भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985
(1985 का अधिनियम संख्यांक 82)
[30 दिसम्बर, 1985]
पोत परिवहन और नौ परिवहन के प्रयोजनों के लिए अंतर्देशीय
जलमार्ग के विनियमन और विकास के लिए तथा उससे
संबंधित या उससे आनुषंगिक विषयों के लिए
प्राधिकरण के गठन का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय अन्तर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) अनुलग्न भूमि" से राष्ट्रीय जलमार्ग से अनुलग्न सभी भूमि अभिप्रेत है, चाहे वह सीमांकित हो या न हो;
(ख) प्राधिकरण" से धारा 3 के अधीन गठित भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकारण अभिप्रेत है;
(ग) जलसरणी" से कोई जलमार्ग अभिप्रेत है, चाहे वह प्राकृतिक हो या कृत्रिम;
(घ) संरक्षण" के अन्तर्गत जलसरणियों की झमाई, नियंत्रण, बंद करना, मोड़ना, या परित्याग करना भी है;
(ङ) संरक्षण उपाय" से संरक्षण के प्रयोजनों के लिए उपाय अभिप्रेत है किन्तु इनके अंतर्गत बाढ़ों से तटों की रक्षा के लिए या ऐसे तटों के जिनका मुख्यतया ऐसे कारणों से कटाव हो गया है जो पोत परिवहन और नौ परिवहन से संबंधित नहीं हैं, पुनःस्थापन के लिए उपाय नहीं आते हैं;
(च) अवसंरचना" के अन्तर्गत ऐसी संरचनाएं हैं जैसे कि डाक, घाट, जैटी, उतराई मंच, जलबंध, बोया, अंतर्देशीय पत्तन, स्थोरा उठाई धराई उपस्कर, सड़क और रेल प्रवेश मार्ग और स्थोरा भंडारण स्थान तथा अवसंरचनात्मक सुविधाएं" पद का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(छ) सदस्य" से धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है;
(ज) राष्ट्रीय जलमार्ग" से ऐसा अंतर्देशीय जलमार्ग अभिप्रेत है, जो राष्ट्रीय जलमार्ग (गंगा-भागीरथी-हुगली नदी इलाहाबाद-हलदिया खण्ड) अधिनियम, 1982 (1982 का 49) की धारा 2 द्वारा राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है;
स्पष्टीकरण-यदि संसद् विधि द्वारा किसी अन्य जलमार्ग को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित करती है तो उस तारीख से, जिसको ऐसी घोषणा प्रभावी होती है, -
(i) ऐसा अन्य जलमार्ग भी इस खंड के अर्थान्तर्गत राष्ट्रीय जलमार्ग समझा जाएगा; और
(ii) इस अधिनियम के उपबंध, आवश्यक उपांतरणों सहित (जिनके अन्तर्गत इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का पूर्वोक्त तारीख के प्रति निर्देश के रूप में अर्थान्वयन करने के लिए उपांतरण भी है) ऐसे राष्ट्रीय जलमार्ग को लागू होंगे;
(झ) नाव्य जलसरणी" से ऐसी जलसरणी अभिप्रेत है, जो पूर्ण वर्ष भर या उसके किसी भाग के दौरान नाव्य है;
(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ट) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं; और
(ठ) नियम" से इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियम अभिप्रेत हैं ।
अध्याय 2
भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण
3. भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण का गठन और निगमन-(1) ऐसी तारीख से जो केंन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा, जिसका नाम भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण होगा ।
(2) प्राधिकरण पूर्वोक्त नाम का, शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की संपत्ति की अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
[(3) प्राधिकरण निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात्: -
(क) अध्यक्ष;
(ख) उपाध्यक्ष;
(ग) तीन से अनधिक पूर्णकालिक सदस्य; और
(घ) तीन से अनधिक अंशकालिक सदस्य,
जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त किए जाएंगे ।]
(4) प्राधिकरण ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, ऐसे किसी व्यक्ति को अपने साथ सहयोजित कर सकेगा जिसकी सहायता या सलाह की वह इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों का पालन करने में वांछा करे और इस प्रकार सहयोजित व्यक्ति को प्राधिकरण के ऐसे विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा जो उन प्रयोजनों से, जिनके लिए वह सहयुक्त किया गया है, सुसंगत है किन्तु वह मत देने का हकदार नहीं होगा ।
4. सदस्यों की सेवा की शर्तें-सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।
[4क. सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हता-कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्त होने के लिए निरर्हित होगा, यदि वह, -
(क) ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता है अंतर्वलित है; या
(ख) अनुन्मोचित दिवालिया है; या
(ग) विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया है; या
