पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अदालत की अवमानना से जुड़े एक सेवा विवाद में कड़ा रुख अपनाते हुए हरियाणा के आइएएस अधिकारी मुकुल कुमार को लंबित पालना रिपोर्ट व हलफनामा दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है, लेकिन इसे एक लाख रुपये के जुर्माने की शर्त से जोड़ दिया गया है। यह राशि सीधे उनके वेतन से काटी जाएगी।

पंचकूला निवासी बीबी गुप्ता द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की पीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछली सुनवाई में भी आइएएस मुकुल कुमार को अंतिम मौका दिया गया था और चेतावनी दी गई थी कि यदि हलफनामा दाखिल नहीं हुआ तो एक लाख रुपये जुर्माना लगाया जाएगा। इसके बावजूद अनुपालन न होने पर अब दोबारा अवसर तो दिया गया, लेकिन जुर्माना अनिवार्य कर दिया गया।

हैफेड के पूर्व कर्मचारी से जुड़ा है केस

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि वसूली गई राशि का आधा हिस्सा पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन चंडीगढ़ तथा शेष आधा हाई कोर्ट कर्मचारी कल्याण कोष को दिया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 25 मई को निर्धारित की गई है।

केस हैफेड के एक पूर्व कर्मचारी की सेवा से जुड़ा है, जिसमें याची के इस्तीफे को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसका इस्तीफा पहले स्वीकार नहीं किया गया था और उसने बाद में इसे वापस भी ले लिया था, लेकिन इसके बावजूद सक्षम प्राधिकारी ने लगभग 30 वर्ष पहले इसे पूर्व प्रभाव से स्वीकार कर लिया।

इस विवाद पर पहले सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि इस्तीफा तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक उसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा औपचारिक रूप से स्वीकार न किया जाए। कोर्ट ने छह सितंबर 1994 के आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर और विधि सिद्धांतों के विपरीत करार देते हुए रद कर दिया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा नियमों में पूर्व प्रभाव से इस्तीफा स्वीकार करने का कोई प्रविधान नहीं है। ऐसे में इस्तीफे को पिछली तारीख से स्वीकार करना अवैध है।

अगर आदेश का पालन नहीं किया तब...

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सेवा में मानते हुए 50 प्रतिशत बकाया वेतन देने का निर्देश भी दिया था लेकिन कोर्ट के इस आदेश की पालना नहीं किया गई। अपने फैसले में अदालत ने यह सिद्धांत भी दोहराया कि जब तक इस्तीफा स्वीकार नहीं होता, तब तक कर्मचारी और नियोक्ता के बीच संबंध समाप्त नहीं होता। साथ ही यह भी कहा गया कि कोई भी कर्मचारी अपने इस्तीफे को स्वीकार होने से पहले कभी भी वापस ले सकता है और ऐसी स्थिति में उसे पूर्व प्रभाव से स्वीकार करना न्यायसंगत नहीं है।

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