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बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 ( Insurance Regulatory and Development Authority of India Act, 1999 (IRDA) )


 

बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999

(1999 का अधिनियम संख्यांक 41)

[29 दिसम्बर, 1999]

बीमा पालिसी-धारकों के हितों का संरक्षण करने, बीमा उद्योग का विनियमन,

संप्रवर्तन तथा उसकाव्यवस्थित रूप से विकास सुनिश्चित करने के लिए

प्राधिकरण की स्थापना करने तथा उससे संबंधितया उसके आनुषंगिक

विषयों और बीमा अधिनियम, 1938, जीवन बीमा निगम

अधिनियम, 1956 तथा साधारण बीमा कारबार

(राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 का और

संशोधन करने का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के पचासवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप से यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 है ।

                (2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

                (3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीयत सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे :

                परन्तु इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसको धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण स्थापित किया जाता है ;

(ख) प्राधिकरण" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है ;

(ग) अध्यक्ष" से प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;

(घ) निधि" से धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन गठित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण निधि अभिप्रेत है ;

(ङ) अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण" से केन्द्रीय सरकार द्वारा संकल्प सं० 17(2)/94-बीमा-5, तारीख 23 जनवरी, 1996 द्वारा स्थापित बीमा विनियामक प्राधिकरण अभिप्रेत है ;

(च) मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती" के अंतर्गत बीमा दलाल, पुनर्बीमा दलाल, बीमा परामर्शी, सर्वेक्षक और हानि-निर्धारक हैं ;

(छ) सदस्य" से प्राधिकरण का पूर्णकालिक या अंशकालिक सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है ;

(ज) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(झ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(ञ) विनियमों" से प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ।

                (2) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किंतु बीमा अधिनियम, 1938(1938 का 4) या जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956(1956 का 31) अथवा साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीकरण) अधिनियम, 1972(1972 का 57) में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो उनके उन अधिनियमों में हैं ।

 

अध्याय 2

बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण

3. प्राधिकरण की स्थापना और निगमन-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण के नाम से ज्ञात एक प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी ।

                (2) प्राधिकरण पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा या उस पर वाद लाया जाएगा ।

                (3) प्राधिकरण का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा जो केन्द्रीय सरकार समय-समय पर विनिश्चित करे ।

                (4) प्राधिकरण भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा ।

4. प्राधिकरण का गठन-प्राधिकरण निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-

                (क) एक अध्यक्ष ;

                (ख) पांच से अनधिक पूर्णकालिक सदस्य ;

                (ग) चार से अनधिक अंशकालिक सदस्य,

जो केन्द्रीय सरकार द्वारा योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जिन्हें जीवन बीमा, साधारण बीमा, बीमांकिक विज्ञान, वित्त, अर्थशास्त्र, विधि, लेखाकर्म, प्रशासन या किसी अन्य विधा विशेष में, जो केंद्रीय सरकार की राय में, प्राधिकरण के लिए उपयोगी होगी, ज्ञान या अनुभव हो :

                परंतु केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्यों की नियुक्ति करते समय यह सुनिश्चित करेगी कि कम से कम एक-एक व्यक्ति ऐसा है जिसे क्रमशः जीवन बीमा, साधारण बीमा या बीमांकिक विज्ञान का ज्ञान या अनुभव है ।

5. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की पदावधि-(1) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य पूर्णकालिक सदस्य अपने पद ग्रहण की तारीख से, पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा और पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा :

परंतु कोई व्यक्ति पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् ऐसे अध्यक्ष के रूप में पद धारण नहीं करेगा :

परंतु यह और कि कोई व्यक्ति बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् ऐसे पूर्णकालिक सदस्य के रूप में पद धारण नहीं करेगा ।

(2) अंशकालिक सदस्य अपने पद ग्रहण की तारीख से, पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए पद धारण करेगा ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, कोई सदस्य,-

                (क) केन्द्रीय सरकार को तीन मास से अन्यून की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा ; या

                                (ख) धारा 6 के उपबंधों के अनुसार उसके पद से हटाया जा सकेगा ।

6. पद से हटाया जाना-(1) केन्द्रीय सरकार, किसी ऐसे सदस्य को,-

                                (क) जो दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है या किसी समय किया गया है ; या

                                (ख) जो सदस्य के रूप में कार्य करने में शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है ; या

                (ग) जो किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है ; या

                (घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित किया है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ; या

                (ङ) जिसने अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बना रहना लोकहित के लिए हानिकारक है,

पद से हटा सकेगी ।

                (2) ऐसा कोई सदस्य उपधारा (1) के खंड (घ) या खंड (ङ) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे उस विषय में सुने जाने का उचित अवसर प्रदान नहीं कर दिया गया है ।

7. अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन और भत्ते-(1) अंशकालिक सदस्यों से भिन्न सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।

(2) अंशकालिक सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे, जो विहित किए जाएं ।

(3) किसी सदस्य के वेतन, भत्तों और उसकी सेवा की शर्तों में नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

8. सदस्यों के भावी नियोजन पर वर्जन-अध्यक्ष और पूर्णकालिक सदस्य उनके उस रूप में पद पर न रहने की तारीख से दो वर्ष की अवधि तक-

                (क) या तो केन्द्रीय सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई नियोजन ; या

                (ख) बीमा सेक्टर की किसी कंपनी में कोई नियुक्ति,

केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय, स्वीकार नहीं करेंगे ।

9. अध्यक्ष की प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष को, प्राधिकरण के सभी प्रशासनिक विषयों की बाबत साधारण अधीक्षण और निदेशन की शक्तियां होंगी ।

10. प्राधिकरण का अधिवेशन-(1) प्राधिकरण का अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति है), ऐसे नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करेगा, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।

(2) अध्यक्ष या यदि वह किसी कारण से प्राधिकरण के अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित कोई अन्य सदस्य, उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(3) प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का, द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।

(4) प्राधिकरण अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के लिए विनियम बना सकेगा ।

11. रिक्तियों, आदि से प्राधिकरण की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-

                (क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ; या

                (ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है ; या

                (ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणावगुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।

12. प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी-(1) प्राधिकरण उतने अधिकारियों और ऐसे अन्य कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किए गए प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और अन्य शर्तें इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा शासित होंगी ।

अध्याय 3

अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण की आस्तियों, दायित्वों, आदि का अंतरण

13. अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण की आस्तियों, दायित्वों, आदि का अंतरण-नियत दिन को,-

(क) अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण की सभी आस्तियां और दायित्व प्राधिकरण को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।

स्पष्टीकरण-अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण की आस्तियों के अंतर्गत सभी अधिकार और शक्तियां और सभी संपत्तियां, चाहे जंगम हों या स्थावर, समझी जाएंगी, जिनके अंतर्गत, विशिष्टतया, रोकड़-बाकी, निक्षेप और ऐसी संपत्तियों में जो अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण के कब्जे में हों, या उनसे अद्भूत होने वाले सभी अन्य हित और अधिकार और उनसे संबंधित सभी लेखाबहियां और दस्तावेज हैं; और दायित्वों के अंतर्गत किसी भी प्रकार के सभी ऋण, दायित्व और बाध्यताएं समझी जाएंगी ;

(ख) खंड (क) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उस दिन से ठीक पहले अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण के प्रयोजन के लिए या उसके संबंध में उक्त विनियामक प्राधिकरण द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, की गई सभी संविदाएं तथा वे सभी मामले और बातें उक्त प्राधिकरण द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत की गई या किए जाने के लिए समझी जाएंगी ;

(ग) अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण को उस दिन के ठीक पूर्व देय सभी धनराशियां प्राधिकरण को देय समझी जाएंगी ;

(घ) ऐसे सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां जो उस दिन के ठीक पूर्व अंतरिम बीमा विनियामक प्राधिकरण द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित की गई थीं या जो इस प्रकार संस्थित की जा सकती थीं, प्राधिकरण द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेंगी या संस्थित की जा सकेंगी ।

अध्याय 4

प्राधिकरण के कर्तव्य, शक्तियां और कृत्य

14. प्राधिकरण के कर्तव्य, शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण का यह कर्तव्य होगा कि वह बीमा कारबार और पुनर्बीमा कारबार को विनियमित, संप्रवर्तित और उसका व्यवस्थित रूप से विकास सुनिश्चित करे ।

                (2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण की शक्तियों और कृत्यों में निम्नलिखित सम्मिलित होगा,-

(क) आवेदक को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करना, ऐसे रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण, उपांतरण करना, उसे वापस लेना, निलंबित या रद्द करना ;

(ख) पालिसी के समनुदेशन, पालिसी धारकों द्वारा नामनिर्देशन, बीमा योग्य हित, बीमा दावे का निपटारा, पालिसी के अभ्यर्पण मूल्य और बीमा संविदाओं के अन्य निबंधनों और शर्तों से संबंधित मामलों में पालिसी धारकों के हितों का संरक्षण करना ;

(ग) मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों और अभिकर्ताओं के लिए अपेक्षित अर्हताएं, आचार संहिता और व्यावहारिक प्रशिक्षण विनिर्दिष्ट करना,

(घ) सर्वेक्षकों और हानि-निर्धारकों के लिए आचार संहिता विनिर्दिष्ट करना ;

(ङ) बीमा कारबार के संचालन में कार्यकुशलता का संप्रवर्तन करना ;

(च) बीमा और पुनर्बीमा कारबार से संबंधित वृत्तिक संगठनों का संप्रवर्तन और विनियमन करना ;

(छ) इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण करना ;

(ज) बीमा कर्ताओं, मध्यवर्तियों, बीमा मध्यवर्तियों और बीमा कारबार से संबंधित अन्य संगठनों से जानकारी मांगना, उनका निरीक्षण करना, जांच और अन्वेषण करना जिसके अंतर्गत संपरीक्षा भी है ;

(झ) उन दरों, सहूलियतों, निबंधनों और शर्तों का नियंत्रण और विनियमन करना, जो साधारण बीमा कारबार की बाबत बीमाकर्ताओं द्वारा प्रस्थापित की जा सकेंगी और जिनका नियंत्रण और विनियमन बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 64प के अधीन टैरिफ सलाहकार समिति द्वारा नहीं किया जाता है ;

(ञ) वह प्ररूप और रीति विनिर्दिष्ट करना जिसमें बीमाकर्ताओं और अन्य बीमा मध्यवर्तियों द्वारा लेखाबहियां रखी जाएंगी और लेखा विवरण दिया जाएगा ;

(ट) बीमा कंपनियों द्वारा निधियों के विनिधान का विनियमन करना ;