(घ) सरकार या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी कंपनी की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है; या
(ङ) केन्द्रीय सरकार की राय में, प्राधिकरण में ऐसा वित्तीय या अन्य हित रखता है जिसके कारण सदस्य के रूप में उसके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ।]
5. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां-(1) प्राधिकरण का अध्यक्ष, प्राधिकरण के अधिवेशनों की अध्यक्षता करने के अतिरिक्त, प्राधिकरण की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो उसे प्राधिकरण द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करेगा, जो विहित किए जाएं ।
(2) प्राधिकरण का उपाध्यक्ष अध्यक्ष की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो विहित किए जाएं या प्राधिकरण द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।
[5क. बैठकें-(1) प्राधिकरण की बैठकें, ऐसे समय और स्थान पर होंगी और अपनी बैठकों में कारबार किए जाने के संबंध में, जिसके अंतर्गत ऐसी बैठकों में गणपूर्ति है, प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन किया जाएगा, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
(2) अध्यक्ष या यदि वह किसी कारण से प्राधिकरण की किसी बैठक में उपस्थित होने में असमर्थ है तो, उपाध्यक्ष और दोनों की अनुपस्थिति में, उस बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया कोई अन्य सदस्य उस बैठक में पीठासीन होगा ।
(3) प्राधिकरण की किसी बैठक में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मतों के बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष का और दोनों की अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का, दूसरा या निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।]
6. सदस्यों का हटाया जाना आदि-(1) केंद्रीय सरकार प्राधिकरण से ऐसे किसी सदस्य को हटा सकेगी जो उसकी राय में, -
(क) कार्य करने से इंकार करता है,
(ख) कार्य करने में असमर्थ हो गया है,
(ग) सदस्य के रूप में अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बना रहना लोक हित में हानिकारक है, या
(घ) सदस्य के रूप में बने रहने के लिए अन्यथा अनुपयुक्त है ।
(2) केंद्रीय सरकार किसी सदस्य को उसके विरुद्ध किसी जांच के लंबित रहने तक निलंबित कर सकेगी ।
(3) इस धारा के अधीन हटाए जाने का कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि संबंधित सदस्य को अपना स्पष्टीकरण केंद्रीय सरकार को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान नहीं कर दिया गया है और जब ऐसा आदेश पारित कर दिया जाता है तब, हटाए गए सदस्य का स्थान रिक्त घोषित कर दिया जाएगा ।
(4) ऐसा कोई सदस्य जिसे इस धारा के अधीन हटा दिया गया है, प्राधिकरण के अधीन सदस्य के रूप में या किसी अन्य हैसियत में पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा ।
7. रिक्ति आदि से प्राधिकरण की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि, -
(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति है, या उसके गठन में कोई त्रुटि है;
(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है, या
(ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।
8. सचिव और अन्य अधिकारी-(1) प्राधिकरण, सचिव और ऐसे अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा, जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्ष निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।
(2) प्राधिकरण के सचिव और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी, जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।
9. सलाहकार समिति-(1) इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए प्राधिकरण, समय-समय पर, ऐसी सलाहकार समितियों का गठन कर सकेगा जो उसके कृत्यों के दक्ष निर्वहन के लिए आवश्यक हों ।
(2) प्रत्येक सलाहकार समिति पोत परिवहन और नौ परिवहन तथा सहबद्ध पहलुओं से संबंधित उतने व्यक्तियों से मिलकर बनेगी जितने प्राधिकरण ठीक समझे ।
10. प्राधिकरण का कारबार के सिद्धांतों पर कार्य करना-इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में प्राधिकरण, जहां तक हो सकेगा, कारबार के सिद्धांतों पर कार्य करेगा ।
अध्याय 3
संपत्ति और संविदा
11. केंद्रीय सरकार की आस्तियों और दायित्वों का प्राधिकरण को अंतरण-(1) उस दिन से ही, जो केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, -
