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बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 ( Banking Companies (Acquisition and Transfer of Undertakings) Act, 1980 )


 

बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980

(1980 का अधिनियम संख्यांक 40)

[11 जुलाई, 1980]

अर्थतंत्र के शिखरों पर और नियंत्रण तथा अर्थतंत्र के विकास से सम्बन्धित आवश्यकताओं

की अधिकाधिक तथा और अच्छी तरह से पूर्ति तथा जनता के कल्याण की अभिवृद्धि,

संविधान के अनुच्छेद 39 के खण्ड (ख) और (ग) में अधिकथित तत्त्वों को सुनिश्चित

करने हेतु राज्य की नीति के अनुरूप, करने के लिए कुछ बैंककारी कम्पनियों

के उपक्रमों को उनके आकार, सम्पत्ति, साधन, कार्यक्षेत्र और

संगठन को ध्यान में रखते हुए, अर्जित करने और

उनका अन्तरण  करने का तथा उससे

सम्बद्ध या उनके आनुषंगिक

विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के इकतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 है ।

(2) यह 15 अप्रैल, 1980 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 591 के अर्थ में कोई विदेशी कम्पनी बैंककारी कम्पनी" के अन्तर्गत नहीं है ;

(ख) किसी विद्यमान बैंक के संबंध में तत्स्थानी नया बैंक" से, प्रथम अनुसूची के स्तम्भ 2 में उस बैंक के सामने विनिर्दिष्ट निगमित निकाय अभिप्रेत है ;

() अभिरक्षक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 7 के अधीन अभिरक्षक हो जाता है या नियुक्त किया जाता है ;

(घ) विद्यमान बैंक" से प्रथम अनुसूची के स्तम्भ 1 में विनिर्दिष्ट ऐसी बैंककारी कम्पनी अभिप्रेत है, जिसकी भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 42 के अधीन रिजर्व बैंक को दी गई विवरणी में 14 मार्च, 1980 को यथादर्शित कुल मांग और सावधि दायित्व दो अरब रुपए से कम नहीं है ;

 [(घक) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;]

(ङ) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ होंगे जो उनके क्रमशः उस अधिनियम में हैं ।

 1[(च) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और इस अधिनियम में या बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में परिभाषित नहीं हैं किन्तु कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ हैं जो कम्पनी अधिनियम, 1956 में हैं ।]

 

 

 

 

अध्याय 2

[विद्यमान बैंकों के उपक्रमों का अंतरण और तत्स्थानी नए बैंकों की शेयर पूंजी]

3. तत्स्थानी नए बैंकों की स्थापना और उनका कारबार-(1) इस अधिनियम के प्राम्भ पर, ऐसे तत्स्थानी नए बैंक गठित किए जाएंगे जो प्रथम अनुसूची के स्तम्भ 2 में विनिर्दिष्ट हैं ।

                (2) जब तक धारा 9 के अधीन बनाई गई किसी स्कीम में इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया जाता, उपधारा (1) के अधीन गठित प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक की समादत्त पूंजी ऐसे विद्यमान बैंक की, जिसके संबंध में वह तत्स्थानी नया बैंक है, समादत्त पूंजी के बराबर होगी ।

 [ [(2क) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक की प्राधिकृत पूंजी तीन हजार करोड़ रुपए होगी जो दस-दस रुपए के तीन सौ करोड़ पूर्णतः समादत्त शेयरों में विभाजित होगी :

परन्तु तत्स्थानी नया बैंक शेयरों के अभिहित या अंकित मूल्य में कमी कर सकेगा और प्राधिकृत पूंजी को ऐसे अभिधान में विभाजित कर सकेगा जो वह रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से विनिश्चित करे :

परंतु यह और कि केंद्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा प्राधिकृत पूंजी को बढ़ा या घटा सकेगी, जो वह ठीक समझे, तथापि, सभी मामलों में शेयर, पूर्णतः संदत्त शेयर होंगे ।]

(2ख) उपधारा (2) में, किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन गठित प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक की समादत्त पूंजी, समय-समय पर :-

(क) ऐसी रकम द्वारा बढ़ाई जा सकेगी जो तत्स्थानी नए बैंक का निदेशक बोर्ड, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् और केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, ऐसे बैंक द्वारा स्थापित आरक्षित निधि में से ऐसी समादत्त पूंजी में अन्तरित करे ;

(ख) ऐसी रकम द्वारा बढ़ाई जा सकेगी जो केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात्, ऐसी समादत् पूंजी में अभिदाय करे ;

  [(ग) ऐसी रकम द्वारा बढ़ाई जा सकेगी, जो तत्स्थानी नए बैंक का निदेशक बोर्ड, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् और केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, चाहे साधारण शेयरों के या अधिमानी शेयरों के लोक निर्गमन 2[या अधिकार निर्गमन या बोनस शेयरों के निर्गमन द्वारा] या अधिमानी आबंटन या प्राइवेट स्थापन द्वारा ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जुटाए, जो विहित की जाए, किन्तु फिर भी केन्द्रीय सरकार, सभी समयों पर, प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक के साधारण शेयरों वाली समादत्त पूंजी का कम से कम इक्यावन प्रतिशत धारण करेगी :

परन्तु अधिमानी शेयरों का निर्गमन, अधिमानी शेयरों के वर्ग, ऐसे अधिमानी शेयरों (चाहे शाश्वत हों या अमोचनीय या मोचनीय) के प्रत्येक वर्ग के निर्गमन की सीमा और ऐसे निबंधनों और शर्तों को, जिनके अधीन रहते हुए, प्रत्येक वर्ग के अधिमानी शेयर निर्गमित किए जा सकेंगे, विनिर्दिष्ट करते हुए, रिजर्व बैंक द्वारा विरचित मार्गदर्शक सिद्धान्तों के अनुसार किया जाएगा ।]

 [(2खख) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक की समादत्त पूंजी को, समय-समय पर, और उपधारा (2ख) में खंड (ग) के अधीन 4[लोक निर्गमन 2[या अधिकार निर्गमन या बोनस शेयरों के निर्गमन द्वारा] या अधिमानी आबंटन या प्राइवेट स्थापन द्वारा समादत्त पूंजी के जुटाए जाने] के पूर्व,-

(क) केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात्, ऐसी समादत्त पूंजी को, जिसकी हानि हुई है, या जो उपलब्ध आस्तियों के रूप में विद्यमान नहीं है, रद्द करके, घटा सकेगी ;

(ख) निदेशक बोर्ड, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् और केन्द्रीय सरकारी की पूर्व मंजूरी से, ऐसी किसी समादत्त पूंजी को, जो तत्स्थानी नए बैंक की आवश्यकताओं से अधिक है, वापस भुगतान करके घटा सकेगी :

परन्तु किसी ऐसी दशा में जहां किसी अन्य तत्स्थानी नए बैंक या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 2 के खंड (ण) में परिभाषित किसी तत्स्थानी नए बैंक का तत्स्थानी नए बैंक के साथ समामेलन किए जाने के कारण पूंजी की हानि हुई है या जो उपलब्ध आस्तियों के रूप में विद्यमान नहीं है या वहां उस कमी को भविष्यलक्षी रूप से या भूतलक्षी रूप से किया जा सकेगा किन्तु ऐसे समामेलन की तारीख से पूर्वतर तारीख से नहीं  ।

(2खखक) (क) कोई तत्स्थानी नया बैंक, या समय-समय पर, उपधारा (2ख) के खंड (ग) के अधीन  [लोक निर्गमन  [या अधिकार निर्गमन या बोनस शेयरों के निर्गमन द्वारा] या अधिमानी आबंटन या प्राइवेट स्थापन द्वारा समादत्त पूंजी के जुटाए जानेट के पश्चात्, संकल्प द्वारा, जो मत देने के हकदार शेयर धारकों के वार्षिक साधारण अधिवेशन में, स्वयं उस दशा में, या जहां परोक्षी अनुज्ञात है वहां परोक्षी द्वारा, मत देकर पारित किया जाए, और जहां संकल्प के, पक्ष में डाले गए मतों की संख्या, उन मतों की यदि कोई हो, संख्या के, तीन गुने से कम नहीं है और मत देने वाले शेयर धारकों द्वारा संकल्प के विरुद्ध डाले गए हैं, अपनी समादत्त पूंजी को किसी भी रूप में घटा सकेगा

(ख) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ; समादत्त पूंजी में,-

(i) किसी ऐसी शेयर पूंजी के संबंध में जो समादत्त नहीं है, उसके किसी शेयर पर के दायित्व को निर्वापित करके या घटाकर,

(ii) किसी ऐसी समादत्त पूंजी को, जिसकी हानि हुई है, या जो उपलब्ध आस्तियों के रूप में विद्यमान नहीं है, उसके किसी शेयर पर के दायित्व को निर्वापित करके या घटाकर अथवा निर्वापित किए बिना या घटाए बिना, रद्द करके ;

(iii) किसी ऐसी समादत्त शेयर पूंजी को, जो तत्स्थानी नए बैंक की आवश्यकताओं से अधिक है, उसके किसी समादत्त शेयर पर के दायित्व को निर्वापित करके या घटाकर अथवा निर्वापित किए बिना, घटाए बिना वापस भुगतान करके,कमी की जा सकेगी ।

(2खखख) उपधारा (2खख) या उपधारा (2खखक) में किसी बात के होते हुए भी, किसी तत्स्थानी नए बैंक की समादत्त पूंजी में, किसी भी समय, इतनी कटौती नहीं की जाएगी जिससे कि वह बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) संशोधन अधिनियम, 1995 के प्रारंभ की तारीख को उस बैंक की समादत्त पूंजी के पच्चीस प्रतिशत से कम हो जाए ।]

(2ग) किसी तत्स्थानी नए बैंक की संपूर्ण समादत्त पूंजी, उपधारा (2ख) के खंड (ग) के अधीन 1[लोक निगर्मन 2[या अधिकार निगर्मन या बोनस शेयरों के निगर्मन द्वारा] या अधिमानी आबंटन या प्राइवेट स्थापन द्वारा जनता से जुटाई गईट समादत्त पूंजी को छोड़कर, केन्द्रीय सरकार में निहित और उसको आबंटित हो जाएगी ।

(2) प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक के ऐसे शेयर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा धारित नहीं हैं, निर्बाध रूप से अंतरणीय होंगे :

