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M/S Grippers India vs Commissioner Of Trade Tax, U.P. ...
2018 Latest Caselaw 2579 ALL

Citation : 2018 Latest Caselaw 2579 ALL
Judgement Date : 14 September, 2018

Allahabad High Court
M/S Grippers India vs Commissioner Of Trade Tax, U.P. ... on 14 September, 2018
Bench: Ashok Kumar

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD

एएफआर

रिजर्व

कोर्ट नं0 - 6

केस :- सेल्स/ट्रेड टैक्स रिवीजन नं0 - 44 ऑफ 2008

रिवीजनिस्ट :- मेसर्स ग्रिपर्स इण्डिया

अपोजिट पार्टी :- कमिश्नर ऑफ ट्रेड टैक्स, यू0पी0, लखनऊ

काउंसिल फार अपोजिट पार्टी :- सी0 एस0 सी0

एण्ड

केस :- सेल्स/ट्रेड टैक्स रिवीजन नं0 - 45 ऑफ 2008

रिवीजनिस्ट :- मेसर्स ग्रिपर्स इण्डिया

अपोजिट पार्टी :- कमिश्नर ऑफ ट्रेड टैक्स, यू0पी0, लखनऊ

काउंसिल फार अपोजिट पार्टी :- सी0 एस0 सी0

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प्रस्तुत निगरानी वर्ष 2002-03 (केन्द्रीय) के प्रकरण में व्यापार कर अधिकरण द्वारा पारित आदेश दिनांक 05.10.2007 के विरुद्ध याची द्वारा योजित की गई है।

व्यापार कर अधिकरण द्वारा द्वितीय अपील को स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय आदेश को अपास्त करते हुए कर निर्धारण अधिकारी के आदेश को पुनर्स्थापित किया गया जिससे क्षुब्ध होकर प्रस्तुत निगरानी व्यापारी द्वारा इस न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत की गई।

इसी प्रकार व्यापार कर अधिकरण द्वारा वर्ष 2001-02 प्रान्तीय कर निर्धारण की कार्यवाही में विभाग द्वारा योजित अपील को स्वीकार कर प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश को अपास्त करते हुए कर निर्धारण अधिकारी के आदेश को पुनर्स्थापित करने के विरुद्ध प्रस्तुत निगरानी याचिका इस न्यायालय के सम्मुख योजित की गई।

चूँकि उपरोक्त दोनो निगरानी एक ही व्यपारी से सम्बन्धित हैं तथा विवादित बिन्दु भी एक दूसरे से सम्बन्धित हैं अतः इनका निर्णय व निस्तारण एक साथ किया जा रहा है।

संक्षेप में वाद के तथ्य इस प्रकार हैं कि व्यापारी एक पंजीकृत फर्म है एवं यह 'एअर टाइट डिवाइस' के निर्माण एवं बिक्री के व्यापार में संलग्न है। व्यापारी द्वारा नियमित प्रपत्रों को रखा जाना स्वीकार किया एवं जाँच हेतु सम्बन्धित अधिकारी के सम्मुख प्रस्तुत किया माना गया।

व्यापारी द्वारा वर्ष 2001-02 में गत वर्ष के अवशेष स्टाक की बिक्री की गई तथा किसी प्रकार की निर्माण प्रक्रिया को कदापि स्वीकार नहीं किया गया।

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा व्यापारी की लेखा पुस्तकों का सम्यक परीक्षण किया गया तथा यह पाया गया कि व्यापारी द्वारा प्रचलित मासिक रुपपत्र दाखिल नहीं किये गये हैं।

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा यह संज्ञान लिया गया कि व्यापारी द्वारा निर्मित 'एअर टाइट डिवाइस' की बिक्री पर 8% की दर से कर देयता स्वीकार की गई है। जबकि उपरोक्त की बिक्री पर अवर्गीकृत की भाँति 10% की दर से व्यापारी पर कर देयता निश्चित होनी है।

व्यापारी को कर निर्धारण अधिकारी द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया जिसका स्पष्टीकरण व्यापारी द्वारा दिया गया।

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा कारण बताओ नोटिस के स्पष्टीकरण पर विचार कर आदेश धारा 30 व्यापार कर अधिनियम नियम 41(8) सपठित धारा 9 केन्द्रीय बिक्री कर अधिनियम द्वारा अन्तिम कर निर्धारण आदेश पारित किया गया।

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा पूर्व वर्ष की भाँति रु0 85 प्रति सेट की दर से 'एअर टाइट डिवाइस' की बिक्री को गत वर्ष में निर्धारित किया गया।

