 2025 Latest Caselaw 6905 ALL
Judgement Date : 22 August, 2025
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, LUCKNOW BENCH Neutral Citation No. - 2025:AHC-LKO:49538 Court No. - 11 Case :- CRIMINAL REVISION No. - 186 of 2018 Revisionist :- Kiran And 2 Others Opposite Party :- State Of U.P. And Anr. Counsel for Revisionist :- Ram Singh Counsel for Opposite Party :- Govt. Advocate Hon'ble Saurabh Lavania,J.
1. Heard learned counsel for the revisionist, learned AGA for the State and perused the record.
2. The present criminal revision has been filed seeking the following main relief(s):-
"WHEREFORE, it is most respectfully prayed that this Hon'ble Court may be pleased to call for and examine the record of learned court below and set-aside the judgment and order so far it is against the revisionist No. 1 and allow the application under section 125 Cr.P.C. in respect of all the revisionists in toto with cost throughout and direct the opposite party No. 2 to provide Rs.5,000/- each per month to the revisionists as maintenance, in the interest of justice."
3. Vide order dated 12.12.2017, under challenged, the Principal Judge, Family Court, Ambedkar Nagar (in short"Family Court") declined to award maintenance to the revisionist No.1 w/o of opposite party No.2 and awarded the maintenance to the minors (children of opposite party No.2). The operative portion of the order dated 12.12.2017 reads as under :-
"पत्रावली में उपलब्ध साक्ष्य की विवेचना से न्यायालय का मत है कि प्रार्थिया व विपक्षी के संसर्ग से उत्पन्न प्रार्थीगण सं० 2 व 3 है। वे अभी अवयस्क है तथा अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है। प्रार्थिया द्वारा अपने प्रार्थना पत्र में भरण पोषण की धनराशि के रूप में विपक्षी सं. 2 को 5000/- रूपया व विपक्षी सं० 3 को 5000 / कुल मु. 10000/- रूपया प्रतिमाह की मांग की है। प्रार्थिनी द्वारा पत्रावली पर विपक्षी के अपने पिता के हार्डवेयर की दुकान को चलाने व उससे आय के संबंध में मौखिक साक्ष्य दिया है तथा दुकान से संबंधित फोटोग्राफस आदि प्रपत्र दाखिल किये हैं जिससे विपक्षी की प्र्याप्त आमदनी प्रतीत होती है। चूंकि विवाद्यक संख्या 2 के परिप्रेक्ष्य में न्यायालय द्वारा यह पाया गया है कि प्रार्थिया सं० 1 विपक्षी से बिना किसी उचित व प्र्याप्त कारण के अलग रह रही है। अतः उसके संबंध में प्रार्थना पत्र निरस्त किये जाने योग्य है परन्तु प्रार्थीगण सं० 2 व 3 नाबालिग पुत्र व पुत्री है, जो कि अपनी माता के साथ ननिहाल में रह रहे हैं। अतः प्रार्थीगण सं० 2 व 3 अपने पिता से भरणं पोषण भत्ता वयस्क
होने तक पाने के अधिकारी हैं। विपक्षी द्वारा भी अपनी आपत्ति में प्रार्थिनी की मासिक आमदनी कितनी है, के सम्बंध में किसी धनराशि का उल्लेख नहीं किया है न ही आमदनी के संबंध में कोई दस्तावेज दाखिल किया है। ऐसी स्थिति में पक्षकारों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए प्रार्थिया सं० 2-महिमा व प्रार्थी सं० अश्विनी कमशः 2500/-, 2500/-रूपये प्रतिमाह उनके वयस्क होने तक भरण पोषण के रूप में पाने के अधिकारी है। तदानुसार याचिका प्रार्थिया सं० 1 के संबंध में निरस्त किये जाने योग्य है एवं प्रार्थीगण सं0 2 व -3 के सम्बंध में प्रार्थना पत्र स्वीकार किये जाने योग्य है।
आदेश
तदानुसार प्रार्थिया संख्या-1 किरन के सम्बंध में प्रार्थना पत्र निरस्त किया जाता है तथा प्रार्थीगण संख्या-2 व 3 कमशः महिमा व अश्विनी के सम्बंध में प्रार्थना पत्र स्वीकृत किया जाता है। विपक्षी आशीष कुमार को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश की तिथि से अपने बच्चों कमशः प्रार्थिया सं० 2 महिमा को 2500/-रूपये एवं प्रार्थी सं० 3 अश्विनी को 2500/-रूपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता उनके वयस्क होने तक प्रत्येक माह की 07 तारीख तक अदा करे।"
4. For not providing maintenance to the revisionist No.1, the Family Court decided the Issue No.2 against the revisionist No.2, which reads as under:-
"द्वितीय निर्धारण बिन्दु यह है कि क्या प्रार्थिया बिना किसी युक्ति-युक्त कारण के विपक्षी से अलग रह रही है?