(ठ) शोधन-क्षमता की मात्रा बनाए रखने का विनियमन करना ;

(ड) बीमाकर्ताओं और मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों के बीच विवादों का न्यायनिर्णयन ;

(ढ) टैरिफ सलाहकार समिति के कार्यकरण का पर्यवेक्षण करना ;

(ण) खंड (च) में निर्दिष्ट वृत्तिक संगठनों के संप्रवर्तन और विनियमन की स्कीमों का वित्तपोषण करने के लिए बीमाकर्ता की प्रीमियम आय का प्रतिशत विनिर्दिष्ट करना ;

(त) बीमाकर्ता द्वारा ग्रामीण या सामाजिक सेक्टर में किए जाने वाले जीवन बीमा कारबार और साधारण बीमा कारबार का प्रतिशत विनिर्दिष्ट करना ;

(थ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना जो विहित की जाएं ।

 

 

 

अध्याय 5

वित्त, लेखा और संपरीक्षा

15. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त संसद् द्वारा, विधि द्वारा, किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्राधिकरण को ऐसी धनराशियों का अनुदान दे सकेगी जो सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने हेतु ठीक समझे ।

16. निधि का गठन-(1) बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण निधि" के नाम से ज्ञात एक निधि का गठन किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित जमा किया जाएगा,-

                (क) प्राधिकरण द्वारा प्राप्त सभी सरकारी अनुदान, फीस और प्रभार ;

                (ख) प्राधिकरण द्वारा ऐसे अन्य स्रोत से प्राप्त सभी राशियां जिसका केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चय किया जाए ;

                (ग) बीमाकर्ता से प्राप्त विहित प्रीमियम आय का प्रतिशत ।

(2) निधि का उपयोजन निम्नलिखित की पूर्ति के लिए किया जाएगा, अर्थात्ः-

                (क) प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य पारिश्रमिक ;

                (ख) प्राधिकरण के कृत्यों के निर्वहन से संबंधित और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उसके अन्य व्यय ।

17. लेखा और संपरीक्षा-(1) प्राधिकरण, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जैसा केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे ।

(2) प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक ऐसे अंतरालों पर, जो वह विनिर्दिष्ट करे, करेगा और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत व्यय प्राधिकरण द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति के, उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में साधारणतया होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखा, संबंधित वाउचर और अन्य दस्तावेज और कागज पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा यथा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित प्राधिकरण के लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ हर वर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

18. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग या अपने कृत्यों के पालन में, तकनीकी और प्रशासनिक विषयों से संबंधित प्रश्नों से भिन्न नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में दे:

परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई निदेश दिए जाने के पूर्व प्राधिकरण को अपने विचार व्यक्त करने का यावत्साध्य अवसर दिया जाएगा ।

(2) इस बारे में कि कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

19. केन्द्रीय सरकार की प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि किसी समय केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि-

(क) ऐसी परिस्थितियों के कारण, जो प्राधिकरण के नियंत्रण से बाहर हैं, वह इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों का निर्वहन या कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है; या

(ख) प्राधिकरण ने केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी निदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों के निर्वहन या कर्तव्यों के पालन में बार-बार व्यतिक्रम किया है और ऐसे व्यतिक्रम के फलस्वरूप प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति या प्राधिकरण के प्रशासन को नुकसान हुआ है; या

(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है,

तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा और उन कारणों से जो उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं, अधिक से अधिक छह मास की इतनी अवधि के लिए, जितनी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगी और किसी व्यक्ति को बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) की धारा 2ख के अधीन बीमा नियंत्रक के रूप में नियुक्त कर सकेगी, यदि ऐसा पहले ही नहीं कर दिया गया है:

                परंतु ऐसी कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण को प्रस्तावित अधिक्रमण के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का उचित अवसर देगी और प्राधिकरण के अभ्यावेदनों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -

                                (क) अध्यक्ष और अन्य सदस्य, अधिक्रमण की तारीख से ही, उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे;

                (ख) ऐसी सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से प्रयोग या निर्वहन किया जा सकेगा, तब तक, जब तक कि उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है, बीमा नियंत्रक द्वारा प्रयोग और निर्वहन किया जाएगा; और

                (ग) प्राधिकरण के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन सभी संपत्ति, तब तक, जब तक कि उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है, केन्द्रीय सरकार में निहित होगी ।

(3) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठित काल की समाप्ति पर या उसके पूर्व, केन्द्रीय सरकार, उसके अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नई नियुक्ति द्वारा प्राधिकरण का पुनर्गठन करेगी और ऐसी दशा में कोई ऐसा व्यक्ति जिसने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपना पद रिक्त किया था, पुनर्नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझा जाएगा ।

(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना की एक प्रति और इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई की और उन परिस्थितियों की, जिनके कारण ऐसी कार्रवाई की गई है पूरी रिपोर्ट शीघ्रातिशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

20. केन्द्रीय सरकार को विवरणियों, आदि का दिया जाना-(1) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार को, बीमा उद्योग के संप्रवर्तन और विकास के लिए किसी प्रस्तावित या विद्यमान कार्यक्रम के संबंध में ऐसी विवरणियां, ब्यौरे और ऐसी विशिष्टियां, जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे, ऐसे समय पर तथा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से देगा, जो विहित की जाए या जैसा केन्द्रीय सरकार उन्हें देने का निदेश दे ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के पश्चात् नौ मास के भीतर, पूर्व वित्तीय वर्ष के दौरान बीमा कारबार के संप्रवर्तन और विकास के लिए क्रियाकलापों सहित अपने क्रियाकलापों का सही और पूर्ण ब्यौरा देते हुए एक रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त रिपोर्टों की प्रतियां, उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएंगी ।

21. प्राधिकरण के अध्यक्ष, सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के अध्यक्ष, सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के बारे में, जब वे इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में कोई कार्य कर रहे हैं या उनका कार्य करना तात्पर्यित है, यह समझा जाएगा कि वे भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के भीतर लोक सेवक हैं ।

22. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी:

परंतु इस अधिनियम की कोई बात किसी व्यक्ति को ऐसे किसी वाद या अन्य कार्यवाही से जो इस अधिनियम के अतिरिक्त, उसके विरुद्ध लाई जा सकती है, छूट प्रदान नहीं करेगी ।

23. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) प्राधिकरण, लिखित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्राधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या अधिकारी को ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को, जिन्हें वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।

(2) प्राधिकरण, लिखित साधारण या विशेष आदेश द्वारा सदस्यों की समितियां भी गठित कर सकेगा और उन्हें प्राधिकरण की ऐसी शक्तियां और कृत्य जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।

24. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन अंशकालिक सदस्यों से भिन्न सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(ख) धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन अंशकालिक सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;

(ग) ऐसी अन्य शक्तियां, जो धारा 14 की उपधारा (2) के खंड (थ) के अधीन प्राधिकरण द्वारा प्रयोग की जा   सकेंगी;

(घ) प्राधिकरण द्वारा धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन रखे जाने वाले लेखाओं के वार्षिक विवरण का प्ररूप;

(ङ) वह प्ररूप और रीति जिसमें और वह समय जिसके भीतर धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार को विवरणियां और विवरण तथा विशिष्टियां दी जाएंगी;

(च) धारा 25 की उपधारा (5) के अधीन वे विषय जिन पर बीमा सलाहकार समिति प्राधिकरण को सलाह देगी;

(छ) कोई अन्य विषय, जो नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए अथवा जिसकी बाबत उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

25. बीमा सलाहकार समिति की स्थापना-(1) प्राधिकरण, अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से जिसे वह ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, बीमा सलाहकार समिति के नाम से ज्ञात समिति की स्थापना कर सकेगा ।

(2) बीमा सलाहकार समिति में वाणिज्य, उद्योग, परिवहन, कृषि, उपभोक्ता मंचों, सर्वेक्षकों, अभिकर्ताओं, मध्यवर्तियों, सुरक्षा और हानि निवारण में लगे हुए संगठनों, अनुसंधान निकायों और बीमा सेक्टर के कर्मचारी संगम के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 25 से अनधिक सदस्य होंगे, जिनमें पदेन सदस्य सम्मिलित नहीं हैं ।

(3) प्राधिकरण का अध्यक्ष और सदस्य, बीमा सलाहकार समिति का पदेन अध्यक्ष और पदेन सदस्य होंगे ।

(4) बीमा सलाहकार समिति का उद्देश्य धारा 26 के अधीन विनियम बनाने से संबंधित विषयों पर प्राधिकरण को सलाह देना होगा ।

(5) उपधारा (4) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बीमा सलाहकार समिति ऐसे अन्य विषयों पर जो विहित किए जाएं, प्राधिकरण को सलाह दे सकेगी ।

26. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, बीमा सलाहकार समिति के परामर्श से, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से   संगत हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्:-

(क) धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के अधिवेशनों का समय और स्थान तथा ऐसे अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, जिसके अंतर्गत आवश्यक गणपूर्ति भी है;

(ख) धारा 10 की उपधारा (4) के अधीन इसके अधिवेशनों में कारबार का संव्यवहार;

(ग) धारा 12 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और अन्य शर्तें;

(घ) वे शक्तियां और कृत्य जो धारा 23 की उपधारा (2) के अधीन सदस्यों की समितियों को प्रत्यायोजित किए जा सकेंगे; और

(ङ) कोई अन्य विषय, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना है या किया जाए अथवा जिसकी बाबत विनियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

27. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह नियम या विनियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

28. अन्य विधियों का लागू होना वर्जित होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में ।

29. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित ऐसे आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:

परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा   जाएगा ।

30. 1938 के अधिनियम 4 का संशोधन-बीमा अधिनियम, 1938 का संशोधन इस अधिनियम की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति से किया जाएगा ।

31. 1956 के अधिनियम 31 का संशोधन-जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 का संशोधन इस अधिनियम की दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति से किया जाएगा ।

32. 1972 के अधिनियम 57 का संशोधन-साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 का संशोधन इस अधिनियम की तीसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति से किया जाएगा ।

 

पहली अनुसूची

(धारा 30 देखिए)

बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) के संशोधन

                1. अधिनियम में, धारा 2 के खंड (5ख) और धारा 2ख को छोड़कर, नियंत्रक" के स्थान पर, जहां-जहां वह आता है, प्राधिकरण" रखें; और ऐसे पारिणामिक परिवर्तन भी किए जाएंगे जो व्याकरण के नियमों द्वारा अपेक्षित हों ।

