Citation : 2024 Latest Caselaw 37094 ALL
Judgement Date : 12 November, 2024
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD Neutral Citation No. - 2024:AHC:177637 Court No. - 49 Case :- WRIT - B No. - 28509 of 1993 Petitioner :- Tulsiya And Others Respondent :- B.R. And Others Counsel for Petitioner :- U.K. Mishra,A.K. Mishra,Varchasva Bajpai Counsel for Respondent :- S.C.,N.K. Saxena,Ramanuj Yadav,V.K. Singh Hon'ble Saurabh Shyam Shamshery,J.
1. None appears for the petitioners. The court takes note that this writ petition is pending since 1993 ie. for more than three decades, thereafter, in the interest of justice, decided on merits even in absence of counsel for the petitioners.
2. Heard Sri Ramanuj Yadav, learned counsel for the respondents and learned Standing Counsel for the State.
3. The mother of the original petitioners have initially filed a Suit under Section 229B of U.P. ZA & LR Act in the year 1984 for declaration her rights as co-tenure holder. In the said suit, issues were framed and after considering evidence on record, it was decreed by an order dated 27.03.1991. The relevant part thereof is mentioned hereinafter:
"वाद बिन्दु नं० 1 व 3
वाद बिन्दु नं० 1 यह है कि क्या विवादित भूमि पर प्रतिवादी श्री सुम्मेरा का नाम तनहा गलत दर्ज है। वाद बिन्दु नं० 3 यह है कि क्या विवादित भूमि पर प्रतिवादी का नाम कर्ता खानदान की हैसियत से तनहा दर्ज हो गया है। वादिनी द्वारा सन् 1357 की नकल खतौनी अपने लिखित साक्ष्य मे प्रस्तुत की गयी है जिसके अवलोकन से स्पष्ट है कि वादिनी के पति व प्रतिवादी नं०1 सह खातेदार थे क्योंकि खतौनी में नीचे अंकित है कि खतौनी मे दिये गये नम्बर दोनों भाई मिल कर काश्त करते है तथा चकबन्दी मे एक समझौता दाखिल किया गया है जिसमें कुछ नम्बर भी परमा को दिये हैं परमा छबीली का मुख्तार आम है जैसा कि उसने अपने बयानो मे भी कहा है कि वह छबीली का मुख्तार आम है। क्योंकि छबीली काफी बृद्ध है तथा चल फिर नही सकते हैं। चूंकि प्रतिवादी कर्ता खानदान था इसलिए उसका नाम बतौर तनहा दर्ज हो गया था। यदि विवादित भूमि वास्तव में प्रतिवादी सुम्मेरा की पैदा की हुयी थी तो उसने दौरान चकबन्दी एक सुलहनामा दिनांक 4.2.76 क्यों प्रस्तुत किया कि गाटा संख्या 201 व 202 पर बतौर हिस्सेदार छबीली बेवा मथुरा प्रसाद काविज व दखील सदैव से रही है इसलिये दर्ज कागजात किया जावे तथा 205 जिस पर कुप है वह आधा सुम्मेरा व आधा छबीली के नाम दर्ज किया जावे। यदि विवादित भूमि तनहा सुम्मेरा की थी तो उसने यह राजीनामा क्यों दाखिल किया अतः यह सिद्ध होता है कि सुम्मेरा कर्ता खानदान था इसलिये उसके नाम तनहा भूमि गलत दर्ज हो गयी है अतः यह वाद बिन्दु निर्णित किये जाते है।
वाद बिन्दु नं० 2 व 4