(क) उस दिन से ठीक पहले अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय के प्रयोजनों के लिए केंद्रीय सरकार में निहित तथा मुख्य इंजीनियर और प्रशासक, अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय द्वारा प्रशासित सभी संपत्ति और आस्तियां प्राधिकरण में निहित होंगी;
(ख) उस दिन से ठीक पहले अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय के प्रयोजनों के लिए या उसके संबंध में केंद्रीय सरकार द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, की गई सभी संविदाएं और किए जाने के लिए वचनबद्ध सभी मामले और बातें उस प्राधिकरण के द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत की गई या किए जाने के लिए वचनबद्ध समझी जाएंगी;
(ग) अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय के प्रयोजनों के लिए या उनके संबंध में केन्द्रीय सरकार द्वारा उस दिन तक उपगत और पूंजीगत व्यय के रूप में घोषित सभी अनावर्ती व्यय ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो केंद्रीय सरकार द्वारा अवधारित की जाएं, केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण के लिए उपबंधित की गई पूंजी समझे जाएंगे;
(घ) अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय के संबंध में उस दिन से ठीक पहले, केंद्रीय सरकार को देय सभी धनराशियां प्राधिकरण को देय समझी जाएंगी;
(ङ) अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय से संबंधित किसी विषय की बाबत सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां, जो ऐसी तारीख से ठीक पहले केंद्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित किए जाने पर लंबित हैं या जो इस प्रकार संस्थित की जा सकती थीं, ऐसी तारीख को और उसके पश्चात् प्राधिकरण द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जाएंगी या संस्थित की जाएंगी; और
(च) अनन्यतः या मुख्यतः अंतर्देशीय जल परिवहन निदेशालय के ऐसे मामलों के लिए या उनके संबंध में जैसे इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण के कृत्यों से सुसंगत हैं, उस दिन से ठीक पहले, केंद्रीय सरकार के अधीन किसी पद को धारण करने वाला प्रत्येक कर्मचारी प्राधिकरण में प्रतियोजन पर समझा जाएगा किन्तु वह प्राधिकरण में अपने पद को उसी अवधि तक और पारिश्रमिक, छुट्टी, भविष्य निधि, निवृत्ति या अन्य सेवांत सुविधाओं की बाबत सेवा के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर धारण करेगा जिन पर वह ऐसे पद को प्राधिकरण का गठन न होने की दशा में धारण करता और जब तक केंद्रीय सरकार अपनी स्वप्रेरणा से या प्राधिकरण के निवेदन पर उस कर्मचारी को अपनी सेवा पर वापस नहीं बुला लेती है या जब तक प्राधिकरण, केंद्रीय सरकार की सहमति से, उस कर्मचारी को अपनी नियमित सेवा में सम्यक् रूप से आमेलित नहीं कर लेता है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, तब तक वह ऐसा करता रहेगा :
परन्तु ऐसे किसी कर्मचारी के प्राधिकरण में प्रतिनियोजन की अवधि के दौरान प्राधिकरण केंद्रीय सरकार को ऐसे प्रत्येक कर्मचारी के संबंध में, उसकी छुट्टी, वेतन, पेंशन और उपदान हेतु इतना अंशदान करेगा, जितना केंद्रीय सरकार आदेश द्वारा, अवधारित करे:
परन्तु यह और कि कोई ऐसा कर्मचारी प्राधिकरण द्वारा अपनी नियमित सेवा में आमेलित नहीं किया जाएगा जिसने उसे अपनी सेवा में आमेलित करने के प्राधिकरण के प्रस्ताव की बाबत अपना यह आशय कि वह प्राधिकरण का नियमित कर्मचारी नहीं होना चाहता, उतने समय के भीतर जितना प्राधिकरण इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, सूचित कर दिया हो ।
(2) यदि कोई ऐसा विवाद या ऐसी शंका उत्पन्न होती है कि इस धारा के अधीन केंद्रीय सरकार की संपत्तियों, अधिकारों या दायित्वों में से कौन से प्राधिकरण को अंतरित कर दिए गए हैं या केंद्रीय सरकार के अधीन सेवा करने वाले कर्मचारियों में से कौन से प्राधिकरण में प्रतिनियोजन पर माने जाने हैं तो ऐसे विवाद या ऐसी शंका का विनिश्चय प्राधिकरण के परामर्श से केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाएगा और केंद्रीय सरकार का उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।
(3) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी प्राधिकरण द्वारा इस धारा के अधीन अपनी नियमित सेवा में किसी कर्मचारी को आमेलित किया जाना ऐसे कर्मचारी को उस अधिनियम या अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
12. प्राधिकरण द्वारा संविदाएं-धारा 13 के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्राधिकरण इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक कोई संविदा करने और उसका पालन करने के लिए सक्षम होगा ।