परन्तु भारत के बाहर निवासी कोई व्यष्टि या कम्पनी अथवा ऐसी किसी विधि के अधीन, जो भारत में प्रवृत्त नहीं है, निगमित कोई कम्पनी या ऐसी कम्पनी या ऐसी कम्पनी की कोई शाखा, चाहे वह भारत के बाहर निवासी हो या नहीं, किसी भी समय तत्स्थानी नए बैंक के शेयरों को अंतरण द्वारा या अन्यथा धारित या अर्जित नहीं करेगी जिससे कि ऐसा विनिधान कुल मिलाकर उस प्रतिशत से अधिक हो जाए, जो समादत्त पूंजी के बीस प्रतिशत से अधिक नहीं हैं और जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट किया जाए ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या अन्य व्यष्टि संगम है ।

(2ङ) केन्द्रीय सरकार से भिन्न तत्स्थानी नए बैंक का कोई शेयर धारक, तत्स्थानी नए बैंक के सभी शेयर धारकों के कुल मताधिकार के 2[दस प्रतिशत] से अधिक उसके द्वारा धारित किन्हीं शेयरों के संबंध में, मताधिकार का प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा :

 [परंतु तत्स्थानी नए बैंक में कोई अधिमानी शेयर पूंजी धारण करने वाले शेयर धारक को ऐसी पूंजी के संबंध में, ऐसे तत्स्थानी नए बैंक के समक्ष रखे गए केवल ऐसे संकल्पों के संबंध में ही मत देने का अधिकार होगा, जो उसके अधिमानी शेयरों से संबंधित अधिकारों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं :

पंरतु यह और कि 2[केंद्रीय सरकार से भिन्न कोई अधिमानी शेयर धारक केवल अधिमानी शेयर पूंजी धारण करने वाले सभी शेयर धारकों के कुल मताधिकारों के दस प्रतिशत से आधिक्य में उसके द्वारा धारित अधिमानी शेयरों के संबंध में मताधिकार का प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।]]

(2च) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक, शेयर धारकों का एक या अधिक जिल्दों में एक रजिस्टर (जिसे इस अधिनियम में रजिस्टर कहा गया है) अपने मुख्य कार्यालय में रखेगा और उसमें निम्नलिखित विशिष्टियां प्रविष्ट करेगा, अर्थात् :-

(i) शेयर धारकों के नाम, पते और उपजीविकाएं, यदि कोई हों प्रत्येक शेयर धारक द्वारा धारित शेयरों का, प्रत्येक शेयर को उसकी द्योतक संख्या द्वारा सुभिन्नतया इंगित करते हुए, विवरण ;

(ii) वह तारीख जिसको प्रत्येक व्यक्ति शेयर धारक के रूप में इस प्रकार प्रविष्ट किया जाता है ;

(iii) वह तारीख जिसको कोई व्यक्ति शेयर धारक नहीं रह जाता है ; और

(iv) ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं :

 [परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी निक्षेपागार द्वारा धारित अशों (शेयरों) को लागू नहीं होगी ।]

(2छ) उपधारा (2च) में किसी बात के होते हुए भी, तत्स्थानी नए बैंक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसे रक्षोपायों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, कम्प्यूटर फ्लापियों या डिस्कटों में, रजिस्टर रखे ।

(3) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में किसी बात के होते हुए भी रजिस्टर की प्रति या उसमें से कोई उद्धरण तत्स्थानी नए बैंक के किसी ऐसे अधिकारी के, जो इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किया जाए, हस्ताक्षर से शुद्ध प्रति होना प्रमाणित किया गया हो, सभी विधिक कार्यवाहियों में साक्ष्य में ग्राह्य होगा ।]

(4) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सम्पत्ति को अर्जित करने, धारण करने और उसका व्ययन करने की, और संविदा करने की शक्ति होगी और वह अपने नाम से वाद ला सकेगा और उस पर उसके नाम से वाद लाया जा सकेगा ।

(5) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ख) में यथापरिभाषित बैंककारी कारबार चलाएगा और करेगा, तथा उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) में  [विनिर्दिष्ट अन्य प्रकार के कारबारों में से एक या अधिक] प्रकार के कारबार कर सकेगा ।

(6) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक एक आरक्षित निधि स्थापित करेगा जिसको, उस विद्यमान बैंक के, जिसके संबंध में वह तत्स्थानी नया बैंक है, नाम जमा शेयर प्रीमियम और आरक्षित निधि के अतिशेष, यदि कोई हैं, और बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949  (1949 का 10) की धारा 17 के उपबंधों के अनुसार अन्तरित की जाने वाली अतिरिक्त राशियां, यदि कोई हों, अन्तरित हो जाएंगी ।

 [(7) (i) तत्स्थानी नया बैंक, रिजर्व बैंक द्वारा ऐसी अपेक्षा किए जाने पर भारत में ऐसे सभी स्थानों पर जहां उसकी कोई शाखा है-

(क) भारत में की किसी सरकार की ओर से धन, सोना-चांदी और प्रतिभूतियां देने, प्राप्त करने, संगृहीत करने और संप्रेषित करने के लिए, और

(ख) कोई अन्य कारबार, जो रिजर्व बैंक समय-समय पर उसे सौंपे, लेने और संव्यवहृत करने के लिए,

रिजर्व बैंक के अभिकर्ता के रूप में कार्य करेगा ;

(ii) वे निबंधन और शर्तें, जिन पर ऐसा कोई अभिकरण कारबार रिजर्व बैंक की ओर से तत्स्थानी नए बैंक द्वारा किया जाएगा, ऐसी होंगी जो करार पाई जाएं ;

(iii) यदि खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी विषय पर करार नहीं हो पाता है या यदि तत्स्थानी नए बैंक और रिजर्व बैंक के बीच, उनके बीच हुए किसी करार के निर्वचन के बारे में, कोई विवाद उत्पन्न होता है तो वह विषय केन्द्रीय सरकार को निर्दिष्ट किया जाएगा और उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ;

(iv) तत्स्थानी नया बैंक ऐसे किसी कारबार का संव्यवहार या ऐसे कृत्यों का, जो उसे खंड (i) के अधीन सौंपे जाएं, पालन स्वयं या रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित किसी अभिकर्ता के माध्यम से कर सकेगा ।]

 [3क. न्यास का रजिस्टर में प्रविष्ट किया जाना-धारा 3 की उपधारा (2च) में किसी बात के होते हुए भी, किसी अभिव्यक्त, विवक्षित या आन्वयिक न्यास की सूचना तत्स्थानी नए बैंक द्वारा, रजिस्टर में प्रविष्ट नहीं की जाएगी या उसके द्वारा ग्रहण नहीं की जाएगी :]

 [परन्तु इस धारा की कोई बात, किसी निक्षेपागार द्वारा फायदाग्राही स्वामियों की ओर से रजिस्ट्रीकृत स्वामी के रूप में धारित अंशों (शेयरों) की बाबत लागू नहीं होगी ।]

 [3ख. फायदाग्राही स्वामियों का रजिस्टर-निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 11 के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा रखा गया फायदाग्राही स्वामियों का रजिस्टर इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए शेयरधारियों का रजिस्टर समझा जाएगा ।

स्पष्टीकरण-धारा 3, धारा 3क और इस धारा के प्रयोजनों के लिए , फायदाग्राही स्वामी", निक्षेपागार" और रजिस्ट्रीकृत स्वामी" पदों के क्रमशः वही अर्थ हैं जो निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 2की उपधारा (1) के खंड (क), खण्ड (ङ) और खंड (ञ) में हैं ।]

4. विद्यमान बैंकों के उपक्रमों का तत्स्थानी नए बैंकों में निहित होना-इस अधिनियम के प्रारम्भ पर प्रत्येक विद्यमान बैंक का उपक्रम तत्स्थानी नए बैंक को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएगा ।

5. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) प्रत्येक विद्यमान बैंक के उपक्रम की बाबत यह समझा जाएगा कि उसमें वे सब आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सब जंगम और स्थावर सम्पत्ति, नकद अतिशेष, आरक्षित निधियां, विनिधान और ऐसी सम्पत्ति में या उससे उद्भूत होने वाले सब अन्य अधिकार और हित, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व उस उपक्रम के संबंध में, चाहे भारत में या भारत के बाहर, विद्यमान बैंक के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में थे तथा तत्संबंधी सब लेखाबहियां, रजिस्टर, अभिलेख और किसी भी प्रकृति की सब अन्य दस्तावेजें सम्मिलित हैं तथा यह भी समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत उस उपक्रम के संबंध में विद्यमान बैंक के उस समय अस्तित्वशील किसी भी प्रकार के सब उधार, दायित्व और बाध्यताएं भी हैं

(2) यदि भारत से बाहर के किसी देश की विधियों के अनुसार, इस अधिनियम के उपबंध उस देश में स्थित किसी ऐसी आस्ति या दायित्व को जो किसी विद्यमान बैंक के उपक्रम का भाग है, तत्स्थानी नए बैंक को अन्तरित या उसमें निहित करने का प्रभाव स्वयं नहीं रखते हैं तो ऐसी आस्ति या दायित्व के संबंध में विद्यमान बैंक का कार्यकलाप, इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, तत्स्थानी नए बैंक के तत्समय मुख्य कार्यपालक अधिकारी में न्यस्त हो जाएगा और वह मुख्य कार्यपालक अधिकारी ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा तथा ऐसे सब कार्य और बातें कर सकेगा जो प्रभावी रूप से ऐसी आस्तियों के अन्तरण और ऐसे दायित्वों के उन्मोचन के प्रयोजन के लिए, विद्यमान बैंक द्वारा प्रयुक्त की जा सकती है या की जा सकती है ।

(3) तत्स्थानी नए बैंक का मुख्य कार्यपालक अधिकारी, उपधारा (2) द्वारा उसे प्रदत्त शक्ितयों के प्रयोग में ऐसी सब र्कारवाई करेगा जो ऐसे अन्तरण या निहित करने के प्रयोजन के लिए भारत से बाहर के किसी ऐसे देश की विधियों द्वारा अपेक्षित हो तथा स्वयं या अपने द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति की मार्फत, विद्यमान बैंक भी किसी आस्ति को वसूल कर सकेगा और उसके किसी दायित्व का उन्मोचन कर सकेगा ।