2. धारा 27, धारा 27क, धारा 27ख, धारा 31, धारा 32क, धारा 40क, धारा 48ख, धारा 64च, धारा 64छ, धारा 64झ, धारा 64ञ, धारा 64ठ, धारा 64द, धारा 64पग, धारा 64पड, धारा 113 और धारा 115 में, केन्द्रीय सरकार" के स्थान पर, जहां-जहां वे आते हैं, प्राधिकरण" रखें ।

3. धारा 2 में,-

                (क) खंड (1) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(1क) प्राधिकरण" से बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अभिप्रेत है;

                                (ख) खंड (5ख) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(5ख) बीमा नियंत्रक" से ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार ने इस अधिनियम या जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) या साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) अथवा बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) के अधीन प्राधिकरण की सभी शक्तियों का प्रयोग, उसके कृत्यों का निर्वहन और कर्तव्यों का पालन करने के लिए धारा 2ख के अधीन नियुक्त किया है;

                                (ग) खंड (7) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

                                                (7क) भारतीय बीमा कंपनी" से कंपनी के स्वरूप का कोई ऐसा बीमाकर्ता अभिप्रेत है -

(क) जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत है;

(ख) जिसमें विदेशी कंपनी द्वारा या तो स्वयं या अपनी समनुषंगी कंपनियों या अपने नामनिर्देशितियों के द्वारा कुल साधारण शेयर धारण ऐसी भारतीय बीमा कंपनी की समादत्त साधारण पूंजी के छब्बीस प्रतिशत से अधिक नहीं है;

(ग) जिसका एकमात्र प्रयोजन जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार अथवा पुनर्बीमा कारबार करने का है;

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, विदेशी कंपनी" पद का वही अर्थ होगा जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 2 के खंड (23क) में उसका है;

(घ) खंड (14) में धारा 114" के स्थान पर इस अधिनियम" रखें ।

4. धारा 2 के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

2क. कतियपय शब्दों और पदों का निर्वचन-उन शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31), साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ होंगे जो उन अधिनियमों में क्रमशः उनके हैं ।" ।

5. धारा 2ख में उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

                (1) यदि किसी समय, प्राधिकरण को बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन अतिष्ठित किया जाता है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी व्यक्ति को, उस अधिनियम की धारा 19 की उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण के पुनर्गठित किए जाने तक बीमा नियंत्रक के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।" ।

 

 

 

6. धारा 2ग की उपधारा (1) में दूसरे परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

                परंतु यह भी कि भारतीय बीमा कंपनी से भिन्न कोई बीमाकर्ता बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् भारत में इस अधिनियम के अधीन किसी भी प्रकार का बीमा कारबार करना आरंभ नहीं करेगा ।" ।

7. धारा 3 में, -

                (क) उपधारा (1) में पहले परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

परन्तु यह और कि, यथास्थिति, ऐसा व्यक्ति या बीमाकर्ता जो बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ पर या उसके पूर्व, भारत में किसी वर्ग का ऐसा बीमा कारबार कर रहा हो जिसके लिए ऐसे प्रारंभ के पूर्व कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं था, ऐसे प्रारंभ से तीन मास की अवधि तक अथवा यदि उसने तीन मास की उक्त अवधि के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया था तो ऐसे आवेदन के निपटारे तक ऐसा कारबार करता रह सकेगा:

परन्तु यह भी कि बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ से ठीक पूर्व अभिप्राप्त किए गए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के बारे में यह समझा जाएगा कि वह प्राधिकरण से इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ही अभिप्राप्त किया गया है ।”;

                                (ख) उपधारा (2) में, -

(i) प्रारंभिक भाग में, रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन के साथ निम्नलिखित दिए जाएंगे-" के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन ऐसी रीति से किया जाएगा जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए और उसके साथ निम्नलिखित दिए जाएंगे: -”;

(ii) खंड (घ) में कामकाज पूंजी" के स्थान पर समादत्त साधारण पूंजी या कामकाज पूंजी" रखें;

(iii) खंड (च) में, परंतुक के अंत में आने वाले, और" का लोप करें;

(iv) खंड (छ) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(छ) ऐसी फीस का जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, संदाय प्रकट करने वाली रसीद जो ऐसे प्रत्येक वर्ग के कारबार के लिए जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए पचास हजार रुपए से अधिक नहीं होगी;

(ज) ऐसे अन्य दस्तावेज जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं;";

                                (ग) उपधारा (2क) के पश्चात् अंतःस्थापित करें-

(2कक) प्राधिकरण ऐसे आवेदक को रजिस्टर करने के लिए अधिमान देगा और उसे रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करेगा यदि ऐसा आवेदक व्यष्टियों या व्यष्टियों के समूह को स्वास्थ्य रक्षण उपलब्ध कराने के लिए जीवन बीमा कारबार या साधारण बीमा कारबार करने के ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, सहमति देता है ।";

                                (घ) उपधारा (4) में, -

(i) खंड (च) में उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश" के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किसी विनियम या किए गए किसी आदेश अथवा जारी किए गए किसी निदेश, या";

(ii) खंड (ज) में, अन्त में या" अंतःस्थापित करें;

(iii) खंड (ज) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(झ) यदि बीमाकर्ता बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के अधीन प्राधिकरण द्वारा, यथास्थिति, जारी किए गए किसी निदेश या किए गए किसी आदेश का पालन करने में व्यतिक्रम करता है; या

 

(ञ) यदि बीमाकर्ता, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) या साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) अथवा विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) की किसी अपेक्षा का पालन करने में व्यतिक्रम करता है या उसके उल्लंघन में कार्य करता है ।”;

                                (ङ) उपधारा (5ग) में, -

                (i) खंड (ज)" के स्थान पर, खंड (ज) या खंड (झ) या खंड (ञ)" रखें;

                (ii) इस अधिनियम की या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश की किसी अपेक्षा" के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

                इस अधिनियम की या बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 की या उनके अधीन बनाए गए किसी नियम या किसी विनियम की या किए गए किसी आदेश की अथवा उन अधिनियमों के अधीन जारी किए गए किसी निदेश की अपेक्षा”;

(च) उपधारा (5घ) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

                (5ङ) प्राधिकरण, आदेश द्वारा, किसी रजिस्ट्रीकरण को ऐसी रीति से जो उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, निलंबित या रद्द कर सकेगा:

परंतु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक संबद्ध व्यक्ति को सुने जाने का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।";

                                (च) उपधारा (7) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(7) प्राधिकरण, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के खोने, नष्ट होने या विकृत होने या ऐसी किसी अन्य दशा में, जिसमें कि प्राधिकरण की यह राय हो कि प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति का दिया जाना आवश्यक है, उसकी दूसरी प्रति पांच हजार रुपए से अनधिक की ऐसी फीस की अदायगी पर दे सकेगा, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए ।" ।

                8. धारा 3क में, -

                                (क) उपधारा (1) में, 31 दिसंबर, 1941" के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

                                                बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ पश्चात् 31 मार्च”;

                                (ख) उपधारा (2) में, -

(i) विहित फीस" के स्थान पर, ऐसी फीस जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए," रखें;

(ii) खंड (i) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(i) ऐसी प्रीमियम आय के एक प्रतिशत के एक-चौथाई से या पांच करोड़ रुपए से, जो भी कम हो, अधिक नहीं होगी;”;

                                                (iii) खंड (ii) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(ii) प्रत्येक वर्ग के बीमा कारबार के लिए किसी भी दशा में पचास हजार रुपए से कम नहीं होगी ।”;

(ग) उपधारा (3) में, विहित फीस" के स्थान पर, ऐसी फीस जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए," रखें;

(घ) उपधारा (4) में विहित फीस से" के स्थान पर, ऐसी फीस से जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए," रखें ।

9. धारा 6 के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

6. पूंजी संबंधी अपेक्षा-ऐसे किसी भी बीमाकर्ता को जो बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् भारत में जीवन बीमा, साधारण बीमा या पुनर्बीमा का कारबार कर रहा है, तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके पास, -

(i) जीवन बीमा या साधारण बीमा का कारबार करने वाले व्यक्ति की दशा में, एक अरब रुपए की समादत्त साधारण पूंजी न हो, या

(ii) पुनर्बीमाकर्ता के रूप में अनन्य रूप से कारबार करने वाले व्यक्ति की दशा में, दो अरब रुपए की समादत्त साधारण पूंजी न हो:

परंतु खंड (i) या खंड (ii) के अधीन विनिर्दिष्ट समादत्त साधारण पूंजी का अवधारण करने में, धारा 7 के अधीन किए जाने वाले निक्षेप और कंपनी के बनाए जाने तथा रजिस्ट्रीकरण में उपगत किन्हीं प्रारंभिक व्ययों को अपवर्जित किया जाएगा:

परन्तु यह और कि ऐसे बीमाकर्ता के पास जो बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के पूर्व भारत में जीवन बीमा, साधारण बीमा या पुनर्बीमा का कारबार कर रहा है और जिससे इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत होने की अपेक्षा की जाती है, उस अधिनियम के प्रारंभ से छह मास के भीतर, यथास्थिति, खंड (i) और खंड (ii) के अनुसार, समादत्त साधारण पूंजी होगी ।" ।

10. धारा 6क में, -

                (क) उपधारा (4) के खंड (ख) में, -

                                (I) उपखंड (i) में, अंत में आने वाले और" का लोप करें;

                (II) उपखंड (ii) में, ऐसे अंतरण के लिए केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी अभिप्राप्त नहीं की गई है" के स्थान पर, ऐसे अंतरण के लिए प्राधिकरण का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त नहीं कर लिया है" रखें;

                (III) उपखंड (ii) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(iii) जहां किसी व्यष्टि, फर्म, समूह, समूह के संघटकों या उसी प्रबंध के अधीन निगमित निकाय द्वारा संयुक्त रूप से अथवा पृथक् रूप से अंतरित किए जाने के लिए आशयित शेयरों का अभिहित मूल्य बीमाकर्ता की समादत्त साधारण पूंजी के एक प्रतिशत से अधिक हो जाता है वहां जब तक कि ऐसे अंतरण के लिए प्राधिकरण का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त नहीं कर लिया है ।

स्पष्टीकरण-इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए, समूह" और उसी प्रबंध" पदों के वही अर्थ होंगे जो एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम, 1969 (1969 का 54) में क्रमशः हैं;

                                (ख) उपधारा (11) में, -

                                                (i) स्पष्टीकरण 1" के स्थान पर, स्पष्टीकरण" रखें;

                                                (ii) स्पष्टीकरण 2 का लोप करें ।

                11. धारा 6क के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

6कक. कतिपय मामलों में संप्रवर्तक द्वारा आधिक्य शेयर धारण को निर्निहित करने की रीति-(1) कोई भी संप्रवर्तक, किसी भी समय किसी भारतीय बीमा कंपनी में समादत्त साधारण पूंजी के छब्बीस प्रतिशत या ऐसे अन्य प्रतिशत से, जो विहित किया जाए, अधिक धारण नहीं करेगा:

परंतु ऐसी दशा में जहां भारतीय बीमा कंपनी, जीवन बीमा, साधारण बीमा या पुनर्बीमा का कारबार शुरू करती है जिसमें संप्रवर्तक समादत्त साधारण पूंजी के छब्बीस प्रतिशत से अधिक या ऐसा अन्य अधिक प्रतिशत, जो विहित किया जाए, धारण करता है वहां ऐसे संप्रवर्तक, समादत्त साधारण पूंजी के छब्बीस प्रतिशत से अधिक शेयर पूंजी को या ऐसी अधिक समादत्त साधारण पूंजी में जो विहित की जाए, ऐसी भारतीय बीमा कंपनी द्वारा उक्त कारबार के प्रारंभ की तारीख से दस वर्ष की अवधि के पश्चात् या ऐसी अवधि के भीतर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए, चरणबद्ध रीति से निर्निहित करेगा ।

स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि परंतुक की कोई बात धारा 2 के खंड (7क) के उपखंड (ख) में निर्दिष्ट ऐसे संप्रवर्तकों को जो विदेशी कंपनी है, लागू नहीं होगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन आधिक्य में की शेयर पूंजी को निर्निहित करने की रीति और प्रक्रिया प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएगी ।" ।

                12. धारा 7 में, -

                                (क) उपधारा (1) में, -

                                                (i) जो धारा 2 के खंड (9) के उपखंड (ग) में विनिर्दिष्ट बीमाकर्ता नहीं है," का लोप करें;

                                                (ii) खंड (क) और खंड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(क) जीवन बीमा कारबार की दशा में, उसके उस समस्त प्रीमियम के योग के जो 31 मार्च, 2000 के पश्चात् प्रारंभ हुए किसी वित्तीय वर्ष में भारत में लिखित है, दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है एक प्रतिशत के बराबर की राशि होगी;

(ख) साधारण बीमा कारबार की दशा में, उसके उस समस्त प्रीमियम के योग के जो 31 मार्च, 2000 के पश्चात् प्रारंभ हुए किसी वित्तीय वर्ष में भारत में लिखित है, दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है तीन प्रतिशत के बराबर की राशि होगी;

(ग) पुनर्बीमा कारबार की दशा में, बीस करोड़ रुपए की राशि होगी;”;

                                (ख) उपधारा (1क), उपधारा (1ख), उपधारा (1ग), उपधारा (1घ) और उपधारा (1ङ) का लोप करें ।

                13. धारा 11 में, -

                                (क) उपधारा (1) में प्रत्येक कैलेण्डर वर्ष" के स्थान पर, प्रत्येक वित्तीय वर्ष" रखें;

                                (ख) उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् उसके द्वारा किए गए बीमा कारबार के संबंध में और उसके शेयरधारकों की निधियों के संबंध में, प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर उस वर्ष के संबंध में, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों के अनुसार एक तुलनपत्र, लाभ-हानि लेखा, प्राप्तियों और संदायों का पृथक् लेखा, आमदनी खाता तैयार करेगा ।

(1ख) प्रत्येक बीमाकर्ता, शेयरधारकों और पालिसी धारकों की निधियों से संबंधित पृथक् खाता रखेगा;" ।

                14. धारा 13 में-

                                (क) उपधारा (1) में-

                                                (i) प्रत्येक तीन वर्ष में कम से कम एक बार" के स्थान पर, प्रत्येक वर्ष" रखें;

                                                (ii) पहले परंतुक में चार वर्ष के पश्चात् की न हो" के स्थान पर, दो वर्ष के पश्चात् की न हो" रखें;

                                                (iii) दूसरे परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

परंतु यह भी कि बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के ठीक पहले भारत में जीवन बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता के लिए अंतिम तारीख, जिसको ऐसे प्रारंभ के पश्चात् प्रथम अन्वेषण बीमांकक द्वारा कराया जाना चाहिए, 31 मार्च, 2001 होगी;";

                                                (iv) तीसरे परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

परंतु यह भी कि प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ को या उसके पश्चात् बीमांकक की रिपोर्ट की संक्षिप्ति प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट रीति में तैयार कराएगा ।”;

                                (ख) उपधारा (4) में परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

                परंतु यह और कि उपधारा (4) में निर्दिष्ट विवरण, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट प्ररूप और रीति में संलग्न किया जाएगा ।" ।

15. धारा 27ख के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

27ग. भारत से बाहर निधियों के विनिधान का प्रतिषेध-कोई भी बीमाकर्ता पालिसी धारकों की निधियों का प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः भारत से बाहर विनिधान नहीं करेगा ।

27घ. विनिधान की रीति और शर्तें-(1) प्राधिकरण, धारा 27, धारा 27क और धारा 27ख में की किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, पालिसी धारकों के हित में, उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किसी बीमाकर्ता द्वारा धारण की जाने वाली आस्तियों के विनिधान का समय, रीति और अन्य शर्तें विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।

 

 

(2) प्राधिकरण, ऐसे समय, रीति और अन्य शर्तों के बारे में विनिर्दिष्ट निदेश दे सकेगा जिनके अधीन रहते हुए पालिसीधारकों की निधियां ऐसी अवसंरचना और सामाजिक सेक्टर में विनिधान की जाएंगी जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसे विनियम बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् भारत में जीवन बीमा, साधारण बीमा या पुनर्बीमा कारबार करने वाले सभी बीमाकर्ताओं को एकरूप में लागू होंगे ।

(3) प्राधिकरण, कारबार की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए और पालिसी धारकों के हितों को संरक्षित करने के लिए बीमाकर्ता को उसके द्वारा धारित की जाने वाली आस्तियों के विनिधान के समय, रीति और अन्य शर्तों से संबंधित निदेश जारी कर सकेगा:

परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई निदेश तब तक जारी नहीं किया जाएगा जब तक कि संबद्ध बीमाकर्ता को सुने जाने का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।"।

                16. धारा 28क की उपधारा (1) में दिसम्बर के इकतीसवें दिन" के स्थान पर, मार्च के इकतीसवें दिन" रखें ।

                17. धारा 28ख की उपधारा (1) में दिसम्बर के इकतीसवें दिन" के स्थान पर, मार्च के इकतीसवें दिन" रखें ।

                18. धारा 31ख में, -

                                (क) उपधारा (1) में केन्द्रीय सरकार" के स्थान पर, दोनों स्थान पर, जहां वे आते हैं, प्राधिकरण" रखें;

                (ख) उपधारा (2) में विहित प्ररूप में एक विवरण देगा" के स्थान पर, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट प्ररूप में एक विवरण देगा" रखें;

                (ग) उपधारा (3) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

                                (4) इस धारा के अधीन प्रत्येक निदेश प्राधिकरण द्वारा किए गए आदेश द्वारा जारी किया जाएगा:

परंतु इस धारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि संबद्ध व्यक्ति को सुने जाने का अवसर न दे दिया गया हो ।" ।

                19. धारा 32क के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

32ख. ग्रामीण और सामाजिक सेक्टर में बीमा कारबार-प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम 1999 के प्रारंभ के पश्चात्, ग्रामीण या सामाजिक सेक्टर में उतना प्रतिशत जीवन बीमा कारबार और साधारण बीमा कारबार करेगा जितना प्राधिकरण द्वारा, राजपत्र में, इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए ।" ।

32ग. ग्रामीण या असंगठित सेक्टर और पिछड़े वर्गों के संबंध में बीमाकर्ता की बाध्यताएं-प्रत्येक बीमाकर्ता, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के पश्चात्, ऐसे व्यक्तियों को जो ग्रामीण सेक्टर में निवास कर रहे हैं, असंगठित या अनियमित सेक्टर के कर्मकारों अथवा समाज के आर्थिक रूप से असुरक्षित या पिछड़े वर्गों के और ऐसे अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों को जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, जीवन बीमा या साधारण बीमा पालिसियां उपलब्ध कराने के लिए धारा 32ख के अधीन बाध्यताओं का निर्वहन करेगा और ऐसी पालिसियों के अन्तर्गत फसल के लिए बीमा भी होगा ।" ।

                20. धारा 33 के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

अन्वेषण

33. प्राधिकरण की अन्वेषण और निरीक्षण की शक्ति-(1) प्राधिकरण, किसी भी समय लिखित आदेश द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को, जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो (जिसे इस धारा में, इसके पश्चात् अन्वेषक प्राधिकारी" कहा गया है), किसी बीमाकर्ता के कार्यकलापों का अन्वेषण करने तथा ऐसे अन्वेषक प्राधिकारी द्वारा किए गए ऐसे किसी अन्वेषण की रिपोर्ट प्राधिकरण को देने का निदेश दे सकेगा:

परन्तु ऐसा अन्वेषक प्राधिकारी, जब कभी आवश्यक हो, इस धारा के अधीन किसी अन्वेषण में अपनी सहायता के प्रयोजन से लेखापरीक्षक या बीमांकक या दोनों को, नियोजित कर सकेगा ।

(2) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 235 में इसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, अन्वेषक प्राधिकारी किसी बीमाकर्ता का तथा उसकी बहियों और लेखाओं का अपने एक या अधिक अधिकारियों द्वारा निरीक्षण किसी भी समय करा सकेगा तथा प्राधिकरण द्वारा ऐसा करने का निदेश दिए जाने पर कराएगा और अन्वेषक प्राधिकारी ऐसे निरीक्षण की अपनी रिपोर्ट की एक प्रति बीमाकर्ता को देगा ।

 

 

(3) बीमाकर्ता के हर प्रबंधक, प्रबंध निदेशक या अन्य अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण अथवा उपधारा (2) के अधीन, निरीक्षण करने के लिए निर्दिष्ट अन्वेषक प्राधिकारी के समक्ष ऐसी सब लेखा-बहियां, रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें, जो उसकी अभिरक्षा और शक्ति में हैं, पेश करे तथा बीमाकर्ता के कार्यकलाप से संबंधित ऐसे कोई विवरण और जानकारी, जिनकी उक्त अन्वेषक प्राधिकारी द्वारा उससे अपेक्षा की जाए, इतने समय के अन्दर उस दे जितना उक्त अन्वेषक प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए ।

(4) उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण करने के लिए अथवा उपधारा (2) के अधीन निरीक्षण करने के लिए निर्दिष्ट, अन्वेषक प्राधिकारी बीमाकर्ता के कारबार के संबंध में बीमाकर्ता के किसी प्रबंधक, प्रबंध निदेशक या अन्य अधिकारी की शपथ पर परीक्षा कर सकेगा और उसके अनुसार शपथ ग्रहण करा सकेगा ।