प्रार्थिया ने अपनी याचिका में विपक्षी से अलग रहने का कारण याचिका की धारा 2 ता 7 में वर्णन किया है और बल दिया है कि विपक्षी व उसके परिजनों द्वारा अतिरिक्त दहेज के रूप में 10 लाख रूपये रोजगार हेतु मांग विदायी से पूर्व की गयी जिसे पूरा न करने के कारण वह नाराज हो गयी लेकिन जिम्मेदार व्यक्तियों के बीच में पड़ने के कारण प्रार्थिनी की विदाई हो सकी। विपक्षी व उसके परिजन प्रार्थिनी के पिता द्वारा दिये गये दान दहेज से खुश नहीं थे और अतिरिक्त दहेज के लिए ताना देकर प्रताड़ना करते रहे। प्रार्थिया यह सोचकर बर्दाश्त करती रही कि भविष्य में सब ठीक हो जायेगा लेकिन विपक्षी का रवैया खराब होता चला गया। विपक्षी ने प्रार्थिया को 2 बार मिटटी का तेल छिड़कर मार डालने का प्रयास किया गया जिससे दोनों के बीच कटुता और हो गयी। इसके पूर्व विपक्षी ने प्रार्थिया के विरूद्ध पारिवारिक न्यायालय में एक वाद प्रस्तुत किया जिसमें दिनांक 27.11.09 को सुलह हुई और उक्त में विपक्षी ने यह लिखित कथन किया कि वह अब प्रार्थिया को कभी भी मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना नहीं देगा लेकिन जब प्रार्थिया विदा होकर उसके घर गयी तो विपक्षी ने उसे गालियां दी वा मारापीटा और प्रार्थिनी का सारा जेवर कपड़ा आदि लेकर एक गाड़ी में बैठाकर यह कहते हुए कि उसकी पिता दृर्घटना में घायल हो गये हैं, दिनांक 14.6.14 को दोपहर 12 बजे पदुमपुर बाजार के दक्षिण सुनसान जगह पर प्रार्थिया व उसके बच्चों को उतार दिये और धमकी दिये कि अतिरिक्त दहेज की धनराशि 10 लाख रूपये लेकर ही आये। प्रार्थिया अपने बच्चों के साथ रोते हुए अपने पिता के घर पहुंची।
विपक्षी ने अपनी लिखित आपत्ति में याचिका में वर्णित उपरोक्त बातों को गलत बताया और बल दिया कि प्रार्थिया विपक्षी के संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती है और अपने मायके वालों को बुलाकर अपने घर चली जाती है तथा प्रार्थिया को अपमानित करती है। विपक्षी ने कई बार पंचायत करके उसकी विदाई का प्रयास किया परन्तु वह तैयार नहीं हुई। जब विपक्षी ने पारिवारिक न्यायालय आजमगढ़ में एक याद प्रस्तुत किया जिसकी नोटिस के उपरांत प्रार्थिया ने झूठे कथनों के आधार पर विपक्षी के विरूद्ध घरेलू हिंसा व दहेज उत्पीड़न का याद प्रस्तुत किया।
बहस के अनुक्रम में विपक्षी के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रार्थिया व उसके गवाहान के बयानों के आधार पर बल दिया है कि प्रार्थिनी बिना किसी उचित व पर्याप्त कारण के विपक्षी से अलग रह रही है।
विधिअनुसार किसी साक्षी का बयान एकरूपेण पढ़ा जाता है। मात्र एक अंश या वाक्य से सम्पूर्ण अर्थ नहीं निकाला जाता है।