(4) जब तक इस अधिनियम द्वारा स्पष्टतः अन्यथा उपबंधित नहीं है, ऐसी सब संविदाएं, विलेख, बंधपत्र, करार, मुख्तारनामें, विधिक प्रतिनिधित्व के अनुदान और किसी भी प्रकृति की अन्य लिखतें, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले अस्तित्वशील या प्रभावशील हैं और जिनमें विद्यमान बैंक एक पक्षकार है या जो विद्यमान बैंक के पक्ष में हैं, तत्स्थानी नए बैंक के विरुद्ध या उसके पक्ष में वैसे ही पूर्णतया प्रवृत्त और प्रभावशील होंगी, और वैसे ही पूर्ण और प्रभावी रूप से प्रवर्तित या कार्यान्वित की जा सकेंगी मानो विद्यमान बैंक के स्थान पर तत्स्थानी नया बैंक उनमें एक पक्षकार रहा हो या मानो वे तत्स्थानी नए बैंक के पक्ष में जारी की गई हों ।

(5) यदि विद्यमान बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध किसी ऐसे उपक्रम के, जो धारा 4 के अधीन अन्तरित किया गया है, किसी कारबार के सम्बन्ध में कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकृति की अन्य कार्यवाही, इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले, लम्बित है तो विद्यमान बैंक के उपक्रम के अन्तरित होने या इस अधिनियम में किसी बात के होने के कारण वह उपशमित या बन्द या किसी प्रकार से प्रतिकूलतः प्रभावित नहीं होगी, किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही तत्स्थानी नए बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी और प्रवर्तित की जा सकेगी ।

(6) इस अधिनियम की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह भारत से बाहर किसी देश में कार्य करने वाले किसी विद्यमान बैंक की, ऐसे देश में स्थित आस्तियों, अधिकारों, शक्तियों, प्राधिकारों और विशेषाधिकारों तथा जंगम और स्थावर सम्पत्ति, नकद अतिशेषों और विनिधानों को (तथा ऐसी सम्पत्ति में या उससे उद्भूत होने वाले अन्य अधिकारों और हितों को) और किसी भी प्रकार के उधारों, दायित्वों और बाध्यताओं को, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व अस्तित्वशील हों, उस दशा में लागू होती है जब उस देश में प्रवृत्त विधियों के अधीन सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण की बैंककारी कम्पनी को वहां बैंककारी कारबार चलाना अनुज्ञेय नहीं है ।

अध्याय 3

रकम का संदाय

6. रकम का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 4 के अधीन तत्स्थानी नए बैंक को विद्यमान बैंक के उपक्रम के अन्तरण की बाबत प्रत्येक विद्यमान बैंक को उतनी रकम देगी जो द्वितीय अनुसूची में प्रत्येक ऐसे विद्यमान बैंक के सामने विनिर्दिष्ट है ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम, प्रत्येक विद्यमान बैंक को उसके विकल्पानुसार, निम्नलिखित रूप में दी जाएगी, अर्थात् :-

() तीन समान वार्षिक किस्तों में नकद (जो रिजर्व बैंक पर जारी किए गए चैक द्वारा संदत्त की जाएगी) और प्रत्येक किस्त की रकम पर, इस अधिनियम के प्रारम्भ से साढ़े पांच प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज दिया जाएगा, अथवा

(ख) केन्द्रीय सरकार के विक्रेय या अन्यथा अन्तरणीय वचनपत्रों या स्टाक-प्रमाणपत्रों के रूप में, जो सममूल्य पर जारी किए जाएंगे और प्रतिसंदेय होंगे, और-

(i) इस अधिनियम के प्रारम्भ से दस वर्ष की समाप्ति पर परिपक्व होंगे और ऐसे प्रारम्भ से छह प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज वाले होंगे, अथवा

(ii) इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीस वर्ष की समाप्ति पर परिपक्व होंगे और सात प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज वाले होंगे, अथवा

() अंशतः नकद (जो रिजर्व बैंक पर जारी किए गए चैक द्वारा संदत्त की जाएगी) और अंश खण्ड () के   उपखण्ड (i) या उपखण्ड (ii) या दोनों में विनिर्दिष्ट उतनी प्रतिभूतियों में, जितनी विद्यमान बैंक द्वारा अपेक्षित हों, अथवा

(घ) अंशतः, खण्ड (ख) के उपखण्ड (i) में विनिर्दिष्ट उतनी प्रतिभूतियों में और अंशतः उस खण्ड के उपखण्ड (ii) में विनिर्दिष्ट उतनी प्रतिभूतियों में, जितनी विद्यमान बैंक द्वारा अपेक्षित हों ।

                (3) उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट विकल्प, केन्द्रीय सरकार को प्राप्त होने की तारीख से या जहां ऐसे विकल्प का प्रयोग न किया गया हो वहां उस अन्तिम तारीख से जिसके पहले ऐसे विकल्प का प्रयोग हो जाना चाहिए था, साठ दिन के भीतर, उस उपधारा के   खण्ड (क) में निर्दिष्ट तीन बराबर वार्षिक किस्तों में से प्रथम किस्त संदत्त की जाएगी और उस उपधारा के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट प्रतिभूतियां जारी की जाएंगी ।

                (4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट विकल्प का प्रयोग इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन मास की अवधि के अवसान के पूर्व (या तीन मास से अनधिक ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर जो केन्द्रीय सरकार, विद्यमान बैंक के आवेदन पर, अनुज्ञात करे), प्रत्येक विद्यमान बैंक द्वारा किया जाएगा और इस प्रकार प्रयुक्त विकल्प अन्तिम होगा और प्रयोग किए जाने के पश्चात् परिवर्तित या विखण्डित नहीं     किया जाएगा ।

                (5) यदि कोई विद्यमान बैंक उपधारा (2) में निर्दिष्ट विकल्प का प्रयोग उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर न करे या करने में असफल रहे उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने विकल्प का प्रयोग उपधारा (2) के खण्ड (ख) के उपखण्ड (i) में विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों द्वारा संदाय के लिए किया है ।

                (6) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, कोई विद्यमान बैंक इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन मास के अवसान के पूर्व (या तीन मास से अनधिक ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर जो केन्द्रीय सरकार, विद्यमान बैंक के आवेदन पर, अनुज्ञात करे), केन्द्रीय सरकार से लिखित आवेदन कर सकेगा कि उसे ऐसे बैंक की समादत्त पूंजी की रकम के, जैंसी कि वह इस अधिनियम के ऐसे प्रारम्भ के ठीक पहले हो, पचहत्तर प्रतिशत के बराबर रकम का अन्तरिम संदाय किया जाए जिसमें वह यह उपदर्शित करेगा कि संदाय वह नकद चाहता है या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रतिभूतियों के रूप में, या दोनों प्रकार से ।

                (7) उपधारा (6) में निर्दिष्ट आवेदन की प्राप्ति से साठ दिन के भीतर केन्द्रीय सरकार, विद्यमान बैंक को अन्तरिम संदाय, ऐसे आवेदन में उपदर्शित विकल्प के अनुसार, करेगी ।

                (8) किसी विद्यमान बैंक को उपधारा (7) के अधीन किया गया अन्तरिम संदाय, ऐसे विद्यमान बैंक को इस अधिनियम के अधीन संदेय कुल रकम में से मुजरा किया जाएगा और ऐसे संदाय के बाद बकाया रही रकम का अतिशेष उस विद्यमान बैंक को, यथास्थिति, उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन प्रयोग किए गए या प्रयुक्त समझे गए, विकल्प के अनुसार दिया जाएगा :

                परन्तु जहां अन्तरिम संदाय का कोई भाग किसी विद्यमान बैंक द्वारा नकद अभिप्राप्त किया जाए वहां इस प्रकार अभिप्राप्त संदाय, प्रथमतः, उपधारा (2) में निर्दिष्ट नकद संदाय की प्रथम किस्त के प्रति मुजरा किया जाएगा, और उस दशा में जब इस प्रकार अभिप्राप्त संदाय प्रथम किस्त की रकम से अधिक है, ऐसे आधिक्य की रकम, नकद संदाय की द्वितीय किस्त के प्रति और ऐसे आधिक्य की रकम का अतिशेष, यदि कोई है, तृतीय किस्त के प्रति समायोजित किया जाएगा ।

अध्याय 4

तत्स्थानी नए बैंकों का प्रबन्ध

7. मुख्य कार्यालय और प्रबन्ध-(1) प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक का मुख्य कार्यालय उस स्थान पर होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे तथा जब तक ऐसा कोई स्थान इस प्रकार विनिर्दिष्ट नहीं किया जाता है, उस स्थान पर होगा जिस पर उस विद्यमान बैंक का जिसके सम्बन्ध में वह तत्स्थानी नया बैंक है, मुख्य कार्यालय इस अधिनियम के प्रारम्भ पर अवस्थित है । 

(2) तत्स्थानी नए बैंक के कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबन्ध एक निदेशक बोर्ड में निहित होगा जो ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा तथा ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जिनके लिए तत्स्थानी नया बैंक प्राधिकृत है ।

(3) (क) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात्, यथाशक्य शीघ्र, केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करके, तत्स्थानी नए बैंक का प्रथम निदेशक बोर्ड नियुक्त करेगी जो सात से अनधिक व्यक्तियों से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, गठित होगा, और इस प्रकार नियुक्त प्रत्येक निदेशक तब तक पद धारण करेगा जब तक धारा 9 के अधीन बनाई गई स्कीम के अनुसार ऐसे तत्स्थानी नए बैंक का निदेशक बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता :

परन्तु केन्द्रीय सरकार, यदि उसकी यह राय है कि तत्स्थानी नए बैंक के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो, किसी व्यक्ति को प्रथम निदेशक बोर्ड की सदस्यता से हटा सकेगी और उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगी ।

(ख) प्रथम निदेशक बोर्ड का प्रत्येक सदस्य (जो केन्द्रीय सरकार का या रिजर्व बैंक का अधिकारी नहीं है), ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो उस पारिश्रमिक के बराबर है जो विद्यमान बैंक के निदेशक बोर्ड का कोई सदस्य इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्राप्त करने का हकदार था ।

(4) केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (3) के अधीन प्रथम निदेशक बोर्ड के नियुक्त किए जाने तक, तत्स्थानी नए बैंक के कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबन्ध एक अभिरक्षक में निहित होगा जो उस बैंक का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा और वह ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा तथा ऐसे सब कार्य और बातें कर सकेगा जो उस बैंक द्वारा प्रयुक्त की जा सकती हैं या की जा सकती हैं ।