प्रतिलिपि खतौनी 1333 फसली से स्पष्ट है कि विवादित भूमि मे से कुछ गाटे मनिया वल्द परसाद, राम लाल पुत्र तुलैया व राजाराम पुत्र हंसा के नाम भी दर्ज है जो जिमन 8 व 7 के काश्तकार की हैसियत से दर्ज है जिससे यह स्पष्ट होता है कि उपरोक्त भूमि तत्समय प्रतिवादी सुम्मेरा के नाम न तो कब्जे मे थी और न ही उसके नाम दर्ज थी। इस भूमि के तत्समय की खतौनी के अनुसार मालिक जमींदार मनी लाल गुरूदेव आदि मुहाल गौरी शंकर तथा बद्री प्रसाद व राजा दुलैया के नाम अंकित है। इसके पश्चात किये गये पट्टे दिनांक 7.6.41 से स्पष्ट है कि उपरोक्त पट्टा पं० मन्नी लाल जमीदार के मुख्तार गया प्रसाद द्वारा किया गया है। जो वादिनी छबीली के पति मथुरा चमार पुत्र मुलिया के पक्ष मे है। पत्रावली पर प्रस्तुत रसीद दिनांक 21.4.68 पर जमीदार पं० मन्नी लाल को दिये गये लगान में ब हैसियत काश्तकार सुम्मेरा बगैरह अंकित किया गया है इसके पश्चात प्रति लिपि खतौनी 1359 फ० मे भी यह अंकित किया गया है कि विवादित भूमि पर सुम्मेरा व मथुरा दोनों भाई काश्त करते है। यद्यपि कि उस खतौनी में अलग-अलग खाते अलग- अलग नाम से दर्ज है। जमींदार द्वारा दी गयी रसीद एवं खतौनी 1359 फसली यह प्रदर्शित करती है कि उपरोक्त दोनो भाई सुम्मेरा व मथुरा आपस में साझे मे काश्त करते थे और यह भूमि वही भूमि है जो मथुरा के नाम से जमीदार द्वारा पट्टे पर दी गयी है। अपने प्रतिवाद में प्रतिवादी द्वारा यह कहा गया है कि उक्त भूमि मुझे पट्टे से तथा अन्य श्रोतों से प्राप्त हुयी परन्तु अपने किसी पट्टे को सुम्मेरा प्रदर्शित नही कर पाया और न ही किसी अपने अभिलेख से यह सिद्ध करने में सफल रहा कि उसने यह भूमि कहा से प्राप्त की। प्रतिलिपि खतौनी 1359 फ० जिसमे जिमन 8 मे सुम्मेरा वल्द मुलिया का नाम तनहा दर्ज किया गया है और जो मुहाल राम सेवक के स्वामित्व की भूमि है उसी भूमि के लगान की रसीद जो सुम्मेरा को दी गयी है उसमें सुम्मेरा वगैरा अंकित किया गया है।
तत्समय साथ मे खेती करने और साथ साथ रहने से सुम्मेरा वगैरा अन्य कोई नही वल्कि सुम्मेरा का भाई मथुरा ही था। चूंकि उक्त 1359 फ० की खतौनी मे सुम्मेरा का नाम तनहा दर्ज हो गया और उसके पश्चात वादीनी छवीली के पति की मृत्यु हो गयी और उसके पश्चात हुयी चकबन्दी क्रियाओं मे वादिनी का हक यद्यपि स्वीकार करते हुए प्रतिवादी ने कुछ भूमि दी अवश्य परन्तु वास्तविक कब्जे के आधार पर उक्त भूमि उसके नाम अंकित हुयी जब कि संयुक्त रूप से पैदा की हुयी उस भूमि पर दोनों का बराबर हिस्सा होना चाहिये वाद बिन्दु तदानुसार निर्णित किया जाता है।
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि दावा वादी डिग्री किये जाने योग्य है। अतः विवादित भूमि मे वादिनी की प्रतिस्थानी उसकी पुत्रियों तुलसिया व सग्गी को सह खातेदार घोषित किया जाता है। परवाना अमल दरामद तदानुसार जारी हो बाद तकमीला पत्रावली दाखिल दफ्तर हो।"
4. The contesting respondents filed an appeal before the Addl. Commissioner (J) which was allowed by an order dated 25.05.1992 and the suit was dismissed. The relevant part thereof is mentioned hereinafter:
"अपीलकर्ता की ओर से 1969 आर० डी० पेज- 176, 1975 आर० डी० पेज- 195, 1979 आर० डी० पेज- 126, 1990 ए० डब्लू० सी० पेज- 98 तथा विपक्ष की ओर से 1981 आर० डी० पेज- 112, 1977 आर० डी० पेज- 363, 1978 आर० जे० पेज- 42, 1980 आर० डी० पेज- 130, 1982 आर० डी० पेज- 330, 1984 आर० डी० पेज- 98, ए० आई० आर० 1985 एस० सी० पेज- 77, 1989 आर० डी० पेज- 205, 1992 आर० जे० पेज- 73 एच० सी०, के साईट्रेशन प्रस्तुत किये गये।
प्रकरण मे मुख्य रूप से विचारणीय बिन्दु यह है कि क्या विवादित भूमि का कोई पट्टा वादनी के पति मथुरा को हुआ था और क्या कोई सहमति प्रतिवादी अपीलकर्ता द्वारा चकबन्दी न्यायालय मे हिस्से के बावत दी अथवा क्या अभिलेखीय साक्ष्य से विवादित भूमि संयुक्त परिवार की साबित है। इस सम्बन्ध में पत्रावली के अवलोकन से पाया जाता है कि एक किता सादा कागज मे उल्लिखित नम्बरान के सम्बन्ध में पट्टा तथा कथित के बारे में प्रस्तुत किया गया है, जो कि 7.6.41 को किया गया है, किन्तु यह पट्टा किस जमीदारी अथवा उसके मुख्तार द्वारा किया गया, उसे न तो साबित ही कराया गया है और न ही इस सम्बन्ध में कोई पुष्ट साक्ष्य ही दिया गया है, अतः इस पट्टा के आधार पर मात्र यह कहना कि उसके पति को विवादित भूमि का पट्टा हुआ था, मान्य नही है। जहाँ तक चकबन्दी न्यायालय मे सहमति देने का प्रश्न है, इस सम्बन्ध मे अपीलकर्ता की ओर से यह कहा गया है कि उसने कोई सहमति नही दी थी, किन्तु जो साक्ष्य पत्रावली पर आया है उसके अनुसार छवीली आदि द्वारा चकबन्दी अधिकारी के आदेश के विरूद्ध अपील संख्या- 396, धारा 11(1) सी० एच० एक्ट छवीली बनाम सुम्मेरा प्रस्तुत की थी। गाटा संख्या- 201 रकवा 2-18 एकड़, 202 रकवा 1-67 एकड़ व 203 रकवा 0-89 एकड़ के बारे मे विवाद था, चूंकि गाटा संख्या- 202 एवं 203 पर तुलसिया आदि का नाम वर्ग-9 मे अंकित था, इसलिये चकबन्दी अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत सहमति के आधार पर बन्दोवस्त अधिकारी, चकबन्दी हमीरपुर के आदेश दिनांक 30.8.77 के द्वारा गाटा संख्या०- 202 एवं 203 क्रमशः रकवा 1-67 एवं 0-89 पर छवीली आदि को सीरदारी अधिकारी अंकित किये गये थे, किन्तु जहाँ तक अन्य नम्बरान का प्रश्न है, इस बारे में कोई आदेश चकबन्दी न्यायालय मे नहीं हुए और न ही किसी प्रकार की सहमति अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत ही की गयी और न ही अन्य नम्बरान के बावत कोई अपीलकर्ता द्वारा चकबन्दी न्यायालय मे नही की गयी, इसलिये दावा वादनी धारा-49 सी० एच० ऐक्ट से बाधित था। अब प्रश्न है कि क्या विवादित भूमि संयुक्त हिन्दू परिवार की सम्पत्ति है और क्या मथुरा का नाम कागजात माल में जमींदारी समय के पूर्व का पाया जाता है। इस सम्बन्ध में जो अभिलेख पत्रावली पर आये है, उसके अनुसार विवादित भूमि 1333 फ० मे खतौनी मे मनिया वल्द परसाद गड़रिया के नाम अंकित है। और कागज संख्या- 104 पर उपलब्ध खतौनी मे यह नम्बर जिमन- 11 मे परती कदीम अंकित है और 1356 फ० मे विवादित नम्बरान मे कुछ नम्बर राम लाल वल्द तुलैया कोम गड़रिया के नाम अंकित है जब कि 1359 फ० की खतौनी मुहाल राम