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा व्यापारी की लेखा पुस्तकों को अस्वीकार करते हुए कर निर्धारण आदेश न्याय एवं विवेक के आधार पर एअर टाइट डिवाइस की बिक्री प्रान्त के अन्दर रु0 1 लाख पर 10% की भाँति रु0 10 हजार कर आरोपित किया गया।

इसी प्रकार केन्द्रीय बिक्री कर अधिनियम के अन्तर्गत व्यापारी पर रु0 1,50,000/- की बिक्री पर 10% की दर से रु0 15 हजार कर आरोपित किया गया (2002-03 केन्द्रीय)।

निगरानी कर्ता की ओर से उपरोक्त कर निर्धारण आदेशों के विरुद्ध धारा 9 व्यापार कर अधिकरण ने प्रदत्त प्राविधानों के अन्तर्गत अपील योजित की गईं।

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा दो बिन्दुओं पर अपना निर्णय पारित किया गया जो कि निम्नवत हैं:-

"1. बिक्री कर 8% से मशीनरी पार्टस का मानते हुए कर देयता स्वीकार की है, जबकि अवर्गीकृत होने के कारण 10% से कर देय है। जो उपर्युक्त विवेचना के अनुसार सही है।

2. कच्चे माल के सापेक्ष्य में बिक्री काफी अधिक होने से यह निष्कर्ष निकाला गया कि इतना अधिक लाभ होने की सम्भावना नहीं होती और यह मान लिया गया कि कच्चे माल की खरीद अपंजीकृत से और की गयी होगी। "

कर निर्धारण अधिकारी द्वारा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया जिसके फलस्वरुप याची द्वारा नक्शे समय से दाखिल नहीं करना याची के हिसाब किताब को अस्वीकार करने का पर्याप्त कारण बना।

व्यापारी द्वारा कर निर्धारण अधिकारी द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस का समुचित उत्तर न देना तथा बात को घुमा फिराकर उत्तर देना भी याची के स्पष्टीकरण को अस्वीकार करने का पर्याप्त कारण बना।

प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा बिना किसी उचित आधार के अपील संख्या 114/2004 वर्ष 2001-02 धारा 30 सपठित नियम 41(8) को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अपीलकर्ता की कर देयता रु0 90,240 मात्र निश्चित की गई। तथा आरोपित कर रु0 2,81,760 मात्र की कमी की गई।

इसी प्रकार वर्ष 2002-03 धारा 30 सपठित धारा 9(2) से सम्बन्धित अपील को आंशिक रुप से स्वीकार करते हुए अपील कर्ता की कर देयता रु0 5,520 मात्र निर्धारित करते हुए आरोपित कर में रु0 9,480 मात्र की कमी की गई।

संयुक्त कमिश्नर (अपील) के आदेश 31.05.2004 के विरुद्ध कमिश्नर व्यापार कर उ0 प्र0 द्वारा द्वितीय अपील संख्या 232/2005 वर्ष 2001-02 एवं द्वितीय अपील संख्या 233/2005 वर्ष 2002-2003 यू0पी0 एवं केन्द्रीय योजित की गई।

व्यापार कर अधिकरण द्वारा योजित द्वितीय अपील की सुनवाई करते समय यह तथ्य पाया गया कि लखनऊ स्थित फर्म सर्वश्री ग्रिपर्स इण्डिया का सर्वेक्षण विशेष अनुसंधान शाखा इकाई द्वारा 26.03.2002 को किया गया था जिसमें उक्त फर्म में माह जून 2001 तक श्री प्रदीप रस्तोगी एवं उनकी पत्नी डायरेक्टर थीं, तत्पश्चात श्रीमती नीलम रस्तोगी फर्म की डायरेक्टर हो गईं, इस प्रकार सम्भल स्थित निर्माता फर्म और लखनऊ स्थित फर्म में कामन डायरेक्टर एवं साझीदार मौजूद थे। यह भी पाया गया कि लखनऊ की फर्म को एअर टाइट डिवाइस रु0 15.00 प्रति सेट (प्रति सेट) 2 पीस के हिसाब से बिक्री की गई, जबकि आगे लखनऊ में इसकी बिक्री रू0 70.00 प्रति सेट के अनुसार की गई थी। इस आधार पर यह माना गया कि जानबूझकर अपनी सिस्टर कन्सर्न को कर योग्य माल कम मूल्य पर बिक्री किया गया जिसने बाद में टैक्सपेड माल की कहीं अधिक मूल्य पर बिक्री की, अतः दोनों फर्मों ने मिलकर कर अपवंचन किया। यह भी पाया गया कि प्रारंभिक स्टाक एवं अन्तिम स्टाक में तैयार माल का जो विवरण दिखाया गया उसके अनुसार प्रारम्भिक स्टाक में रु0 7.00 प्रति पीस का मूल्य आता था, जबकि अन्तिम स्टाक में यह मूल्यांकन मात्र रु0 1.05 पैसे था, इन सभी तथ्यों के आधार पर यह माना गया कि व्यापारी द्वारा हिसाब-किताब व्यापार के नियमित क्रम में नहीं रखे जाते हैं तथा इन आधारों पर व्यापारी के घोषित विवरण एवं लेखों को अस्वीकार करते हुए कर अपवंचित खरीद बिक्री निर्धारित की गई।

