सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सबरीमाला मंदिर मामले की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान निर्माताओं ने समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कानून बनाए थे और एक नौ-न्यायाधीशों की पीठ इसे पलट नहीं सकती। इस मामले की अगली सुनवाई बुधवार को होगी। कोर्ट ने संकेत दिया है कि यह मुद्दा देश की धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न है।
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है सुनवाई
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है। इसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। यह सुनवाई केरल के सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवादों और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे को लेकर की जा रही है।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक सुधार पर बहस
सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयरदीप गुप्ता ने दलील दी कि धर्म के मूल तत्वों को सामाजिक सुधार के नाम पर हटाया नहीं जा सकता। इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि "सामाजिक सुधार के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।"
महिलाओं के प्रवेश और आस्था पर चर्चा
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक का आधार मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक धारणाएं हैं। इस पर अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आस्था को कैसे देखा जाता है, भक्त की दृष्टि से या बाहरी दृष्टिकोण से।
संविधान और सामाजिक सुधार पर कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि देश की जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से किसी सामाजिक सुधार की मांग करती है, तो अदालत उसे स्वीकार कर सकती है। लेकिन यदि कोई विचार जनता पर थोपा जाता है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
संविधान में वैज्ञानिक सोच और सुधार की भावना
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि संविधान में वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का प्रावधान है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान का उद्देश्य धार्मिक सुधार को भी शामिल करना है, लेकिन यह समानता और गरिमा के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं हो सकता।
सबरीमाला मामला क्यों है अहम?
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक ऐतिहासिक फैसले में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक करार दिया था। हालांकि बाद में इस फैसले पर पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिनकी सुनवाई अब नौ-न्यायाधीशों की बड़ी पीठ कर रही है।
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