13. प्राधिकरण की ओर से संविदाएं निष्पादित करने का ढंग-(1) प्राधिकरण की ओर से प्रत्येक संविदा प्राधिकरण के अध्यक्ष द्वारा या उसके ऐसे अन्य सदस्य या ऐसे अधिकारी द्वारा की जाएगी, जिसे प्राधिकरण इस निमित्त साधारणतया या विशिष्टतया सशक्त करे और ऐसी संविदाएं या ऐसे वर्ग की संविदाएं जैसी विनियमों में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्राधिकरण की सामान्य मुद्रा से मुद्रांकित की जाएंगी:
परन्तु उतने मुल्य या रकम से, जितनी केंद्रीय सरकार समय-समय पर आदेश द्वारा नियत करे, अधिक की कोई संविदा तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि प्राधिकरण द्वारा उसका पूर्व अनुमोदन न कर दिया गया हो:
परन्तु यह और कि स्थावर संपत्ति के अर्जन या विक्रय के लिए या ऐसी किसी संपत्ति के तीस वर्ष से अधिक के पट्टे के लिए कोई संविदा तथा इतने मूल्य या रकम से जितनी केंद्रीय सरकार समय-समय पर आदेश द्वारा इस निमित्त नियत करे, अधिक की कोई अन्य संविदा तब तक नहीं की जाएगी जब तक केंद्रीय सरकार द्वारा उसका पूर्व अनुमोदन न कर दिया गया हो ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, वह प्ररूप और रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन कोई संविदा की जाएगी ऐसी होगी जो विनियमों द्वारा विहित की जाए ।
(3) कोई भी संविदा, जो इस अधिनियम के उपबंधों तथा विनियमों के अनुसार नहीं है, प्राधिकरण पर आबद्धकर नहीं होगी ।
अध्याय 4
प्राधिकरण के कृत्य और शक्तियां
14. प्राधिकरण के कृत्य-(1) प्राधिकरण-
(क) पोत परिवहन और नौ परिवहन के लिए, राष्ट्रीय जलमार्ग और अनुलग्न भूमि के विकास, अनुरक्षण और बेहतर उपयोग के लिए सर्वेक्षण और अन्वेषण कर सकेगा और इस निमित्त स्कीमें तैयार कर सकेगा;
(ख) राष्ट्रीय जलमार्ग के लिए अवसंरचनात्मक सुविधाओं की व्यवस्था कर सकेगा या उनका गठन करने की अनुज्ञा दे सकेगा;
(ग) संरक्षण उपाय और नियंत्रण संकर्म कार्यान्वित कर सकेगा तथा ऐसे सभी अन्य कार्य कर सकेगा, जो पोत परिवहन और नौ परिवहन की सुरक्षा और सुविधा के लिए तथा राष्ट्रीय जलमार्ग के सुधार के लिए आवश्यक हों;
(घ) राष्ट्रीय जलमार्ग के तल और अनुलग्न भूमि में कूड़ा करकट फेंकने, सामग्रियों के संनिक्षेपण या वहां से उनको हटाने जैसे क्रियाकलापों का, जहां तक वे सुरक्षित और दक्ष पोत परिवहन और नौ परिवहन, नाव्य जल सरणियों के अनुरक्षण, नियंत्रण और संरक्षण उपायों को प्रभावित कर सकते हों, नियंत्रण कर सकेगा;
(ङ) राष्ट्रीय जलमार्ग और अनुलग्न भूमि में से ऐसी किसी बाधा या अड़चन को, जो सुरक्षित नौ परिवहन में अड़चन डाल सकती हो या अवसंरचनात्मक सुविधाओं की या संरक्षण उपायों की सुरक्षा को संकटापन्न कर सकती हो, उस दशा में जहां ऐसी बाधा या अड़चन विधिपूर्वक की गई हो या ऐसी बाधा या अड़चन दीर्घकाल तक बने रहने के कारण या अन्यथा विधिपूर्ण हो गई हो, उस व्यक्ति को जिसको ऐसी बाधा के हटाने या परिवर्तन द्वारा नुकसान हो प्रतिकर देने के पश्चात्, हटा सकेगा या परिवर्तित कर सकेगा;
(च) राष्ट्रीय जलमार्ग पर नौ परिवहन और यातायात के (जिसके अंतर्गत पथ नियम भी हैं) विनियमन का उपबंध कर सकेगा;
(छ) राष्ट्रीय जलमार्ग पर, उसके आरपार या उसके नीचे संरचनाओं के सन्निर्माण या परिवर्तन का विनियमन कर सकेगा;
(ज) राष्ट्रीय जलमार्ग के बारे में नौ परिवहन संबंधी, मौसम विज्ञान संबंधी सूचनाओं का प्रसार कर सकेगा;
(झ) राष्ट्रीय जलमार्ग पर अंतर्देशीय जल परिवहन का परिवहन के अन्य प्रकारों से समन्वय सुनिश्चित कर सकेगा;
(ञ) राष्ट्रीय जलमार्ग पर यान मार्गदर्शन की व्यवस्था पर सकेगा और उसे बनाए रख सकेगा; और
[(ट) साधारण शेयर की सहभागिता के रूप में अंतर्देशीय पोत परिवहन से संबंधित सह-उद्यमों में सम्मिलित हो सकेगा ।]
(2) प्राधिकरण निम्नलिखित भी कर सकेगा-
(क) केंद्रीय सरकार को अंतर्देशीय जल परिवहन से संबंधित विषयों पर सलाह देना;
(ख) अंतर्देशीय जल परिवहन का परिवहन के अन्य प्रकारों के साथ समन्वय करने की दृष्टि से परिवहन की अपेक्षाओं का अध्ययन करना;
(ग) जलराशिक सर्वेक्षण और नदी चार्टों का प्रकाशन करना;
(घ) अंतर्देशीय जल परिवहन के विकास के लिए स्कीम बनाने में और उसके कार्यान्वयन में किसी राज्य सरकार की, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो परस्पर तय पाई जाएं, सहायता करना;
(ङ) पोत परिवहन और नौ परिवहन के लिए जलमार्गों की योजना और उसके विकास के या वहां किसी सुविधा के संबंध में भारत में और विदेशों में परामर्शी सेवाओं का विकास करना और ऐसी सेवाएं, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो परस्पर तय पाई जाएं, प्रदान करना;
(च) अंतर्देशीय जल परिवहन से संबंधित विषयों में, जिनके अंतर्गत यान की डिजाइन, देशी नावों का यंत्रीकरण, अनुकर्षण की तकनीक, उतरने की और टर्मिनल सुविधाएं, पत्तन संस्थापन और सर्वेक्षण तकनीकें हैं, अनुसंधान का संचालन करना;