सेवक मे विवादित नम्बरान सुम्मेरा वल्द मुल्लिया के नाम तन्हा अंकित है, जो कि खाता संख्या- 152 एवं 214 में अंकित है। यही स्थिति गाटा सं० 209/9 के बारे मे है, वह भी सुम्मेरा के नाम तन्हा अंकित है। इन अभिलेखों में सुम्मेरा का नाम तन्हा ही अंकित चला आता है। और जब विवादित भूमि सुम्मेरा अथवा मथुरा के पिता मुलिया के नाम जमींदारी विनाश के पूर्व की साबित नही होती, तो और विवादित भूमि पर 1359 फ० मे तन्हा सुम्मेरा का ही नाम अंकित पाया जाता है तो यह भूमि न तो संयुक्त परिवार की सम्पत्ति कही जा सकती है और न ही यह माना जा सकता कि इसमे मथुरा अथवा उनकी पत्नि आदि का कोई हक था और नही साक्ष्य से ही साबित है। स्पष्टतया सुम्मेरा विवादित भूमि का तन्हा काश्तकार साबित है, जो साक्ष्य वादनी की ओर से आया है, उसमे छवीली की ओर से उसके मुख्तार का ब्यान हुआ है, जिन्होने यद्यपि परिवार को संयुक्त बयान किया है, किन्तु जो अभिलेखीय साक्ष्य आया है, उससे परम लाल का बयान का असत्य प्रतीत होता है यह गवाह छवीली का नाती है अर्थात लड़की की लड़की का लड़का है, जैसा कि उसने अपने जिरह मे स्वीकार किया है। गवाह पोखिया ने कहा है कि मन्नी लाल जमीदार ने यह पट्टा मथुरा एवं सुम्मेरा के नाम किया था, पट्टा करते समय वह मौजूद था, करीब अस्सी बीघा के ऊपर की जमीन का पट्टा हुआ था। किन्तु गवाह का यह बयान उपलब्ध साक्ष्य पट्टा से असत्य साबित होता है, क्योंकि इसमें मात्र मथुरा का ही नाम उल्लिखित है, सुम्मेरा का कोई नाम नही उल्लिखित है, साथ ही इसमे मात्र 13-30 रकवा का ही उल्लेख है और यह भूमि 80 बीघा के सम्बन्ध में नही है। इस प्रकार जो मौखिक साक्ष्य वादनी की ओर से आया है, उससे वादिनी का दावा साबित नही होता है, जब कि प्रतिवादी अपीलकर्ता की ओर से प्रस्तुत स्वयं सुम्मेरा का बयान व गवाह गिरवर प्रसाद व धावन पुत्र हिरैया आयु 103 साल का बयान हुआ है, धावन ने अपने जिरह मे कहा है कि जब मथुरा की शादी हुयी थी तब मथुरा सुम्मेरा अलग अलग रहते थे उसने यह भी कहा है कि विवादित भूमि मे कोई हिस्सा मथुरा अथवा छवीली का नही है। गवाह सुम्मेरा का बयान है कि उसके पिता को मरे 60 साल हो गये है, और जब पिता मरे, तब मथुरा एवं सुम्मेरा अलग अलग हो गये थे।उपरोक्त मौखिक साक्ष्य प्रतिवादी के कथन की पुष्टि करते है। इस प्रकार पत्रावली पर उपलब्ध सम्पूर्ण मौखिक अभिलेखीय साक्ष्य से विवादित भूमि तन्हा प्रतिवादी अपीलकर्ता की ही साबित है, इसमे मथुरा का कोई हक साबित नही होता है और न ही पट्टा साबित है, इसलिये जो निर्णय अवर न्यायालय द्वारा दिया गया है, वह स्पष्टतया तथ्यों एवं साक्ष्यों एवं विधि के प्रतिकूल होने के कारण निरस्त होने योग्य है।
अतः अपील स्वीकार की जाती है और अवर न्यायालय का आदेश दिनांक 27.3.91 निरस्त कर दावा वादिनी निरस्त किया जाता है। परवाना अमल दरामद तद्नुसार जारी हो।"
5. A second appeal filed by the present petitioners against the order of first appellate court, was rejected by an order dated 05.05.1993 and relevant part thereof is mentioned hereinafter:
"4- अपीलकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने अपने तर्क मे कहा कि 7.6.41 का पट्टा अवर न्यायालय की पत्रावली पर मौजूद है जो केवल मथुरा के नाम पर है। ऐसी स्थिति में वादिनी के कथन को गलत नही माना जाना चाहिए था। चकबन्दी मे एक सुलहनामा भी दाखिल हुआ था जिसमें वादिनी श्रीमती छबीली के अधिकारों को माना गया था। इन तर्कों के उत्तर मे प्रतिपक्षी के विद्वान अधिवक्ता ने अवर न्यायालय के आदेशों को बिल्कुल सही आदेश बताया और अपने तर्क में यह कहा कि प्रत्येक अवस्था मे श्रीमती छबीली की मृत्यु के पश्चात धारा 172 व 171 जमींदारी विनाश अधि० के अंतर्गत मथुरा का भाई होने के कारण सुम्मेरा ही मथुरा का वारिस होता क्योंकि शादी -सुदा लड़की वरासत में धारा 171 जमींदारी विनाश एवं भु० सु० अधिनियम के अंतर्गत भाई के बाद मे आती है। उनका यह भी तर्क था कि यद्यपि वर्तमान अपीलार्थीगण तुलसिया व सुग्गी के वसीयत नामा की फोटोकापी अवर न्यायालय मे दाखिल की है जिस वसीयत नामा दिनांक 9.1.84 मे उन्हें शादी-शुदा बताया गया है। परन्तु इस वसीयत नामे को किसी भी साक्षी द्वारा सिद्ध नही किया गया। उनका यह भी तर्क था कि चकबन्दी मे जिस सुलहनामे की बात कही गयी उस सुलहनामे में कभी भी श्रीमती छबीली के अधिकारों को स्वीकार नही किया गया। उक्त सुलहनामा केवल 2 ही प्लाटों के संबंध मे था जैसा कि बन्दोबस्त अधिकारी चकबंदी के आदेश दिनांक 30.8.77 द्वारा स्पष्ट है। उक्त सुलहनामे के आधार पर केवल प्लाट नं०202 व 203 पर अनाधिकार कब्जे के आधार पर सुम्मेरा का नाम खारिज करके छबीली विधवा मथुरा का नाम बतौर सीरदार चकबंदी मे दर्ज कर दिया गया था। सहकाश्तकारी के अधिकार छबीली को कभी भी नहीं दिये गये। ये दोनो प्लाट वर्तमान दावे में विवादित भूमि नही है उनका खाता अलग से छबीली के नाम चकबन्दी में बन चुका है।
5- मैने उपरोक्त तर्कों पर विचार किया। अतिरिक्त आयुक्त का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही है कि पट्टा दिनांक 7.6.41 किसी भी गवाह द्वारा सिद्ध नहीं किया गया। इस पट्टे पर कथित जमींदार मन्नी लाल के हस्ताक्षर भी नहीं है। किसी गया प्रसाद के हस्ताक्षर है, वह भी दूसरे कलम व स्याही से। यह गया प्रसाद कौन था इसकी भी कोई जानकारी नहीं है। यह भी बात मानने योग्य नही है कि पट्टा मथुरा के नाम से दिया जावे और खतौनी मे सुम्मेरा का नाम दर्ज। चकबंदी मे भी श्रीमती छबीली को सह सीरदार मानने से संबंधित कोई भी सुलहनामा दाखिल किये जाने का साक्ष्य पत्रावली पर नहीं है।
6- अतिरिक्त आयुक्त ने सर्वथा उचित कारणों से ही वादिनी का दावा खारिज किया। वर्तमान द्वितीय अपील मे कोई बल नहीं है जो खारिज की जाती है। पक्षकार अपना अपना खर्चा स्वयं वहन करें।"
6. In the aforesaid circumstances, present petitioners have filed the present writ petition in the year 1993, challenging the above referred both the orders. This Court by an order dated 13.08.1993 has directed that above referred impugned orders shall remain stayed.