(5) अन्वेषक प्राधिकारी, इस धारा के अधीन किए गए किसी निरीक्षण की बाबत प्राधिकरण को रिपोर्ट उस दशा में देगा जबकि निरीक्षण करने का निदेश प्राधिकरण ने उसे दिया हो, तथा किसी अन्य दशा में प्राधिकरण को दे सकेगा ।

(6) उपधारा (1) अथवा उपधारा (5) के अधीन किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, प्राधिकरण, उस रिपोर्ट के संबंध में अभ्यावेदन करने का बीमाकर्ता को ऐसा अवसर देने के पश्चात् जो प्राधिकरण की राय में युक्तियुक्त प्रतीत हो, लिखित आदेश द्वारा-

(क) बीमाकर्ता से यह अपेक्षा कर सकेगा कि रिपोर्ट से उत्पन्न किसी विषय के बारे में वह ऐसी कार्रवाई करे जैसी प्राधिकरण ठीक समझे; या

(ख) बीमाकर्ता का रजिस्ट्रीकरण रद्द कर सकेगा; या

(ग) किसी व्यक्ति को निदेश दे सकेगा कि वह उस दशा में, जिसमें कि बीमाकर्ता कंपनी है, उसके परिसमापन के लिए न्यायालय में आवेदन करे, भले ही बीमाकर्ता का रजिस्ट्रीकरण खंड (ख) के अधीन रद्द किया गया हो या नहीं ।

(7) प्राधिकरण, बीमाकर्ता को युक्तियुक्त सूचना देने के पश्चात् उपधारा (5) के अधीन अन्वेषक प्राधिकारी द्वारा दी गई रिपोर्ट को, या उसके ऐसे भाग को, जो उसे आवश्यक प्रतीत हो, प्रकाशित कर सकेगा ।

(8) प्राधिकरण वह न्यूनतम जानकारी, जो बीमाकर्ताओं द्वारा अपनी बहियों में रखी जानी है, वह रीति जिसमें ऐसी जानकारी रखी जाएगी, वे जांच-पड़तालें तथा अन्य सत्यापन, जो बीमाकर्ताओं द्वारा इस संबंध में किए जाने हैं तथा उनसे आनुषंगिक सब अन्य ऐसी बातें, जो उसकी राय में अन्वेषक प्राधिकारी को इस धारा के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हैं, उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए बीमाकर्ता" शब्द के अन्तर्गत, भारत में निगमित बीमाकर्ता की दशा में, -

(क) उसकी वे सब समनुषंगी आती हैं जो अनन्यतः भारत के बाहर बीमा कारबार करने के प्रयोजन से बनाई गई हैं; और

(ख) उसकी सब शाखाएं आती हैं, भले ही वे भारत में या भारत के बाहर स्थित हों ।

(9) उपधारा (6) के खंड (ख) के अधीन किए गए आदेश से भिन्न किसी भी ऐसे आदेश पर, जो इस धारा के अधीन किया गया है, किसी न्यायालय में आक्षेप नहीं किया जाएगा ।

(10) इस धारा के अधीन किए गए किसी अन्वेषण के और उससे आनुषंगिक सब व्यय बीमाकर्ता द्वारा चुकाए जाएंगे तथा बीमाकर्ता से शोध्य अन्य ऋणों पर अग्रता रखेंगे तथा भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलीय होंगे ।" ।

                21. धारा 33क में से केन्द्रीय सरकार या" का लोप करें ।

                22. धारा 34ज में, -

                                (क) उपधारा (1) में, -

                                                (i) नियंत्रक" के स्थान पर प्राधिकरण के अध्यक्ष" रखें;

                                                (ii) सहायक बीमा नियंत्रक" के स्थान पर प्राधिकरण द्वारा प्राधिकृत अधिकारी" रखें;

(ख) उपधारा (5) और उपधारा (7) में, नियंत्रक" के स्थान पर, जहां भी वह आता है, प्राधिकरण के अध्यक्ष" रखें ।

                23. धारा 35 में, -

                                (क) उपधारा (1) में नियंत्रक द्वारा मंजूर की गई" के स्थान पर प्राधिकरण द्वारा अनुमोदन की गई" रखें;

                                (ख) उपधारा (3) में, -

(i) पहले पैरा में, ऐसी कोई स्कीम मंजूर करने के लिए" के स्थान पर ऐसी किसी स्कीम का अनुमोदन करने के लिए" रखें;

(ii) दूसरे पैरा में, समामेलन या अंतरण जिसे नियंत्रक ने मंजूर कर दिया हो" के स्थान पर समामेलन या अंतरण, जिसका प्राधिकरण ने अनुमोदन कर दिया हो" रखें ।

                24. धारा 36 में, -

(क) उपधारा (1) में उस ठहराव को उस दशा में मंजूर कर सकेगा" के स्थान पर उस ठहराव का उस दशा में अनुमोदन कर सकेगा" रखें;

(ख) उपधारा (2) में, -

(i) नियंत्रक ऐसी संविदाओं की रकम को कम करने वाले ठहराव को ऐसे निबंधनों और ऐसी शर्तों पर मंजूर कर सकेगा" के स्थान पर प्राधिकरण ऐसी संविदाओं की रकम को कम करने वाले ठहराव का ऐसे निबंधनों और ऐसी शर्तों पर अनुमोदन कर सकेगा" रखें;

(ii) संविदाओं की वह कमी जो नियंत्रक द्वारा मंजूर की गई हो" के स्थान पर संविदाओं की वह कमी जिसका प्राधिकरण द्वारा अनुमोदन किया गया हो" रखें ।

                25. धारा 37 के खंड (ग) में मंजूर की गई स्कीम" के स्थान पर अनुमोदन की गई स्कीम" रखें ।

26. धारा 40क की उपधारा (3) में जो-" शब्द से आरंभ होने वाले और दस प्रतिशत से अधिक है" शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर, जो, जहां पालिसी अग्िन या समुद्री बीमा अथवा प्रकीर्ण बीमा से संबंधित है वहां, पालिसी पर देय प्रीमियम के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं है ।" रखें ।

27. धारा 42क में, -

                (क) उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें-

(1) प्राधिकरण या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी विनियमों द्वारा अवधारित रीति से आवेदन करने वाले किसी व्यक्ति को बीमा कारबार के लिए याचना करने या उसे उपाप्त करने के प्रयोजन के लिए बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य करने की अनुज्ञप्ति उसके द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित रीति तथा विनियमों द्वारा अवधारित फीस की अदायगी पर, जो दो सौ पचास रुपए से अधिक न होगी देगा:

परंतु यह तब जब कि-

(i) व्यष्टि की दशा में, वह उपधारा (4) में उल्लिखित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है, तथा

(ii) कंपनी या फर्म की दशा में, उसके निदेशकों या भागीदारों में से कोई भी उक्त निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है:

परंतु यह और कि बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के ठीक पूर्व जारी की गई अनुज्ञप्ति ऐसे विनियमों के अनुसार जो ऐसी अनुज्ञप्ति के लिए उपबंध करते हैं जारी की गई समझी जाएगी;";

                                (ख) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(3) बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ की तारीख के पश्चात् इस धारा के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति उसके दिए जाने की तारीख से केवल तीन वर्ष की अवधि तक ही प्रवृत्त रहेगी, किन्तु यदि आवेदक व्यष्टि है तो वह आवेदक अथवा यदि आवेदक कंपनी या फर्म है तो उसके निदेशकों या भागीदारों में से कोई उपधारा (4) के खंड (ख), खंड (ग), खण्ड (घ), खण्ड (ङ) और खंड (च) में उल्लिखित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है, और यदि अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए आवेदन निर्गमन प्राधिकारी के पास उस तारीख से, जिसको अनुज्ञप्ति प्रवृत्त नहीं रह जाती, कम से कम तीस दिन पूर्व पहुंच गया है तो वह अनुज्ञप्ति प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित फीस का, जो दो सौ पचास रुपए से अधिक नहीं होगी, संदाय करने पर और यदि अनुज्ञप्ति के नवीकरण का आवेदन निर्गमन प्राधिकारी के पास उस तारीख से, जिसको वह अनुज्ञप्ति प्रवृत्त नहीं रह गई है, कम से कम तीस दिन पूर्व नहीं पहुंचता है तो शास्ति के रूप में विनियमों द्वारा अवधारित रकम की अतिरिक्त फीस का, जो सौ रुपए से अधिक नहीं होगी, संदाय करने पर एक बार में तीन वर्ष की अवधि के लिए नवीकृत की जाएगी ।";

                                (ग) उपधारा (3क) में, परंतुक के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

परंतु यदि प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि अन्यथा असम्यक् कठिनाई होगी तो वह इस उपधारा के उल्लंघन में आवेदन को आवेदक द्वारा सात सौ पचास रुपए की शास्ति का संदाय किए जाने पर स्वीकार कर सकेगा ।";

                                (घ) उपधारा (4) में खंड (घ) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(ङ) यह कि उसके पास अपेक्षित अर्हताएं और बारह मास से अनधिक अवधि का व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं है जो प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए,

(च) यह कि उसने ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है जो प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए:

परंतु ऐसे व्यक्ति से, जिसे इस धारा की उपधारा (1) या धारा 64पड की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति जारी की गई थी, यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि उसके पास खंड (ङ) और खंड (च) की अपेक्षानुसार अपेक्षित अर्हताएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण हो और वह ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण करे;

(छ) यह कि वह प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट आचार संहिता का अतिक्रमण करता है; और “;

                                (ङ) उपधारा (6) के स्थान पर निम्नलिखित रखें:-

(6) प्राधिकरण, खो गई, नष्ट हो गई या विकृत हो गई अनुज्ञप्ति के बदले में उसकी दूसरी प्रति विनियमों द्वारा अवधारित फीस का संदाय करने पर, जो पचास रुपए से अधिक न होगी, दे सकेगा ।”;

                                (च) उपधारा (7) में, -

                                                (i) पचास रुपए" के स्थापन पर पांच सौ रुपए" रखें;

                                                (ii) सौ रुपए" के स्थान पर एक हजार रुपए" रखें;

                                (छ) उपधारा (8) में, पचास रुपए" के स्थान पर पांच हजार रुपए" रखें ।

                28. धारा 42क की उपधारा (1) में, -

(क) नियंत्रक या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी" के स्थान पर प्राधिकरण या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी" रखें;