(छ) अंतर्देशीय जलमार्ग के वर्गीकरण के लिए मानक अधिकथित करना;
(ज) देश के भीतर और बाहर अंतर्देशीय जल परिवहन कार्मिकों के लिए तकनीकी प्रशिक्षण के कार्यक्रम की व्यवस्था करना; और
(झ) ऐसे अन्य कृत्य करना जो इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों ।
(3) उपधारा (1) के खंड (ङ) में निर्दिष्ट प्रतिकर से उद्भूत या संबंधित कोई विवाद, लोक प्रयोजनों के लिए अपेक्षित भूमि के मामले में वैसे ही विवादों से संबंधित, विधि के अनुसार अवधारित किया जाएगा ।
(4) उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन कृत्यों को करने के लिए प्राधिकरण द्वारा तैयार की गई प्रत्येक स्कीम, जिसमें उस रकम से, जो विहित की जाए, अधिक पूंजीगत व्यय अन्तर्वलित हो, अनुमोदन के लिए केंद्रीय सरकार को प्रस्तुत की जाएगी ।
(5) केंद्रीय सरकार उपधारा (4) के अधीन उसको प्रस्तुत की गई स्कीम का या तो उपांतरणों के बिना या ऐसे उपांतरणों सहित जो वह आवश्यक समझे अनुमोदन कर सकेगी, या स्कीम को प्राधिकरण को ऐसे निदेशों के साथ नामंजूर कर सकेगी कि वह ऐसे निदेशों के अनुसार एक नई स्कीम तैयार करे ।
15. स्कीमों का संशोधन-प्राधिकरण धारा 14 की उपधारा (5) के अधीन अनुमोदित स्कीम में, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, कोई तात्त्विक तब्दीली नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए तात्त्विक तब्दीली" से स्कीम की लागत में, उसकी लागत से बीस प्रतिशत से अधिक की वृद्धि या फायदे और लागत अनुपात में ऐसी तब्दीली अभिप्रेत है जिससे लागत घटक अनुपात में फायदा से अधिक हो जाता है या फायदा घटक बीस प्रतिशत कम हो जाता है ।
। । । । । । ।
अध्याय 5
वित्त, लेखा और लेखापरीक्षा
17. फीसों और प्रभारों का उद्ग्रहण और संग्रहण-(1) प्राधिकरण, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, फीसें और प्रभार ऐसी दरों पर उद्गृहीत कर सकेगा, जो पोत परिवहन, नौ परिवहन, अवसंरचनात्मक सुविधाओं के, जिनके अन्तर्गत यात्रियों के लिए सुविधाएं और जलयानों को घाट पर लगाने, स्थोरा की उठाई-धराई और स्थोरा के संग्रहण से संबंधित सुविधाएं हैं, प्रयोजनों के लिए राष्ट्रीय जलमार्ग के उपयोग के संबंध में की गई सेवाओं और दी गई सुविधाओं के लिए इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा अधिकथित की जाए ।
(2) उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत फीसें और प्रभार ऐसी रीति से संगृहीत किए जाएंगे जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।
18. केंद्रीय सरकार द्वारा अनुदान और उधार-केंद्रीय सरकार, संसद् द्वारा विधि द्वारा इस निमित्त किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात् प्राधिकरण को ऐसी धनराशि का अनुदान और उधार दे सकेगी जो केंद्रीय सरकार आवश्यक समझे ।
[18क. प्राधिकरण की उधार लेने की शक्तियां-प्राधिकरण, ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपने सभी या किन्हीं कृत्यों के निर्वहन के लिए बंधपत्र, डिबेंचर या अन्य लिखत, जैसा वह ठीक समझे, निर्गमन करके, किसी स्रोत से धन उधार ले सकेगा ।]
19. निधि का गठन-(1) भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण निधि के नाम से एक निधि का गठन किया जाएगा और उसमें-
(क) धारा 18 के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण को दिए गए अनुदान और उधार;
(ख) इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण को प्राप्त हुई सभी फीसें और प्रभार; और
(ग) ऐसे अन्य स्रोतों से जो केंद्रीय सरकार विनिश्चित करे, प्राधिकरण को प्राप्त सभी धनराशियां,
जमा की जांएगी ।
(2) निधि का उपयोजन निम्नलिखित के लिए किया जाएगा, अर्थात्: -
(क) प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य पारिश्रमिक;
(ख) धारा 14 के अधीन प्राधिकरण के कृत्यों के निर्वहन में प्राधिकरण के व्यय; और
(ग) इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत उद्देश्यों और प्रयोजनों पर व्यय ।
20. बजट-प्राधिकरण ऐसे प्ररूप में और प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए आगामी वित्तीय वर्ष के लिए अपना बजट तैयार करेगा जिसमें प्राधिकरण की प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किए जाएंगे और उसे केंद्रीय सरकार को भेजेगा ।
21. निधियों का विनिधान-प्राधिकरण अपनी निधियों का (जिनके अंतर्गत आरक्षित निधि भी है) विनिधान केंद्रीय सरकार की प्रतिभूतियों में या ऐसी अन्य रीति से, जो विहित को जाए, कर सकेगा ।
