लिव-इन रिलेशन में रह रहा एक टीनएज कपल (किशोर जोड़ा) को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राहत दे दी है। लड़की के परिवार से मिल रही धमकियों के चलते यह कपल हाईकोर्ट की शरण में पहुंचा था। अदालत ने इस टीनएज लिव-इन कपल को पुलिस सुरक्षा दे दी है। दोनों के शादी से पहले एक साथ रहने पर लड़की का परिवार नाराज है। परिवार के लोग इस कपल को धमकियां दे रहे हैं। हाईकोर्ट ने इस कपल को राज्य के यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के नियमों के तहत एक तय समय में अपने रिश्ते का रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश भी दिया है।
 

लड़की की उम्र 19 साल, लड़का 18 साल का

लिव-इन में रह रहे कपल में लड़की की उम्र 19 साल और लड़के की उम्र 18 साल है। वे दोनों एक ही धर्म के हैं। इस कपल ने कोर्ट को बताया कि वे करीब एक महीने से साथ रह रहे हैं। वे लड़के के शादी के लिए आवश्यक कानूनी उम्र (21 साल) तक पहुंचने के बाद शादी करना चाहते हैं। चूंकि लड़का अभी 18 साल का है, इसलिए वे अभी शादी नहीं कर सकते हैं। इसी कारण उन्होंने मौजूदा लिव-इन अरेंजमेंट के लिए सुरक्षा मांगी थी।

खतरे का आकलन करने के बाद सुरक्षा

जस्टिस आलोक महरा ने पाया कि कपल को सुरक्षा देने के लिए शुरुआती तौर पर मामला बनता है। उन्होंने उधम सिंह नगर जिले के बाजपुर के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को निर्देश दिया कि वे खतरे का आकलन करें और अगर कोई वास्तविक खतरा हो तो उचित सुरक्षा दें। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जो लोग कथित तौर पर धमकियां दे रहे हैं, उन्हें कानून का पालन करने और कानूनी तरीके से व्यवहार करने के लिए समझाया जाए।
 

दिहाड़ी मजदूर है लड़का

लिव-इन कपल की ओर से कोर्ट में पेश हुए वकील राहुल अधिकारी ने बताया कि लड़की ने 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की है, जबकि लड़का दिहाड़ी मजदूरी करता है और कभी-कभी कॉमर्शियल वाहन भी चलाता है। अधिकारी ने बताया, 'वे दोनों लंबे समय से एक ही इलाके में रह रहे हैं। उनके रिश्ते के बारे में पता चलने पर लड़की के चाचा, भाई और चचेरे भाई नाराज हो गए। वे उनके साथ रहने के फैसले का विरोध कर रहे हैं।

साथी चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि धमकियों से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। उनके वकील ने पहले के फैसलों, जिनमें सुप्रीम कोर्ट का 'लता सिंह बनाम यूपी राज्य' का फैसला भी शामिल है, का हवाला देते हुए कहा कि साथी चुनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। परिवार के सदस्यों या समुदाय के दबाव से इसमें बाधा नहीं डाली जा सकती।
 

लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी

हाईकोर्ट ने सुरक्षा देते हुए कपल को निर्देश दिया कि वे यूसीसी की धारा 381(1) के तहत उचित समय के भीतर अपने लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन कराएं। यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड के यूसीसी में लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। यूसीसी के नियमों के तहत अगर कोई भी साथी 21 साल से कम उम्र का है तो रजिस्ट्रार को माता-पिता या अभिभावकों को सूचित करना होता है। इससे जोड़े का औपचारिक रजिस्ट्रेशन उसी पारिवारिक विवाद का हिस्सा बन जाता है जिसे सुलझाने के लिए वे कोर्ट गए थे।

यह केस ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड में लिव-इन रिलेशनशिप पर यूसीसी के प्रावधानों का व्यापक कानूनी और सार्वजनिक परीक्षण हो रहा है। खास तौर पर निजता, अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और बालिगों के रिश्तों पर राज्य की निगरानी की समीक्षा की जा रही है। हालांकि इस मामले में कोर्ट ने जोड़े की सुरक्षा की याचिका और यूसीसी के तहत रजिस्ट्रेशन की कानूनी जरूरत के बीच संतुलन बनाया। कोर्ट ने पुलिस से कहा कि वे तभी दखल दें जब कोई वास्तविक खतरा हो।

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