(ख) उससे आवेदन किया हो" के स्थान पर उसे आवेदन किया हो" रखें ।

                29. धारा 42ग के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

42घ. मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को अनुज्ञप्ति जारी करना-(1) प्राधिकरण या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी, विनियमों द्वारा अवधारित रीति से आवेदन करने वाले किसी व्यक्ति को जो इसमें वर्णित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है, इस अधिनियम के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने की अनुज्ञप्ति, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित रीति से और प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित फीस की अदायगी पर, देगा:

परंतु यह तब जब कि-

(क) व्यष्टि की दशा में, वह धारा 42 की उपधारा (4) में उल्लिखित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है; या

(ख) कंपनी या फर्म की दशा में, इसके निदेशकों या भागीदारों में से कोई भी, उक्त निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है ।

(2) इस धारा के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति का धारक मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने का हकदार हो जाएगा ।

(3) इस धारा के अधीन जारी की गई अनुज्ञप्ति उसके दिए जाने की तारीख से केवल तीन वर्ष की अवधि तक ही प्रवृत्त रहेगी किन्तु, यदि आवेदक, व्यष्टि है, तो वह आवेदक अथवा आवेदक कंपनी या फर्म है तो, उसके निदेशकों या भागीदारों में कोई धारा 42 की उपधारा (4) के खंड (ख), खंड (ग), खंड (घ), खंड (ङ) और खंड (च) में उल्लिखित निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त नहीं है और अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए आवेदन निर्गमन प्राधिकारी के पास उस तारीख से, जिसको अनुज्ञप्ति प्रवृत्त नहीं रह जाती, कम से कम तीस दिन पूर्व पहुंच गया है तो वह अनुज्ञप्ति, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित फीस का संदाय करने पर और यदि अनुज्ञप्ति के नवीकरण का आवेदन निर्गमन प्राधिकारी के पास उस तारीख से, जिसको वह अनुज्ञप्ति प्रवृत्त नहीं रह गई है, कम से कम तीस दिन पूर्व नहीं पहुंचता है तो शास्ति के रूप में विनियमों द्वारा अवधारित अतिरिक्त फीस का, जो सौ रुपए से अधिक नहीं होगी, संदाय करने पर एक बार में तीन वर्ष की अवधि के लिए नवीकृत की जाएगी ।

(4) इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए कोई भी आवेदन उस दशा में ग्रहण नहीं किया जाएगा, जब कि वह आवेदन, निर्गमन प्राधिकारी के पास उस अनुज्ञप्ति के प्रवृत्त न रह जाने के पूर्व नहीं पहुंच जाता:

परंतु यदि प्राधिकरण का यह समाधान हो गया है कि अन्यथा असम्यक् कठिनाई होगी तो वह इस उपधारा के उल्लंघन में किसी आवेदन को आवेदक द्वारा सात सौ पचास रुपए की शास्ति का संदाय किए जाने पर स्वीकार कर सकेगा ।

(5) ऊपर निर्दिष्ट निरर्हताएं निम्नलिखित होंगी: -

                (क) यह कि वह व्यक्ति अवयस्क है;

                (ख) यह कि सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि वह विकृतचित्त है;

                (ग) यह कि उसके बारे में सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि वह आपराधिक दुर्विनियोजन या आपराधिक न्यास भंग या छल या कूटरचना का या ऐसे किसी अपराध के दुष्प्रेरण का या उसे करने के प्रयत्न का दोषी है:

                परंतु जहां किसी ऐसे अपराध की बाबत किसी व्यक्ति पर अधिरोपित दंडादेश की समाप्ति से कम से कम पांच वर्ष व्यतीत हो गए हैं, वहां प्राधिकरण ऐसे व्यक्ति की बाबत मामूली तौर पर यह घोषणा करेगा कि उसकी दोषसिद्धि इस खंड के अधीन निरर्हता के रूप में प्रवृत्त नहीं रह गई है ;

                (घ) यह कि किसी बीमा पालिसी से या किसी बीमा कंपनी के परिसमापन से संबंधित किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान या किसी बीमाकर्ता के कार्यकलापों के अन्वेषण के दौरान यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वह बीमाकर्ता या बीमाकृत के प्रति किसी कपट, बेइमानी या दुर्व्यपदेशन का दोषी है यह जानते हुए उसमें भागीदार रहा है या ऐसे अपराध के प्रति मौनानुकूल रहा है;

                (ङ) यह कि उसके पास ऐसी अपेक्षित अर्हताएं और बारह मास से अनधिक की अवधि का ऐसा व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं है, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए;

                (च) यह कि उसने ऐसी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए;

                (छ) यह कि उसने उस आचार संहिता का अतिक्रमण किया है जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।

(6) यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती पूर्वगामी निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त है तो ऐसी किसी अन्य शास्ति पर, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जिसके लिए वह दायी हो, प्राधिकरण, इस धारा के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को दी गई अनुज्ञप्ति को रद्द कर देगा और उस दशा में भी रद्द कर सकेगा जबकि मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती ने जानते हुए इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन किया है ।

(7) प्राधिकरण खो गई, नष्ट हो गई या विकृत हो गई अनुज्ञप्ति के बदले में उसकी दूसरी प्रति ऐसी फीस का संदाय करने पर, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, दे सकेगा ।

(8) जो व्यक्ति, मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करने के लिए इस धारा के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति प्राप्त किए बिना मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में कार्य करेगा वह, जुर्माने से दंडनीय होगा और जो बीमाकर्ता या बीमाकर्ता की ओर से कार्य करने वाला व्यक्ति, किसी ऐसे व्यक्ति को मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती के रूप में नियुक्त करेगा, जो उस रूप में कार्य करने के लिए अनुज्ञप्त नहीं है या भारत में बीमा कारबार ऐसे किसी व्यक्ति के माध्यम से, करेगा, वह जुर्माने से दंडनीय होगा ।

(9) यदि उपधारा (8) का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कंपनी या फर्म है, तो ऐसी किन्हीं अन्य कार्यवाहियों पर, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो कंपनी या फर्म के विरुद्ध की जा सकेंगी, कंपनी का ऐसा प्रत्येक निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी और फर्म का ऐसा प्रत्येक भागीदार, जिसने जानते हुए ऐसे उल्लंघन में भाग लिया है, जुर्माने से दंडनीय   होगा ।" ।

                30. धारा 64पक की उपधारा (1) के खंड (क) में बीमा नियंत्रक" के स्थान पर प्राधिकरण का अध्यक्ष" रखें ।

                31. धारा 64पख में, -

                                (क) उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(1) प्राधिकरण, इस भाग के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनियम बना सकेगा ।”;

                                (ख) उपधारा (2) में, नियम" के स्थान पर विनियम" रखें;

                                (ग) उपधारा (3) में, केंद्रीय सरकार" के स्थान पर, दोनों स्थानों पर, जहां-जहां वे आते हैं, प्राधिकरण" रखें;

                                (घ) उपधारा (5) में, बीमा नियंत्रक" के स्थान पर प्राधिकरण का अध्यक्ष" रखें ।

                32. धारा 64पग की उपधारा (1) के परन्तुक में नियंत्रक केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से" के स्थान पर प्राधिकरण" रखें ।

                33. धारा 64पघ में उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

परंतु प्राधिकरण का अध्यक्ष, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ से ही सलाहकार समिति का अध्यक्ष बन जाएगा और उस रूप में कार्य करेगा तथा ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले पद धारण करने वाला टैरिफ समिति की कोई अध्यक्ष उसका अध्यक्ष नहीं रहेगा ।" ।

                34. धारा 64पञ की उपधारा (5) में केन्द्रीय सरकार" के स्थान पर, जहां-जहां वह आता है, प्राधिकरण" रखें ।

                35. धारा 64पड में, -

                                (क) उपधारा (1) में, -

(i) खंड (ख) में बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1968 के प्रारंभ से एक वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात्" के पश्चात् किंतु बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ से पूर्व" अंतःस्थापित करें;

(ii) खंड (ख) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

(खक) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ से एक वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सर्वेक्षक या हानि-निर्धारक के रूप में कार्य करने का इरादा रखता है, प्राधिकरण को ऐसे समय के भीतर, ऐसी रीति से जिसमें और ऐसी फीस का संदाय करके, जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाए, आवेदन करेगा:

परंतु बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के ठीक पहले दी गई अनुज्ञप्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसी अनुज्ञप्ति का उपबंध करने वाले विनियमों के अनुसार दी गई है ।";

                                                (iii) खंड (ग) में, जो विहित की जाए," के स्थान पर, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए," रखें;

                                                (iv) खंड (घ) के उपखंड (i) में, -

                                                                (अ) मद (क) के स्थान निम्नलिखित रखें, -

(क) वह बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ की तारीख को सर्वेक्षक या हानि-निर्धारक के रूप में व्यवसाय कर रहा था, या”;

(आ) मद (च) में, विहित" के स्थान पर प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट" रखें;

                                (ख) उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें-

(1क) प्रत्येक सर्वेक्षक और हानि-निर्धारक, अपने कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों और अन्य वृत्तिक अपेक्षाओं की बाबत उस आचार संहिता का अनुपालन करेगा जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।"।

                36. धारा 64फ में, -

                                (क) उपधारा (1) में, -

                                                (i) खंड (i) में, खंड (छ) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(ज) ऐसी अन्य आस्ति या आस्तियां, जो इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं;";

                                                (ii) खंड (ii) में, -

                                                                (अ) उपखंड (ख) की मद (i) और मद (ii) में, 40 प्रतिशत" के स्थान पर, 50 प्रतिशत" रखें;

                                                                (आ) उपखंड (च) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

(छ) ऐसा अन्य दायित्व जो खंड (ii) के प्रयोजनों के लिए सम्मिलित किए जाने हेतु इस निमित्त सृजित किया जाए ।”;

                                (ख) उपधारा (2) के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

(2) प्रत्येक बीमाकर्ता, यथास्थिति, साधारण बीमा कारबार के संबंध में प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित लेखापरीक्षक द्वारा या जीवन बीमा कारबार की बाबत प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित बीमांकक द्वारा प्रमाणित अपनी आस्तियों और दायित्वों का विवरण, जिनका इस धारा द्वारा अपेक्षित रीति से निर्धारण पूर्ववर्ती वर्ष की 31 मार्च को किया गया है, यथास्थिति, धारा 15 या धारा 16 के अधीन दी गई अपनी विवरणियों के साथ प्राधिकरण को देगा ।

(3) प्रत्येक बीमाकर्ता अपनी आस्तियों और दायित्वों का मूल्यांकन इस धारा द्वारा अपेक्षित रीति से और प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त बनाए गए विनियमों के अनुसार, करेगा ।" ।

                37. धारा 64फक में, -

(क) उपधारा (1) में, सदैव" के स्थान पर, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ के पूर्व सदैव" रखें;