प्रार्थिनी ने पी.डब्लू, 1 के रूप में अपनी मुख्य परीक्षा में वाद कथनों का दोहराई है जिसे पुनः अंकित करने की आवश्यकता नहीं है। प्रार्थिया ने साक्ष्य में विपक्षी के विरूद्ध शादी के दिन से ही प्रार्थिया व उसके पिता से अपने व्यवसाय हेतु 10 लाख अतिरिक्त दहेज की मांग करने की बात कही है और उसी के परिप्रेक्ष्य में शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना कहा है। ऐसी स्थिति में अपनी जिरह में बल दिया है कि मेरी शादी हम लोगों के परिवार वालों ने देखकर समझकर तय किया था। शादी की बातचीत होने के लगभग डेढ़ माह बाद विवाद हुआ। इस डेढ़ माह के बीच में मेरे मायके वालों व ससुराल वालो के बीच बातचीत होती थी। विवाह के पूर्व ससुराल वालों व मेरे मायके वालो के बीच जो लेन देन तय हुआ था वह मेरे मायके वालों ने दिया था। विवाह के समय मेरी ससुराल व मेरे मायके वालों के बीच कोई दान दहेज का विवाद नहीं हुआ था। मैं विवाह में विदा होकर गयी तो मैं पहली बार 3 माह तक रही। पहली विदाई में अपने पति व ससुराल वालों के साथ हंसीखुशी रही। इसके बाद मायके आयी और एक माह रहने के बाद पुनः ससुराल गयी और लगभग 8, 9 माह ससुराल में रही। इस बीच मुझे गर्भ आ गया था। मेरी ससुराल में संयुक्त परिवार है। मेरी ससुराल में महिलाओं में मेरी सास व 2 नन्दें घर में रहती हैं। शादी के बाद मैं अपनी ससुराल कई बार आयी गयी हूं। मैं जितनी बार आई गई हूं रीति रिवाज के अनुसार आई गई हूं। मेरी ससुराल में सबके बेडरूम अलग अलग है। मेरे पति ने आजमगढ़ में विदाई का एक मुकदमा सन 2009 में किया था। इस मुकदमे में आजमगढ के न्यायालय में हम लोगों के बीच सुलह हो गयी थी। हम लोगों ने शपथ पत्र दाखिल किया है। मेरी सभी आवश्यकताओं को मेरी पति पूरा करते थे। मैं संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती है। यदि मेरे पति अलग लेकर रहें तो मैं उनके साथ जाने को तैयार हूं। मेरे पति अपने मां बाप से अलग नहीं रहना चाहते जो सुलहनामा आजमगढ़ में दाखिल है उसमें दान दहेज मांगने की बात नहीं कही गयी है। मैं अपने मायके में 4 साल से बैठी हूं। मैं अंतिम बार ससुराल से अपने भाई के साथ मायके आयी थी।
प्रार्थिनी के अन्य साक्षी उसका भाई केशव प्रसाद पी.डब्लू. 2 के रूप में अपनी मुख्य परीक्षा में विपक्षी पर 10 लाख अतिरिक्त दहेज के लिए अपनी बहन के साथ शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देना बताया है। साक्षी ने जिरह में बल दिया है कि विपक्षी का परिवार संयुक्त परिवार है। आशीष के पिता की हार्डवेयर की दुकान है। आशीष के यहां मेरी बहन का कमरा सेप्रेट है। साक्षी ने जिरह के पृष्ठ सं० 3 पर बल दिया है कि घर से ही दान दहेज मांगने की बात शुरू हुई थी। मेरी बहन को तलाक की नोटिस 2014 में मिली है। यदि मेरी बहन ने अपनी जिरह के पेज 3 पर यह कहा है कि मैं अंतिम बार अपनी ससुराल से अपने भाई के साथ मायके आयी थी तो उक्त कथन गलत होगा। ऐसा नहीं है कि मेरी बहन अपनी सुराल में संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती है बल्कि अलग रहना चाहती है।
