गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता के बीच बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में मनोवैज्ञानिक जांच (Psychological Assessment) को लेकर विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि ऐसी जांच केवल तभी कराई जानी चाहिए, जब उसकी वास्तव में आवश्यकता हो। कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया कि कस्टडी विवादों में बच्चों को बिना जरूरत मनोवैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया से न गुजरना पड़े और हर स्थिति में उनके सर्वोत्तम हितों को प्राथमिकता दी जाए।
यह मामला बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था, जिसमें अलग रह रहे माता-पिता के बीच चल रहे कस्टडी विवाद में फंसे एक नाबालिग बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच कराने का निर्देश दिया गया था। इससे पहले, विशेषज्ञों की एक समिति को बच्चे और दोनों माता-पिता का मूल्यांकन करने का कार्य सौंपा गया था, ताकि पिता और बच्चे के बीच संपर्क दोबारा स्थापित किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि किन परिस्थितियों में अदालतें बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच का आदेश दे सकती हैं और ऐसी प्रक्रिया के दौरान कौन-से सुरक्षा उपाय अपनाए जाने चाहिए, ताकि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अदालत ने माता-पिता के बीच चल रहे विवाद, बच्चे को एक अभिभावक के खिलाफ करने के आरोप, झूठी यादें पैदा होने की आशंका तथा लंबे समय तक चलने वाले कस्टडी मामलों में बच्चों की बदलती मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं से जुड़े मुद्दों पर भी विचार किया।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि बच्चों की मनोवैज्ञानिक जांच का आदेश देने से पहले फैमिली कोर्ट को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि सबसे पहले माता-पिता की मानसिक स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच आवश्यक है या नहीं, यह तय करने से पहले फैमिली कोर्ट को दोनों माता-पिता, विशेष रूप से उस अभिभावक की मानसिक स्थिति का मूल्यांकन कराने के लिए मनोवैज्ञानिक नियुक्त करना चाहिए, जिसके पास वर्तमान में बच्चे की कस्टडी है।
पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि यदि विशेषज्ञों की राय के आधार पर अदालत को लगे कि बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच आवश्यक या उचित नहीं है, तो ऐसी कोई जांच नहीं कराई जानी चाहिए। वहीं, यदि जांच जरूरी हो, तो उसे एक स्वतंत्र बाल मनोवैज्ञानिक द्वारा कराया जाना चाहिए और बच्चे के साथ कम से कम बातचीत की जानी चाहिए, ताकि उस पर अनावश्यक मानसिक प्रभाव न पड़े।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट को ऐसे मामलों में सतर्क रहना चाहिए, जहां एक अभिभावक बच्चे को दूसरे अभिभावक के खिलाफ करने की कोशिश कर रहा हो, बच्चे के मन में झूठी यादें पैदा होने की आशंका हो, या फिर POCSO के तहत कोई मामला लंबित हो। ऐसे सभी पहलू कस्टडी और मुलाकात (Visitation Rights) से जुड़े निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।
बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेशों में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को नए सिरे से विचार के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित नए दिशानिर्देशों के अनुसार पुनः विचार करे।
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