(ख) उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें, -

(1क) प्रत्येक बीमाकर्ता, अपने दायित्वों की रकम के ऊपर अपनी आस्तियों का मूल्य बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ को या उसके पश्चात्, सदैव इतना अधिक बनाए रखेगा जो निम्नलिखित रीति से निकाली गई रकम से कम न हो (जिसे इस धारा में इसके पश्चात्, अपेक्षित शोधन क्षमता मार्जिन" कहा गया है, अर्थात्: -

(i) जीवन बीमा कारबार करने वाले बीमाकर्ता की दशा में, अपेक्षित शोधन क्षमता मार्जिन निम्नलिखित रकमों से उच्चतर होगा-

                                                                                (क) पचास करोड़ रुपए (पुनर्बीमाकर्ताओं की दशा में, एक अरब रुपए);

                                                                                (ख) नीचे उल्लिखित मद (ख्र्) और (ख्र्ख्र्) में निकाले गए परिणामों की कुल राशि: -

(ख्र्) नीचे मद (अ) (प्रक्रम 1") में वर्णित संगणना और नीचे मद (आ) (प्रक्रम 2") में वर्णित संगणना को लागू करके प्राप्त परिणामों का योग:

                (अ) प्रक्रम 1 के लिए-

(अ-1) विनियमों द्वारा अवधारित प्रतिशत के बराबर राशि, जो सीधे कारबार के लिए गणितीय आरक्षिति के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होगी और पुनर्बीमा समाप्ति के लिए किसी कटौती के बिना पुनर्बीमा स्वीकृतियों की राशि निकाली जाएगी;

(अ-2) पुनर्बीमा समाप्तियों की कटौती के पश्चात्, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के अंत में गणितीय आरक्षितियों की रकम, ऐसी किसी कटौती के पूर्व उन गणितीय आरक्षितियों की रकम के प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाएगी; और

(अ-3) ऊपर मद (अ-1) में उल्लिखित राशि को निम्नलिखित से गुणा किया जाएगा-

(अ-3.1) जहां ऊपर मद (अ-2) के अधीन निकाला गया प्रतिशत पचासी प्रतिशत (या अनन्य रूप से पुनर्बीमा कारबार करने वाले पुनर्बीमाकर्ता की दशा में, पचास प्रतिशत) से अधिक है उतने अधिक प्रतिशत, और

(अ-3.2) किसी अन्य दशा में, पचासी प्रतिशत (या अनन्य रूप से पुनर्बीमा कारबार करने वाले पुनर्बीमाकर्ता की दशा में, पचास प्रतिशत);

                                                                                                                                (आ) प्रक्रम 2 के लिए-

(आ-1) प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित प्रतिशत के बराबर राशि, जो उन पालिसियों के लिए जिन पर जोखिम की राशि कोई नकारात्मक आंकड़ा नहीं है, जोखिम राशि के एक प्रतिशत से अधिक नहीं है निकाली जाएगी;

(आ-2) उन पालिसियों के लिए, जिन पर पुनर्बीमा समाप्ति की कटौती के पश्चात् जोखिम की राशि कोई नकारात्मक आंकड़ा नहीं है, पूर्ववर्ती वित्त वर्ष के अंत में जोखिम राशि की रकम, ऐसी किसी कटौती के पूर्व उस जोखिम राशि की रकम के प्रतिशत के रूप में व्यक्त की जाएगी, और

(आ-3) ऊपर मद (आ-1) में निकाली गई राशि को निम्नलिखित से गुणा किया जाएगा-

(आ-3.1) जहां ऊपर मद (आ-2) में निकाला गया प्रतिशत पचास प्रतिशत से अधिक है, उतने अधिक प्रतिशत; और

(आ-3.2) किसी अन्य दशा में, पचास प्रतिशत ।

(ख्र्ख्र्) धारा 64फ के उपबंधों के अनुसार, अवधारित आस्तियों के मूल्य का प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित प्रतिशत;

(ii) साधारण बीमा कारबार करने वाले किसी बीमाकर्ता की दशा में, अपेक्षित शोधन मार्जिन निम्नलिखित रकमों में से अधिकतम होगा: -

                (क) पचास करोड़ रुपए (पुनर्बीमाकर्ता की दशा में एक अरब रुपए); या

                (ख) शुद्ध प्रीमियम आय के बीस प्रतिशत के बराबर राशि; या

                (ग) शुद्ध उपगत दावों के तीस प्रतिशत के बराबर राशि,

जो शुद्ध प्रीमियमों और शुद्ध उपगत दावों की संगणना में पुनर्बीमा के लिए जमा के अधीन होगी । यह वास्तविक होगा । किंतु ऐसा प्रतिशत, जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाए, पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होगा:

परंतु यदि किसी बीमाकर्ता की बाबत प्राधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि इस उपधारा के उपबंधों का अनुपालन करने से बीमाकर्ता को या तो अननुकूल दावा अनुभव के कारण या कारबार की मात्रा में तीव्र वृद्धि के कारण या किसी अन्य कारणवश असम्यक् कठिनाई होगी तो वह यह निदेश दे सकेगा कि इतनी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों पर, जो वह विनिर्दिष्ट करे, ऐसा शोधन क्षमता मार्जिन ऊपर उल्लिखित, यथास्थिति, उपखंड (i) या उपखंड (ii) की राशियों से कम नहीं होगा ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजन के लिए, पद-

(i) गणितीय आरक्षिति" से, जीवन बीमा कारबार के लिए पालिसियों या संविदाओं के अधीन अथवा उनके संबंध में उद्भूत दायित्वों को (जिनमें वे दायित्व, जो देय हो गए हैं और ऐसे दायित्व जो किसी पालिसी के संबंध में वापस निक्षेप ठहराव से उद्भूत हुए हैं, नहीं हैं जिसके द्वारा बीमाकर्ता द्वारा सिडेंट के पास रकम जमा की जाती है) पूरा करने के लिए बीमाकर्ता द्वारा की गई व्यवस्था अभिप्रेत है । गणितीय आरक्षिति के अंतर्गत संचयनों के प्रतिकूल विचलनों के लिए विशेष व्यवस्था भी है, जैसे कि इस प्रयोजन के लिए दायित्वों के मूल्यांकन में मृत्यु और अस्वस्थता दरें, ब्याज दरें और व्यय दरें, तथा प्राधिकरण द्वारा इस प्रयोजनार्थ बनाए गए विनियमों के अनुसार, किए गए विशेष उपबंध भी हैं ;

(ii) शुद्ध उपगत दावों" से तीन पूर्व वित्तीय वर्षों से अनधिक की विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान शुद्ध उपगत दावों का औसत अभिप्रेत है;

(iii) जोखिम राशि" से जीवन बीमा पालिसी के संबंध में, ऐसी राशि अभिप्रेत है जो-

(क) ऐसी किसी दशा में, जिसमें नीचे उपखंड (ख) के अंतर्गत आने वाले मामले से भिन्न किसी मामले में मृत्यु के परिणामस्वरूप रकम संदेय है, मृत्यु पर संदेय रकम, और

(ख) किसी ऐसी दशा में, जिसमें प्रश्नगत पालिसी के अधीन फायदे के अंतर्गत, मृत्यु के परिणामस्वरूप, किसी वार्षिकी का संदाय, किस्तों में की गई किसी राशि का संदाय अथवा किसी अन्य किस्म के सावधिक संदाय हैं तो उस फायदे का वर्तमान मूल्य, नई लाइन से दोनों दशाओं में, सुसंगत पालिसियों की बाबत गणितीय आरक्षितियों में से कम की जाएगी ।;

(ग) उपधारा (2) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

(2क) यदि बीमाकर्ता किसी समय, अपेक्षित शोधन क्षमता मार्जिन इस धारा के उपबंधों के अनुसार, नहीं बनाए रखता है, तो वह, प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए निदेशों के अनुसार, प्राधिकरण को, तीन मास से अनधिक की विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर, कमी को दूर करने के लिए कार्य योजना उपदर्शित करते हुए, एक वित्तीय योजना प्रस्तुत करेगा ।

(2ख) ऐसा बीमाकर्ता, जिसने प्राधिकरण को उपधारा (2क) के अधीन योजना प्रस्तुत की है, यदि प्राधिकरण इसे अपर्याप्त समझता है तो योजना में उपांतरणों का प्रस्ताव करेगा और प्राधिकरण द्वारा पर्याप्त रूप में स्वीकार की गई योजना को प्रभावी करेगा ।

(2ग) ऐसा बीमाकर्ता उपधारा (2क) के उपबंधों का अनुपालन नहीं करेगा, तो उसे दिवालिया समझा जाएगा और न्यायालय द्वारा उसका परिसमापन कर दिया जाएगा ।”;

                                (घ) उपधारा (6) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

(7) प्रत्येक बीमाकर्ता, यथास्थिति, धारा 15 या धारा 16 के अधीन प्राधिकरण को अपनी विवरणियों के साथ, बीमाकर्ता द्वारा रखे जाने वाले अपेक्षित शोधन क्षमता मार्जिन का, जीवन बीमा कारबार की दशा में, प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित बीमांकक द्वारा प्रमाणित एक विवरण और साधारण बीमा कारबार की दशा में, प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित लेखापरीक्षक द्वारा प्रमाणित विवरण उपधारा (1क) द्वारा अपेक्षित रीति में प्रस्तुत करेगा ।" ।

                38. धारा 70 की उपधारा (1) में, उसने नियंत्रक से रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र" के स्थान पर बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व उसने प्राधिकरण से रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र" रखें ।

39. धारा 95 की उपधारा (1) में, इस भाग में-" के स्थान पर बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व इस भाग में-" रखें ।

40. धारा 101क में, -

                (क) उपधारा (1) में, केन्द्रीय सरकार द्वारा" के स्थान पर प्राधिकरण द्वारा केन्द्रीय सरकार के पूर्व         अनुमोदन से," रखें;

                (ख) उपधारा (2) में, केन्द्रीय सरकार" के स्थान पर प्राधिकरण" रखें ।

41. धारा 101ख में, -

                (क) उपधारा (1) में, केन्द्रीय सरकार" के स्थान पर प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से," रखें ।

                (ख) उपधारा (2) में, विहित" के स्थान पर, प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित" रखें ।

42. धारा 102 से धारा 105 के स्थान पर निम्नलिखित रखें, -

102. इस अधिनियम के अनुपालन में चूक के लिए या उसके उल्लंघन में कार्य के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति जिससे इस अधिनियम, या उसके अधीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों के अधीन अपेक्षा है कि वह-

(क) प्राधिकरण को कोई दस्तावेज, विवरण, लेखा, विवरणी या रिपोर्ट प्रस्तुत करे, उन्हें पेश करने में असफल रहेगा; या