22. वार्षिक रिपोर्ट-प्राधिकरण ऐसे प्ररूप में और प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा, जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का पूरा विवरण दिया जाएगा और उसकी प्रति केंद्रीय सरकार को भेजेगा ।
23. लेखा और लेखापरीक्षा-प्राधिकरण के लेखा ऐसी रीति से रखे और लेखा परीक्षित किए जाएंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित की जाए, और प्राधिकरण ऐसी तारीख से पूर्व, जो विहित की जाए अपने लेखाओं की लेखापरीक्षित प्रति उस पर लेखापरीक्षक की रिपोर्ट के साथ केंद्रीय सरकार को भेजेगा ।
24. वार्षिक रिपोर्ट और लेखापरीक्षक की रिपोर्ट का संसद् के समक्ष रखा जाना-केंद्रीय सरकार वार्षिक रिपोर्ट और लेखापरीक्षक की रिपोर्ट को, उनकी प्राप्ति के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 6
प्रकीर्ण
25. केंद्रीय सरकार को निदेश देने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में, नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केंद्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित रूप में दे:
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई निदेश दिए जाने के पूर्व प्राधिकरण को अपने विचार व्यक्त करने का यावत्साध्य अवसर दिया जाएगा ।
(2) केंद्रीय सरकार का यह विनिश्चय कि कोई प्रश्न नीति का है या नहीं अंतिम होगा ।
26. प्राधिकरण के लिए भूमि का अनिवार्य अर्जन-प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए अपेक्षित कोई भूमि लोक प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझी जाएगी और ऐसी भूमि का प्राधिकरण के लिए अर्जन भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य तत्समान विधि के उपबंधों के अधीन किया जा सकेगा ।
27. कुछ विधियों का लागू होना आदि-(1) इस अधिनियम के उपबंध भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 (1908 का 15) और महापत्तन न्यास अधिनियम, 1963 (1963 का 38) के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे और विशिष्टतया इस अधिनियम की कोई बात किसी ऐसी अधिकारिता, कृत्यों, शक्तियों और कर्तव्यों पर प्रभाव नहीं डालेगी जिनका प्रयोग, निर्वहन या पालन-
(क) किसी पत्तन संरक्षक द्वारा या भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 (1908 का 15) के अधीन किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, अथवा
(ख) किसी महापत्तन के न्यासी बोर्ड द्वारा या महापत्तन न्यास अधिनियम, 1963 (1963 का 38) के अधीन किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, अंतर्देशीय जलमार्ग (जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय जलमार्ग है) के किसी ऐसे प्रभाग में या उसके संबंध में, जो ऐसे पत्तन या महापत्तन की परिसीमाओं के भीतर आता है,
किया जाना अपेक्षित है ।
(2) इस अधिनियम की किसी बात का राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में घोषित जलमार्ग पर पोत परिवहन और नौ परिवहन के संबंध में अन्तर्देशीय जलयान अधिनियम, 1917 (1917 का 1) या इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व प्रवृत्त भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 (1908 का 15) और महापत्तन न्यास अधिनियम, 1963(1963 का 38) से भिन्न किसी अन्य केन्द्रीय अधिनियम या किसी राज्य या प्रांतीय अधिनियम के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा । । । ।
28. प्रवेश करने की शक्ति-इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त साधारणतया या विशेषतया प्राधिकृत कोई व्यक्ति जब भी इस अधिनियम के किन्हीं प्रयोजनों के लिए ऐसा करना आवश्यक हो तब सभी युक्तियुक्त समयों पर किसी भूमि या परिसर में प्रवेश कर सकेगा, और-
(क) कोई निरीक्षण, सर्वेक्षण, माप, मूल्यांकन या जांच कर सकेगा;
(ख) तल मापन कर सकेगा;
(ग) अवमृदा की खुदाई या वेधन कर सकेगा;
(घ) सीमाओं और कार्य की आशयित रेखाओं को उपवर्णित कर सकेगा;
(ङ) चिह्न लगाकर और खाइयां काट कर ऐसी तल सीमाओं और रेखाओं को चित्रित कर सकेगा; या
(च) ऐसे अन्य कार्य या बातें कर सकेगा, जो विहित की जाएं ।
परंतु ऐसा कोई व्यक्ति किसी भवन में या किसी निवास-गृह से संलग्न किसी परिवृत्त आंगन या उद्यान में प्रवेश (जब तक कि वह प्रवेश उसके अधिभोगी की सहमति से न हो) ऐसे अधिभागी को पहले, ऐसा करने के अपने आशय की कम से कम चौबीस घंटों की लिखित सूचना देकर ही करेगा ।
29. प्रत्यायोजन-प्राधिकरण लिखित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्राधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को (धारा 36 के अधीन शक्तियों को छोड़कर) जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।