(5) किसी विद्यमान बैंक का अध्यक्ष, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व उस रूप में पद धारण कर रहा था, तत्स्थानी नए बैंक का अभिरक्षक होगा और वही उपलब्धियां प्राप्त करेगा जो वह ऐसे प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्राप्त कर रहा था :

परन्तु यदि विद्यमान बैंक का अध्यक्ष तत्स्थानी नए बैंक का अभिरक्षक बनने से या अभिरक्षक के रूप में कार्य करते रहने से इन्कार कर देता है अथवा यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि ऐसा करना तत्स्थानी नए बैंक के हित में आवश्यक है तो वह किसी अन्य व्यक्ति को तत्स्थानी नए बैंक का अभिरक्षक नियुक्त करे सकेगी और इस प्रकार नियुक्त अभिरक्षक ऐसी उपलब्धियां प्राप्त करेगा जैसी केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा और धारा 12 की उपधारा (1) में किसी विद्यमान बैंक के सम्बन्ध में अध्यक्ष" शब्द के अर्न्तगत वह व्यक्ति भी है जो अध्यक्ष के कर्तव्यों का पालन कर रहा है अथवा अन्यथा उस बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के रूप में कार्य कर  रहा है ।

(6) अभिरक्षक केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।

8. केन्द्रीय सरकार के निदेशों से तत्स्थानी नए बैंकों का मार्गदर्शन-प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक अपने कृत्यों के निर्वहन में नीति के उन विषयों के बारे में, जिनमें लोकहित अन्तर्ग्रस्त है, ऐसे निदेशों से मागर्दर्शन प्राप्त करेगा जो केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर से परामर्श के पश्चात्, दे।

9. केन्द्रीय सरकार की स्कीम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए एक स्कीम रिजर्व बैंक से परामर्श के पश्चात्, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उक्त स्कीम निम्नलिखित सभी विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेगी, अर्थात् :-

(क) तत्स्थानी नए बैंक की पूंजी संरचना,  । । ।

(ख) तत्स्थानी नए बैंक के, किसी भी नाम से ज्ञात, निदेशक बोर्ड का गठन और उसके सम्बन्ध में या उसके आनुषंगिक सब ऐसे विषय जिन्हें केन्द्रीय सरकार आवश्यक या समीचीन समझे ;

(ग) किसी तत्स्थानी नए बैंक का दो या अधिक निगमों के रूप में पुनर्गठन, किसी तत्स्थानी नए बैंक का किसी अन्य तत्स्थानी नए बैंक के साथ या किसी अन्य बैंककारी संस्था के साथ समामेलन, किसी तत्स्थानी नए बैंक के सम्पूर्ण उपक्रम का या उसके किसी भाग का  [किसी अन्य तत्स्थानी नए बैंक या बैंककारी संस्था कोट अन्तरण या किसी अन्य बैंककारी संस्था के सम्पूर्ण उपक्रम का या उसके किसी भाग का किसी तत्स्थानी नए बैंक को अन्तरण ;

 [(गक) वह रीति, जिसमें अतिरिक्त संख्या में निदेशक उपधारा (3) के खण्ड () के दूसरे परंतुक के अधीन    निवृत्त होंगे ;]

() ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक विषय जो इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यन्वित करने के लिए आवश्यक हैं

 [(3) उपधारा (1) के अधीन बनाई गई किसी स्कीम के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक के प्रत्येक निदेशक बोर्ड में,-

(क) [चार से अनधिक पूर्णकालिक एसे निदेशक] होंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् नियुक्त किए जाएंगे ;

(ख) एक ऐसा निदेशक होगा, जो केन्द्रीय सरकार का पदाधिकारी हो और जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा :

परन्तु कोई ऐसा निदेशक किसी अन्य तत्स्थानी नए बैंक का निदेशक नहीं होगा ।

स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए, तत्स्थानी नया बैंक पद" के अन्तर्गत बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और  अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) के अर्थ में तत्स्थानी नया बैंक है ;

 [(ग) एक ऐसा निदेशक होगा जिसके पास वाणिज्यिक बैंकों के विनियमन या पर्यवेक्षण से संबंधित मामलों में आवश्यक विशेषज्ञता और अनुभव हो, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक की सिफारिश पर नामनिर्देशित किया जाएगा ]

स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजन के लिए, रिजर्व बैंक का अधिकारी" के अन्तर्गत रिजर्व बैंक का ऐसा अधिकारी है, जिसे उस बैंक द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 54कक के अधीन उसमें निर्दिष्ट किसी संस्था में प्रतिनियुक्त किया जाता है ;

 ।                             ।                             ।                             ।                              ।                             ।

(ङ) तत्स्थानी नए बैंक के ऐसे कर्मचारियों में से, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की    धारा 2 के खंड (घ) के अधीन कर्मकार है, एक निदेशक होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा, ऐसी रीति से, जो इस धारा के अधीन बनाई गई किसी स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाए, नामनिर्देशित किया जाएगा ;

(च) तत्स्थानी नए बैंक के ऐसे कर्मचारियों में से, जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की    धारा 2 के खंड (घ) के अधीन कर्मकार नहीं है, एक निदेशक केन्द्रीय सरकार द्वारा, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् नामनिर्देशित किया जाएगा ;

(छ) एक ऐसा निदेशक होगा, जो कम से कम पन्द्रह वर्ष तक चार्टर्ड अकाउंटेट रहा हो और जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात्, नामनिर्देशित किया जाएगा ;

(ज) खंड (झ) के उपबंधों के अधीन रहते हुए छह से अनधिक ऐसे निदेशक होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे ;

 1[(झ) जहां धारा 3 की उपधारा (2ख) के खंड (ग) के अधीन पुरोधृत पूंजी,-

(i) कुल समादत्त पूंजी के सोलह प्रतिशत से अनधिक नहीं है, वहां एक निदेशक होगा ;

(ii) कुल समादत्त पूंजी के सोलह प्रतिशत से अधिक है किंतु बत्तीस प्रतिशत से अधिक नहीं है, वहां दो निदेशक होंगे ;

(iii) कुल समादत्त पूंजी के बत्तीस प्रतिशत से अधिक है, वहां तीन निदेशक होंगे,

जो केन्द्रीय सरकार से भिन्न शेयरइधारकों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे :

परंतु इस खंड के अधीन किसी ऐसे निदेशक के निर्वाचन के पश्चात् कार्यभार ग्रहण कर लेने पर खंड () के अधीन नामनिर्देशित निदेशक उतनी ही संख्या में ऐसी रीति से निवृत्त हो जाएंगे, जो स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाए :

परंतु यह और कि यदि बैंककारी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) और वित्तीय संस्था विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारम्भ पर या उसके पूर्व किसी तत्स्थानी नए बैंक में निर्वाचित निदेशकों की संख्या, यथास्थिति, उपखंड (i) या उपखंड (ii) या उपखंड (iii) में विनिर्दिष्ट निदेशकों की संख्या से अधिक होती है तो ऐसे प्रारंभ के पूर्व अतिरिक्त संख्या में निर्वाचित ऐसे निदेशक ऐसी रीति से निवृत्त हो जाएंगे, जो स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाए और ऐसे निदेशक अपने पद से समय-पूर्व निवृत्ति के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने के हकदार नहीं होंगे ]

(3क) उपधारा 3 के खंड (ज) के अधीन नामनिर्देशित किए जाने वाले या उस उपधारा के खंड (झ) के अधीन निर्वाचित किए जाने वाले निदेशक ऐसे व्यक्ति होंगे-

(अ) जिन्हें निम्नलिखित विषयों में से किसी एक या अधिक विषयों का विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव       हो, अर्थात् :-

(i) कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था,

(ii) बैंककारी,

(iii) सहकारिता,

(iv) अर्थशास्त्र,

(v) वित्त,

(vi) विधि,

(vii) लघु उद्योग,

(viii) कोई अन्य विषय जिसका विशेष ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव, रिजर्व बैंक की राय में तत्स्थानी नए बैंक के लिए उपयोगी होगा ;

(आ) जो निक्षेपकर्ताओं के हितों का प्रतिनिधित्व करेंगे ; अथवा

(इ) जो कृषकों, कर्मकारों और कारीगरों के हितों का प्रतिनिधित्व करेंगे ।]

 [(3कक) उपधारा (3क) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना और इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति उपधारा (3) के खंड (झ) के अधीन निदेशक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक पात्र नहीं होगा, जब तक कि वह ट्रैक रिकार्ड, सत्यनिष्ठा और ऐसे अन्य मापदंड के, जो इस संबंध में रिजर्व बैंक समय-समय पर अधिसूचित करे, आधार पर ठीक और उचित प्रास्थिति वाला व्यक्ति न हो ।

(3कख) रिजर्व बैंक, उपधारा (3कक) के अधीन जारी अधिसूचना में उपयुक्त और उचित प्रास्थिति का अवधारण करने वाला प्राधिकारी, ऐसे अवधारण की रीति, ऐसे अवधारण के लिए अनुपालन की जाने वाली प्रक्रिया और ऐसे अन्य विषयों को भी विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जो आवश्यक या उससे आनुषंगिक समझे जाएं ।]

(3ख) जहां रिजर्व बैंक की यह राय है कि किसी तत्स्थानी नए बैंक का उपधारा (3) के खण्ड (झ) के अधीन निर्वाचित कोई निदेशक,  [उपधारा (3क) और उपधारा (3कक)ट की अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता है वहां वह, ऐसे निदेशक और बैंक को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् आदेश द्वारा ऐसे निदेशक को हटा सकेगा और ऐसे हटाए जाने पर, निदेशक बोर्ड, इस प्रकार हटाए गए व्यक्ति के स्थान पर, 2[उपधारा (3क) और उपधारा (3कक)] की अपेक्षाओं को पूरा करने वाले किसी अन्य व्यक्ति को निदेशक के रूप में उस समय तक के लिए सहयोजित कर सकेगा जब तक कि कोई निदेशक, तत्स्थानी नए बैंक के शेयर धारकों द्वारा उसके आगामी वार्षिक साधारण अधिवेशन में सम्यक् रूप से निर्वाचित नहीं किया जाता है और इस प्रकार सहयोजित व्यक्ति को तत्स्थानी नए बैंक के शेयर धारकों द्वारा निदेशक के रूप में सम्यक् रूप से निर्वाचित किया गया समझा जाएगा ]

