अरावली पहाड़ियों के लिए विवादास्पद 100 मीटर की ऊंचाई की परिभाषा को स्वीकार करने वाले अपने फैसले पर रोक लगाने के 5 महीने बाद, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सख्ती बरतते हुए कहा कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं को फिर से परिभाषित नहीं कर देती, तब तक अरावली के एक इंच हिस्से को भी खनन के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
जजों ने कहा- इस मामले की टुकड़ों में सुनवाई नहीं करेंगे
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामले का उल्लेख किए जाने पर कहा कि हम इस मामले की टुकड़ों में सुनवाई नहीं करेंगे। जब तक हम पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते, तब तक किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और संबंधित मुद्दे’’ शीर्षक से स्वतः संज्ञान लेते हुए एक मामले की सुनवाई कर रहा है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि वहां बहुत कुछ हो रहा है। हमें जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, वे काफी चिंताजनक हैं।
अभी खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं होगा
- पीठ ने मामले का उल्लेख करने वाले वकील से कहा कि यदि किसी खनन पट्टे को रद्द किया जाता है, तो संबंधित पक्ष उसे चुनौती दे सकता है।
- पीठ ने कहा कि हम अभी खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं करेंगे क्योंकि यह एक संवेदनशील मामला है, इसमें जल्दबाजी करनी सही नहीं होगी।
- न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी।
क्या थी समिति की सिफारिश
न्यायालय ने दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला की सुरक्षा के लिए इसकी परिभाषा को लेकर मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था। समिति ने सिफारिश की थी कि अरावली पहाड़ी उस भू-आकृति को माना जाए, जिसकी ऊंचाई निर्धारित अरावली जिलों में स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक हो, जबकि अरावली पर्वतमाला ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों का समूह होगा, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों।
उच्चतम न्यायालय ने 29 दिसंबर को अरावली की नयी परिभाषा को लेकर उठे विरोध का संज्ञान लेते हुए 20 नवंबर के अपने आदेश को स्थगित कर दिया था, जिसमें पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान की गई थी। न्यायालय ने सभी खनन गतिविधियों पर भी रोक लगा दी थी।
न्यायालय ने कहा था कि गंभीर अस्पष्टताओं को दूर करने की जरूरत है, जिनमें यह सवाल भी शामिल है कि 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी का मानदंड कहीं पर्वतमाला के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय संरक्षण से वंचित तो नहीं कर देगा।
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