व्यापार कर अधिकरण के सम्मुख विभागीय राज्य प्रतिनिधि द्वारा यह तर्क दिया गया कि व्यापारी द्वारा अत्यन्त कम मूल्य के माल की खरीद दिखायी गई है जबकि उसके सापेक्ष लगभग 12 गुना बिक्री कम दर से दिखाई गई है। अतः ये ऑकड़े इस बात की ओर इंगित करते हैं कि व्यापारी द्वारा भारी मात्रा में खरीद बिक्री अपवंचित की गई है अर्थात प्रदर्शित नहीं की गई है।

व्यापार कर अधिकरण द्वारा सम्यक बातों को ध्यान में रखते हुए तथा अभिलेखों एवं प्रपत्रों का सम्यक रूप से अवलोकन करने के पश्चात निम्न अवधारणा निश्चित की गई:-

"उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि व्यापारी ने कुल 72320 पीस की बिक्री रु0 9,02,400.00 की प्रदर्शित की है जबकि कच्चा माल रु0 77,698.00 मात्र का ही खरीदा गया है। क्रय किए गए कच्चे माल में प्लास्टक दाना, नायलान, पी0वी0सी0 रबर आदि प्रान्त के बाहर से आयात किए गए हैं। इस प्रकार यह प्रमाणित पाया गया कि बेसिक कच्चा माल खरीदा जाता है, इसके पश्चात सेमी फिनिश्ड एवं फिनिश्ड माल तैयार किया गया है और इसके निर्माण की कई प्रक्रियाएं हैं। 77,698.00/- के कच्चे माल से रु0 9,02,400.00/- के तैयार माल की बिक्री एवं रु0 52,000.00/- के माल के अन्तिम रहतिया के रूप में बचे रहने के आँकड़ों को किसी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता है। इन आंकड़ों से पूर्ण रूप से यह स्पष्ट है कि प्रान्त के बाहर से रु0 77,698.00/- के क्रय के अतिरिक्त प्रान्त के अन्दर से भारी मात्रा में अपंजीकृत से अपवंचित क्रय की गई है, जिसको जानबूझकर खातों में प्रदर्शित नहीं किया गया है। इस आधार पर कर निर्धारण अधिकारी ने वर्ष 2001-02 में अपंजीकृत से कुल रुपया 4,00.000.00/- की क्रय पर कर आरोपित किया था। इस आरोपित क्रय कर को प्रथम अपीलीय अधिकारी के कर अपवंचन का कोई प्रमाण न होना मानते हुए समाप्त कर दिया है। हमारे विचार से प्रथम अपीलीय अधिकारी का निर्णय तथ्यों पर आधारित नहीं है क्योंकि दर्शित आंकड़ों से ही यह स्पष्ट है कि भारी मात्रा से क्रय छिपाई गई है। इस प्रकार से कर अपवंचन से तथ्य प्रमाणित न होने की टिप्पणी हमारे विचार से पूर्णतः अनुचित एवं आधारहीन है।

उपरोक्त के अतिरिक्त माहवार नक्शे एवं कर निरन्तर समय से जमा नहीं किए गए हैं और यह सभी नक्शे लखनऊ स्थित फर्म के सर्वेक्षण दिनांक 26.03.2002 के बाद एक साथ जमा किए गए हैं। इस तथ्य से भी यह प्रमाणित है कि व्यापारी ने अपने हिसाब-किताब व्यापार के नियमित क्रम में नहीं रखे हैं।