(4) केन्द्रीय सरकार उपधारा (1) के अधीन बनाई गई किसी स्कीम में संशोधन या फेरफार करने के लिए स्कीम, रिजर्व बैंक से परामर्श के पश्चात् बना सकेगी ।

 [(5) उपधारा (2) के खंड (ग) में निर्दिष्ट किसी विषय या उसके आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक किसी विषय की बाबत इस धारा के अधीन बनाई गई स्कीम के प्रवर्तन की तारीख से ही,-

(क) वह स्कीम तत्स्थानी नए बैंक या निगम या निगमों या बैंककारी संस्थाओं पर तथा सदस्यों, यदि कोई हों, निक्षेपकर्ताओं और अन्य लेनदारों पर भी तथा उनमें से प्रत्येक के कर्मचारियों पर तथा उनमें से किसी के संबंध में कोई अधिकार या दायित्व रखने वाले किन्हीं अन्य व्यक्तियों पर, जिनके अन्तर्गत उनमें से किसी के द्वारा रखी गई किसी भविष्य निधि या अन्य निधि का प्रबंध करने वाले या उससे किसी अन्य रीति में संबद्ध न्यासी और अन्य व्यक्ति हैं, आबद्धकर होगी ;

(ख) यथास्थिति, तत्स्थानी नए बैंक या बैंककारी संस्था की सम्पत्ति और आस्तियां, स्कीम के आधार पर और उसमें उपबंधित मात्रा तक, यथास्थिति, बैंककारी संस्था या तत्स्थानी नए बैंक के पुनर्गठन से अस्तित्व में लाए गए निगम या निगमों को अंतरित हो जाएंगी और उनमें निहित हो जाएंगी और, यथास्थिति, तत्स्थानी नए बैंक या बैंककारी संस्थाओं के दायित्व, स्कीम के आधार पर और उसमें उपबंधित मात्रा तक ऐसे निगम या निगमों को अन्तरित हो जाएंगे और उनके दायित्व हो जाएंगे ।

स्पष्टीकरण [1]-इस धारा में बैंककारी संस्था" से बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक या कोई समनुषंगी बैंक हैं ।]

4[स्पष्टीकरण 2-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, तत्स्थानी नया बैंक" पद के अन्तर्गत बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) के अर्थ में तत्स्थानी नया बैंक है ।]

 [(6)] इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाई गई प्रत्येक स्कीम, बनाई जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस स्कीम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह स्कीम नहीं बनाई जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी ; किन्तु स्कीम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

 [9क. रिजर्व बैंक की अतिरिक्त निदेशक नियुक्त करने की शक्ति-(1) यदि रिजर्व बैंक की यह राय है कि बैंककारी नीति के हित में या लोकहित में या तत्स्थानी बए बैंक अथवा उसके निक्षेपकों के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह, समय-समय पर, लिखित आदेश द्वारा ऐसी तारीख से, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, एक या अधिक व्यक्तियों को तत्स्थानी नए बैंक के अतिरिक्त निदेशकों के रूप में पद धारण करने के लिए नियुक्त कर सकेगा ।

(2) इस धारा के अनुसरण में, अतिरिक्त निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति,-

(क) रिजर्व बैंक के प्रसादपर्यन्त और उसके अधीन रहते हुए, तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए या ऐसी और अवधियों के लिए पद धारण करेगा जो एक बार में तीन वर्ष से अधिक की न हो, जो रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे ;

(ख) स्वयं निदेशक होने के कारण ही या अपने पद के कर्तव्यों के निष्पादन या उनके संबंध में सद्भावपूर्वक की गई या करने से रह गई किसी बात के कारण कोई बाध्यता या दायित्व उपगत नहीं करेगा ; और

(ग) उससे तत्स्थानी नए बैंक में अर्हता शेयरों को धारण करना अपेक्षित नहीं होगा ।

(3) तत्स्थानी नए बैंक के निदेशकों की कुल संख्या के किसी अनुपात की संगणना करने के प्रयोजन के लिए इस धारा के अधीन नियुक्त किसी अतिरिक्त निदेशक को हिसाब में नहीं लिया जाएगा ।]

अध्याय 5

प्रकीर्ण

10. लेखाओं का बन्द किया जाना और लाभों का व्ययन-(1) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक प्रति वर्ष 31 दिसम्बर को  [या ऐसी अन्य तारीख को जो केद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करेट अपनी बहियों को बन्द और संतुलित करवाएगा तथा अपने लेखाओं की लेखापरीक्षा के लिए, रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से, लेखापरीक्षक नियुक्त करेगा :

 2[परतु केन्द्रीय सरकार, इस उपधारा के अधीन, एक लेखा अवधि से दूसरी लेखा अवधि को संक्रमण को सुकर बनाने की दृष्टि से, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो वह संबंधित वर्षों की बाबत बहियों को बंद और संतुलित करने के लिए, या उससे संबंधित अन्य विषयों के लिए आवश्यक या समीचीन समझती है ]

(2) तत्स्थानी नए बैंक का प्रत्येक लेखापरीक्षक, ऐसा व्यक्ति होगा जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 के अधीन कम्पनी के लेखापरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए अर्हित है और ऐसा पारिश्रमिक पाएगा जो रिजर्व बैंक, केन्द्रीय सरकार से परामर्श करके, नियत करे ।

(3) प्रत्येक लेखापरीक्षक को तत्स्थानी नए बैंक के वार्षिक तुलनपत्र और लाभ और हानि लेखे की प्रति और उस बैंक द्वारा रखी गई सब पुस्तकों की एक सूची प्रदाय की जाएगी और लेखापरीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह तुलनपत्र और लाभ और हानि लेखे की परीक्षा तत्संबद्ध लेखाओं और वाउचरों के साथ करे और अपने कर्तव्यों के पालन में,-

() उसे तत्स्थानी नए बैंक की पुस्तकों, लेखाओं और अन्य दस्तावेजों तक सभी युक्तियुक्त समयों पर पहुंच     प्राप्य होगी ;

(ख) वह ऐसे लेखाओं के अन्वेषण में अपनी सहायता के लिए लेखाकारों या अन्य व्यक्ितयों को तत्स्थानी नए बैंक के व्यय पर नियोजित कर सकेगा ;

() वह ऐसे लेखाओं के संबंध में तत्स्थानी नए बैंक के अभिरक्षक या किसी अधिकारी या कर्मचारी की परीक्षा    कर सकेगा

                (4) तत्स्थानी नए बैंक का प्रत्येक लेखापरीक्षक वार्षिक तुलनपत्र और लेखाओं पर अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को देगा और ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट में यह बताएगा कि,-

(क) क्या उसकी राय में, तुलनपत्र सब आवश्यक विशिष्टियों से युक्त, पूरा और ठीक तुलनपत्र है और ऐसे उचित रूप में तैयार किया गया है कि उससे तत्स्थानी नए बैंक के कार्यकलाप की स्थिति सही और ठीक रूप में प्रदर्शित होती है और यदि उसने कोई स्पष्टीकरण या जानकारी मांगी थी तो क्या वह दे दी गई है और समाधानप्रद है ;

(ख) तत्स्थानी नए बैंक के संव्यवहार, जो उसकी अवेक्षा में आए हैं, उस बैंक की शक्तियों के भीतर हैं या नहीं ;

(ग) तत्स्थानी नए बैंक के कार्यालयों और शाखाओं से प्राप्त विवरणियां, उसके द्वारा की जाने वाली लेखापरीक्षा के प्रयोजन के लिए पर्याप्त पाई गई हैं या नहीं ;

() लाभ और हानि लेखा, ऐसे लेखे से सम्बद्ध अवधि के लिए लाभ या हानि का सही अतिशेष दर्शित करता है या नहीं ; तथा

(ङ) कोई अन्य विषय जो उसके विचार में, केन्द्रीय सरकार की अवेक्षा में लाया जाना चाहिए ।

                 [स्पष्टीकरण 1-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए,-

() तुलन-पत्र की तत्स्थानी नए बैंक के कार्यकलापों की स्थिति का सही और ठीक रूप से प्रकटन करने       वाला, और

() लाभ और हानि लेखा को ऐसे लेखा से संबद्ध अवधि के लिए लाभ या हानि का सही अतिशेष दर्शित       करने वाला,

केवल इस तथ्य के कारण नहीं माना जाएगा कि यथास्थिति, तुलन-पत्र या लाभ और हानि लेखा ऐसे विषयों को, प्रकट नहीं करता है जिनको प्रकट करने की अपेक्षा, इस अधिनियम या किसी अन्य अधिनियम के सुसंगत उपबंधों के साथ पठित बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के उपबंधों द्वारा, नहीं की गई है ।

स्पष्टीकरण 2-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए तत्स्थानी नए बैंक के लेखाओं के बारे में केवल इस आधार पर कि उनमें कुछ विषयों को प्रकट नहीं किया गया है, यह नहीं समझा जाएगा कि वे उचित रूप से तैयार नहीं किए गए हैं, यदि-

(i) वे विषय ऐसे हैं जिन्हें तत्स्थानी नए बैंक से इस अधिनियम या किसी अन्य अधिनियम के सुसंगत उपबंधों के साथ पठित बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के किन्हीं उपबंधों के आधार पर प्रकट करने की अपेक्षा नहीं की गई है ; और

(ii) खंड (1) में निर्दिष्ट उपबंध तत्स्थानी नए बैंक के तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि लेखा में या लेखापरीक्षक की रिपोर्ट में विनिर्दिष्ट है ।]

                (5) लेखापरीक्षक की रिपोर्ट सत्यापित और हस्ताक्षरित होगी और केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएगी ।

                (6) लेखापरीक्षक, लेखापरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति तत्स्थानी नए बैंक और रिजर्व बैंक को भी भेजेगा ।

                (7) डूबे और शंकास्पद ऋणों, आस्तियों में अवक्षयण, कर्मचारिवृन्द और अधिवार्षिकी निधियों में अभिदाय और अन्य सब ऐसे विषयों के लिए, जिनके लिए उपबन्ध करना किसी विधि के अधीन आवश्यक है या जिनके लिए बैंककारी कम्पनियों द्वारा प्रायः उपबन्ध किया जाता है, उपबन्ध करने के पश्चात् तत्स्थानी नया बैंक,  [अपने शुद्ध लाभ में से लाभांश घोषित कर सकेगा और अधिशेष को, यदि कोई हो, प्रतिधारित कर सकेगा] केन्द्रीय सरकार को अन्तरित कर देगा ।