विपक्षी ने डी.डब्लू. 1 के रूप में अपने बयान में बल दिया है कि मेरा संयुक्त परिवार है। मेरी पत्नी संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती जबकि मैं संयुक्त परिवार में रखना चाहता हूं। इन्हीं बातों को लेकर झगड़ा झंझट करती थी। उसके बाद अक्सर अपने भाई को बुलाकर 15, 20 दिन में चली जाती थी। मैं व मेरे परिवार वाले रखना चाहते हैं परन्तु वह साथ में नहीं रहना चाहती है। मैं व मेरे पिता ने कई बार किरन के घर जाकर सुलह समझौता करके विदाई कराना चाहा परन्तु मेरी पत्नी संयुक्त परिवार में न रहने की जिद पर अड़ी रही। साक्षी से विस्तृत जिरह की गयी है जिसमें उसने स्पष्ट रूप से यह बल दिया है कि यदि किरन मेरे साथ जाना चाहे तो मैं उसे अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हूं। उसके द्वारा यह भी बल दिया गया कि इस संबंध में ऐसी स्थिति में मैं तलाक चाह रहा हूं। इस समय तलाक का मुकदमा चल रहा है।
विपक्षी के द्वितीय साक्षी डी. डब्लू, 1 ने भी अपने बयानों में विपक्षी के कथनों का समर्थन किया है।
पत्रावली पर उपलब्ध लिखित व मौखिक साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि प्रार्थिया ने अपनी याचिका में विवाह के समय ही विपक्षी द्वारा 10 लाख रूपये अतिरिक्त दहेज के रूप में मांगने के परिप्रेक्ष्य में शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना देने और उसको बच्चों के साथ परसनपुर बाजार के दक्षिण सुनसान जगह पर छोड़ देने की बात कही है। किन्तु उसने अपने जिरह में यह स्वीकार किया है कि विवाह के समय उसकी ससुराल वाले और मायके वालों के बीच में दान दहेज का कोई विवाद नहीं था। उसने यह भी स्वीकार किया है कि यह विदा होकर ससुराल गयी और 3 माह रही। वहां उसके पति व ससुराल वाले हंसी खुशी से रहे। साक्षी ने यह बल दिया है कि विपक्षी उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता था लेकिन वह संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती है। यदि उसके पति अलग लेकर रहें तो उसके साथ जाने को तैयार हूं। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया है कि मैं अंतिम बार अपने ससुराल से अपने भाई के साथ मायके आयी थी। पत्रावली पर प्रार्थिनी की ओर प्रस्तुत सूची के माध्यम से दाखिल कागजात के अवलोकन से प्रतीत होता है कि पारिवारिक न्यायालय आजमगढ़ में अशीष कुमार विपक्षी द्वारा विदाई का वाद किरन के विरूद्ध योजित किया था जिसमें पक्षकारों के बीच समझौता हुआ था, जिसकी सत्यापित प्रतिलिपि पत्रावली पर उपलब्ध है। सुलहनामा दिनांक 27.11.2009 में ऐसा कोई तथ्य नहीं लिखा है जिससे यह प्रतीत होता हो कि विपक्षी द्वारा प्रार्थिया को अतिरिक्त दहेज के संबंध में शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी गयी हो। उपरोक्त संधिपत्र से विपक्षी द्वारा प्रार्थिनी को शारीरिक व मानसिक प्रताडना देने का तथ्य सिद्ध नहीं होता है। अन्य प्रपत्रों से यह प्रतीत होता है कि पक्षकारों