आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल द्वारा जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सुनवाई से हटाने की मांग के बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम आदेश पारित किया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी मामले को एक जज से दूसरे जज को ट्रांसफर करने का उस जज पर निराशाजनक, मनोबल गिराने वाला और हताश करने वाला असर पड़ सकता है। ऐसा आम तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने 9 अप्रैल के एक आदेश में कहा कि गया कि ऐसी शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर, सावधानी से और सिर्फ खास स्थितियों में ही किया जाना चाहिए। यह आदेश सोमवार को सार्वजनिक किया गया। कोर्ट भ्रष्टाचार के एक मामले में दो आरोपियों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने ट्रायल कोर्ट के अपने मामले को दूसरी जगह भेजने से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी थी।

आरोपियों ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने अपना रवैया बदल लिया है। शुरू में, दलीलें अलग-अलग चरणों में सुनी जानी थीं, जिसकी शुरुआत मंजूरी के मुद्दे से होनी थी। लेकिन जब एक नए पीठासीन अधिकारी ने कार्यभार संभाला तो कोर्ट ने निर्देश दिया कि अंतिम दलीलें मंजूरी और मामले के गुण-दोष दोनों पर एक साथ सुनी जाएं। उन्होंने कहा कि इस बदलाव से अनिश्चितता पैदा हुई और पक्षपात की आशंकाएं बढ़ीं, जिसकी वजह से उन्हें मामले को दूसरी जगह भेजने की मांग करनी पड़ी।

याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट जिस तरह से सुनवाई करता है, उसमें इस तरह के बदलाव अपने आप में पक्षपात या पहले से तय नतीजे का संकेत नहीं देते हैं। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस बात से कि कोर्ट अब अंतिम दलीलें पूरी तरह से सुनना चाहता है, अपने आप में कोई खास मतलब नहीं निकलता। न ही इससे किसी तरह का पक्षपात या नतीजे के पहले से तय होने का कोई संकेत मिलता है। जिस तरीके से ट्रायल कोर्ट अंतिम दलीलें सुनना चाहता है उससे जुड़े ऐसे मामूली पहलुओं को उसी के विवेक पर छोड़ देना ही सबसे अच्छा है।

यह आदेश उसी दिन अपलोड किया गया, जिस दिन जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की एक दूसरी बेंच ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों की एक याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस याचिका में उन्होंने दिल्ली आबकारी नीति मामले में सीबीआई की याचिका की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को अलग करने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें इस बात का वाजिब अंदेशा था कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी।

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