                1[(7क) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक, केन्द्रीय सरकार को  [और रिजर्व बैंक को] वार्षिक तुलन-पत्र, लाभ और हानि लेखा और लेखापरीक्षक की रिपोर्ट तथा लेखाओं से संबद्ध अवधि के दौरान बैंक के कार्यकरण और क्रियाकलापों के बारे में निदेशक बोर्ड को    रिपोर्ट देगा ।]

                 [(8) केन्द्रीय सरकार, लेखापरीक्षकों की प्रत्येक रिपोर्ट और तत्स्थानी नए बैंक के कार्यकरण और क्रियाकलापों की बाबत रिपोर्ट, प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।]

                1[(9) पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार, किसी भी समय, उतने लेखापरीक्षकों को नियुक्त कर सकेगी जितने वह तत्स्थानी नए बैंक के लेखाओं की परीक्षा करने और उन पर रिपोर्ट देने के लिए ठीक समझे और इस प्रकार नियुक्त लेखापरीक्षकों को, तत्स्थानी नए बैंक के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में वे सभी अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो इस धारा के अधीन, तत्स्थानी नए बैंक द्वारा नियुक्त किसी लेखापरीक्षक को हैं ।]

                 [10क. वार्षिक साधारण अधिवेशन-(1) ऐसे प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक का, जिसने धारा 3 की उपधारा (2ख) के खण्ड (ग) के अधीन पूंजी निर्गमित की है, एक साधारण अधिवेशन (जिसे इस अधिनियम में वार्षिक साधारण अधिवेशन कहा गया है) ऐसे स्थान पर, जहां बैंक का मुख्य कार्यालय स्थित है, प्रत्येक वर्ष ऐसे समय पर आयोजित किया जाएगा जो निदेशक बोर्ड द्वारा, समय-समय पर, विनिर्दिष्ट किया जाए :

परन्तु ऐसा वार्षिक साधारण अधिवेशन, उस तारीख से छह सप्ताह की समाप्ति के पूर्व आयोजित किया जाएगा जिसको तुलनपत्र, लाभ और हानि लेखा तथा संपरीक्षक को रिपोर्ट सहित, धारा 10 की उपधारा (7क) के अधीन केन्द्रीय सरकार को या रिजर्व बैंक को, इनमें से जो भी तारीख पूर्वतर हो, भेजा जाता है ।

(2) किसी वार्षिक साधारण अधिवेशन में उपस्थित शेयर धारक पूर्ववर्ती 31 मार्च तक के तैयार किए गए तत्स्थानी नए बैंक के तुलनपत्र तथा लाभ और हानि लेखा, लेखाओं के अंतर्गत आने वाली अवधि के लिए तत्स्थानी नए बैंक के कार्यकरण और क्रियाकलापों पर निदेशक बोर्ड की रिपोर्ट तथा तुलनपत्र और लेखाओं पर लेखापरीक्षक की रिपोर्ट पर  [चर्चा करने, उसका अनुमोदन करने और उसे अंगीकार करनेट के हकदार होंगे ।]

 [(3) इस धारा की कोई बात उस अवधि के दौरान लागू नहीं होगी जिसके लिए तत्स्थानी नए बैंक का निदेशक बोर्ड       धारा 18क की उपधारा (1) के अधीन अधिक्रान्त कर दिया गया था :

परंतु प्रशासक यदि वह उस तत्स्थानी नए बैंक के, जिसके निदेशक बोर्ड का अधिक्रमण किया गया था, हित में समुचित समझता है तो इस धारा के उपबंधों के अनुसार, वार्षिक साधारण अधिवेशन बुला सकेगा ।]

2[10ख. असंदत्त या अदावाकृत लाभांश का असंदत्त लाभांश लेखा में अन्तरण-(1) जहां बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) और वित्तीय संस्था विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारंभ के पश्चात्, तत्स्थानी नए बैंक द्वारा कोई लाभांश घोषित किया गया है किन्तु घोषणा की तारीख से तीस दिन के भीतर ऐसे किसी शेयर धारक को, जो लाभांश के संदाय का हकदार है, उसका संदाय नहीं किया गया है या उसके द्वारा दावा नहीं किया गया है, वहां तत्स्थानी नया बैंक तीस दिन की ऐसी अवधि की समाप्ति की तारीख से सात दिन के भीतर लाभांश की कुल रकम, जो उक्त तीस दिन की अवधि के भीतर असंदत्त या अदावाकृत रह जाती है, एक विशेष लेखा में, जो (तत्स्थानी नए बैंक का नाम)ह्ल.. के असंदत्त लाभांश लेखा" कहलाएगा, अंतरित करेगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में लाभांश जो असंदत्त है" पद से ऐसा लाभांश अभिप्रेत है जिसकी बाबत अधिपत्र भुनाया नहीं गया है या जिसका अन्यथा संदाय या दावा नहीं किया गया है ।

(2) जहां बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) और वित्तीय संस्था विधि (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रारंभ के पूर्व तत्स्थानी नए बैंक द्वारा घोषित कोई संपूर्ण लाभांश या उसका कोई भाग ऐसे प्रारंभ पर असंदत्त रहता है वहां तत्स्थानी नया बैंक ऐसे प्रारंभ से छह मास की अवधि के भीतर ऐसी असंदत्त रकम को उपधारा (1) में निर्दिष्ट लेखा में अंतरित कर देगा ।

(3) इस धारा के अनुसरण में, तत्स्थानी नए बैंक के असंदत्त लाभांश लेखा में अंतरित कोई ऐसा धन, जो ऐसे अंतरण की तारीख से सात वर्ष की अवधि के लिए असंदत्त या अदावाकृत रहता है, तत्स्थानी नए बैंक द्वारा कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 205ग की उपधारा (1) के अधीन स्थापित विनिधानकर्ता शिक्षा और संरक्षण निधि में अंतरित कर दिया जाएगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन विनिधानकर्ता शिक्षा और संरक्षण निधि में अंतरित धन का कंपनी अधिनियम, 1956             (1956 का 1) की धारा 205ग में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए और रीति से उपयोग किया जाएगा ।]

11. तत्स्थानी नए बैंक का भारतीय कम्पनी समझा जाना-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के प्रयोजनों के लिए प्रत्येक तत्स्थानी नए बैंक को भारतीय कम्पनी और ऐसी कम्पनी समझा जाएगा, जिसमें जनता पर्याप्त रूप से हितबद्ध है ।

12. अध्यक्ष आदि का पद रिक्त होना-(1) प्रत्येक ऐसे व्यक्ति के बारे में जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व किसी विद्यमान बैंक के अध्यक्ष के रूप में पद धारण किए हुए है, उस दशा में जब वह तत्स्थानी नए बैंक का अभिरक्षक हो जाए, यह समझा जाएगा कि उसने ऐसे अध्यक्ष के रूप में पद ऐसे प्रारम्भ पर रिक्त कर दिया है ।

(2) उपधारा (1) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, विद्यमान बैंक का प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी, इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, तत्स्थानी नए बैंक का, यथास्थिति, अधिकारी या अन्य कर्मचारी हो जाएगा तथा उस बैंक में उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों के साथ अपना पद या सेवा धारण करेगा जो उसे तब अनुज्ञेय होते जब विद्यमान बैंक का उपक्रम तत्स्थानी नए बैंक को अन्तरित और उनमें निहित न किया गया होता और वह ऐसा तब तक करता रहेगा जब तक तत्स्थानी नए बैंक में उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक उसके पारिश्रमिक, निबंधन या शर्तें तत्स्थानी नए बैंक द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती ।

(3) उन व्यक्तियों के स्थान पर, जो किसी विद्यमान बैंक के अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों के लिए गठित पेंशन-निधि, भविष्य-निधि, उपदान-निधि या अन्य ऐसी ही निधि के न्यासी इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व थे, ऐसे व्यक्ति जिन्हें केन्द्रीय सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, न्यासी हो जाएंगे ।

(4) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवाओं का विद्यमान बैंक से तत्स्थानी नए बैंक को अन्तरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।

 [12क. बोनस-(1) तत्स्थानी नए बैंक का कोई अधिकारी या [बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (1965 का 21) की धारा 2 के खंड (13) के अर्थ में किसी कर्मचारी से भिन्नट अन्य कर्मचारी किसी बोनस के संदाय का हकदार नहीं होगा ।

(2) तत्स्थानी नए बैंक का कोई कर्मचारी, जो बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (1965 का 21) की धारा 2 के खण्ड (13) के अर्थ में कोई कर्मचारी है, किसी बोनस के संदाय का उस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार ही हकदार होगा, अन्यथा नहीं ।

(3) इस धारा के उपबन्ध, किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी और इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में या औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अथवा किसी चलन, प्रथा या रूढ़ि में अथवा किसी संविदा, करार, समझौता, अधिनिर्णय या अन्य लिखत में किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।]

13. विश्वस्तता और गोपनीयता के बारे में बाध्यताएं-(1) प्रत्येक तत्स्थानी नया बैंक, विधि द्वारा जैसा अपक्षित है उसके सिवाय, बैंककारों की रूढ़िगत पद्धतियों और प्रथाओं का अनुसरण करेगा और, विशिष्टतया अपने घटकों के या उनके कार्यकलाप के संबंध में कोई जानकारी उस दशा के सिवाय प्रकट नहीं करेगा जिसमें तत्स्थानी नए बैंक के लिए ऐसी जानकारी प्रकट करना, विधि या बैंककारों की रूढ़िगत पद्धतियों और प्रथाओं के अनुसार आवश्यक या समुचित हो ।

(2) तत्स्थानी नए बैंक का प्रत्येक निदेशक, किसी स्थानीय बोर्ड या समिति का सदस्य या लेखापरीक्षक, सलाहकार, अधिकारी या अन्य कर्मचारी अपना कर्तव्य भार ग्रहण करने के पूर्व तृतीय अनुसूची में दिए गए प्ररूप में विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा करेगा ।

(3) तत्स्थानी नए बैंक का प्रत्येक अभिरक्षक, तृतीय अनुसूची में दिए गए प्ररूप में विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा यथासंभव शीघ्र करेगा ।