7. Sri Ramanuj Yadav, learned counsel appearing on behalf of the contesting respondents submits that since there are concurrent findings of two courts against the petitioners, therefore, it may not be interfered in the writ jurisdiction. He also refers relevant part of both the impugned orders which has already been mentioned in this order.
8. I have considered above submission and also perused impugned orders as well as contents of the writ petition and the grounds raised therein. For reference the grounds mentioned in the writ petition, are reproduced hereinafter:
"I. Because the trial court had rightly decreed the petitioners claim for co-tenancy over the land in dispute and the opposite party have committed patent error of law in reversing the same.
II. Because the opposite party no.1 has committed patent error of law in deciding the case without looking into the crucial relevant evidence on record.
III. Because there is clear evidence on record that Gaya Prasad, who had signed the patta on behalf of the Zamindari was the authorised agent of the Zamindari Murari Singh and the view to the contrary of the opposite party no.1 is based on a patent and manifest illegality in the impugned judgment.
IV. Because the impugned judgment of opposite party no.1 is vitiated by patent error of law.
V. Because the compromise deed entered into between the parties before Consolidation authority a copy of which was on the record clearly established the petitioners claim of co-tenancy over the disputed property and the view to the contrary is patently illegal.
VI. Because the opposite party no.1 has misread the evidence on record and also ignored material evidence from considering resulting the manifest illegality in the impugned judgment.
VII. Because the opposite party no.1 has ignored the relevant provisions of the evidence Act regarding the presumptions of correctness and proof of the document more than twenty years old.
VIII. Because the copy of the compromise deed before the Consolidation authority is on the record and the opposite party no.1 has misread the record and ignored material evidence and the impugned judgment is vitiated in law.
IX. Because the impugned judgments are otherwise bad and contrary to law and vitiated by patent error of law and liable to be quashed."
9. As referred above, first appellate court and second appellate court has returned a finding that patta dated 07.06.1941 was not proved by any witness. It was not even signed by the Zamidar- Manni Lal. The said patta was signed by one Gaya Prasad, however, his antecedents were not on record even his power to execute the patta is also been highly disputed as well as in case patta was issued in the name of Mathura, how name of Sumeda was mentioned in the Khatauni and that it has also remain unexplained. So far as the compromise is concerned during the consolidation proceedings, there is categorical finding that there was no material or order was available in the consolidation proceeding.
10. The grounds referred in preceding paragraphs, no material was submitted that Gaya Prasad who had signed the patta has any authorization that he was an authorized agent of Zamidar Murari Singh. Presumption of old entries is always subject to contrary material and evidence that said entries were not entered in due process.
11. In the aforesaid circumstances, since there are concurrent findings on facts returned by first and second appellate court and also above refer grounds mentioned in this writ petition, does not show any ground to interfere with said concurrent findings, which are based on material available and no perversity is being shown either. See Deepak Tandon & Another vs. Rajesh Kumar Gupta, (2019) 5 SCC 537 and also Hans Prakash Shukla and Ors vs. State of Uttar Pradesh and Another, 2023 SCC Online SC 777.
12. Accordingly, the writ petition is dismissed.
13. Interim order, if any, stands vacated.
Order Date :- 12.11.2024
C. MANI
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