30. प्राधिकरण के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन-प्राधिकरण के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष के या इस निमित्त प्राधिकरण द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और प्राधिकरण द्वारा निष्पादित सभी अन्य लिखतें, इस निमित्त प्राधिकरण द्वारा प्राधिकृत प्राधिकरण के किसी अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
31. प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के सभी सदस्य, अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जब वे इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या उनका ऐसा कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ।
32. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों अथवा विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के बारे में कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही सरकार या सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकरण के किसी सदस्य अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
(2) इस अधिनियम या नियमों अथवा विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए तात्पर्यित किसी बात से कारित या कारित होने के लिए संभाव्य किसी नुकसान के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही प्राधिकरण के विरुद्ध नहीं होगी और विशेषतया प्राधिकरण का यह उत्तरदायित्व नहीं होगा कि वह ऐसे अनुतोष उपायों के लिए उपबंध करे जो बाढ़ या संकर्मों के टूट जाने और पूरा न होने के कारण आवश्यक हो गए हैं ।
33. केंद्रीय सरकार की प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि किसी समय केंद्रीय सरकार की यह राय हो कि-
(क) गंभीर आपात के कारण प्राधिकरण इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या इसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है; या
(ख) प्राधिकरण ने केंद्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए किसी निदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में बार-बार व्यतिक्रम किया है और उस व्यतिक्रम के फलस्वरूप प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति या किसी राष्ट्रीय जलमार्ग के प्रशासन को हानि हुई है; या
(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है,
तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अधिक से अधिक छह मास की इतनी अवधि के लिए जितनी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगी:
परन्तु खण्ड (ख) में वर्णित कारणों से इस उपधारा के अधीन कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण को यह कारण दर्शित करने के लिए उचित अवसर देगी कि उसे अतिष्ठित क्यों न कर दिया जाए और प्राधिकरण के स्पष्टीकरणों और आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -
(क) सभी सदस्य, अतिष्ठित किए जाने की तारीख से, उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे;
(ख) उन सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका प्रयोग या निर्वहन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है, प्रयोग और निर्वहन, तब तक जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा, जिन्हें केन्द्रीय सरकार निदेश दे;
(ग) प्राधिकरण के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन सभी संपत्ति तब तक जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है केंद्रीय सरकार में निहित होगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठिति काल की समाप्ित पर, केंद्रीय सरकार-
(क) अतिष्ठिति काल को अधिक से अधिक छह मास तक की इतनी अतिरिक्त अवधि के लिए बढ़ा सकेगी जितनी वह आवश्यक समझे; या
(ख) नई नियुक्ति द्वारा प्राधिकरण का पुनर्गठन कर सकेगी और ऐसी दशा में वे व्यक्ति जिन्होंने उपधारा (2) के खण्ड (क) के अधीन अपने पद रिक्त किए हैं, नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझे जाएंगे:
परन्तु केंद्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन मूलतः विनिर्दिष्ट अथवा इस उपधारा के अधीन बढ़ाई गई अतिष्ठिति काल की समाप्ति के पूर्व किसी समय, इस उपधारा के खंड (ख) के अधीन कार्रवाई कर सकेगी ।
(4) केंद्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना को और इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई की तथा उन परिस्थितियों की जिनके कारण ऐसी कार्रवाई की गई है, पूरी रिपोर्ट शीघ्रतातिशीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
34. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) धारा 4 के अधीन प्राधिकरण के सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें;