 [(4) इस धारा की कोई बात प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005के अधीन प्रकट की गई प्रत्यय विषयक जानकारी को लागू नहीं होगी ।]

14. अभिरक्षक का लोक सेवक होना-किसी तत्स्थानी नए बैंक का प्रत्येक अभिरक्षक, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 9 के प्रयोजनों के लिए लोक सेवक समझा जाएगा ।

15. कुछ त्रुटियों के कारण कार्यों या कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-(1) सद्भावपूर्वक कार्य करते हुए अभिरक्षक द्वारा किए गए सब कार्य उसकी नियुक्ति में या प्रक्रिया में किसी त्रुटि के होते हुए भी, विधिमान्य होंगे

(2) किसी तत्स्थानी नए बैंक के किसी निदेशक बोर्ड या स्थानीय बोर्ड या समिति का कोई कार्य या कार्यवाही, यथास्थिति, ऐसे बोर्ड या समिति में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के आधार पर ही अविधिमान्य नहीं होगी

(3) किसी तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक या स्थानीय बोर्ड या समिति के सदस्य के रूप में सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए गए सब कार्य विधिमान्य होंगे यद्यपि बाद में यह प्रकट हो कि उसकी नियुक्ति किसी त्रुटि या निरर्हता के कारण अविधिमान्य थी अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबन्ध के आधार पर समाप्त हो गई थी :

परन्तु इस धारा की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक अथवा स्थानीय बोर्ड या समिति के सदस्य द्वारा किए गए किसी ऐसे कार्य को विधिमान्य बनाती है जो तत्स्थानी नए बैंक को यह दिखा दिए जाने के बाद कि उसकी नियुक्ति अविधिमान्य है या समाप्त हो गई है, किया गया है ।

16. क्षतिपूर्ति-(1) किसी तत्स्थानी नए बैंक के प्रत्येक अभिरक्षक की और केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक के प्रत्येक अधिकारी की और तत्स्थानी नए बैंक के प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी की, उसके कर्तव्यों के निर्वहन में या उसके सम्बन्ध में उसके द्वारा उपगत सभी हानियों और व्ययों की बाबत, जो उसके जानबूझकर किए गए कार्य या व्यतिक्रम से न हुए हों, उस बैंक द्वारा क्षतिपूर्ति    की जाएगी ।

(2) किसी तत्स्थानी नए बैंक का कोई निदेशक अथवा स्थानीय बोर्ड या समिति का कोई सदस्य, उस बैंक को होने वाली किसी ऐसी हानि या उस पर पड़ने वाले किसी ऐसे व्यय के लिए, जो तत्स्थानी नए बैंक की ओर से अर्जित या ली गई किसी सम्पत्ति या प्रतिभूति के मूल्य की या उस सम्पत्ति या प्रतिभूति में हक की, अपर्याप्तता या कमी के परिणामस्वरूप या किसी ग्राहक या ऋणी व्यक्ति के दिवाले या सदोष कार्य के परिणामस्वरूप अथवा अपने पद के कर्तव्य के निष्पादन में या उसके सम्बन्ध में की गई किसी बात के परिणामस्वरूप हो, तब के सिवाय उत्तरदायी न होगा, जब ऐसी हानि, व्यय, अपर्याप्तता या कमी उस निदेशक या सदस्य के जानबूझकर किए गए किसी कार्य या व्यतिक्रम के कारण हो ।

 [16क. निदेशकों की नियुक्ति के संबंध में तत्स्थानी नए बैंक के साथ किए गए ठहराव का अभिवावी होना-(1) जहां किसी कंपनी के साथ तत्स्थानी नए बैंक द्वारा किए गए किसी ठहराव में तत्स्थानी नए बैंक द्वारा ऐसी कंपनी के एक या अधिक निदेशकों की नियुक्ति के लिए उपबंध है वहां ऐसा उपबंध और उसके अनुसरण में की गई निदेशकों की कोई नियुक्ति, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या कंपनी से संबंधित संगम-ज्ञापन, संगम-अनुच्छेद या किसी अन्य लिखत में, किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, विधिमान्य और प्रभावी होगी और शेयर-अर्हता, आयु-सीमा, निदेशकों की संख्या, निदेशकों के पद से हटाए जाने और पूर्वोक्त ऐसी किसी विधि या लिखत में अंतविष्ट वैसी ही शर्तों के संबंध में कोई उपबंध, पूर्वोक्त ठहराव के अनुसरण में तत्स्थानी नए बैंक द्वारा नियुक्त किसी निदेशक को लागू नहीं होगा ।

(2) पूर्वोक्त रूप से नियुक्त कोई निदेशक-

(क) तत्स्थानी नए बैंक के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और उसे तत्स्थानी नए बैंक के लिखित आदेश द्वारा हटाया जा सकेगा या उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को रखा जा सकेगा ;

(ख) निदेशक होने के कारण ही अथवा ऐसी किसी बात के लिए जिसे निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक किया गया है या करने का लोप किया गया है अथवा उससे संबंधित किसी बात के लिए कोई बाध्यता या दायित्व उपगत नहीं करेगा ;

(ग) चक्रानुक्रम से निवृत्ति के लिए दायी नहीं होगा और उसे ऐसी निवृत्ति के लिए दायी निदेशकों की संख्या की संगणना करने के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा ।]

17. विद्यमान बैंकों के प्रति निर्देशों का अर्थान्वयन-इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि या किसी संविदा या अन्य लिखत में किसी विद्यमान बैंक के प्रति किसी निर्देश का, जहां तक उसका सम्बन्ध ऐसे उपक्रम से है जो धारा 4 द्वारा अन्तरित किया गया है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह तत्स्थानी नए बैंक के प्रति निर्देश है ।

18. विघटन-निगमों के परिसमापन सम्बन्धी विधि का कोई उपबन्ध किसी तत्स्थानी नए बैंक को लागू नहीं होगा और किसी तत्स्थानी नए बैंक को, केन्द्रीय सरकार के आदेश से और ऐसी रीति से जिसका वह निदेश दे, समापनाधीन किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

 [18क. कतिपय मामलों में बोर्ड का अधिक्रमण-(1) जहां केन्द्रीय सरकार का, रिजर्व बैंक की सिफारिश पर यह समाधान हो जाता है कि लोक हित में या किसी तत्स्थानी नए बैंक के कार्यों का संचालन ऐसी रीति में, जो निक्षेपकर्ताओं या तत्स्थानी नए बैंक के हित के लिए हानिकारक है, किए जाने से रोकने के लिए या किसी नए तत्स्थानी बैंक के उचित प्रबंध को सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है वहां केन्द्रीय सरकार, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, आदेश द्वारा ऐसे तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड को, छह मास से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, अधिक्रांत कर सकेगी :

परन्तु निदेशक बोर्ड के अधिक्रमण की अवधि, समय-समय पर बढ़ाई जा सकेगी, किन्तु फिर भी कुल अवधि बारह मास से अधिक नहीं होगी ।

(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड के अधिक्रमण पर, रिजर्व बैंक के परामर्श से, ऐसी अवधि के लिए जो वह अवधारित करे, ऐसे प्रशासक की (जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार का अधिकारी हो) नियुक्ति कर सकेगी, जिसके पास विधि, वित्त, बैंककारी, अर्थशास्त्र या लेखाकर्म में अनुभव हो

(3) केन्द्रीय सरकार, प्रशासक को ऐसे निदेश जारी कर सकेगी, जो वह समुचित समझे और प्रशासक ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए बाध्य होगा ।

(4) तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड के अधिक्रमण का आदेश करने पर, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी,-

(क) अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और अन्य निदेशक, अधिक्रमण की तारीख से उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे ;

(ख) ऐसी सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन, ऐसे तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से या ऐसे तत्स्थानी नए बैंक के साधारण अधिवेशन में पारित संकल्प द्वारा प्रयोग या निर्वहन किया जा सकेगा, ऐसे तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड का पुनर्गठन किए जाने तक, उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक द्वारा प्रयोग और निर्वहन किया जाएगा :

परन्तु प्रशासक द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्ति, इस बात के होते हुए भी विधिमान्य होगी कि ऐसी शक्ति तत्स्थानी नए बैंक के साधारण अधिवेशन में पारित संकल्प द्वारा प्रयोक्तव्य है ।

(5) केन्द्रीय सरकार, प्रशासक की, उसके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए, रिजर्व बैंक के परामर्श से, तीन या अधिक ऐसे व्यक्तियों की समिति का गठन कर सकेगी, जिनके पास विधि, वित्त, बैंककारी, अर्थशास्त्र या लेखाकर्म में अनुभव हो ।

(6) समिति ऐसे समयों और स्थानों पर अधिवेशन करेगी और प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(7) प्रशासक और केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (5) के अधीन गठित समिति के सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते ऐसे होंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और वे संबंधित तत्स्थानी नए बैंक द्वारा संदेय होंगे

(8) उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए आदेश में यथाविनिर्दिष्ट निदेशक, बोर्ड के अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति से पूर्व दो मास के अवसान पर या उसके पूर्व, तत्स्थानी नए बैंक का प्रशासक नए निदेशकों का निर्वाचन करने और निदेशक बोर्ड का पुनर्गठन करने के लिए तत्स्थानी नए बैंक का साधारण अधिवेशन बुलाएगा ।

(9) किसी अन्य विधि में या किसी संविदा, संगम-ज्ञापन या संगम-अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति अपने पद की हानि या पर्यवसान के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।

(10) उपधारा (2) के अधीन नियुक्त प्रशासक तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड के पुनर्गठित किए जाने के पश्चात् तुरन्त अपना पद रिक्त कर देगा ।]

19. विनियम बनाने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए जिन विषयों का उपबन्ध करना समीचीन है उन सब विषयों का उपबन्ध करने के लिए तत्स्थानी नए बैंक का निदेशक बोर्ड, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् और केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से,  [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा] ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और तद्धीन बनाई गई किसी स्कीम के उपबन्धों से असंगत न हो ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, विनियम निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) स्थानीय बोर्ड की शक्तियां, कृत्य और कर्तव्य और वे निर्बन्धन, शर्तें या परिसीमाएं, यदि कोई हों, जिनके अधीन उनका प्रयोग या पालन किया जा सकेगा, स्थानीय समितियों और स्थानीय बोर्डों की समितियों की संरचना और गठन (जिसके अन्तर्गत किसी ऐसी समिति के सदस्यों की संख्या भी है), ऐसी समितियों की शक्तियां, कृत्य और कर्तव्य, स्थानीय समितियों के और स्थानीय बोर्डों की समितियों के अधिवेशन करना और उनमें कार्य का संचालन ;