(ख)        निदेशों का पालन करे, ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहेगा;

(ग) शोधन क्षमता मार्जिन बनाए रखे, ऐसा शोधन क्षमता मार्जिन बनाए रखने में असफल रहेगा;

(घ) बीमा संधियों के बारे में निदेशों का पालन करे, उक्त बीमा संधियों के ऐसे निदेशों का पालन करने में असफल रहेगा,

तो वह शास्ति का जो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए पांच लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा और जुर्माने से दंडनीय होगा ।

103. धारा 3, धारा 7 और धारा 98 के उल्लंघन में बीमा कारबार करने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति ऐसा कथन करेगा या कोई दस्तावेज, विवरण, लेखा, विवरणी या रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जो मिथ्या है और जिसकी बाबत वह या तो यह जानता है या विश्वास करता है कि वह मिथ्या है या उसका यह विश्वास नहीं है कि वह सही है, -

(क) तो वह शास्ति का जो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए पांच लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा; और

                (ख) वह कारावास से जिसकी अवधि ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से दंडनीय होगा ।

104. दस्तावेज में मिथ्या कथन के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति धारा 27 या धारा 27क या धारा 27ख या धारा 27ग या धारा 27घ के उपबंधों का पालन करने में असफल रहेगा तो वह शास्ति का जो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए पांच लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा ।

105. संपत्ति सदोष अभिप्राप्त करना या विधारित करना-यदि बीमाकर्ता का ऐसा कोई भी निदेशक, प्रबंध निदेशक, प्रबंधक या अन्य अधिकारी या कर्मचारी किसी संपत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उक्त अधिनियम के किसी प्रयोजन के लिए सदोष उपयोजित करेगा, तो वह शास्ति का जो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए दो लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा ।

105क. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :

परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का दायी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

                                (क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत-

                                                (i) फर्म; और

                                                (ii) व्यक्तियों का संगम या व्यष्टियों का निकाय है चाहे वह निगमित हो या नहीं; और

                                (ख) निदेशक" से, -

                                                (i) फर्म के संबंध में, फर्म का भागीदार अभिप्रेत है;

                (ii) व्यक्तियों के संगम या व्यष्टियों के निकाय के संबंध में, उसके कार्यों का नियंत्रण करने वाला कोई सदस्य अभिप्रेत है ।

105ख. धारा 32का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि बीमाकर्ता धारा 32ख के उपबंधों का पालन करने में असफल रहेगा, तो वह ऐसी शास्ति का जो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए पांच लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा और कारावास से, जिसकी अवधि ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, अथवा जुर्माने से, दंडनीय होगा ।

105ग. धारा 32का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-यदि बीमाकर्ता धारा 32ग के उपबंधों का पालन करने में असफल रहेगा तो वह शास्ति का, जो ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए पच्चीस लाख रुपए से अधिक की नहीं होगी, दायी होगा और पश्चात्वर्ती और चालू रहने वाली असफलता की दशा में, धारा 3 के अधीन ऐसे बीमाकर्ता को अनुदत्त रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्राधिकरण द्वारा रद्द कर दिया जाएगा ।" ।

43. धारा 110क, धारा 110ख और धारा 110ग में, नियंत्रक" के स्थान पर, जहां-जहां वह आता है, प्राधिकरण का अध्यक्ष" रखें ।

44. धारा 110छ में, नियंत्रक" के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां वह आता है, प्राधिकरण का अध्यक्ष" रखें ।

45. धारा 110ज की उपधारा (1) में, धारा 34" के स्थान पर, धारा 27घ, धारा 34" रखें ।

46. धारा 114 की उपधारा (2) में-

                (क) खंड (क) के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

(कक) समादत्त साधारण पूंजी के छब्बीस प्रतिशत से अधिक समादत्त साधारण पूंजी का ऐसा अन्य प्रतिशत और वह अवधि जिसके भीतर ऐसी अधिक समादत्त साधारण पूंजी धारा 6कक की उपधारा (1) के अधीन निर्निहित की जाएगी ।”;

                                (ख) खंड (छ) और खंड (ठठ) का लोप करें ।

47. धारा 114 के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

114क. विनियम बनाने की प्राधिकरण की शक्ति-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए ऐसे विनियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से सुसंगत हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

                (क) धारा 3 के अधीन बीमाकर्ताओं के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित विषय, जिनके अंतर्गत फीस भी है;

                (ख) धारा 3 की उपधारा (5ङ) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण की रीति;

                (ग) धारा 3 की उपधारा (7) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति जारी किए जाने के लिए पांच हजार रुपए से अनधिक की ऐसी फीस जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाए;

                (घ) धारा 3क के अधीन रजिस्ट्रीकरण के नवीकरण और उसके लिए फीस से संबंधित विषय;

                (ङ) धारा 6कक की उपधारा (2) के अधीन आधिक्य शेयर पूंजी को निर्निहित करने की रीति और प्रक्रिया;

                (च) धारा 11 की उपधारा (1क) के अधीन तुलन-पत्र, लाभ-हानि लेखा और प्राप्तियों तथा संदायों का पृथक् लेखा और आय लेखा तैयार करना;

                (छ) वह रीति जिससे धारा 13 की उपधारा (1) के चौथे परंतुक के अधीन बीमांकक की रिपोर्ट का सारांश विनिर्दिष्ट किया जाएगा;

                (ज) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 13 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट विवरण संलग्न किया जाएगा;

                (झ) धारा 27घ की उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन बीमाकर्ता द्वारा धारित आस्तियों के विनिधान का समय, रीति और अन्य शर्तें;             

                (ञ) बीमाकर्ता द्वारा अपनी लेखा पुस्तकों में रखी जाने वाली न्यूनतम जानकारी, वह रीति जिसमें ऐसी जानकारी रखी जानी चाहिए, बीमा अभिकर्ताओं द्वारा उस संबंध में अपनाई जाने वाली जांच और अन्य सत्यापन तथा धारा 33 की उपधारा (8) के अधीन उनसे आनुषंगिक सभी अन्य विषय;

                (ट) धारा 42 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन करने की रीति, बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए अनुज्ञप्ति जारी करने की रीति और फीस;

                (ठ) धारा 42 की उपधारा (3) के अधीन बीमा अभिकर्ता की अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए अवधारित की जाने वाली फीस और अतिरिक्त फीस;

                (ड) धारा 42 की उपधारा (4) के खंड (ङ) के अधीन बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए अपेक्षित अर्हताएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण;

                (ढ) धारा 42 की उपधारा (4) के खंड (च) के अधीन बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए परीक्षा पास करना;

                (ण) धारा 42 की उपधारा (4) के खंड (छ) के अधीन आचार संहिता;

                (त) धारा 42 की उपधारा (6) के अधीन अनुज्ञप्ति की दूसरी प्रति जारी करने के लिए फीस जो पचास रुपए से अधिक की नहीं होगी;

                (थ) धारा 42घ की उपधारा (1) के अधीन मध्यवर्ती या बीमा मध्यवर्ती को अनुज्ञप्ति देने की रीति      और फीस;

                (द) वह फीस और अतिरिक्त फीस जो धारा 42घ की उपधारा (3) के अधीन मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों की अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए अवधारित की जाएगी;

                (ध) धारा 42घ की उपधारा (5) के खंड (ङ) के अधीन मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों के लिए अपेक्षित और व्यावहारिक प्रशिक्षण;

                (न) धारा 42घ की उपधारा (5) के खंड (च) के अधीन मध्यवर्तियों या बीमा मध्यवर्तियों के रूप में कार्य करने के लिए उत्तीर्ण की जाने वाली परीक्षा;

                (प) धारा 42घ की उपधारा (5) के खंड (छ) के अधीन आचार संहिता;

                () धारा 42 की उपधारा (7) के अधीन अनुज्ञप्ति की दूसरी प्रति जारी करने के लिए फीस;

                () ऐसे विषय जो टैरिफ सलाहकार समिति से संबंधित धारा 64पख की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किए जाएं;

                () धारा 64पड के अधीन सर्वेक्षकों और हानि-निर्धारकों के अनुज्ञापन, उनके कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों और अन्य वृत्तिक अपेक्षाओं से संबंधित विषय;

                () ऐसी अन्य आस्ति या आस्तियां, जो धारा 64फक के अधीन आस्तियों की पर्याप्तता सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए धारा 64 की उपधारा (1) के खंड () के अधीन विनिर्दिष्ट की जाएं;

                () धारा 64 की उपधारा (3) के अधीन आस्तियों और दायित्वों का मूल्यांकन;

                (यक) आस्तियों की पर्याप्तता से संबंधित धारा 64फक की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट विषय;

                (यख) धारा 101 और धारा 101 के अधीन पुनर्बीमा से संबंधित विषय;

                (यग) पालिसीधारकों के हितों का संरक्षण करने के लिए शिकायतों को दूर करने और बीमा उद्योग का विनियमन, संप्रवर्तन करने तथा उसके सुव्यवस्थित विकास को सुनिश्चित करने से संबंधित विषय

                (यघ) कोई अन्य विषय जो प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना है या किया जाए या जिसकी बाबत विनियमों द्वारा उपबंध किए जाने हैं या किए जाएं

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में या दो अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा "

48. धारा 116 में, केन्द्रीय सरकार" के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ की तारीख से पूर्व, केन्द्रीय सरकार" रखें

 

दूसरी अनुसूची

(धारा 31 देखिए)

जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) का संशोधन

                1. अधिनियम में नियंत्रक" के स्थान पर जहां-जहां वह आता है, प्राधिकरण" रखें

2. धारा 30 के पश्चात् निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

 30. निगम के अनन्य विशेषाधिकार का रहना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, निगम का, भारत में जीवन बीमा कारबार करने का अनन्य विशेषाधिकार बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ से ही समाप्त हो जाएगा और तत्पश्चात् निगम भारत में जीवन बीमा कारबार बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) के उपबंधों के अनुसार करेगा "

तीसरी अनुसूची

(धारा 32 देखिए)

साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) का संशोधन

                धारा 24 के पश्चात्, निम्नलिखित अंतःस्थापित करें: -

24. निगम और अर्जक कंपनियों के अनन्य विशेषाधिकार का रहना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, निगम और अर्जक कंपनियों का भारत में साधारण बीमा कारबार करने का अनन्य विशेषाधिकार बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 के प्रारंभ से ही समाप्त हो जाएगा और तत्पश्चात् निगम और अर्जक कंपनियां, भारत में साधारण बीमा कारबार, बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) के उपबंधों के अनुसार करेंगी "

 

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