के बीच में घरेलू हिंसा व दहेज प्रताड़ना से संबंधित वाद भी लम्बित है। विपक्षी के बयान से यह प्रतीत होता है कि वर्तमान में उसके द्वारा प्रार्थिया सं० 1 के विरूद्ध विवाह विच्छेद का मुकदमा दाखिल किया है जो अभी लम्बित है। विपक्षी ने अपनी जिरह में यह भी स्वीकार किया है कि वह अब अपनी पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता और तलाक चाहता है। प्रार्थिनी व उसके गवाह उसके भाई केशव प्रसाद ने अपने बयान में यह स्वीकार किया है कि विपक्षी का एक संयुक्त परिवार है जिसके परिवार में उसके माता पिता व 2 बहने, भाई व उसकी पत्नी रहती है। स्वयं प्रार्थिनी ने यह भी स्वीकार किया है कि विपक्षी उसकी हर आवश्यकताओं की पूर्ति करता था लेकिन वह उसके साथ संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती। यदि उसका पति उसे अलग लेकर रहे तो वह साथ रहने को तैयार है। पत्रावली पर उपलब्ध प्रार्थिनी के बयान में आयी हुई स्वीकारोक्ति के परिप्रेक्ष्य में उसका यह तथ्य पुष्ट नहीं होता है कि विपक्षी द्वारा विवाह के समय प्रार्थिया व उसके पति से 10 लाख रूपये की मांग की गयी और इसी के कारण पक्षकारों के बीच विवाद हुआ। उसकी स्वीकारोक्ति से यह भी सिद्ध है कि वह अंतिम बार अपनी ससुराल से अपने भाई के साथ अपने मायके आयी जिससे यह तथ्य पुष्ट नहीं होता कि विपक्षी द्वारा उसे मारपीटकर दिनांक 14.09.2016 को दोपहर 12 बजे पदुमपुर बाजार के दक्षिण सुनसान जगह पर छोड़ दिये। पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह सिद्ध है कि विपक्षी का एक संयुक्त परिवार है और प्रार्थिया विपक्षी के साथ अलग रहना चाहती है। विपक्षी अपने परिवार से अलग नहीं रहना चाहता। अतः पत्रावली पर उल्लिखित मौखिक साक्ष्य से स्पष्ट है कि प्रार्थिनी बिना किसी युक्ति युक्त कारण के विपक्षी से अलग रह रही है।
वर्तमान यौचिका विपक्षी संख्या 2 व 3 के संबंध में याचित की गयी है कि विपक्षी उनका पिता है। पक्षकारों के बीच यह तथ्य अविवादित है कि विपक्षी द्वारा अपने बच्चों को कभी कोई भरण पोषण धनराशि दी हो। यह उन्हें अपने अभिरक्षा में लेने का प्रयास किया हो। प्रार्थी सं० 2 व 3 प्रार्थिया सं० 1 के साथ अपने ननिहाल में रह रहे है। ऐसी स्थिति में प्रार्थीगण सं० 2 व 3 विपक्षी से भरण पोषण पाने का युक्ति युक्त कारण मौजूद है।"
5. Upon perusal of the record including the above quoted part of impugned order dated 12.12.2017 i.e. the decision on Issue No.2, this Court finds that the finding on the Issue No.2 recorded by the Family Court is justified for the reason that the revisionist No.1 failed to establish that under compelling circumstances she left the matrimonial home.
6. Accordingly, the criminal revision is dismissed.
Order Date :- 22.8.2025
ML/-
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