(ख) वह रीति जिससे स्थानीय बोर्डों का कार्य किया जाएगा तथा उसके सम्बन्ध में प्रक्रिया ;

 [(खक) तत्स्थानी नए बैंक के शेयरों की प्रकृति, वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन शेयर धारित और अंतरित किए जा सकेंगे तथा साधारणतया शेयर धारकों के अधिकारों और कर्तव्यों से संबंधित सभी विषय ;

(खख) रजिस्टर का रखा जाना और धारा 3 की उपधारा (2च) में विनिर्दिष्ट विशिष्टियों के अतिरिक्त रजिस्टर में विशिष्टियों का प्रविष्ट किया जाना, कंप्यूटर फ्लापियों या डिस्कटों पर रजिस्टर के रखे जाने में पालन किए जाने वाले रक्षोपाय, रजिस्टर का निरीक्षण और बंद किया जाना और उनसे संबंधित सभी अन्य विषय ;

(खग) वह रीति जिससे साधारण अधिवेशन बुलाए जाएंगे, वह प्रक्रिया जिसका उसमें अनुसरण किया जाएगा और वह रीति जिससे, मताधिकार का प्रयोग किया जा सकेगा ;

(खघ) शेयर धारकों के अधिवेशनों का आयोजित किया जाना और उनमें किया जाने वाला कारबार ;

(खङ) वह रीति जिससे शेयर धारकों या अन्य व्यक्तियों पर तत्स्थानी नए बैंक की ओर से सूचनाओं की तामील की जा सकेगी ;

(खच) वह रीति जिससे धारा 9 की उपधारा (3) के खंड (ज) के अधीन नामनिर्देशित निदेशक निवृत्त होंगे ;]

(ग) किसी तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड की शक्तियों और कृत्यों का उस बैंक के महाप्रबन्धक, निदेशक, अधिकारी या अन्य कर्मचारी को प्रत्यायोजन ;

(घ) वे शर्तें या परिसीमाएं जिनके अधीन कोई तत्स्थानी नया बैंक सलाहकार, अधिकारी और अन्य कर्मचारी नियुक्त कर सकेगा, और उनके पारिश्रमिक तथा सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें नियत कर सकेगा ;

(ङ) तत्स्थानी नए बैंक के सलाहकारों, अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों के कर्तव्य और आचरण ;

(च) तत्स्थानी नए बैंक के अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों के अथवा ऐसे अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों के आश्रितों के फायदे के लिए अधिवार्षिकी-निधि, पेंशन-निधि, भविष्य निधि या अन्य निधियां स्थापित करना और उनको बनाए रखना और ऐसी निधियों में से संदेय अधिवार्षिं की भत्ते, वार्षिकियां और पेंशनें अनुदत्त करना ;

(छ) तत्स्थानी नए बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध की गई विधिक कार्यवाहियों का संचालन और उनमें प्रतिरक्षा तथा अभिवचनों पर हस्ताक्षर करने की रीति ;

(ज) तत्स्थानी नए बैंक के लिए एक मुद्रा की व्यवस्था और उसके उपयोग की रीति तथा प्रभाव ;

(झ) वह प्ररूप और रीति जिसमें तत्स्थानी नए बैंक को आबद्ध करने वाली संविदाएं निष्पादित की जा सकेंगी ;

(ञ) वे शर्तें और अपेक्षाएं जिनके अधीन तत्स्थानी नए बैंक द्वारा उधार या अग्रिम दिए जा सकेंगे या विपत्रों का भुगतान मितिकाटे पर किया जा सकेगा या वे कम किए जा सकेंगे ;

(ट) वे व्यक्ति और प्राधिकारी जो तत्स्थानी नए बैंक के अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों के या उनके आश्रितों के फायदे के लिए गठित किसी पेंशन-निधि, भविष्य-निधि या अन्य निधि का प्रशासन करेंगे ;

() तत्स्थानी नए बैंक के क्रियाकलाप के कार्यक्रमों के विवरण और वित्तीय विवरण तैयार और प्रस्तुत करना और वह अवधि जिसके लिए तथा वह समय जिसके भीतर ऐसे विवरण और प्राक्कलन तैयार और प्रस्तुत किए जाएंगे ; तथा

(ड) साधारणतया तत्स्थानी नए बैंक के मामलों का दक्षतापूर्ण संचालन ।

                (3) जब तक उपधारा (1) के अधीन कोई विनियम नहीं बनाया जाता तब तक विद्यमान बैंक के संगम-अनुच्छेद तथा विद्यमान बैंक द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, नियम, उपविधि या आदेश, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, उपधारा (1) के अधीन बनाए गए विनियम समझे जाएंगे और तद्नुसार प्रभावी होंगे और विद्यमान बैंक के किसी प्राधिकारी के प्रति उनमें किया गया कोई निर्देश, तत्स्थानी नए बैंक के तत्स्थानी प्राधिकारी के प्रति निर्देश समझा जाएगा और जब तक इस अधिनियम के अधीन ऐसा तत्स्थानी प्राधिकारी गठित नहीं किया जाता तब तक वह अभिरक्षक के प्रति निर्देश समझा जाएगा ।

 [(4) इस अधिनियम के अधीन तत्स्थानी नए बैंक के निदेशक बोर्ड द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, केन्द्रीय सरकार को भेजा जाएगा और वह सरकार उसकी एक प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

20. कुछ अधिनियमितियों का संशोधन-(1) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में,-

() धारा 34 की उपधारा (3) में, और कोई समनुषंगी बैंक" शब्दों के स्थान पर बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक और कोई समनुषंगी बैंक" शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे ;

() धारा 36कघ की उपधारा (3) में, और कोई समनुषंगी बैंक" शब्दों के स्थान पर बैंककारी कम्पनी     (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक और कोई समनुषंगी बैंक" शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे ;

() धारा 51 में, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी अन्य बैंककारी संस्था को" शब्दों के स्थान पर बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की धारा 3 के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी अन्य बैंककारी संस्था को" शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे

(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 2 के खंड (खख) में और कोई भी समनुषंगी बैंक" शब्दों के स्थान पर बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक और कोई भी समनुषंगी बैंक" शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे

(3) बैंककारी कम्पनी (विधि-व्यवसायियों के मुवक्किलों के खाते) अधिनियम, 1949 (1949 का 46) की धारा 2 के खंड () में, और कोई भी समनुषंगी बैंक" शब्दों के स्थान पर बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की    धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक और कोई भी समनुषंगी बैंक" शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे

(4) निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारण्टी निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) की धारा 2 के खंड (ङङ) में, गठित तत्स्थानी नया बैंक" शब्दों के पश्चात् या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक" शब्द, कोष्ठक और अंक अन्तःस्थापित किए जाएंगे

(5) राज्य कृषि-उधार निगम अधिनियम, 1968 (1968 का 60) की धारा 2 के खंड (ii) में, गठित तत्स्थानी नया बैंक" शब्दों के पश्चात् या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक" शब्द, कोष्ठक और अंक अन्तःस्थापित किए जाएंगे

21. निरसन और व्यावृत्ति-(1) बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अध्यादेश, 1980 इसके द्वारा निरसित किया जाता है

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, जिसके अन्तर्गत किया गया कोई आदेश, जारी की गई कोई अधिसूचना या दिया गया कोई निदेश भी है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंध के अधीन की गई समझी जाएगी

प्रथम अनुसूची

(धारा  2, 3 और 4 देखिए)

विद्यमान बैंक

तत्स्थानी नया बैंक

स्तम्भ 1

स्तम्भ 2

दि आंध्र बैंक लिमिटेड

आन्ध्र बैंक

कारपोरेशन बैंक लिमिटेड

कारपोरेशन बैंक

दि न्यू बैंक आफ इंडिया लिमिटेड

न्य बैंक आफ इंडिया

दि ओरिएण्टल बैंक आफ कामर्स लिमिटेड

ओरिएण्टल बैंक आफ कामर्स

दि पंजाब एण्ड सिंध बैंक लिमिटेड

पंजाब एण्ड सिंध बैंक

विजया बैंक लिमिटेड

विजया बैंक

द्वितीय अनुसूची

(धारा 6 देखिए)

विद्यमान बैंक का नाम

रकम

 

(लाख रुपयों में)

दि आन्ध्र बैंक लिमिटेड

610

कारपोरेशन बैंक लिमिटेड

180

दि न्यू बैंक आफ इंडिया लिमिटेड

510

दि ओरिएण्टल बैंक आफ कामर्स लिमिटेड

100

दि पंजाब एण्ड सिंध बैंक लिमिटेड

210

विजया बैंक लिमिटेड

240

तृतीय अनुसूची

[धारा 13 की उपधारा (2) और (3) देखिए]

विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा

                मैं...................................एतद्द्वारा घोषणा करता हूं कि।...................................के (यथास्थिति) अभिरक्षक, निदेशक, स्थानीय बोर्ड के सदस्य, स्थानीय समिति के सदस्य, लेखा परीक्षक, सलाहकार, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के रूप में मुझ से अपेक्षित और उक्त।...................................में मेरे द्वारा धारित पद या स्थिति से उचित रूप से सम्बद्ध कर्तव्यों का मैं निष्ठापूर्वक, सच्चाई से और अपनी पूर्ण कुशलता और योग्यता से निष्पादन और पालन करूंगा

                मैं यह भी घोषणा करता हूं कि मैं...................................के कार्यों से या...................................से व्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कार्यों से सम्बद्ध कोई जानकारी किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसका विधिक रूप से हकदार नहीं है, संसूचित नहीं करूंगा और ही संसूचित होने दूंगा ; और ऐसे किसी व्यक्ति को...................................की या उसके कब्जे की और ...................................के कारबार से या।...................................से व्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कारबार से सम्बद्ध किन्हीं पुस्तकों या दस्तावेजों का निरीक्षण तो करने दूंगा और उन तक उसकी पहुंच होने दूंगा

                ।यहां तत्स्थानी नए बैंक का नाम भरें

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