(ख) धारा 5 के अधीन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की शक्तियां और कर्तव्य;
(ग) धारा 9 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट सलाहकार समिति से संबंधित विषय;
(घ) धारा 14 की उपधारा (4) के अधीन विहित किए जाने के लिए अपेक्षित रकम;
(ङ) वह रीति जिसमें और वह समय जब, प्राधिकरण धारा 20 के अधीन अपना बजट और धारा 22 के अधीन अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा;
(च) वह रीति जिसमें प्राधिकरण धारा 21 के अधीन अपनी निधियों का विनिधान कर सकेगा;
(छ) वह रीति जिसमें प्राधिकरण के लेखा धारा 23 के अधीन रखे और लेखापरीक्षित किए जाएंगे;
(ज) धारा 28 के अधीन प्रवेश करने की शक्ति के प्रयोग के संबंध में शर्तें और निर्बंधन और उस धारा के खंड (च) में विनिर्दिष्ट विषय; और
(झ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जा सकता है या जिसके संबंध में नियमों द्वारा उपबंध किया जाना है या किया जा सकता है ।
35. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम और नियमों से संगत विनियम साधारणतया इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) वह रीति जिसमें और वे प्रयोजन जिनके लिए प्राधिकरण धारा 3 की उपधारा (4) के अधीन किसी व्यक्ति को अपने साथ सहयुक्त कर सकेगा;
(ख) धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के सचिव और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें;
(ग) ऐसी संविदाएं या ऐसे वर्ग की संविदाएं जो प्राधिकरण की सामान्य मुद्रा से मुद्रांकित की जानी है और वह रीति और प्ररूप जिसमें प्राधिकरण द्वारा संविदा की जा सकेगी;
(घ) वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए धारा 14 की उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट विषयों के संबंध में कोई कृत्य किए जा सकेंगे;
(ङ) राष्ट्रीय जलमार्ग पर पथ के नियम;
(च) अवसंरचनाओं और अवसंरचनात्मक सुविधाओं का सुरक्षित, दक्षतापूर्ण और सुविधाजनक उपयोग, प्रबंध और नियंत्रण;
(छ) राष्ट्रीय जलमार्ग पर लाए गए माल का ग्रहण, ढुलाई, भंडारकरण और हटाया जाना और ऐसे माल को, जिसको उतारने से पूर्व नुकसान हुआ हो या जिसके बारे में इस प्रकार नुकसान होने का अभिकथन किया गया हो, भारसाधन में लेने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;
(ज) ऐसे डाकों, घाटों, जेट्टियों और उतराई मंचों को जिन पर माल जलयानों से उतारा जाएगा और जलयानों के फलक पर लादा जाएगा, विनियमित करना, घोषित करना और परिभाषित करना;
(झ) वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन राष्ट्रीय जलमार्ग पर, जलयानों पर माल लादा और उनसे उतारा जाएगा, विनियमित करना;
(ञ) उपद्रवियों या अन्य अवांछनीय व्यक्तियों तथा अतिचारियों को राष्ट्रीय जलमार्ग से हटाना;
[(ट) बंधपत्रों, डिबेंचरों या अन्य लिखतों को जारी करने के लिए निबंधन और शर्तें; और
(ठ) अपनी बैठकों में कारबार करने के संबंध में समय, स्थान और प्रक्रिया के नियम, जिनके अंतर्गत धारा 5क की उपधारा (1) के अधीन उसकी गणपूर्ति भी है ।]
(3) उपधारा (2) के खंड (ग) से खंड (ञ) तक के अधीन बनाए गए किसी विनियम में यह उपबन्ध किया जा सकेगा कि उसका उल्लंघन जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और जहां ऐसा उल्लंघन चालू रहता है वहां ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन, ऐसे प्रथम उल्लंघन के लिए दोषसिद्ध के पश्चात् चालू रहता है, बीस रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
36. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यदि अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन, यथास्थिति, उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह नियम या विनियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु उस नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
37. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत ऐसे उपबंध कर सकेगी जो उसे ऐसी कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
38. 1982 के अधिनियम 49 का संशोधन-राष्ट्रीय जलमार्ग (गंगा-भागीरथी-हुगली नदी इलाहाबाद-हलदिया खण्ड) अधिनियम, 1982 में, -
(क) धारा 3 में केन्द्रीय सरकार" शब्दों के स्थान पर संघ" शब्द रखा जाएगा और इसमें उपबंधित विस्तार तक" शब्दों के स्थान पर भारतीय अन्तर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985 में उपबंधित विस्तार तक" शब्द और अंक रखे जाएंगे;
(ख) धारा 4 से लेकर धारा 15 तक का लोप किया जाएगा ।
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