जहाँ तक व्यापार कर अधिनियम की धारा 12(2) के प्राविधानों के तहत निर्माण किए जाने का हिसाब-किताब न रखे जाने का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में भी हमारे द्वारा तथ्यों पर विचार किया गया और यह पाया गया कि कच्चे माल एवं दैनिक रूप से तैयार माल एवं अनफिनिश्ड माल का कोई भी उत्पादन का हिसाब नहीं रखा गया है। इस सम्बन्ध में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय सी0एस0टी0 बनाम सर्वश्री गिरजा शंकर अवनीश कुमार - 1997-यू0पी0टी0सी0-पृष्ठ -213(एस0सी0) में यह व्यवस्था दी है कि "उत्पादकों के वाद में स्टॉक रजिस्टर रखा जाना अति आवश्यक है। इसका न रखा जाना तकनीकी कमी नहीं है, इस कमी के आधार पर लेखा पुस्तकें अस्वीकार करते हुए बिक्री का अनुमान किया जाना उचित है।"

उपरोक्त के अतिरिक्त माननीय उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय सर्वश्री गनेश आइसक्रीम फैक्ट्री बनाम सी0टी0टी0-2002-यू0पी0टी0सी0-पृष्ठ -662 में भी धारा 12(2) के तहत उत्पादन का हिसाब न रखे जाने के आधार पर खातों को अस्वीकार किया जाना उचित माना गया है।

उपरोक्त न्यायिक निर्णयों के परिप्रेक्ष्य में हमारे विचार से कर निर्धारण अधिकारी ने व्यापारी के हिसाब-किताब अस्वीकार किए थे जो उचित थे, जिसको प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा स्वीकार किया जाना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता है।

प्रारंभिक स्टाक एवं अन्तिम स्टाक में प्रदर्शित प्रति पीस का मूल्य रु0 7.00 एवं रू0 1.05 पैसे के सम्बन्ध में भी कोई संतोषजनक उत्तर कर निर्धारण अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, इस बिन्दु पर प्रथम अपीलीय अधिकारी ने भी कोई विश्लेषण अपने निर्णय में नहीं किया है, यह भी उचित नहीं है।

लखनऊ स्थित फर्म के सर्वेक्षण दिनांक 26.03.2002 के समय पाए गए तथ्यों के सम्बन्ध में भी कोई मिलीभगत सिद्ध न होना प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा माना गया है। यह भी हमारे विचार से उचित नहीं है क्योंकि फर्म में साझीदार के नजदीकी रिश्तेदार ही माह जून -2001 के बाद डायरेक्टर के पद पर इस फर्म में नियुक्त रहे हैं सभी दशा में कर योग्य कर देयता सम्भल स्थित निर्माता फर्म के द्वारा की गई बिक्री पर ही बनती है, तब तक फर्म द्वारा आगे की गई बिक्री अगले व्यापारी के हाथ में कर मुक्त टैक्सपेड हो जाती है, अतः इतने अधिक मार्जिन के अनुसार दोनों फर्मों के बीच में खरीद व बिक्री किया जाना तभी सम्भव है, जबकि दोनों फर्मों का कोई इस सम्बन्ध में आपसी गुप्त समझौता हुआ हो। इस प्रकार प्रश्नगत व्यापारी ने अपरोक्ष रूप से बिक्री में अवमूल्यन लखनऊ की फर्म के साथ मिल कर किया है जो वर्णित तथ्यों एवं परिस्थितियों से भी प्रमाणित है। लखनऊ की फर्म को मात्र रू0 15.00 प्रति सेट की दर से एअर टाइट डिवाइस बेचा गया है जबकि आगे लखनऊ की फर्म ने रु0 70.00 प्रति सेट के अनुसार इसकी बिक्री की है जो व्यवहारिक नहीं था। इस आधार पर ट्रान्सपोर्टेशन खर्च, लाभ आदि का मार्जिन देने के बाद लगभग रु0 30.00 प्रति सेट के अनुसार बिक्री निर्धारित किया जाना उचित होगा।"

मेरे द्वारा कर निर्धारण अधिकारी, प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं व्यापार कर अधिकरण के निर्णयों का सम्यक अवलोकन एवं परीक्षण किया गया। परीक्षणोपरान्त मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि प्रस्तुत निगरानी में कोई बल नहीं है। व्यापार कर अधिकरण द्वारा सभी तथ्यों का सम्यक परिक्षण करने के उपरान्त जो निर्णय लिया गया है वह सर्वथा उचित है उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप अपेक्षित नहीं है।

अतएव प्रस्तुत दोनो निगरानी अस्वीकार की जाती हैं एवं व्यापार कर अधिकरण के निर्णय दिनांक 05.10.2007 की संस्तुति की जाती है।

दिनाँक :- 14.9.2018

एस0 के0 श्रीवास्तव

 

 

 
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